लखनऊ सादी साड़ी में बस चढ़ीं SDM मैडम — टिकट चेकिंग के वक्त इंस्पेक्टर की करतूत उजागर!

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लखनऊ की सच्चाई

दिसंबर 2022 की एक ठंडी सुबह थी, और लखनऊ शहर अब भी धुंध की हल्की चादर में लिपटा हुआ था। सड़कों पर ओस की बूंदें चमक रही थीं और कहीं-कहीं से गरम मसाला चाय की खुशबू हवा में घुल रही थी। धीरे-धीरे शहर जागने लगा। हॉर्न की आवाजें, फूल बेचती बुजुर्ग औरतों की पुकारें और मंदिर की घंटियां सब मिलकर एक नए दिन की शुरुआत का ऐलान कर रहे थे।

इसी भीड़ में एक सादी सी बेरंग साड़ी पहने एक महिला रिक्शे से उतरी, जिसके हाथ में एक पुराना कपड़े का थैला था। उसके चेहरे पर सुकून और आंखों में गहराई थी। कोई नहीं जानता था कि वह महिला दरअसल एसडीएम प्रिया शर्मा हैं, जो लखनऊ जिले के प्रशासनिक विभाग की एक ईमानदार अधिकारी हैं और आज एक गुप्त निरीक्षण पर निकली थीं। उन्होंने अपनी कुर्सी और सरकारी गाड़ी छोड़ दी थी क्योंकि उन्होंने तय किया था कि वह आम लोगों के बीच जाकर बिना अपनी पहचान बताए सच्चाई देखेंगे।

वह धीरे-धीरे बस नंबर 37 में चढ़ी, जो शहर का सबसे भीड़भाड़ वाला और अव्यवस्थित रूट माना जाता है। बस में कदम रखते ही उन्होंने ठंडी हवा में एक लंबी सांस ली और पीछे की सीट पर जाकर बैठ गई। किसी को अंदाजा भी नहीं था कि इस बस में एक ऐसी घटना होने वाली है जो कई लोगों की जिंदगी बदल देगी।

बस नंबर 37 धीरे-धीरे डिपो से आगे बढ़ रही थी। अंदर लोगों की भाप जैसी सांसें, गीली ऊनी शॉल की गंध और खिड़कियों पर जमी ठंडी धुंध मिलकर एक अलग ही दुनिया बना रही थी। कंडक्टर ने छत से लटकती रस्सी खींचकर अगला स्टॉप पुकारा, और तभी भीड़ में हलचल हुई। सामने वाले दरवाजे से भारी कदमों की आहट के साथ निरीक्षक रमेश तिवारी बस में चढ़े। उनकी टोपी थोड़ी तिरछी थी, जैकेट का बटन खुला हुआ और हाथ में टिकट चेकिंग का मोटा रजिस्टर था। उनके चेहरे पर वैसी ही कड़वाहट थी जो अक्सर छोटी ताकत का बड़ा प्रदर्शन करती है।

तिवारी ने बस में नजर दौड़ाई, जैसे कोई किसान पक्की फसलों पर निगाह डालता है कि कहां से काटना आसान रहेगा। उनकी आंखें सीधे पीछे नहीं गईं। वे पहले ही डिब्बे में ठिठक गए, जहां दो मजदूर अपने टिफिन की गंध के साथ बैठे थे। उन्होंने बिना कुछ पूछे दहाड़ते हुए कहा, “टिकट दिखाओ।” दोनों जल्दी-जल्दी अपनी जेबें टटोलने लगे। एक ने मुड़े-थोड़े टिकट दिखा दिए, पर दूसरे का टिकट शायद पसीने में भीग कर जेब की तहों से चिपक गया था। तिवारी की भौहें सिकुड़ गईं। उन्होंने उस मजदूर को थप्पड़ तो नहीं मारा, पर उनकी आवाज में वही चोट थी जब उन्होंने कहा, “फर्जी ड्रामा मत करो। ₹50 निकालो वरना चालान कटेगा और थाने चलना पड़ेगा।”

बस में सन्नाटा छा गया। खिड़की से बाहर देख रहे लोग भीतर झांकने लगे। किसी के होठों से दुआ निकली तो किसी के माथे पर पसीना आ गया। प्रिया शर्मा पीछे की सीट पर शांत बैठी रही। उनकी आंखें निरीक्षक के चेहरे पर नहीं बल्कि उसके अंदाज पर थीं। वे देख रही थीं कि वह किसे चुनता है, किसे डराता है और कहां कानून का हवाला देकर उसे अपनी जेब में डालता है।

तभी बीच की सीट पर बैठे एक दुबले-पतले लड़के ने कांपते हुए हाथ उठाया और कहा, “सर, मेरा टिकट अभी तक बना नहीं है। मैंने चढ़ते ही कंडक्टर को पैसे दिए थे।” कंडक्टर भीड़ के बीच रस्सी थामे थोड़ा सकुचाया और बोला कि स्टॉप पास था इसलिए भीड़ में रह गया। उस लड़के का नाम राहुल वर्मा था, और उसके बैग से झांकती इंजीनियरिंग की किताबें बता रही थीं कि वह एक मेहनती छात्र है। तिवारी उसे ठंडी नजरों से ऐसे देखने लगे जैसे कोई कमजोर शिकार मिल गया हो। उन्होंने कहा, “नियम जानते हो, बिना टिकट यात्रा अपराध है। अभी ₹50 निकालो, रसीद बाद में मिल जाएगी।”

राहुल की आंखों में घबराहट थी, पर उसके गालों पर जिद की लकीर भी थी। उसने थरथराती आवाज में कहा कि उसके पास सिर्फ ₹100 हैं जिससे उसे नोट्स की फोटो स्टार्ट करानी है। इसलिए वह जुर्माना रसीद के साथ ही देगा। तिवारी के चेहरे पर तिरस्कार आ गया और उन्होंने कहा कि रसीद का नाम मत लो, बस पैसे निकालो। तभी एक बुजुर्ग महिला, शांता देवी, उठीं, जिनकी हथेलियों में गेंदे के फूलों की खुशबू और समय का खुरदरापन था। वे रोज इसी बस से मंडी जाती थीं। उन्होंने बड़े धैर्य से कहा, “बेटा, लड़का कह रहा है तो रसीद दे दो। बिना रसीद के पैसा लेना ठीक नहीं है।”

तिवारी ने उन्हें झिड़कते हुए कहा, “अम्मा, आप बैठिए और हमें नौकरी मत सिखाइए।” भीड़ सहम गई। प्रिया के माथे पर शिकन उभरी क्योंकि वे अब केवल दर्शक नहीं रहना चाहती थीं। पर उनका उद्देश्य निरीक्षक की असलियत को एक प्रक्रिया के तहत खोलना था। उन्होंने अपना थैला ऊपर खिसकाया ताकि पहचान पत्र तक पहुंचना आसान रहे। वे देख रही थीं कि तिवारी केवल असहाय लोगों को निशाना बना रहे हैं।

बस अगले स्टॉप पर रुकी और हलचल के बीच तिवारी की नजर एक ऐसी स्त्री पर पड़ी जिसकी गोद में बच्चा था। उसने टिकट कंगन के नीचे दबा रखा था। पर दिखाने का मौका नहीं मिला था। तिवारी ने उस पर चिल्लाकर पैसे मांगे। भीड़ में करुणा की लहर उठी, पर डर से सब चुप रहे। तभी राहुल ने अपने पुराने फोन का कैमरा चालू कर दिया और पूछा, “सर, क्या यह सरकारी कार्रवाई है जिसमें आप बिना रसीद नकद मांग रहे हैं?” तिवारी ने उसे कैमरा बंद करने की धमकी दी।

प्रिया अब आगे की ओर झुकी जैसे कोई बुजुर्ग बीच-बचाव करने आता है। तिवारी ने उनसे भी टिकट मांगा तो प्रिया ने जानबूझकर समय लिया और कहा कि अभी बनवाया नहीं है। तिवारी की आंखों में चमक आ गई और उन्होंने तुरंत ₹50 मांगे। प्रिया ने धीमे से रसीद मांगी तो तिवारी हंसकर बोले, “सरकार से बहुत प्रेम है क्या?” राहुल का कैमरा सब रिकॉर्ड कर रहा था। शांता देवी ने फिर से बोली कि सही काम से ही इज्जत मिलती है। तिवारी झल्लाकर उनके पीछे पड़ गए। लेकिन शांता देवी ने अपना टिकट दिखा दिया।

बस अब हजरतगंज की ओर मुड़ रही थी। प्रिया उठीं और उस बच्चे वाली स्त्री के पास जाकर उन्हें दिलासा दिया कि कानून भय नहीं, भरोसा होना चाहिए। फिर वे सीधे तिवारी के सामने खड़ी हो गईं। बस में तूफान से पहले वाला मौन था। तिवारी ने पूछा, “आप कौन होती हैं?” प्रिया ने शांत पर दृढ़ स्वर में कहा कि अभी आपने मुझसे बिना रसीद पैसे मांगे। यह किस नियम के तहत है? तिवारी ने ठहाका मारते हुए अपने निरीक्षक होने का रब दिखाया। प्रिया ने अपनी आंखों में दृढ़ता लाते हुए राहुल की ओर देखा, जिसने इशारा किया कि वीडियो बन रहा है।

भीड़ अब एक दिशा में खड़ी थी। राहुल ने साहस बटोर कर कहा कि बिना रसीद पैसे लेना भ्रष्टाचार है। कंडक्टर ने भी झिझकते हुए कहा कि रसीदें खत्म नहीं हुई हैं। तिवारी घबरा गए। प्रिया ने देखा कि अब पहचान बताने का समय आ गया है। उन्होंने अपना पहचान पत्र निकाला जिस पर उपजिलाधिकारी लखनऊ प्रिया शर्मा लिखा था। नाम सुनते ही बस में सनसनी फैल गई। कंडक्टर ने अनायास सिर झुका लिया और तिवारी के चेहरे की कड़वाहट सूख कर पपड़ी बन गई।

उन्होंने हकलाते हुए माफी मांगनी चाही, पर प्रिया ने बीच में ही कहा कि आपने जनता के भरोसे पर हाथ डाला है। आज यह नहीं चलेगा। उन्होंने तुरंत रजिस्टर सील करने और नकद की गिनती अलग से करने का आदेश दिया। तिवारी ने बोलना चाहा पर शब्द गले में फंस गए। प्रिया की दीप्त आवाज गूंजी कि आपने जनता के भरोसे पर हाथ डाला है। तभी पीछे से पहली तालियां बजी और देखते ही देखते पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। राहुल का कैमरा ऐतिहासिक लम्हों को कैद कर रहा था।

शांता देवी ने मुस्कुराकर प्रिया को दुआएं दीं। प्रिया ने उस स्त्री का जुर्माना माफ किया और समझाया कि कानून डर नहीं सहारा है। कंडक्टर ने रजिस्टर सील किया और तिवारी बहुत धीमे स्वर में गलती स्वीकार करने लगे। प्रिया ने कठोरता से कहा कि यह गलती नहीं, गलत नियत से किया गया दुराचार है। उन्होंने यात्रियों से कहा कि जब हम चुप रहते हैं तो भ्रष्टाचार बढ़ता है और जब हम खड़े होते हैं तो यह रुकता है।

बाहर धुंध छटने लगी थी और बस में लोगों के चेहरों पर एक नई रोशनी थी। राहुल ने कैमरा नीचे किया। उसकी उंगलियां अब कांप नहीं रही थीं। शांता देवी ने राहुल से कहा कि इस वीडियो को संभाल कर रखना। यह दूसरों का सहारा बनेगा। प्रिया ने राहुल और शांता देवी को अपने दफ्तर बुलाया। बस हजरतगंज के सिग्नल पर रुकी। लाल बत्ती होने पर भी सबके भीतर एक सकारात्मक लहर दौड़ रही थी।

प्रिया ने खिड़की से बाहर देखते हुए सोचने लगी कि सत्ता नहीं बल्कि सही नियत ही न्याय का आधार है। सिग्नल हरा हुआ और बस आगे बढ़ गई। तिवारी अपनी सीट पर सिमट कर बैठ गए। और भीड़ में कोई मुस्कुरा रहा था तो कोई खुद से वादा कर रहा था कि अब अन्याय पर चुप नहीं रहेगा। प्रिया ने अपने थैले को कसकर पकड़ा और मन ही मन कहा कि न्याय ताज से नहीं नियत से चलता है।

उनके शब्द बस की छत से टकराकर हर यात्री के दिल में बैठ गए। यह मोड़ बस के भीतर था। पर इसकी गूंज पूरे शहर में जाने वाली थी। अगले दिन की सुबह लखनऊ की गलियों में वही ठंडी हवा थी। पर कुछ अलग था। चाय के ठेलों पर आज राजनीति की नहीं बल्कि बस नंबर 37 की चर्चा थी। अखबार के पहले पन्ने पर बड़ी हेडलाइन थी। एसडीएम ने बस में पकड़ा रिश्वतखोर निरीक्षक, वीडियो वायरल।

राहुल का वह वीडियो जो उसने अपने पुराने फोन में रिकॉर्ड किया था, अब हर मोबाइल स्क्रीन पर था। उसमें निरीक्षक रमेश तिवारी का हड़काना, यात्रियों का डर और फिर वो क्षण साफ दिख रहा था जब प्रिया शर्मा ने अपना पहचान पत्र दिखाया था। वीडियो के अंत में यात्रियों की तालियां और प्रिया की शांत आवाज, “कानून भरोसा है। डर नहीं,” जैसे किसी पुराने जमाने के गीत का नया अंत बन गई थी।

शहर में लोग एक-दूसरे से कहने लगे कि ऐसे अधिकारी ही देश को बदल सकते हैं। स्कूलों में बच्चों को वह वीडियो दिखाया जा रहा था ताकि वे समझ सकें कि सच्चाई बोलने से डरना नहीं चाहिए। यहां तक कि सरकारी दफ्तरों में भी अफसर चर्चा कर रहे थे कि अब किसी को नहीं छोड़ा जाएगा। पर सबसे ज्यादा असर रमेश तिवारी पर पड़ा। वो उस दिन के बाद से ऑफिस नहीं आया था। फोन बंद था और घर का दरवाजा अंदर से बंद था। पड़ोसी कहते थे कि कल तक जो लोगों पर चिल्लाता था, आज खुद चुप है।

समाज ने उसे पहले ही बेईमान का ठप्पा लगाकर सजा सुना दी थी। फिर भी प्रिया शर्मा के मन में हलचल थी। वह जानती थी कि एक आदमी की गलती के पीछे अक्सर एक भ्रष्ट व्यवस्था की परतें होती हैं। वह सोचने लगी कि क्या रमेश तिवारी अकेला दोषी था? या वह पूरी व्यवस्था जिसने छोटे अफसरों को डर और लालच के बीच फंसा दिया था।

उस शाम जब सूर्य की आखिरी किरणें दफ्तर की खिड़की से अंदर आ रही थीं। प्रिया ने फाइल बंद की और सचिव से कहा कि वे रमेश तिवारी को बुलाएं। वह उससे मिलना चाहती हैं। सचिव ने चौंक कर कहा कि उसके खिलाफ सबूत पक्के हैं और निलंबन तय है। प्रिया ने शांत स्वर में कहा, “मुझे उसके खिलाफ नहीं, उसके भीतर के इंसान से बात करनी है।”

अगले दिन जब तिवारी को सरकारी आदेश मिलने वाला था, उसे एसडीएम ऑफिस बुलाया गया। वह घबराया हुआ था। चेहरा मुरझाया और बाल बिखरे हुए थे। प्रिया की आंखों में ना घृणा थी ना क्रोध। सिर्फ स्थिरता थी। उन्होंने कहा, “बैठिए तिवारी जी। मुझे पता है जो आपने किया वह गलत था। पर मैं जानना चाहती हूं कि आपने ऐसा क्यों किया।”

कुछ पल के सन्नाटे के बाद तिवारी की आवाज टूटी हुई निकली। उसने बताया कि 20 साल से वह यही देख रहा है। ना स्टाफ है ना मदद, बस हर दिन की भीड़। गाली और तनाव धीरे-धीरे आदत बन गई। उसने स्वीकार किया कि वह गलत था पर अकेला नहीं था। प्रिया ने उसकी बात सुनी और कहा कि ईमानदारी चली जाए तो पद केवल कुर्सी रह जाता है।

उन्होंने तिवारी को एक मौका दिया कि वह उसी बस स्टॉप पर जाकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगे और लोगों को बताएं कि रिश्वत क्या नुकसान करती है। तिवारी की आंखें भर आईं और उसने पूछा कि क्या लोग उसे माफ करेंगे? प्रिया ने कहा कि शायद सब नहीं। पर अगर एक बच्चा भी इसे देखकर सही रास्ता चुने तो वह माफी से बड़ा इनाम होगा।

तीन दिन बाद बस नंबर 37 फिर उसी स्टॉप पर रुकी। इस बार कैमरा राहुल के फोन में नहीं बल्कि पत्रकारों के पास था। कांपती आवाज में तिवारी ने माइक पर अपनी गलती मानी और वादा किया कि अब वह किसी यात्री से बिना रसीद एक भी नहीं लेगा। बस में खामोशी थी। प्रिया पीछे खड़ी थीं। उन्होंने कहा कि जब गलती मान ली जाती है तब न्याय सिर्फ सजा नहीं बल्कि सुधार बन जाता है।

उस दिन से लखनऊ परिवहन विभाग में नया नियम लागू हुआ कि हर निरीक्षक के पास बॉडी कैमरा रहेगा और सभी भुगतान डिजिटल होंगे। यह बदलाव बस नंबर 37 की घटना से आया था। जिसे अब लोग न्याय की बस कहने लगे थे। राहुल कॉलेज का हीरो बन गया और उसे राज्य प्रशासन से ईमानदारी पुरस्कार मिला।

प्रिया के चेहरे पर वही शांति थी। पर भीतर एक नई रोशनी। उन्होंने देखा कि कैसे एक छोटे से कार्य ने पूरे तंत्र में हलचल मचा दी और अब रसीद देना इज्जत का सवाल बन गया था। उन्हें शांता देवी की एक चिट्ठी मिली जिसमें लिखा था कि उनकी वजह से उनके बेटे ने झूठ बोलना बंद कर दिया है।

हालांकि दफ्तर में कुछ लोग इसे दिखावा कहते थे। प्रिया को अपनी सच्चाई पर भरोसा था। जल्द ही उन्हें राज्यपाल का बुलावा आया। जिन्होंने उन्हें लोक सेवा नैतिकता कार्यक्रम का नेतृत्व करने को कहा। अब वे हर जिले में जाकर कर्मचारियों को सिखाती थीं कि ईमानदारी जीवन का तरीका है।

एक दिन, जब प्रिया ने देखा कि एक युवा अधिकारी आरव सिंह बस नंबर 37 की कहानी से प्रेरित होकर अपने जिले में आवाज मंच शुरू करना चाहते थे। प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबूती से उठाए।

समय बीतता गया और लखनऊ की हवा में अब बस नंबर 37 की गूंज थी। जो उस भरोसे का प्रतीक बन गई थी जिसे आम लोगों ने अपने अधिकारों के लिए फिर से महसूस किया था। प्रिया के लिए यह गौरव का नहीं, जिम्मेदारी का क्षण था।

उन्होंने देखा कि कैसे एक छोटे से कार्य ने पूरे तंत्र में हलचल मचा दी और अब रसीद देना इज्जत का सवाल बन गया था। उन्हें शांता देवी की एक चिट्ठी मिली जिसमें लिखा था कि उनकी वजह से उनके बेटे ने झूठ बोलना बंद कर दिया है।

हालांकि दफ्तर में कुछ लोग इसे दिखावा कहते थे। प्रिया को अपनी सच्चाई पर भरोसा था। जल्द ही उन्हें राज्यपाल का बुलावा आया। जिन्होंने उन्हें लोक सेवा नैतिकता कार्यक्रम का नेतृत्व करने को कहा। अब वे हर जिले में जाकर कर्मचारियों को सिखाती थीं कि ईमानदारी जीवन का तरीका है।

एक दिन, जब प्रिया ने देखा कि एक युवा अधिकारी आरव सिंह बस नंबर 37 की कहानी से प्रेरित होकर अपने जिले में आवाज मंच शुरू करना चाहते थे। प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबूती से उठाए।

समय बीतता गया और लखनऊ की हवा में अब बस नंबर 37 की गूंज थी। जो उस भरोसे का प्रतीक बन गई थी जिसे आम लोगों ने अपने अधिकारों के लिए फिर से महसूस किया था।

प्रिया के लिए यह गौरव का नहीं, जिम्मेदारी का क्षण था। उन्होंने देखा कि कैसे एक छोटे से कार्य ने पूरे तंत्र में हलचल मचा दी और अब रसीद देना इज्जत का सवाल बन गया था।

उन्हें शांता देवी की एक चिट्ठी मिली जिसमें लिखा था कि उनकी वजह से उनके बेटे ने झूठ बोलना बंद कर दिया है।

हालांकि दफ्तर में कुछ लोग इसे दिखावा कहते थे। प्रिया को अपनी सच्चाई पर भरोसा था। जल्द ही उन्हें राज्यपाल का बुलावा आया। जिन्होंने उन्हें लोक सेवा नैतिकता कार्यक्रम का नेतृत्व करने को कहा।

अब वे हर जिले में जाकर कर्मचारियों को सिखाती थीं कि ईमानदारी जीवन का तरीका है। एक दिन, जब प्रिया ने देखा कि एक युवा अधिकारी आरव सिंह बस नंबर 37 की कहानी से प्रेरित होकर अपने जिले में आवाज मंच शुरू करना चाहते थे।

प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबूती से उठाए। समय बीतता गया और लखनऊ की हवा में अब बस नंबर 37 की गूंज थी।

जो उस भरोसे का प्रतीक बन गई थी जिसे आम लोगों ने अपने अधिकारों के लिए फिर से महसूस किया था।

प्रिया के लिए यह गौरव का नहीं, जिम्मेदारी का क्षण था। उन्होंने देखा कि कैसे एक छोटे से कार्य ने पूरे तंत्र में हलचल मचा दी और अब रसीद देना इज्जत का सवाल बन गया था।

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हालांकि दफ्तर में कुछ लोग इसे दिखावा कहते थे। प्रिया को अपनी सच्चाई पर भरोसा था। जल्द ही उन्हें राज्यपाल का बुलावा आया।

जिन्होंने उन्हें लोक सेवा नैतिकता कार्यक्रम का नेतृत्व करने को कहा। अब वे हर जिले में जाकर कर्मचारियों को सिखाती थीं कि ईमानदारी जीवन का तरीका है।

एक दिन, जब प्रिया ने देखा कि एक युवा अधिकारी आरव सिंह बस नंबर 37 की कहानी से प्रेरित होकर अपने जिले में आवाज मंच शुरू करना चाहते थे।

प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबूती से उठाए।

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प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबती से उठाए।

समय बीतता गया और लखनऊ की हवा में अब बस नंबर 37 की गूंज थी।

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जल्द ही उन्हें राज्यपाल का बुलावा आया।

जिन्होंने उन्हें लोक सेवा नैतिकता कार्यक्रम का नेतृत्व करने को कहा।

अब वे हर जिले में जाकर कर्मचारियों को सिखाती थीं कि ईमानदारी जीवन का तरीका है।

एक दिन, जब प्रिया ने देखा कि एक युवा अधिकारी आरव सिंह बस नंबर 37 की कहानी से प्रेरित होकर अपने जिले में आवाज मंच शुरू करना चाहते थे।

प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबती से उठाए।

समय बीतता गया और लखनऊ की हवा में अब बस नंबर 37 की गूंज थी।

जो उस भरोसे का प्रतीक बन गई थी जिसे आम लोगों ने अपने अधिकारों के लिए फिर से महसूस किया था।

प्रिया के लिए यह गौरव का नहीं, जिम्मेदारी का क्षण था।

उन्होंने देखा कि कैसे एक छोटे से कार्य ने पूरे तंत्र में हलचल मचा दी और अब रसीद देना इज्जत का सवाल बन गया था।

उन्हें शांता देवी की एक चिट्ठी मिली जिसमें लिखा था कि उनकी वजह से उनके बेटे ने झूठ बोलना बंद कर दिया है।

हालांकि दफ्तर में कुछ लोग इसे दिखावा कहते थे। प्रिया को अपनी सच्चाई पर भरोसा था।

जल्द ही उन्हें राज्यपाल का बुलावा आया।

जिन्होंने उन्हें लोक सेवा नैतिकता कार्यक्रम का नेतृत्व करने को कहा।

अब वे हर जिले में जाकर कर्मचारियों को सिखाती थीं कि ईमानदारी जीवन का तरीका है।

एक दिन, जब प्रिया ने देखा कि एक युवा अधिकारी आरव सिंह बस नंबर 37 की कहानी से प्रेरित होकर अपने जिले में आवाज मंच शुरू करना चाहते थे।

प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबती से उठाए।

समय बीतता गया और लखनऊ की हवा में अब बस नंबर 37 की गूंज थी।

जो उस भरोसे का प्रतीक बन गई थी जिसे आम लोगों ने अपने अधिकारों के लिए फिर से महसूस किया था।

प्रिया के लिए यह गौरव का नहीं, जिम्मेदारी का क्षण था।

उन्होंने देखा कि कैसे एक छोटे से कार्य ने पूरे तंत्र में हलचल मचा दी और अब रसीद देना इज्जत का सवाल बन गया था।

उन्हें शांता देवी की एक चिट्ठी मिली जिसमें लिखा था कि उनकी वजह से उनके बेटे ने झूठ बोलना बंद कर दिया है।

हालांकि दफ्तर में कुछ लोग इसे दिखावा कहते थे। प्रिया को अपनी सच्चाई पर भरोसा था।

जल्द ही उन्हें राज्यपाल का बुलावा आया।

जिन्होंने उन्हें लोक सेवा नैतिकता कार्यक्रम का नेतृत्व करने को कहा।

अब वे हर जिले में जाकर कर्मचारियों को सिखाती थीं कि ईमानदारी जीवन का तरीका है।

एक दिन, जब प्रिया ने देखा कि एक युवा अधिकारी आरव सिंह बस नंबर 37 की कहानी से प्रेरित होकर अपने जिले में आवाज मंच शुरू करना चाहते थे।

प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबती से उठाए।

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प्रिया के लिए यह गौरव का नहीं, जिम्मेदारी का क्षण था।

उन्होंने देखा कि कैसे एक छोटे से कार्य ने पूरे तंत्र में हलचल मचा दी और अब रसीद देना इज्जत का सवाल बन गया था।

उन्हें शांता देवी की एक चिट्ठी मिली जिसमें लिखा था कि उनकी वजह से उनके बेटे ने झूठ बोलना बंद कर दिया है।

हालांकि दफ्तर में कुछ लोग इसे दिखावा कहते थे। प्रिया को अपनी सच्चाई पर भरोसा था।

जल्द ही उन्हें राज्यपाल का बुलावा आया।

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एक दिन, जब प्रिया ने देखा कि एक युवा अधिकारी आरव सिंह बस नंबर 37 की कहानी से प्रेरित होकर अपने जिले में आवाज मंच शुरू करना चाहते थे।

प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबती से उठाए।

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प्रिया के लिए यह गौरव का नहीं, जिम्मेदारी का क्षण था।

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हालांकि दफ्तर में कुछ लोग इसे दिखावा कहते थे। प्रिया को अपनी सच्चाई पर भरोसा था।

जल्द ही उन्हें राज्यपाल का बुलावा आया।

जिन्होंने उन्हें लोक सेवा नैतिकता कार्यक्रम का नेतृत्व करने को कहा।

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प्रिया ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आवाज को मजबती से उठाए।

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प्रिया के लिए यह गौरव का नहीं, जिम्मेदारी का क्षण था।

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