शहीद के परिवार को राशन देने से मना करने वाले दुकानदार का वो हश्र, जिसे देखकर रूह कांप जाएगी 😱

.
.
.

शहीद की माँ को राशन देने से मना करने वाले दुकानदार का वह हश्र, जिसने पूरे गाँव की आत्मा झकझोर दी

दोपहर की धूप उस दिन कुछ ज़्यादा ही बेरहम थी।

उत्तर भारत के छोटे से गाँव रामगढ़ की धूल भरी सड़कें तप रही थीं। हवा में गर्मी के साथ एक अजीब-सी भारी उदासी घुली हुई थी। गाँव के बीचों-बीच बनी सरकारी राशन की दुकान के बाहर लोगों की लंबी कतार लगी थी। और उस कतार के आख़िर में, सबसे पीछे, खड़ी थी 65 साल की शांति देवी

उनके पैरों में पुरानी, घिसी हुई चप्पलें थीं जिन्हें वे बार-बार ज़मीन से सटाकर ठीक करने की कोशिश कर रही थीं। कमर उम्र और दुख के बोझ से झुकी हुई थी। चेहरे पर झुर्रियों का जाल फैला था और आँखों में एक ऐसा दर्द था जो शब्दों में नहीं समाता।

एक हाथ में उन्होंने अपना राशन कार्ड थाम रखा था—इतनी मजबूती से, जैसे वह कागज़ नहीं, उनकी ज़िंदगी की आख़िरी डोर हो। दूसरे हाथ में एक मैला-सा कपड़े का थैला था, जो खाली था, बिल्कुल उनकी रसोई की तरह।

शांति देवी के लिए यह राशन कार्ड सिर्फ़ सरकारी दस्तावेज़ नहीं था।
यह उनके और उनकी आठ साल की पोती परी के जिंदा रहने का सहारा था।

तीन साल पहले, उनका इकलौता बेटा मेजर अजय सिंह सीमा पर दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गया था। उस दिन जब तिरंगे में लिपटी बेटे की अर्थी गाँव में आई थी, तो शांति देवी को लगा था कि उनकी साँसें वहीं रुक जाएँगी। लेकिन अजय की आख़िरी निशानी—उसकी बेटी परी—ने उन्हें टूटने नहीं दिया।

उन्होंने अपने आँसू पी लिए।
पत्थर बनकर जीना सीख लिया।

सरकारी पेंशन के काग़ज़ात आज भी किसी दफ़्तर की फ़ाइलों में दबे पड़े थे। महीने-महीने दफ़्तरों के चक्कर लगाते-लगाते उनकी हिम्मत टूट चुकी थी। ऐसे में सरकारी राशन ही उनके लिए आख़िरी उम्मीद था।


दुकान के अंदर गद्दी पर बैठा था लाला धनीराम

मोटा शरीर, पान से लाल दाँत और आँखों में लालच की चमक। वह आदमी पूरे गाँव में बदनाम था। राशन कम तोलना, दाम ज़्यादा बताना और सवाल करने वालों को गालियाँ देना—यह उसका रोज़ का काम था।

उसे अपने रसूख़ का घमंड था।
गाँव का मुखिया उसका रिश्तेदार था।
“ऊपर तक मेरी पहुँच है”—यह बात वह हर रोज़ याद दिलाता था।

लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
गर्मी से शांति देवी का सिर चकरा रहा था।

सुबह से उन्होंने सिर्फ़ एक गिलास पानी पिया था, ताकि अगर राशन मिलने में देर हो जाए, तो घर में बची आख़िरी सूखी रोटी अपनी पोती को खिला सकें।

उनके सामने खड़े एक मज़दूर ने जब कहा,
“लाला जी, चावल में कंकड़ बहुत हैं…”

तो धनीराम गरजा,
“अबे ओ भिखारी! पाँच रुपये किलो में बासमती चाहिए क्या? लेना है तो ले, वरना निकल!”

मज़दूर चुपचाप कंकड़ वाला राशन लेकर चला गया।

धनीराम हँसा।
गरीबों की लाचारी उसे अजीब-सा सुख देती थी।


घंटों बाद, जब सूरज ढलने को था, शांति देवी की बारी आई।

वे काँपते हाथों से काउंटर तक पहुँचीं और राशन कार्ड आगे बढ़ाया।

धनीराम ने पान की पीक थूकते हुए कार्ड उठाया और घृणा से बोला,
“अरे बुढ़िया, तू फिर आ गई? अभी पिछले महीने ही तो ले गई थी। क्या तेरा पेट है या कुआँ?”

शांति देवी ने हाथ जोड़ दिए।
“बेटा, घर में एक दाना नहीं है। मेरी पोती कल रात से भूखी है। सरकार जो भेजती है, बस वही दे दो।”

धनीराम ठहाका मारकर हँसा।
“सरकार भेजती है? यहाँ तक आते-आते सब हवा हो जाता है। आज का कोटा खत्म। अगले हफ्ते आना।”

शांति देवी के सामने अँधेरा छा गया।

उन्होंने पीछे रखे अनाज के बोरों की ओर देखा।
“बेटा, वहाँ तो बहुत अनाज रखा है… मुझे बस पाँच किलो दे दो।”

धनीराम आग-बबूला हो गया।

उसने राशन कार्ड उनके मुँह पर फेंक दिया।
“जब बोल दिया नहीं है, तो नहीं है!”

फिर उसने ज़हर उगल दिया—

“वैसे भी तेरे बेटे की बड़ी खबरें छपी थीं। बहुत बड़ा हीरो था न? सुना है फौजियों को मरने के बाद बहुत पैसा मिलता है। सब डकार गई क्या?”

ये शब्द शांति देवी के दिल पर खंजर की तरह लगे।

उनका बेटा…
जिसने इस देश की मिट्टी के लिए जान दी थी…

उनकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार ये बेबसी के नहीं, गुस्से के थे।

“खबरदार!” उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा।
“मेरे बेटे का नाम अपनी गंदी ज़ुबान से मत लेना।”

धनीराम ने थैला छीनकर सड़क पर फेंक दिया।
“चल निकल यहाँ से!”

दो लोगों ने उन्हें पकड़कर किनारे करना चाहा।
शांति देवी गिर पड़ीं।

घुटने छिल गए।
आँसू बहते रहे।

भीड़ तमाशा देखती रही।


तभी…
गाँव की खामोशी चीरती हुई एक गड़गड़ाहट गूँजी।

यह किसी आम गाड़ी की आवाज़ नहीं थी।

भारी टायरों वाला एक सेना का ट्रक धूल उड़ाता हुआ दुकान के सामने आकर रुका।

हरे रंग की वर्दी।
आगे लहराता तिरंगा।

ट्रक से जवान उतरे।
सख़्त चेहरे।
आँखों में आग।

सबसे आखिर में उतरे कर्नल विक्रम सिंह

उनकी नज़र सबसे पहले ज़मीन पर गिरी शांति देवी पर पड़ी।

उनका चेहरा सख़्त हो गया।

वे घुटनों पर बैठे, टोपी उतारी और बोले—

“माँ जी…”

शांति देवी ने ऊपर देखा।
वर्दी वही थी, जो उनका बेटा पहनता था।

“मैं अजय नहीं हूँ,” कर्नल ने कहा,
“लेकिन उसका भाई हूँ।”

पूरे गाँव की साँसें थम गईं।


जो हुआ उसके बाद…
वह सिर्फ़ सज़ा नहीं थी।

वह सबक था।

एक दुकानदार के लिए।
एक समाज के लिए।
और हम सब के लिए।


समाप्त