लोग जिस पागल को पत्थर मार रहे थे 😢… आर्मी चीफ ने गाड़ी रोककर उसे सैल्यूट क्यों किया?

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जनरल का रहस्यमयी रोग और एक पागल का सैल्यूट

भारत में हमारे सैनिकों के साथ जुड़ी कई ऐसी घटनाएँ हैं, जो न सिर्फ हमें गर्व से भर देती हैं बल्कि यह भी बताती हैं कि देशभक्ति और समर्पण क्या होता है। ऐसी ही एक कहानी आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं, जो आपको न सिर्फ भावुक करेगी, बल्कि आपके रोंगटे भी खड़े कर देगी। यह कहानी है एक पागल समझे जाने वाले आदमी की, जिसकी बहादुरी और देशभक्ति ने उसे न सिर्फ सम्मान दिलाया, बल्कि उसके साहस और जज़्बे ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। यह कहानी एक ऐसे जनरल के बारे में है, जिनकी बीमारी का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं था, लेकिन एक पागल ने अपना सैल्यूट कर उसे ठीक कर दिया।

सड़क पर पागल समझे जाने वाला आदमी

कहानी एक छोटे से शहर के घंटाघर चौक की है। यह चौक उन दिनों का सबसे व्यस्त चौराहा था, जहां लोग हर रोज़ अपनी सुबह की दौड़ में व्यस्त रहते थे। मई की तपती गर्मी में, लू के थपेड़े और पिघलते डामर के बीच एक आदमी कूड़े के ढेर के पास बैठा था। उसके बाल उलझे हुए थे और दाढ़ी बड़ी हुई थी। वह शख्स खुद को पागल समझकर जी रहा था, लेकिन उस पागल के भीतर छिपा था एक सच्चा देशभक्त।

उस दिन, जैसे ही एक आदमी अपने ठेले से केले बेचने के लिए आया, उसने देखा कि वह पागल सड़क के किनारे पड़ा एक सड़ा हुआ केला उठाने की कोशिश कर रहा था। सोहन लाल, फलों के दुकान का मालिक, जो हमेशा गुस्सैल और तैश में रहता था, चिल्लाया, “अरे ओ पागल, हट यहां से।” उसने कहा, “अगर तुझे खाने को नहीं मिल रहा तो उधर जा, गटर में बैठ और किसी काम का न बन, मेरी दुकान में गंदगी मत फैला।”

यहां तक कि सोहन ने पत्थर उठाया और उसे डराने की कोशिश की, लेकिन वह आदमी डरा नहीं। उसने एक अजीब सी मुस्कान के साथ सोहन लाल की तरफ देखा, फिर उसकी पूरी सजगता में खड़ा हो गया और अपने माथे पर हाथ रखते हुए “जय हिंद” कहा। उसने पूरे जोश के साथ चिल्लाया, “दुश्मन सीमा पर है, हम पीछे नहीं हटेंगे!”

अब यह सुनकर सोहन लाल और वहां खड़े लोग हंसी में आ गए। एक लड़के ने मजाक करते हुए कहा, “यह तो पागल फौजी है, रोज़ इसी तरह खुद को बॉर्डर पर समझता है।” दूसरे लड़के ने कहा, “बड़ा ड्रामा करता है यह पागल।” और तभी, एक लड़के ने पत्थर उठाकर उस आदमी की तरफ फेंका, जो सीधे उस पागल के माथे पर लगा। खून की एक पतली धारा निकल आई, लेकिन पागल आदमी ने अपने सैल्यूट को नहीं तोड़ा।

उसने बस वही किया जो एक फौजी करता, अपने कमांडर के सामने खड़ा होकर सैल्यूट किया। उसने दर्द की परवाह नहीं की। उसकी आंखों में एक अद्भुत चमक थी, जिसे कोई समझ नहीं पा रहा था, लेकिन जो पागलपन से ज्यादा एक जुनून था।

जनरल विक्रम सिंह का आगमन

चौराहे के इस दृश्य को देख रहे लोग यह नहीं जानते थे कि कुछ ही देर बाद वह आदमी, जो उन्हें पागल समझा जा रहा था, इतिहास का हिस्सा बनने वाला था। एक बारीकी से विचार किया गया था कि एक आर्मी जनरल शहर में आ रहे थे। सेना की गाड़ियां और सैन्य अधिकारी अपना रास्ता साफ कर रहे थे। अचानक, चौराहे पर एक भारी काफिला आ गया और लोग समझ गए कि लेफ्टिनेंट जनरल विक्रम सिंह आ रहे हैं।

जनरल विक्रम सिंह भारतीय सेना के सबसे सख्त और सम्मानित जनरलों में से एक थे। उनका नाम सुनते ही दुश्मन कांपते थे। जनरल विक्रम सिंह की गाड़ी चौराहे से गुजर रही थी और तभी उनकी नजर उस पागल पर पड़ी, जो सैल्यूट की मुद्रा में खड़ा था। जनरल ने देखा कि उस आदमी का खड़ा होने का तरीका, उसका सैल्यूट, और उसकी आंखों में वह जोश था, जो उन्होंने कभी अपनी सेना के जवानों में देखा था। यह देखकर जनरल विक्रम सिंह का दिल कांप उठा। उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवाने का आदेश दिया।

सैल्यूट और सम्मान

जनरल विक्रम सिंह ने तुरंत ड्राइवर को आदेश दिया कि “गाड़ी रोक दो”। पूरा काफिला रुक गया। पुलिस वाले घबराए हुए थे, इंस्पेक्टर राठी दौड़ते हुए आए और बोले, “सर, यह पागल है, इसे हटवा दूंगा।” लेकिन जनरल विक्रम सिंह ने इशारे से इंस्पेक्टर को चुप करा दिया और बिना किसी हिचकिचाहट के वह उस आदमी के पास गए, जो अभी भी सैल्यूट किए खड़ा था। जनरल ने उस पागल का हाथ अपनी ओर खींचते हुए कहा, “तुम कौन हो?”

उस आदमी ने धीमी आवाज में कहा, “मैं मेजर रणवीर सिंह राठौर हूं।” जनरल विक्रम सिंह को एक जटिल एहसास हुआ कि यह वही आदमी था जो 15 साल पहले भारत के कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो गया था। उस समय जनरल विक्रम सिंह ने रणवीर को खो दिया था, लेकिन आज वह सामने खड़ा था। यह वही मेजर था जिसने अकेले दुश्मन के बंकर में घुसकर 10 दुश्मन सैनिकों को मार गिराया था।

सच्चे नायक की पहचान

जनरल विक्रम सिंह ने तुरंत उस पागल को अपने गले लगा लिया। जनरल ने कहा, “तुम जिंदा हो, रणवीर! हमने तो सोचा था कि तुम शहीद हो गए हो!” पूरे चौराहे में सन्नाटा छा गया। लोगों को समझ में ही नहीं आया कि एक पागल को जनरल ने क्यों सम्मान दिया। जनरल विक्रम सिंह ने अपनी वर्दी से मेडल निकाले और उन सभी लोगों के सामने उन्हें पहनने का आदेश दिया।

फिर जनरल विक्रम सिंह ने कहा, “यह भारतीय सेना के मेजर रणवीर सिंह राठौर हैं। इन्हें पागल मत समझो। इन्होने इस देश के लिए जान दी है। 15 साल तक दुश्मन के बंदी रहे और फिर भी देश की सेवा की।”

इस कड़ी सच्चाई ने पूरे शहर को हिला दिया। लोग सोचने लगे, “क्या हम सच में पागल को पहचानते हैं?” उन्होंने जो सम्मान उस पागल को दिया, वह किसी और के लिए नहीं था, बल्कि एक सच्चे देशभक्त के लिए था, जो एक सैन्य नायक था।

निष्कर्ष

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि कभी भी किसी की बाहरी स्थिति या रूप को देखकर उसे कम नहीं आंकना चाहिए। जितना अधिक हम अपने देशभक्तों और नायकों का सम्मान करेंगे, उतना अधिक हम उनकी सच्ची महिमा को समझ पाएंगे। यह घटना एक पागल के जरिए हमें यह याद दिलाती है कि असली नायक कभी अपनी पहचान छिपाते नहीं, वे हमेशा अपने देश के लिए जीते हैं और मरते हैं।

यह कहानी हमें अपने आस-पास के लोगों को समझने और सम्मान देने का संदेश देती है, क्योंकि कोई नहीं जानता कि अगले पल कौन हमारी मदद करेगा और कौन हमें गौरव दिलाएगा।