लोग जिस पागल को पत्थर मार रहे थे 😢… आर्मी चीफ ने गाड़ी रोककर उसे सैल्यूट क्यों किया?

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लोग जिस पागल को पत्थर मार रहे थे

दोपहर के ठीक दो बज रहे थे।
मई की तपती गर्मी उत्तर भारत के उस छोटे से शहर को जैसे जला रही थी। घंटाघर चौक पर सड़क की डामर पिघलने को तैयार थी। हवा में लू के थपेड़े थे और भीड़ अपने-अपने काम में उलझी हुई थी।

उसी चौराहे के एक कोने में, कूड़े के ढेर के पास, एक आदमी बैठा था।

उसके बाल जटाओं की तरह उलझे हुए थे। चेहरे पर महीनों पुरानी दाढ़ी। कपड़ों के नाम पर बदन से लटकते फटे-पुराने चीथड़े। पैरों में बिना जोड़ी की चप्पलें। पूरा शरीर धूल, पसीने और बदबू से भरा हुआ।

लोग उसे देखते और नाक सिकोड़ लेते।

“पागल है…”
“भागा हुआ भिखारी…”
“सड़क का कूड़ा…”

वह आदमी कुछ बुदबुदा रहा था। कभी खुद से बात करता, कभी आसमान की तरफ देखता। कभी अचानक सावधान की मुद्रा में खड़ा हो जाता, जैसे सामने कोई अफसर खड़ा हो।

चौराहे पर फल की एक दुकान थी। उसका मालिक सोहन लाल, हमेशा की तरह चिड़चिड़ा और गुस्सैल। दुकान के पास एक सड़ा हुआ केला पड़ा था। उस आदमी ने भूख से कांपते हाथों से उसे उठाने की कोशिश की।

सोहन लाल भड़क उठा।

“ए पागल! चल हट यहाँ से। मेरा धंधा खराब कर रहा है। भाग जा वरना डंडा मारूँगा!”

वह आदमी डरा नहीं।

उसने अजीब सी मुस्कान के साथ सोहन लाल की ओर देखा। फिर अचानक सीधा खड़ा हुआ। सीना तान लिया। ठोड़ी ऊपर उठाई। और पूरी गंभीरता से माथे पर हाथ रखकर सैल्यूट मारा।

“जय हिंद सर! दुश्मन सीमा पर है। हम पीछे नहीं हटेंगे!”

पास खड़े लड़के ठहाके मारकर हँस पड़े।

“देखो… पागल फौजी!”
“रोज़ यही नाटक करता है।”

एक लड़के ने सड़क से पत्थर उठाया और पूरी ताकत से उसकी तरफ फेंक दिया।

पत्थर सीधे उसके माथे पर लगा।

खून की एक पतली धार बहने लगी।

लेकिन उस आदमी ने न चीख मारी, न सैल्यूट तोड़ा।

वह वैसे ही खड़ा रहा।

जैसे कोई सिपाही गोली खाकर भी अपने पोस्ट से नहीं हटता।

उसकी आँखों में कुछ था…
पागलपन नहीं।
कुछ और।
कोई अधूरा युद्ध।

वह धीरे-धीरे वहाँ से हटकर चौराहे के बीच लगे खंभे की ओर गया। उस खंभे पर 15 अगस्त को लगाया गया एक छोटा सा प्लास्टिक का तिरंगा हवा में फड़फड़ा रहा था, फटने को तैयार।

तिरंगा नीचे गिरने ही वाला था।

वह आदमी दौड़ा।

और उस झंडे को ऐसे लपक लिया जैसे कोई माँ गिरते हुए बच्चे को पकड़ती है।

उसने अपने गंदे कपड़ों से झंडे को साफ किया। उसे चूमा। और सावधानी से अपनी जेब में रख लिया।

लोग हँस रहे थे।

“अब देखो… झंडा लेकर नाचेगा।”

तभी दूर से भारी सायरन की आवाज़ गूँजी।

यह पुलिस का सायरन नहीं था।

यह सेना का काफिला था।

आज शहर के आर्मी कैंट में नए आर्मी चीफ का दौरा था।

ट्रैफिक रोक दिया गया। पुलिस वाले चिल्लाने लगे।

“सब पीछे हटो! रोड खाली करो!”

इंस्पेक्टर राठी डंडा पटकते हुए उस आदमी की ओर बढ़ा।

“ए पागल! दिखाई नहीं देता? साहब लोग आ रहे हैं। उधर जा! तेरी बदबू से उनका मूड खराब हो जाएगा।”

उसने धक्का दिया।

वह आदमी लड़खड़ाया।

लेकिन फिर भी उसने इंस्पेक्टर को सैल्यूट मारा।

“सर, मिशन पूरा हुआ। रिपोर्टिंग फॉर सैंड ड्यूटी।”

इंस्पेक्टर माथा पकड़कर रह गया।

हवलदारों ने उसे पकड़कर भीड़ के पीछे धकेल दिया।

तभी सामने से काफिला आया।

सबसे आगे मिलिट्री पुलिस।
फिर जिप्सियाँ।
और बीच में काले रंग की चमचमाती टाटा सफारी — तीन सितारों के साथ।

लेफ्टिनेंट जनरल विक्रम सिंह।

भारतीय सेना का वह नाम, जिसे सुनकर दुश्मन भी सतर्क हो जाता था।

गाड़ी आगे बढ़ रही थी।

लेकिन तभी…

उस आदमी की नज़र तिरंगे पर पड़ी।

और उसके भीतर जैसे कोई सोया हुआ सैनिक जाग उठा।

उसने हवलदारों के हाथ झटक दिए।

पूरी ताकत से गरजा—

“ATTENTION!”

पूरा चौराहा सन्न रह गया।

वह आदमी सड़क के किनारे खड़ा हुआ।
सीना चौड़ा।
ठोड़ी ऊँची।
और ऐसा परफेक्ट सैल्यूट…
जिसे देखकर किसी भी फौजी की रूह काँप जाए।

फटे कपड़े।
खून से सना चेहरा।
लेकिन पोश्चर — परेड ग्राउंड का।

गाड़ी आगे निकल चुकी थी।

लेकिन जनरल विक्रम सिंह ने देखा।

कुछ ऐसा…
जो उन्होंने 15 साल पहले देखा था।

आँखों की वही आग।

“STOP THE CAR.”

ब्रेक लगे।
पूरा काफिला रुक गया।

जनरल गाड़ी से उतरे।

भीड़ की साँसें थम गईं।

इंस्पेक्टर दौड़ता हुआ आया।

“सर… सॉरी सर। यह यहाँ का पागल है।”

जनरल ने हाथ उठाकर उसे चुप करा दिया।

वे उस आदमी के सामने खड़े हो गए।

धीमी, काँपती आवाज़ में बोले—

“मेजर… रणवीर?”

वह आदमी काँप गया।

उसकी आँखों से जैसे धुंध हटने लगी।

“कोड नेम… तूफ़ान।
मिशन… लाहौर…”

जनरल विक्रम सिंह रो पड़े।

उन्होंने उसे सीने से लगा लिया।

“रणवीर… तुम ज़िंदा हो?”

भीड़ जड़ हो चुकी थी।

जनरल गरजे—

“तुम जानते हो यह कौन है?
यह भारतीय सेना के पैरा स्पेशल फोर्सेस के मेजर रणवीर सिंह राठौर हैं।
कारगिल के हीरो।
देश के लिए अपना दिमाग खो देने वाला सिपाही।”

पत्थर मारने वाले लड़कों के हाथ काँप रहे थे।

मेजर रणवीर ने जेब से वही तिरंगा निकाला।

“सर… झंडा गिरना नहीं चाहिए।”

जनरल ने झंडा माथे से लगाया।

और पूरे चौराहे के सामने…
एक पागल को सैल्यूट किया।

भारत माता की जय गूँज उठी।