सबने समझा कूड़ा बिनने वाला…लेकिन उसने 5000 करोड़ का खजाना खोल दिया 😱

.
.

.

सबने समझा कूड़ा बिनने वाला… लेकिन उसने 5000 करोड़ का खजाना खोल दिया

प्रस्तावना

शहर के सबसे पुराने बाजार के बीचोंबीच एक इमारत थी, जिसे लोग शर्मा सेठ की हवेली कहते थे। बाहर से देखने पर वह जगह किसी आम गोदाम जैसी लगती थी, लेकिन अंदर कदम रखते ही समझ आ जाता था कि यहां कुछ अलग है। मोटी दीवारें, भारी दरवाजे और बीचोंबीच रखी हुई एक विशाल तिजोरी। वही तिजोरी जिसकी चर्चा पूरे शहर में थी। कहा जाता था कि इसके अंदर करोड़ों का खजाना बंद है—सोना, हीरे, पुराने सिक्के और ना जाने क्या-क्या। लेकिन दिक्कत बस एक थी, तिजोरी खुलती नहीं थी।

पिछले तीन सालों से शर्मा सेठ ने हर मुमकिन कोशिश कर ली थी। बड़े-बड़े इंजीनियर आए, लॉक एक्सपर्ट बुलाए गए, विदेशी मशीनें मंगवाई गई। किसी ने कोड तोड़ने की कोशिश की, किसी ने सेंसर लगाए। लेकिन हर बार नतीजा एक ही रहा—तिजोरी वहीं की वहीं बंद। आज फिर वही दिन था। हवेली के बड़े हॉल में भीड़ जमा थी। बिजनेस पार्टनर, वकील, मीडिया और कुछ खास मेहमान। बीच में खड़ी थी वह काली मोटी लोहे की तिजोरी। उस पर पुराने किस्म के निशान खुदे थे, जैसे किसी ने जानबूझकर उसे रहस्यमय बनाया हो।

शर्मा सेठ का चेहरा चिड़चिड़ा था। सफेद कुर्ता, मोटी सोने की चैन और आंखों में गुस्सा। सामने खड़ा आखिरी एक्सपर्ट अभी-अभी हार मान चुका था। “सॉरी सेठ जी, इस तिजोरी का मैकेनिज्म बहुत अलग है। शायद बिना ओरिजिनल जानकारी के इसे खोलना नामुमकिन है।”

चुनौती का पल

हॉल में हल्की सी खुसफुसर शुरू हो गई। कोई बोला, “इतना पैसा और फिर भी तिजोरी बंद।” कोई हंसा, कोई सिर हिलाने लगा। उसी वक्त दरवाजे के पास खड़ा एक लड़का आगे बढ़ा। उम्र करीब 15 या 16 साल। बदन पर फटा पुराना शर्ट, धूल से भरी पट और पैरों में घिसी हुई चप्पल। बाल बिखरे हुए, चेहरा दुबला लेकिन आंखों में अजीब सा ठहराव।

उसने धीमी लेकिन साफ आवाज में कहा, “सेठ जी, मैं तिजोरी खोल सकता हूं।” पूरा हॉल एक पल के लिए शांत हो गया। फिर अचानक हंसी फूट पड़ी। किसी ने जोर से कहा, “अरे यह कौन है?” किसी ने कहा, “बाहर से कोई बच्चा घुस आया है।” गार्ड आगे बढ़े, लेकिन शर्मा सेठ ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया। उन्होंने लड़के को ऊपर से नीचे तक देखा—कपड़े, शक्ल, हालत। फिर व्यंग से मुस्कुराए, “तू? यह तिजोरी इतने बड़े-बड़े दिमाग नहीं खोल पाए और तू खोल देगा?”

लड़के ने नजरें झुकाई नहीं। “एक मौका दे दीजिए। अगर नहीं खुली तो मैं खुद चला जाऊंगा।” भीड़ को मजा आने लगा। कैमरे फिर से उठ गए। नया तमाशा मिल गया था। शर्मा सेठ ने ठहाका लगाया और बोले, “ठीक है। अगर तूने यह तिजोरी खोल दी, तो मैं तुझे 10 करोड़ दूंगा।” हॉल में शोर मच गया। कोई बोला, “पागल हो गए हैं सेठ।” कोई बोला, “अब देखो बच्चा क्या करता है।” लड़के ने सिर्फ एक बात कही, “मंजूर है।”

तिजोरी के रहस्य

लड़का तिजोरी के सामने आकर खड़ा हो गया। इतनी बड़ी भारी और ठंडी तिजोरी उसने पहले कभी इतनी नजदीक से नहीं देखी थी। लेकिन उसके चेहरे पर ना डर था, ना घबराहट। बस एक गहरी सांस और पूरी तसल्ली। भीड़ में से कोई बोला, “इसे तो ताला छूना भी नहीं आता होगा।” किसी ने हंसकर कहा, “लगता है सेठ जी आज दान करने के मूड में हैं।”

शर्मा सेठ हाथ बांधे खड़े थे। उनके चेहरे पर आधी हंसी, आधा तंज। उनके लिए यह सब एक मनोरंजन था। उन्हें यकीन था कि कुछ मिनटों में यह लड़का थक कर खुद पीछे हट जाएगा। लेकिन लड़के ने किसी की बात नहीं सुनी। उसने सबसे पहले तिजोरी को गौर से देखा। बहुत गौर से। जैसे वह सिर्फ लोहे का ढांचा नहीं, कोई पुरानी कहानी पढ़ रहा हो। उसकी उंगलियां तिजोरी की सतह पर हल्के-हल्के घूमने लगीं। कभी ऊपर बने निशानों पर, कभी किनारों पर, कभी नीचे के कोनों पर।

एक बुजुर्ग वकील ने पास खड़े आदमी से फुसफुसाकर कहा, “देख रहा है, यह यूं ही हाथ नहीं फेर रहा। कुछ ढूंढ रहा है।” लड़के ने कान से तिजोरी को छूकर हल्की सी थपकी दी। फिर दूसरी तरफ से भी ठक-ठक। अंदर से आवाज थोड़ी अलग लग रही थी। उसने आंखें बंद की। भीड़ को लगा अब कोई नाटक शुरू होगा, कोई जादू, कोई मंत्र, लेकिन कुछ नहीं हुआ। वह बस खड़ा रहा, शांत। जैसे अपने दिमाग में किसी नक्शे को दोहरा रहा हो।

नीरज की कहानी

दरअसल उसका नाम नीरज था। नीरज पास की झुग्गियों में रहता था। उसका पिता कबाड़ी का काम करता था। टूटे ताले, जंग लगे बक्से, पुराने संदूक—यही नीरज की दुनिया थी। बचपन से वह अपने पिता के साथ कबाड़ छांटता रहा था। कई बार ऐसे ताले मिलते जो दिखने में बेकार होते, लेकिन नीरज घंटों बैठकर उन्हें खोल देता। उसे मशीनें नहीं आती थीं, किताबों की भाषा नहीं आती थी, लेकिन उसे सुनना आता था—धातु की आवाज, दबाव का फर्क, खाली जगह का अंदाजा।

नीरज ने तिजोरी के दाई ओर बने एक छोटे से उभार पर उंगली रखी। वहां कोई बटन नहीं था, बस थोड़ा सा फर्क। उसने वहां हल्का दबाव डाला, फिर छोड़ा। कुछ नहीं हुआ। उसने दोबारा कोशिश की। इस बार दबाव थोड़ा बदलकर फिर नीचे वाले कोने में वहीं किया। भीड़ बोर होने लगी। एक रिपोर्टर बोला, “लगता है खत्म हो गया शो।” लेकिन तभी नीरज रुक गया। उसने सिर थोड़ा तिरछा किया, जैसे किसी हल्की आवाज को पकड़ लिया हो। फिर उसने दोनों हाथ तिजोरी पर रखे। एक ऊपर, एक नीचे। धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया।

“क्लिक।” बहुत हल्की आवाज। इतनी हल्की कि आधे लोग सुन ही नहीं पाए। लेकिन नीरज के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई। शर्मा सेठ सीधा हो गए। यह आवाज उन्होंने खुद से कहा। नीरज ने आंखें खोल दी। अभी तिजोरी नहीं खुली थी, लेकिन कुछ जाग चुका था और यह तो बस शुरुआत थी।

हुनर की पहचान

क्लिक की वह आवाज छोटी थी, लेकिन असर बड़ा। शर्मा सेठ की आंखें अब तिजोरी से हट नहीं रही थी। जो लोग अभी तक हंस रहे थे, वे भी चुप हो गए। हॉल में अजीब सा सन्नाटा फैल गया, जैसे किसी ने हवा रोक दी हो। नीरज ने हाथ पीछे नहीं खींचे। उसे पता था कि यह ताला एक झटके में नहीं खुलने वाला। यह उन तालों में से था जो ताकत नहीं, धैर्य पहचानते हैं। उसने फिर से तिजोरी को थपथपाया। इस बार अलग जगह। धक-धक। एक तरफ से आवाज भारी थी, दूसरी तरफ खोखली।

उसके माथे पर पसीने की हल्की बूंदें आ गईं। कपड़े पुराने थे, लेकिन उसकी हर हरकत बेहद नपी-तुली थी। जैसे वह कोई अंदाजा नहीं लगा रहा, बल्कि किसी याद को फॉलो कर रहा हो। भीड़ में से एक इंजीनियर बुदबुदाया, “यह लड़का प्रेशर पॉइंट्स ढूंढ रहा है।”

नीरज ने तिजोरी के नीचे झुक कर देखा। वहां कोई ताला नहीं था, कोई लीवर नहीं, लेकिन धातु की बनावट थोड़ी अलग थी। उसने उंगलियों से वहां हल्का घुमावदार दबाव दिया। कुछ नहीं हुआ। उसने सांस छोड़ी। फिर दोबारा कोशिश की। इस बार पहले से थोड़ा धीमा। अंदर से फिर वही आवाज आई। “गुड।” अब यह आवाज साफ थी। शर्मा सेठ अनजाने में आगे बढ़े। “रुको,” उन्होंने कहा, “कोई मशीन तो चाहिए हो, बता दें।”

नीरज ने बिना पलटे कहा, “नहीं सेठ जी, मशीन उलझा देती है। यह तिजोरी सीधे हाथ से बात करती है।” कई लोग चौंक गए। “सीधे हाथ से बात करती है।” नीरज ने तिजोरी के सामने खड़े होकर आंखें बंद की। उसने दोनों हथेलियां तिजोरी पर रखीं। जैसे कोई डॉक्टर मरीज की धड़कन सुनता है। कुछ सेकंड तक वह बिल्कुल स्थिर रहा। फिर उसने बाएं हाथ से ऊपर के हिस्से पर दबाव दिया और दाएं हाथ से नीचे की ओर हल्का सा स्लाइड किया।

क्लिक—फिर एक और क्लिक। अब आवाजें साफ थी। हॉल में खड़े कैमरे फिर से चालू हो गए। रिपोर्टर फुसफुसाने लगे, “कुछ हो रहा है। यह बच्चा सच में कुछ कर रहा है।” नीरज के दिमाग में उसके पिता की आवाज गूंज रही थी, “हर ताला जल्दी नहीं खुलता बेटा, पहले उसे समझना पड़ता है।”

खजाने की दस्तक

नीरज ने तिजोरी के किनारे पर उभरे एक बेहद छोटे निशान पर उंगली रखी। यह निशान जंग जैसा लगता था, लेकिन असल में वह जानबूझकर बनाया गया था। उसने वहां दबाव डाला, धीरे लगातार। अचानक तिजोरी के अंदर से भारी चीज के सरकने की आवाज आई। “गुड धड़।” भीड़ में किसी ने सांस खींच ली। नीरज ने हाथ हटा ली। वह जानता था अभी नहीं। अगर वह जल्दबाजी करता तो सब फिर से लॉक हो जाता।

उसने एक कदम पीछे लिया। गहरी सांस ली। फिर आगे बढ़ा। अब तिजोरी सिर्फ एक लोहे का डिब्बा नहीं थी। वह जाग चुकी थी और पहली बार वह खुलने के लिए तैयार लग रही थी। नीरज एक कदम पीछे हटा तो कई लोगों को लगा कि वह हार गया। भीड़ में फिर से हलचल होने लगी, “बस इतना ही, अब थक गया होगा। देखा कहां था ना?” लेकिन शर्मा सेठ ने इस बार किसी को कुछ कहने नहीं दिया। उनकी नजरें तिजोरी पर टिकी थी। उन्होंने साफ देखा था तिजोरी के अंदर कुछ हिला था।

नीरज ने अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ा। पसीना था, लेकिन हाथ कांप नहीं रहे थे। उसने नजर उठाकर तिजोरी को देखा। अब वह उसे बाहर से नहीं देख रहा था। वह उसके अंदर की तस्वीर अपने दिमाग में बना चुका था। उसने धीमी आवाज में कहा, “सेठ जी, अगर मैं गलत हुआ तो यह तिजोरी फिर से पहले जैसी बंद हो जाएगी। फिर कोई भी इसे नहीं खोल पाएगा।”

हॉल में खड़े कुछ लोग चौंक गए, “यह क्या कह रहा है? यह तो रिस्क है।” शर्मा सेठ ने दांत भींच लिए। तीन साल की नाकामी, करोड़ों की लागत और अब यह बच्चा। कुछ पल वह चुप रहे। फिर बोले, “जो करना है कर। अब पीछे हटने का मतलब नहीं।”

तिजोरी का खुलना

नीरज ने सिर हिलाया। उसने तिजोरी के बाई तरफ नीचे बैठकर कान लगाया। इस बार उसने थपकी नहीं दी, बस सुना। पूरा हॉल खामोश था। इतना कि किसी के गले से पानी निगलने की आवाज भी तेज लग रही थी। नीरज को अंदर से हल्की सी धातु की कंपन महसूस हुई। यह वही कंपन थी जो उसे कबाड़ में मिले पुराने संदूकों में महसूस होती थी। फर्क बस इतना था कि यह तिजोरी कई गुना ज्यादा जटिल थी।

उसने दाएं हाथ की दो उंगलियां एक साथ ऊपर के कोने पर रखी। बाएं हाथ की हथेली नीचे वाले हिस्से पर धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया। फिर अचानक दोनों हाथों का दबाव एक साथ छोड़ दिया। “क्लैक।” इस बार आवाज साफ और तेज थी। भीड़ में किसी ने जोर से कहा, “अरे, यह तो सच में खुल रही है।”

नीरज ने समय बर्बाद नहीं किया। उसने तुरंत तिजोरी के बीच वाले हिस्से पर हाथ रखा और हल्का सा घुमाव दिया। यह घुमाव इतना छोटा था कि कैमरे भी ठीक से पकड़ नहीं पाए, लेकिन असर बड़ा था। तिजोरी के अंदर जैसे कुछ सेट हो गया हो। अब आवाजें बिखरी हुई नहीं थी, विक्रम में थी। “गुड क्लिक धक।” शर्मा सेठ का चेहरा सफेद पड़ने लगा। उन्होंने जिंदगी में बहुत कुछ देखा था, लेकिन यह पहली बार था जब उनका शक डर में बदल रहा था।

नीरज के दिमाग में एक ही बात चल रही थी, “जल्दी नहीं। अगर जल्दी की तो सब खत्म।” उसने आखिरी बार तिजोरी के सामने खड़े होकर दोनों हाथ रखे, आंखें बंद की, सांस रोकी और बहुत हल्के से जैसे किसी सोए हुए बच्चे को जगाते हैं, उसने दबाव डाला।

अचानक तिजोरी का ऊपरी हिस्सा 1 इंच बाहर की ओर सरक गया। पूरा हॉल सन्न रह गया। यह अभी पूरी तरह नहीं खुली थी, लेकिन अब कोई हंस नहीं रहा था। अब कोई शक नहीं कर रहा था। अब सब जान चुके थे, यह लड़का खाली हाथ नहीं आया है।

खजाने की खोज

तिजोरी का ऊपरी हिस्सा 1 इंच बाहर सरकते ही जैसे समय थम गया। कोई चिल्लाया नहीं, कोई ताली नहीं बजी, सब बस देखते रह गए। नीरज ने हाथ वहीं रखे। उसने धक्का नहीं दिया। उसे पता था यह वह पल है जहां ज्यादातर लोग गलती कर बैठते हैं—अधीरता, ज्यादा जोर और ताला फिर से खुद को बंद कर लेता है।

उसने बहुत धीमी आवाज में खुद से कहा, “अब बस सही क्रम।” उसकी आंखें तिजोरी के अंदर झांकने की कोशिश नहीं कर रही थी, वह बाहर के संकेत पढ़ रहा था—हल्का झुकाव, दरवाजे का वजन, धातु की सांस। उसने बाएं हाथ से ऊपर वाले हिस्से को स्थिर रखा और दाएं हाथ से नीचे की ओर बहुत हल्का दबाव दिया। “गुड़।” अब आवाज भारी थी। ऐसी आवाज जो सिर्फ तभी आती है जब अंदर कुछ बड़ा अपनी जगह छोड़ रहा हो।

शर्मा सेठ अनजाने में दो कदम आगे आ गए। उनका गला सूख चुका था। “खुल रही है,” उनके मुंह से अपने आप निकल गया। नीरज ने आखिरी बार नीचे की ओर उंगली घुमाई—बस आधा घेरा, उसे ज्यादा नहीं। “क्लैक।” इस बार आवाज ने कोई शक नहीं छोड़ा। तिजोरी का दरवाजा अपने आप आगे की ओर झुक गया। एक सेकंड, दो सेकंड, फिर भारी लोहे का दरवाजा पूरी तरह खुल गया।

पूरा हॉल जैसे फट पड़ा। “खुल गई! अरे यह तो खुल गई! यह बच्चा कर दिखाया!” कैमरे चमकने लगे, लोग आगे बढ़ने लगे। लेकिन गार्ड्स ने तुरंत रोक लिया। शर्मा सेठ खुद तिजोरी के सामने पहुंचे। उनके हाथ कांप रहे थे। तिजोरी के अंदर का नजारा किसी ने सोचा भी नहीं था—अंदर सोने की ईंटें थी, हीरों से भरे लकड़ी के बक्से, पुराने जमाने के सिक्कों की थैलियां और नीचे मखमली कपड़े में लिपटी हुई मोटी-मोटी ज्वेलरी। करोड़ों नहीं, दर्जनों करोड़।

सम्मान और सवाल

हॉल में किसी की आवाज नहीं निकल रही थी। कुछ लोग अविश्वास में सिर हिला रहे थे, कुछ की आंखें चमक रही थी। शर्मा सेठ ने धीरे से एक ईंट उठाई। वजन असली था, चमक असली थी। उन्होंने नीरज की तरफ देखा—वहीं फटे कपड़े, वहीं शांत आंखें। “तू… कौन है बेटा?” नीरज ने सिर झुका लिया, “नीरज, कबाड़ी का बेटा।”

सेठ कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने जेब से रुमाल निकाला, माथा पोंछा और गहरी सांस ली। “मैंने कहा था, अगर तू तिजोरी खोल देगा तो मैं तुझे 10 करोड़ दूंगा।” हॉल में फिर से शोर उठा, “क्या सच में देगा? अब देखो क्या होता है।” शर्मा सेठ ने हाथ उठाकर सबको चुप कराया। उन्होंने अपने मैनेजर की तरफ देखा, “अभी यहीं, सबके सामने।”

नीरज के पिता, जो भीड़ के पीछे खड़े थे, अब तक कुछ समझ ही नहीं पाए थे। उनके पैरों से जैसे जमीन खिसक गई हो। लेकिन नीरज की नजर तिजोरी पर नहीं थी। उसकी नजर उस दरवाजे पर थी जो आज सिर्फ लोहे का नहीं, उसकी किस्मत का भी ताला खोल चुका था।

कहानी का मोड़

हॉल में शोर अब काबू से बाहर होने लगा था। कोई फोन पर बात कर रहा था, कोई वीडियो लाइव कर चुका था। “खजाना मिल गया” की खबर आग की तरह फैलने लगी थी। शर्मा सेठ ने अपने पर्सनल मैनेजर को इशारा किया, “लीगल टीम बुलाओ, अकाउंट्स तैयार रखो।”

मैनेजर हड़बड़ाकर फोन लगाने लगा। नीरज अब भी वहीं खड़ा था। ना उसके चेहरे पर लालच था, ना जीत की खुशी। जैसे उसने कोई सौदा नहीं, सिर्फ अपना काम पूरा किया हो। शर्मा सेठ उसके पास आए। पहली बार उनकी आवाज में सख्ती नहीं थी, “तू जानता है 10 करोड़ क्या होते हैं?”

नीरज ने सिर हिलाया, “इतना कि मेरे पिता जिंदगी भर कबाड़ उठाकर भी नहीं कमा पाएंगे।” भीड़ में खड़े कुछ लोग असहज हो गए, यह बच्चा सीधा बोल रहा था। सेठ कुछ पल उसे देखते रहे, फिर बोले, “तो फिर भी तू डर नहीं रहा?” नीरज ने जवाब दिया, “डर तब लगता है जब ताला समझ ना आए।”

सम्मान और इनाम

तभी नीरज के पिता आगे आए। उनका नाम रामदीन था, कपड़े और भी ज्यादा पुराने, आंखों में घबराहट। “सेठ जी, लड़का बच्चा है, अगर कोई गलती हो गई हो तो…” शर्मा सेठ ने उन्हें रोक दिया, “गलती? इसने मुझे तीन साल का सिर दर्द खत्म कर दिया।”

उसी वक्त लीगल टीम पहुंच गई। कागज खुले, कैमरों के सामने सब कुछ साफ-साफ हो रहा था। सेठ ने ऊंची आवाज में कहा, “सब लोग सुन लें, मैंने वादा किया था और शर्मा सेठ अपना वादा तोड़ता नहीं।” एक कागज आगे बढ़ाया गया। नीरज का नाम पूछा गया, उम्र लिखी गई, गार्डियन के तौर पर पिता का नाम।

नीरज के हाथ में पेन दिया गया। उसने कभी इतने कागज नहीं देखे थे, लेकिन उसने बिना हिचक दस्तखत कर दिए। भीड़ में किसी ने कहा, “अब यह लड़का बदल जाएगा।” नीरज ने वह बात सुन ली। उसने सिर उठाकर कहा, “मैं नहीं बदलूंगा, हालात बदलेंगे।”

शर्मा सेठ ने चेक आगे बढ़ाया। 10 करोड़। रामदीन के हाथ कांपने लगे। वह बैठने ही वाले थे कि नीरज ने उन्हें थाम लिया। सेठ ने चेक नीरज को नहीं, उसके पिता को दिया, “इसे संभाल कर रखना, बेटा समझदार है लेकिन दुनिया नहीं।”