10 साल बाद लौटा फौजी: राम मंदिर की सीढ़ियों पर भीख मांगती मिली पत्नी

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यह कहानी एक भारतीय फौजी की है, जिसने अपनी पत्नी को 10 साल के बाद राम मंदिर की सीढ़ियों पर भीख मांगते हुए पाया। यह एक प्रेरणादायक और दिल को छूने वाली कहानी है, जो हमें यह सिखाती है कि एक सच्चे फौजी का कर्तव्य केवल सीमा पर नहीं होता, बल्कि वह अपने परिवार और समाज की भी रक्षा करता है।

अयोध्या की पावन धरती

अयोध्या, वह पवित्र शहर जहां हर पत्थर, हर गली और हर पेड़ में भगवान श्री राम की गाथा बसी हुई है। यह वही शहर है, जो हर भारतीय के दिल में एक विशेष स्थान रखता है। यह शहर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसकी आध्यात्मिकता और इतिहास ने इसे और भी खास बना दिया है।

अयोध्या में राम मंदिर की सीढ़ियों पर जब विक्रम सिंह ने कदम रखा, तो वह एक ऐसा मोड़ था, जो उसकी और उसकी पत्नी सुमन की ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाला था। यह वही विक्रम था, जो 10 साल पहले एक सैनिक के रूप में शहीद हो गया था। उसकी पत्नी सुमन ने यह मान लिया था कि वह अब कभी लौटकर नहीं आएगा। लेकिन जीवन के कड़े इम्तिहान के बाद, जब विक्रम वापस लौटकर आया, तो उसने पाया कि उसकी पत्नी ने कई सालों तक अपने जीवन की कठिनाइयों का सामना किया था।

विक्रम सिंह की वापसी

विक्रम सिंह, एक सच्चे भारतीय फौजी की तरह 10 साल बाद वापस लौटे थे। यह वह समय था जब उसे अपनी पत्नी सुमन की हालत का पता चला। वह जब अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन करने पहुंचे, तो उन्हें अपने जीवन का सबसे बड़ा सच सामने मिला।

विक्रम सिंह ने अपना पहला कदम अयोध्या की धरती पर रखा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी थकान थी, लेकिन उसकी आँखों में चमक थी। 10 साल पहले, विक्रम को कश्मीर में एक बर्फीले तूफान और दुश्मन की घुसपैठ के दौरान लापता घोषित कर दिया गया था। उसे शहीद मान लिया गया था। लेकिन अब वह वापस आया था, अपने परिवार से मिलने और भगवान श्री राम के दर्शन करने के लिए।

राम मंदिर की सीढ़ियों पर भीख मांगती सुमन

विक्रम जब राम मंदिर की सीढ़ियों पर पहुंचा, तो उसकी नज़र एक भिखारिन पर पड़ी, जो बिल्कुल अपनी पत्नी सुमन की तरह दिख रही थी। वह लड़की जो राम मंदिर के सीढ़ियों पर गुमसुम बैठी थी, उसी के बारे में विक्रम को कई सालों तक उम्मीद थी।

विक्रम ने उसे अपनी पत्नी सुमन मान लिया, लेकिन उसका चेहरा और उसकी हालत देखकर उसे यकीन नहीं हुआ। उसने सोचा कि वह शायद कोई और है। विक्रम ने अपनी पत्नी को पहचानने की कोशिश की, लेकिन सुमन का चेहरा बहुत बदल चुका था। उसकी आंखों में वह डर और दुख था, जिसे विक्रम ने 10 साल पहले छोड़ा था।

विक्रम ने अपनी पत्नी को देखा और उसे अपनी गोदी में उठा लिया। “तुम मुझे पहचान नहीं पा रही हो सुमन?” विक्रम की आवाज़ कांप रही थी। सुमन की आंखों में हलचल हुई और फिर वह विक्रम को पहचान पाई। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन उसकी मुस्कान वापस लौट आई।

सुमन की दास्तान

सुमन ने विक्रम से सारी कहानी बताई, कैसे 10 साल पहले विक्रम के शहीद होने के बाद उसका परिवार टूट गया। विक्रम के पिता की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई, और सुमन को बलवंत, विक्रम के चचेरे भाई, ने ग़लत तरीके से अपना हक़ जताया था। उसने सुमन को घरेलू नौकरानी बना दिया और विक्रम की माँ को वृद्धाश्रम में फेंक दिया।

सुमन ने कहा, “बाबूजी को उन्होंने मार दिया, विक्रम। मां को वृद्धाश्रम में डाल दिया और मुझे भिखारिन बना दिया।” विक्रम की आंखों में आंसू थे, उसने ठान लिया कि वह अब बलवंत से बदला लेगा, जिसने उसके परिवार के साथ यह सुलूक किया था।

विक्रम का बदला

विक्रम ने अपने गुस्से को काबू किया, लेकिन उसने मन में यह कसम खाई कि अब वह अपने परिवार को फिर से सम्मान दिलाएगा। उसने सबसे पहले अपनी माँ को वृद्धाश्रम से बाहर निकाला और उसे सुरक्षित स्थान पर रखा। फिर विक्रम ने बलवंत के खिलाफ कदम उठाया। वह अपनी पत्नी और माँ के साथ बलवंत की हवेली के सामने खड़ा था। उसने उस हवेली के गेट को खोला और बलवंत को अंदर से बाहर खींच लिया। बलवंत ने विक्रम को देखते ही घबराकर अपनी गलती मान ली, लेकिन विक्रम ने कहा, “अब तुझे जो करना था, वह हो चुका।”

विक्रम ने बलवंत और उसके गुंडों को पुलिस के हवाले किया। बलवंत को जाली वसीयत, घरेलू हिंसा और हत्या की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया। विक्रम ने न्याय की जीत देखी, और इस बार उसे अपने परिवार का सम्मान वापस मिला।

राम मंदिर के सामने विक्रम का संदेश

राम मंदिर में एक बार फिर घंटियां गूंज रही थीं। विक्रम ने अपने परिवार के साथ भगवान श्री राम के दर्शन किए और पुजारी से आरती ली। मीडिया ने जब विक्रम के बारे में सुना, तो वह वहां आए और विक्रम से सवाल करने लगे। विक्रम ने कहा, “अगर मेरे लौटने पर मुझे मेरी पत्नी भिखारी मिलती है, तो यह मेरी नहीं, बल्कि इस सिस्टम की शर्म है।”

इस बार विक्रम ने अपनी पत्नी सुमन का हाथ कसकर पकड़ा और उसे अपनी पुरानी जीप में बैठाया। विक्रम ने खुद को और अपनी पत्नी को राम के आशीर्वाद से एक नई जिंदगी दी।

अंतिम सबक

यह कहानी एक सच्चे फौजी की है, जिसने अपने कर्तव्य, परिवार और समाज के लिए हर कठिनाई का सामना किया। विक्रम सिंह ने साबित कर दिया कि एक सच्चा फौजी न केवल अपने देश की रक्षा करता है, बल्कि अपने परिवार और समाज की भी रक्षा करता है। उसके लिए कर्तव्य और ईमानदारी हमेशा सबसे ऊपर होती है।

कभी-कभी जीवन में हम जिन संघर्षों से गुजरते हैं, वे हमें एक नई दिशा दे सकते हैं। विक्रम ने अपने परिवार और समाज के लिए जो किया, वह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है। एक फौजी का दिल हमेशा अपने परिवार और देश के लिए धड़कता है, और यही असली ताकत होती है।

समाप्त