हत्या करने वाली पत्नी की दोस्त निकली चालाक, इस मामले में उसका भी पूरा हाथ | गुरविंदर सिंह फरीदकोट केस

 

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शीर्षक: “तीसरी दोस्त”

बारिश रात भर हुई थी। सुबह की धूप अभी भी बादलों के पीछे कहीं अटकी थी, और सड़कों पर मिट्टी की गंध तैर रही थी। पंजाब के एक छोटे-से शहर धनपुर में हर कोई हर किसी को जानता था, और हर कोई यह भी जानता था कि “घर की बात घर में” रखने का नियम कितनी आसानी से टूट जाता है।

धनपुर के बाहरी हिस्से में एक कॉलोनी थी—गुलमोहर विहार। वहीं, गली नंबर सात के कोने वाले मकान में रहने वाला आदमी, गुरनाम सिंह, पिछले दो साल से अपनी “सीधी-सादी” जिंदगी को लेकर लोगों की नजरों में मिसाल था। ट्रांसपोर्ट का छोटा-सा काम, उम्र बत्तीस, चाल-ढाल में ठहराव—और पत्नी हरलीन के साथ एक ऐसा घर, जिसके बाहर तुलसी का गमला था और अंदर दीवारों पर नई पेंट की चमक।

लेकिन मिसालें अक्सर वही बनती हैं जिनके भीतर दरारें सबसे पहले आती हैं—और जिन्हें देखने के लिए कोई तैयार नहीं होता।

उस सुबह जब गुरनाम सिंह का शव उसके बेडरूम में मिला, तो शहर में एक ही सवाल गूंजने लगा—
“इतना सीधा आदमी… इसके साथ ऐसा क्यों?”

और उस सवाल के पीछे, बहुत धीरे-धीरे एक दूसरा सवाल उठने लगा—
“किसके लिए?”

1) पहली परत: घर का सन्नाटा

पुलिस की जीप जब कॉलोनी में घुसी, तो बच्चे स्कूल जाने के लिए निकल रहे थे। एक पल को सब रुक गए। पुलिस का आना धनपुर में वैसे भी खबर बन जाता था, और जब जीप सीधे गुरनाम के घर के सामने रुकी, तो खिड़कियों के पर्दे खुद-ब-खुद सरकने लगे।

दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर से हरलीन की आवाज़ टूटकर बाहर आई—
“प्लीज़… किसी को बुलाइए…!”

सबसे पहले पड़ोसी मिसेज़ वर्मा अंदर घुसीं। फिर दो-तीन लोग और। और फिर एक ऐसी चीख, जो पूरे घर में नहीं, पूरे मोहल्ले में फैल गई।

गुरनाम बिस्तर के पास पड़ा था। चेहरा शांति से ढका हुआ, जैसे कोई बहुत लंबी थकान के बाद सो गया हो। लेकिन कमरे में शांति नहीं थी—शांति के नीचे एक अजीब-सी बेचैनी थी, जो किसी चीज़ के “सही न होने” की गवाही दे रही थी।

कुछ देर में सब समझ गए—यह सिर्फ मौत नहीं थी।
यह घटना थी।

पुलिस ने घर सील किया। एसआई राघव सिंह खुद मौके पर थे। सख्त चेहरा, आंखों में अनुभव का वजन, और आदत—हर चीज़ को “जैसा दिखता है” वैसा मानने से पहले परखने की।

उन्होंने हरलीन को पानी दिया और पूछताछ शुरू की।

हरलीन की आंखें सूजी हुई थीं। आवाज़ कांप रही थी—
“मैं… मैं सुबह उठी तो… गुरनाम उठे नहीं। मैंने हिलाया… फिर… मैंने देखा…”

एसआई राघव ने धीरे से पूछा—
“रात को कौन-कौन था घर में?”

हरलीन ने तुरंत कहा—
“कोई नहीं। सिर्फ हम दोनों।”

“किसी से झगड़ा? किसी ने धमकी?”

“नहीं… बस… कभी-कभी छोटी बातों पर बहस हो जाती थी।”

“किस बात पर?”

हरलीन ने नजरें झुका लीं—
“पैसों पर… और… कुछ घरेलू बातें।”

राघव सिंह ने कमरे में नजर घुमाई। अलमारी थोड़ी खुली थी, लेकिन सामान बिखरा नहीं था। मोबाइल चार्जिंग पर लगा था। खिड़की अंदर से बंद। दरवाज़ा आधा खुला—पर वह “घबराहट में खुला” लग रहा था, “जबरन खुला” नहीं।

और फिर उनकी नजर गई एक कप पर—बेडसाइड टेबल पर रखा हुआ, आधा खाली।
कप में चाय की हल्की गंध थी, पर उसमें कुछ “और” भी था—एक कड़वाहट, जो चाय की नहीं थी।

राघव ने कांस्टेबल को इशारा किया—
“इसे फोरेंसिक में भेजो। और… घर का सीसीटीवी है?”

हरलीन ने जल्दी से कहा—
“नहीं, हमारे पास नहीं।”

“पड़ोस में?”

मिसेज़ वर्मा बोलीं—
“वही सामने वाला घर… शर्मा जी ने कैमरा लगाया है।”

राघव सिंह ने सिर हिलाया।
कहानी की पहली परत खुलने वाली थी।

2) दूसरी परत: “दोस्ती” का चेहरा

हरलीन की एक बहुत करीबी दोस्त थी—सोनिया। शहर में सब उसे सोनिया “मैडम” कहते थे। ब्यूटी पार्लर चलाती थी, बोलती मीठा थी, और लोगों के मन की बात इतनी जल्दी पकड़ लेती कि सामने वाला खुद अपनी पोल खोल देता।

गुरनाम के घर में सोनिया का आना-जाना आम था। कभी मेहंदी की बात, कभी कपड़ों की, कभी “पति समझता ही नहीं” वाली शिकायतें—हरलीन का मन अक्सर सोनिया के पास ही हल्का होता था।

जब पुलिस ने हरलीन से पूछा कि कल रात उसने किससे बात की थी, तो वह थोड़ी देर रुकी—फिर बोली—
“सोनिया से… बस…”

राघव सिंह ने नोट किया—
“बस” शब्द हमेशा किसी कहानी का दरवाज़ा होता है।

उन्होंने पूछा—
“कितनी देर बात हुई?”

“पाँच… दस मिनट।”

“क्या बात?”

हरलीन ने होंठ काटे—
“वही… घर की बातें। गुरनाम… देर से आते हैं, बात नहीं करते… मैं अकेली महसूस करती हूँ…”

राघव सिंह ने बिना भाव बदले कहा—
“ठीक है। सोनिया का नंबर?”

हरलीन ने नंबर दे दिया।
और अगले ही घंटे, सोनिया थाने में थी—सफेद सूट, आंखों में दुख का अभिनय, और हाथों में पानी की बोतल, जैसे वह किसी का सहारा बनकर आई हो।

“गुरनाम जी तो अच्छे इंसान थे,” सोनिया ने कहा, “यह कैसे हो गया… मैं तो विश्वास ही नहीं कर पा रही।”

राघव सिंह ने शांत स्वर में पूछा—
“कल रात आप हरलीन से कब बात कर रही थीं?”

“करीब… नौ बजे के आसपास। वह परेशान थी… मैंने बस उसे समझाया।”

“क्या समझाया?”

सोनिया ने लंबी सांस ली—
“मैंने कहा, रिश्ते में उतार-चढ़ाव होते हैं। सब ठीक हो जाएगा।”

राघव सिंह ने सीधे देखा—
“आपने उसे कोई दवा या घरेलू नुस्खा बताया?”

सोनिया की आंखें पल भर को झपकीं—

“नहीं… क्यों?”

“फोरेंसिक को कप मिला है। उसमें कुछ मिलावट लग रही है। अभी पुष्टि नहीं… पर पूछ रहा हूँ।”

सोनिया ने तुरंत हाथ जोड़ दिए—
“साहब, मैं क्यों करूँगी ऐसा? हरलीन मेरी बहन जैसी है।”

राघव सिंह ने फाइल बंद की।
“ठीक है। आप जा सकती हैं। शहर से बाहर मत जाना।”

सोनिया उठी, दुखी चेहरा बनाए, और बाहर निकल गई।
लेकिन उसके बाहर निकलते ही राघव सिंह ने कांस्टेबल से कहा—
“इसकी कॉल डिटेल, लोकेशन, और पार्लर के स्टाफ की लिस्ट निकालो। और… हरलीन के मोबाइल के चैट बैकअप भी।”

कांस्टेबल बोला—
“सर, आपको शक है?”

राघव सिंह ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा—
“मुझे शक नहीं… मुझे पैटर्न दिख रहा है।”

3) तीसरी परत: गुरनाम की डायरी

गुरनाम के घर की तलाशी में पुलिस को एक पुरानी-सी डायरी मिली। उसका कवर घिसा हुआ था, जैसे वह अक्सर खोली जाती हो—पर किसी की नजर से बचाकर।

डायरी के पन्नों में गुरनाम ने छोटी-छोटी बातें लिखी थीं—काम, पैसों की तंगी, किसने उधार मांगा, किसने धोखा दिया। लेकिन आखिरी दो पन्नों में कुछ अलग था।

“हरलीन बदल गई है।”
“उसकी दोस्त सोनिया बहुत ज्यादा दखल देती है।”
“आज फिर हरलीन ने कहा—‘तुम मेरी बातों को समझते नहीं।’”
“मैंने कहा—‘हम घर बना रहे हैं, वक्त लगेगा।’”
“पर उसे शायद घर नहीं… कुछ और चाहिए।”

राघव सिंह ने पन्ने पलटे। आखिरी लाइन ने उन्हें रोक दिया—

“कल सोनिया आई थी। चाय में अजीब स्वाद था। मैंने पूछा, उसने कहा—नई पत्ती है।”

राघव सिंह ने डायरी बंद की।
अब यह “घरेलू मौत” नहीं रही।
अब यह सुनियोजित लगने लगी।

4) फोरेंसिक रिपोर्ट: चाय का सच

48 घंटे बाद फोरेंसिक रिपोर्ट आई।

कप के अवशेषों में एक विषाक्त पदार्थ की मात्रा मिली—इतनी कि अगर किसी व्यक्ति के शरीर में जाए, तो पहले बेहोशी, फिर सांस रुकना… और फिर सन्नाटा।

राघव सिंह ने रिपोर्ट हाथ में लेकर सिर्फ एक वाक्य कहा—
“अब बात सीधी है।”

हरलीन को फिर बुलाया गया।

उसके सामने रिपोर्ट रखी गई।
“यह चाय में मिला था। यह गलती से नहीं मिलता, हरलीन जी।”

हरलीन ने रिपोर्ट देखी, हाथ कांप गए।
“मैं… मैंने कुछ नहीं किया, साहब… मैं क्यों…?”

राघव सिंह ने धीरे-धीरे सवाल शुरू किए—कठोर नहीं, पर लगातार।

“चाय किसने बनाई?”

“मैंने…”

“चाय की पत्ती कहाँ से आई?”

“घर में थी…”

“कौन लाया था?”

हरलीन की आंखें घूम गईं।
“मैं… मुझे याद नहीं…”

राघव सिंह ने सामने झुककर कहा—
“याद कीजिए। यह वही जगह है जहाँ झूठ टिक नहीं पाता।”

हरलीन की सांस तेज़ हो गई।
“सोनिया… सोनिया कल… पत्ती लाई थी। बोली थी—‘नई है, ट्राय करो।’”

राघव सिंह ने शांत आवाज़ में कहा—
“और आपको इस पर शक नहीं हुआ?”

हरलीन रोने लगी—
“मुझे क्या पता था… वह मेरी दोस्त है!”

राघव सिंह ने पहली बार अपनी आवाज़ ऊँची की—
“दोस्ती में ज़हर नहीं मिलाया जाता, हरलीन जी!”

हरलीन का चेहरा सफेद पड़ गया।
वह फूट पड़ी—
“मैंने… मैंने सिर्फ… मैं परेशान थी। गुरनाम मुझे समय नहीं देते थे। सोनिया कहती थी—‘तुम्हारी जिंदगी बर्बाद हो रही है।’ वह कहती थी—‘बस उसे सुला दो, फिर हम बात करेंगे…’”

“हम?” राघव सिंह ने पकड़ लिया।
“हम कौन?”

हरलीन ने रोते हुए कहा—
“मैं… मैं नहीं जानती… वह… वह कहती थी सब ठीक हो जाएगा।”

राघव सिंह ने कलम घुमाई।
अब कहानी का नाम बदल रहा था—
अब यह “पत्नी” की कहानी नहीं थी।
अब यह “पत्नी और दोस्त” की कहानी थी।

5) सोनिया की चाल: पार्लर के पीछे का खेल

पुलिस ने सोनिया के ब्यूटी पार्लर की जांच शुरू की। पहली नजर में सब सामान्य—मेकअप का सामान, क्रीम, हेयर डाई, रिसेप्शन पर रजिस्टर। मगर राघव सिंह उन चीज़ों को देखते थे, जो दिखती नहीं।

स्टोर-रूम में एक छोटा-सा कैबिनेट मिला—लॉक किया हुआ। सोनिया ने कहा—
“यह बस मेरे पर्सनल डॉक्यूमेंट्स हैं।”

पुलिस ने वारंट के साथ लॉक खुलवाया। अंदर कुछ कागज थे—और एक छोटी शीशी, जिस पर कोई लेबल नहीं था।

फोरेंसिक ने शीशी का टेस्ट किया।
वही पदार्थ।

अब सोनिया “सिर्फ दोस्त” नहीं थी।
वह साजिश का केंद्र थी।

लेकिन सवाल अब भी बचा था:
सोनिया ने यह क्यों किया?

राघव सिंह ने उसकी कॉल डिटेल मंगवाई।
और तभी सामने आया एक नाम—करणदीप

करणदीप शहर का “समझदार” बिजनेसमैन कहलाता था। असल में वह जमीनों के सौदों में चाल चलता था, लोगों को फँसाकर सस्ते में खरीदता, और फिर ऊँचे दाम पर बेचता।

गुरनाम के पास कॉलोनी के पास वाली एक छोटी जमीन थी—पिता की विरासत। उसे बेचने के लिए कई लोग पीछे पड़े थे, पर गुरनाम टस से मस नहीं होता था। वह कहता—
“यह मेरे पिता की निशानी है। इसे नहीं बेचूंगा।”

और ठीक वहीं पर, कहानी के धागे आपस में जुड़ने लगे।

सोनिया और करणदीप की बातचीत रिकॉर्ड में थी—बार-बार, देर रात, लंबी कॉल्स।
और गुरनाम की मौत के बाद, करणदीप की एक कॉल थी—
“काम हो गया?”

राघव सिंह ने अपनी टीम को देखा।
“अब समझ आया… यह सिर्फ रिश्ते का झगड़ा नहीं। यह लालच है।”

6) हरलीन की टूटती स्वीकारोक्ति

हरलीन को दोबारा बैठाया गया—इस बार उसके सामने सोनिया का नाम सिर्फ “दोस्त” नहीं, “सह-आरोपी” की तरह रखा गया।

राघव सिंह ने कहा—
“सोनिया के पास वही पदार्थ मिला। और उसका करणदीप से संपर्क भी।”

हरलीन का चेहरा जैसे गिर गया।
“करणदीप…? वह… वह सोनिया का…?”

“हमें वही बताइए जो आप जानती हैं।”

हरलीन ने सिसकते हुए कहा—
“सोनिया अक्सर कहती थी कि ‘तुम्हारे पास जमीन है, घर है… तुम्हें क्या कमी है?’ फिर कहती—‘गुरनाम की वजह से तुम घुट रही हो।’
फिर… एक दिन उसने कहा—‘अगर गुरनाम ना रहे, तो तुम्हें आज़ादी भी मिल जाएगी और सब कुछ तुम्हारा हो जाएगा।’”

राघव सिंह ने बिना पलक झपकाए पूछा—
“तो आपने योजना मान ली?”

हरलीन ने सिर हिला दिया—
“मैंने… मैंने सोचा नहीं… बस… उसके शब्द… मेरे दिमाग में बैठ गए।
उसने कहा—‘मैं सब संभाल लूंगी। बस तुम चाय बना देना।’
मैंने पूछा—‘मर तो नहीं जाएगा?’
उसने कहा—‘नहीं, बस नींद आ जाएगी…’”

हरलीन फूट-फूटकर रोने लगी।
“मैंने उसे रोका नहीं, साहब… मैं दोषी हूँ… लेकिन मैं… मैं राक्षस नहीं हूँ…!”

राघव सिंह ने धीमे से कहा—
“जिन्होंने अपराध किया, वे पहले खुद को यही कहते हैं।”

7) गिरफ्तारी: सोनिया का नकाब

सोनिया को पकड़ने पुलिस उसके घर पहुँची। दरवाज़ा खुला, पर अंदर सन्नाटा। अलमारी खाली। कपड़े गायब।
वह भाग चुकी थी।

राघव सिंह ने तुरंत नाकाबंदी करवाई। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, हाईवे—सब जगह खबर।

दो दिन बाद एक सूचना मिली—धनपुर से 70 किलोमीटर दूर नौशहरा ढाबे के पास एक महिला नकाब में बैठी है, लगातार फोन कर रही है।

पुलिस पहुँची।
वह सोनिया थी।

उसने पहले तो चिल्लाकर कहा—
“मैंने कुछ नहीं किया! यह सब हरलीन की गलती है!”

राघव सिंह ने उसे हथकड़ी लगाते हुए शांत स्वर में कहा—
“जिन्होंने चाल चली, वे हमेशा कहते हैं—‘मैंने कुछ नहीं किया।’ चलिए, अब अदालत तय करेगी।”

सोनिया का चेहरा पहली बार बिगड़ा।
उसके भीतर का “मीठा” खत्म हो गया।
और उसकी जगह निकली—एक ठंडी, गुस्सैल सच्चाई।

8) आखिरी परत: असली मकसद

थाने में पूछताछ हुई। शुरुआत में सोनिया ने हर बात से इंकार किया। लेकिन जब शीशी, कॉल रिकॉर्ड, और हरलीन की बयान-डायरी सामने रखी गई, तो उसके बचने की जगह कम होती गई।

आखिर में उसने हँसते हुए कहा—
“ठीक है। मान लिया। मैंने किया।”

राघव सिंह ने पूछा—
“क्यों?”

सोनिया ने कुर्सी पर पीछे टिकते हुए कहा—
“क्योंकि दुनिया में सबसे सस्ता हथियार क्या है, पता है?
किसी के कान में सही समय पर सही बात डाल देना।
मैंने हरलीन को मारा नहीं, साहब… मैंने उसे बस… धकेला।”

“धकेला किस तरफ?”

“उस तरफ जहाँ से लौटना मुश्किल होता है।”

राघव सिंह ने सख्ती से कहा—
“मकसद?”

सोनिया की आंखें चमकीं—
“गुरनाम के पास जमीन थी। वह नहीं बेचता था। करणदीप को वह जमीन चाहिए थी।
और मुझे चाहिए था पैसा… और वह जिंदगी, जो मैं दूसरों को सजाकर दिखाती थी।”

राघव सिंह ने पूछा—
“और हरलीन?”

सोनिया ने कंधे उचका दिए—
“उसे चाहिए था प्यार, ध्यान, और थोड़ी ‘आजादी’। मैंने उसे सपना दिखाया—कि गुरनाम हटेगा तो जिंदगी खिल जाएगी।
सपने दिखाना मेरा काम है, साहब। मैं पार्लर चलाती हूँ।”

कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
फिर राघव सिंह ने कहा—
“आपने एक आदमी की जान ली, एक औरत की जिंदगी बर्बाद की, और एक घर उजाड़ दिया। इसे आप ‘काम’ कहती हैं?”

सोनिया ने बिना झिझक कहा—
“दुनिया भी तो यही करती है। फर्क बस इतना है—मैं पकड़ी गई।”

राघव सिंह ने फाइल बंद की।
“और यही फर्क काफी है।”

9) अदालत और पछतावा

कुछ महीने बाद अदालत में सुनवाई हुई। धनपुर के लोग रोज तारीख पर आते, जैसे यह मामला उनका मनोरंजन बन गया हो। लेकिन हरलीन के लिए यह मनोरंजन नहीं था—यह उसकी सांसों पर चढ़ा बोझ था।

जब जज ने उससे पूछा—
“क्या आपको अपने किए पर पछतावा है?”

हरलीन की आवाज़ बहुत धीमी थी—
“पछतावा… शब्द छोटा है, साहब।
मैंने भरोसा किया… और मैंने अपने ही हाथों से अपना घर जला दिया।
मैंने गुरनाम को नहीं समझा… और सोनिया को ज्यादा समझ लिया।”

सोनिया कोर्ट में भी वही रही—आंखों में चालाकी, चेहरा शांत।
लेकिन जब सजा सुनाई गई, तो उसके चेहरे पर पहली बार डर की एक रेखा आई—बहुत छोटी, बहुत जल्दी, पर मौजूद।

राघव सिंह बाहर खड़े थे। उन्होंने भीड़ को देखा—और मन ही मन सोचा:
अपराध हमेशा किसी एक दिन में नहीं होता।
वह धीरे-धीरे बनता है—शिकायत से, लालच से, और उस दोस्ती से, जो आपकी कमज़ोरी को पहचानकर उसे हथियार बना लेती है।

10) कहानी की सीख: “दोस्ती” का असली मतलब

धनपुर में कुछ दिन तक यह मामला चर्चा में रहा। फिर नई खबरें आ गईं, नई अफवाहें, नए तमाशे। शहर आगे बढ़ गया।

लेकिन कुछ चीजें वहीं रह गईं—
गुरनाम की बंद डायरी,
हरलीन की टूट चुकी आवाज़,
और सोनिया की वह ठंडी मुस्कान, जिसने सिखाया कि—

हर मीठा बोलने वाला अपना नहीं होता।
हर सलाह मदद नहीं होती।
और सबसे बड़ी बात:
जब किसी का दुख “ईंधन” बन जाए, तो कोई चालाक उसे आग बनाकर छोड़ता है।

गुरनाम की मौत ने एक घर नहीं बदला—
उसने कई रिश्तों की परिभाषा बदल दी।

और राघव सिंह के लिए यह केस एक लाइन बनकर रह गया—
“कई बार हत्या हाथ से नहीं… ज़हन में होती है।”