शादी की रात दुल्हन भाग गई… स्टेशन पर मिला अजनबी लड़का… फिर जो हुआ |
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भागी हुई दुल्हन और स्टेशन पर मिला अजनबी
रात के नौ बज चुके थे। पटना की उस पुरानी गली में रोशनी झिलमिला रही थी। घर के बाहर झालरें लटक रही थीं, दरवाज़े पर गेंदे और मोगरे की मालाएँ सजी थीं, और भीतर से शहनाई की धुन धीमे-धीमे बह रही थी। पड़ोस की औरतें साड़ियों का पल्लू संभालती हुई बार-बार आ-जा रही थीं। रसोई में पकवानों की खुशबू थी, आँगन में रिश्तेदारों की फुसफुसाहट, और हर चेहरे पर एक बनावटी-सी मुस्कान।
लेकिन उस घर के एक कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा था।
आईने के सामने लाल जोड़े में सजी बैठी थी—कविता।
माथे पर मांग टीका, हाथों में गहरी मेहंदी, पैरों में पायल, होंठों पर गाढ़ी लाली। देखने वाला कहता—कितनी सुंदर दुल्हन है। पर आईने में खुद को देखती कविता को लग रहा था जैसे सामने बैठी लड़की कोई और है। उसकी आँखों में चमक नहीं थी। वहाँ डर था, घुटन थी और एक ऐसा सवाल जो कई दिनों से उसे भीतर ही भीतर काट रहा था—क्या यह मेरी ज़िंदगी है?
कविता की उम्र बाईस साल थी। साधारण परिवार की लड़की, लेकिन असाधारण सपनों वाली। वह डॉक्टर बनना चाहती थी। उसने एक बार मेडिकल प्रवेश परीक्षा दी थी, असफल रही, पर हारी नहीं थी। उसने दोबारा तैयारी शुरू की थी। उसकी किताबें अभी भी अलमारी में करीने से रखी थीं। पर तीन महीने पहले घर की आर्थिक हालत बिगड़ गई। पिता का काम ठप पड़ गया। छोटे भाई अभय की पढ़ाई, माँ की दवाइयाँ, घर का किराया—सब एक साथ बोझ बनकर टूट पड़े।
तभी रिश्ता आया—शहर के संपन्न व्यापारी का बेटा, राजेश। दहेज नहीं चाहिए, लड़की पढ़ी-लिखी होनी चाहिए। परिवार को सहारा मिलेगा।
पहली मुलाकात में राजेश ने मुस्कुराकर पूछा था, “खाना अच्छा बना लेती हो ना?”
दूसरी मुलाकात में उसने साफ कहा था, “शादी के बाद पढ़ाई की ज़रूरत नहीं। घर संभालना ही काफी है।”
उसी दिन कविता का दिल टूट गया था।
आज वही शादी थी। बाहर बारात आने ही वाली थी। अंदर उसका दम घुट रहा था। उसे नानी की बात याद आई—“जब लगे कि सब रास्ते बंद हैं, तो ध्यान से देखना, कोई न कोई खिड़की खुली होगी।”
कविता ने कमरे की छोटी खिड़की की तरफ देखा, जो पिछवाड़े की संकरी गली में खुलती थी।
उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।
उसने पर्स उठाया—तीन सौ रुपए, एक पुरानी डायरी और मोबाइल। उसने भारी जोड़ा संभाला, खिड़की की कुंडी खोली और पेड़ की मोटी डाल पकड़कर नीचे उतर गई। दुपट्टा डाल में अटक गया, फट गया—पर वह उतर चुकी थी।
वह भागी।
नंगे पैरों में चप्पलें, कंकरीली सड़क, धड़कता दिल। उसे बस एक जगह याद आई—पटना जंक्शन।
रात के ग्यारह बजे स्टेशन भीड़ से भरा था, पर कविता के भीतर खालीपन था। लाल जोड़े में सजी एक लड़की प्लेटफॉर्म की बेंच पर अकेली बैठी थी। कुछ लोग घूरकर आगे बढ़ गए। कुछ ने दया से देखा। पर कोई रुका नहीं।
उसके फोन में पचास से ज्यादा मिस्ड कॉल थीं—पिताजी, माँ, अभय।
बैटरी 12%।
वह सोच रही थी—अब कहाँ जाऊँ?
तभी किसी ने धीमे से कहा, “पानी लेंगी?”
उसने सिर उठाया। सामने एक लंबा, शांत चेहरा वाला युवक खड़ा था। आँखों में चिंता, पर कोई अजीब जिज्ञासा नहीं।
“मैं आकाश हूँ… अभय का दोस्त।”
कविता चौंकी। “आप… अभय को मत बताइए कि मैं यहाँ हूँ।”
आकाश ने सिर हिलाया। “नहीं बताऊँगा। यह तुम्हारा फैसला है।”
उसके इस जवाब में भरोसा था।
कविता रो पड़ी। उसने सब बताया—शादी, सपने, डर, घुटन। आकाश चुपचाप सुनता रहा। जब वह चुप हुई, उसने बस इतना कहा—“खुद को बचाना गलत नहीं होता।”
फिर उसने कहा, “यहाँ पास में एक महिला आश्रय गृह है। सुरक्षित जगह है। अगर चाहो तो वहाँ चल सकते हैं।”
कविता ने संकोच किया, पर उसकी आँखों में मजबूरी नहीं, सम्मान था।
वे रिक्शे से एक शांत मोहल्ले पहुँचे। सफेद इमारत, छोटा-सा बगीचा। वहाँ की संचालिका सुमित्रा दीदी ने बिना सवाल किए उसे कमरा दे दिया।
उस रात कविता बहुत रोई—पर इस बार डर से नहीं, राहत से।
सुबह आकाश आया। उसने पूछा, “घर बात करोगी?”
कविता काँपी। पर उसने फोन उठाया। पहले अभय, फिर पिताजी।
पिताजी की आवाज़ आई—“बेटा, तू ठीक है?”
वह रो पड़ी।
उसे लगा डाँट पड़ेगी। पर पिताजी बोले—“मुझे माफ कर दे। मैंने तेरे सपनों पर बोझ डाला।”
कविता सन्न रह गई।
“घर आ जा,” पिताजी ने कहा, “कोई दबाव नहीं होगा।”
कविता ने हिम्मत कर कहा—“मैं यह शादी नहीं करूँगी। मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ।”
लंबी चुप्पी।
फिर जवाब आया—“ठीक है बेटा।”
उस एक शब्द ने उसकी दुनिया बदल दी।
घर लौटते वक्त उसका दिल काँप रहा था। दरवाजे पर पिताजी खड़े थे। आँखें लाल, चेहरा थका, पर बाँहें खुली।
“आ गई,” उन्होंने बस इतना कहा।
वह उनसे लिपट गई।
अंदर बैठकर पिताजी ने एक पुरानी कहानी सुनाई। पच्चीस साल पहले, जब वे पढ़ाई छोड़ने वाले थे, एक युवक ने मदद की थी—विजय वर्मा। बिना शर्त पैसे दिए, कहा—“कभी किसी और की मदद कर देना।”
आकाश उसी विजय वर्मा का बेटा था।
कमरे में सन्नाटा था। जैसे नियति ने चक्र पूरा कर दिया हो।
शादी रद्द हुई। समाज ने बातें कीं। पर इस बार परिवार साथ था।
कविता ने पढ़ाई शुरू की। पिताजी ने कोचिंग में दाखिला दिलाया। माँ ने गहने बेचे। अभय ने जेबखर्च बचाया। हफ्ते में एक दिन वह आश्रय गृह जाकर लड़कियों को पढ़ाती।
आकाश नॉर्थ ईस्ट में पोस्टेड था। कभी-कभी 20 सेकंड की कॉल। “पढ़ाई कैसी चल रही है?”
फिर सरहद पर तनाव बढ़ा। खबरें आने लगीं। हर शहीद का नाम सुनकर उसका दिल रुक जाता। पर उसने खुद को मजबूत रखा।
महीनों बाद खबर आई—आकाश सुरक्षित लौट रहा है।
वह घर आया। थका हुआ, पर मुस्कुराता हुआ।
कुछ दिन बाद उसने पिताजी से कहा, “मैं कविता से शादी करना चाहता हूँ। अगर वह तैयार हो।”
पिताजी मुस्कुराए—“फैसला उससे पूछो।”
कविता ने कहा, “मेरी पढ़ाई पहले पूरी होगी।”
आकाश ने जवाब दिया, “मैंने कब कहा छोड़ दो?”
परीक्षा का दिन आया। केंद्र के बाहर पिताजी, अभय और आकाश खड़े थे। आकाश ने कहा, “जो मन में है, पन्नों पर उतार देना।”
नतीजा आया—कविता का चयन हो गया।
घर में मिठाई बँटी। पड़ोसन काकी भी आईं, जिन्होंने पहले शादी के पक्ष में ज़ोर दिया था। आज बोलीं—“तू सही थी बेटा।”
तीन महीने बाद सादा शादी हुई। कोई शोर नहीं, कोई दिखावा नहीं। बस अपने लोग।
पाँच साल बाद एक छोटे अस्पताल के बाहर बोर्ड लगा—
डॉ. कविता वर्मा
गरीब मरीजों का इलाज निशुल्क।
उद्घाटन में पिताजी, माँ, अभय, सुमित्रा दीदी और आकाश वर्दी में खड़े थे।
पिताजी ने कहा, “उस रात तूने जो किया, तब समझ नहीं आया था। आज समझ आया—तू सही थी।”
कविता ने मुस्कुराकर कहा, “बस रास्ता ढूँढना था, पिताजी।”
आकाश दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था।
कविता ने सोचा—उस रात खिड़की से कूदना भागना नहीं था। वह खुद को खोजने की शुरुआत थी।
कभी-कभी अँधेरे में उठाया गया एक कदम हमें रोशनी तक ले जाता है।
और जो अपने सपनों के लिए खड़ा हो जाता है—वह हारता नहीं, इतिहास लिखता है।
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