12 साल बाद DM बेटा माँ से मिलने गाँव पहुँचा… बूढ़ी माँ टूटी-फूटी झोपड़ी में रह रही थी — फिर जो हुआ…
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“12 साल बाद DM बेटे ने मां से मिलने गांव पहुंचा, बूढ़ी मां टूटी-फूटी झोपड़ी में रह रही थी — फिर जो हुआ…”
भाग 1: डीएम साहब का लौटना
मुजफ्फरपुर जिले के एक छोटे से गांव की कच्ची सड़क पर धूल का गुबार अचानक उठने लगा। एक के बाद एक सरकारी गाड़ियाँ आकर रुकीं, और गांव के लोग समझ गए कि कोई बड़ा अफसर आया है। डीएम साहब की गाड़ी जैसे ही रुकी, सबकी नजरें उस ओर मुड़ गईं। सूट-बूट और सख्त चेहरे के साथ डीएम साहब बाहर उतरे, जिनके पीछे एसडीएम, तहसीलदार और कुछ पुलिस अधिकारी भी थे।
लेकिन डीएम साहब ने किसी से कोई सवाल नहीं किया, न किसी से फाइल की मांग की, न ही रास्ता पूछा। उन्होंने बस सामने जाती संकरी पगडंडी की ओर देखा और बिना कुछ कहे पैदल चल पड़े। वह पगडंडी जो पक्की सड़क के खत्म होते ही शुरू होती थी। उनके पीछे अधिकारी थे, लेकिन डीएम साहब किसी से कुछ नहीं बोले।
वह रास्ता उन्हें अच्छी तरह याद था। हर मोड़, हर गड्ढा, हर झुका हुआ पेड़। यही रास्ता था जिस पर कभी वह नंगे पांव स्कूल जाते थे और इसी रास्ते पर कभी मां के साथ पानी भरने जाते थे। डीएम साहब के कदम जैसे अपने आप रुक गए।
कुछ ही कदमों के बाद वह झोपड़ी सामने आ गई। टूटी हुई दीवारें, जगह-जगह से झड़ता पलस्तर, टीन की छत जो अब सिर्फ नाम की छत थी। बाहर पड़ी एक पुरानी खाट और पास ही एक खाली मटका। डीएम साहब के चेहरे पर सख्ती का भाव हल्का पड़ा। वह बस खड़े हो गए।
यह कोई सरकारी रिकॉर्ड की जगह नहीं थी, यह वही जगह थी जहाँ उन्होंने पहली बार मां की गोद में सिर रखकर हंसना सीखा था। वह कुछ पल खड़े रहे, और फिर धीरे से झोपड़ी की चौखट पर हाथ रखा। जैसे ही उन्होंने अंदर झांका, उन्हें एक बूढ़ी औरत दिखाई दी, जो चूल्हे के पास बैठी थी। उसकी कमर झुकी हुई थी, और उसकी आंखों में थकान थी जैसे उसने बरसों से किसी के लौटने का इंतजार किया हो।

भाग 2: मां की गोदी में पलने वाली यादें
मां ने चूल्हे की ओर हाथ बढ़ाया, लेकिन माचिस की तीली फिसल गई। डीएम साहब ने झुककर माचिस उठाई और चूल्हा जला दिया। मां ने उसे देखा और कहा, “यह हाथ किसी अफसर जैसे नहीं लगते।” डीएम साहब वहीं खाट पर बैठ गए। खाट के चरमराने की आवाज आई, जैसे वह पहचान गई हो कि यह वही जगह है। मां ने कहा, “कहाँ से आए हो बेटा?”
डीएम साहब ने हल्के से जवाब दिया, “यहीं से।”
मां हल्का सा हंसी। उसने कहा, “सब यही कहते हैं, लेकिन कोई यहीं का नहीं रहता।” उसकी नजर अपने झोपड़ी के बाहर उसी पगडंडी पर चली गई। फिर उसने कहा, “मेरा बेटा भी यहीं से गया था।”
डीएम साहब की उंगलियाँ मुट्ठी में बदल गईं। उसकी मां ने धीमी आवाज में कहा, “पिछले 12 साल हो गए।” यह सुनते ही डीएम साहब के भीतर एक शून्य सा आ गया। मां बोली, “पहले हर दिन इंतजार किया, फिर आदत पड़ गई।” उसने बिना आंसू के कहा, “मैं मां हूं, बेटा, इंतजार करना सीख ही लेती हूं।”
डीएम साहब ने धीरे से पूछा, “अगर वह लौट आए तो?” मां ने बिना रुके कहा, “तो क्या? दरवाजा तो खुला है।”
भाग 3: 12 साल बाद लौटे बेटे की चुनौती
अगले कुछ पल में, डीएम साहब को एहसास हुआ कि 12 साल बाद लौटना आसान नहीं था। असल में असली मुश्किल तो अब शुरू होने वाली थी। वह मां, जो कभी बेटे की सख्ती से डरती थी, आज उसी सख्ती से खुद को मजबूत बनाकर खड़ी थी। उसने कभी किसी से शिकायत नहीं की थी, लेकिन अब उसने बेटा खोने के बाद अपने भीतर का संघर्ष जता दिया था। डीएम साहब को यह महसूस हो रहा था कि उनकी सख्त सोच अब ज्यादा दूर नहीं जा सकती, क्योंकि उन सख्त फैसलों ने ही उनकी मां को यहां तक लाकर खड़ा कर दिया था।
डीएम साहब ने झोपड़ी के भीतर कुछ पल और बिताए, और फिर सोचा कि अगर वे सच में मां को सम्मान देना चाहते हैं, तो उन्हें सिर्फ सरकारी काम से परे जाकर कुछ करना होगा।
भाग 4: डीएम साहब की यात्रा
डीएम साहब ने धीरे से अपनी मां के हाथ को पकड़ लिया। उनकी आंखों में आंसू थे, और आवाज में कमजोरी। मां ने सिर झुका लिया, जैसे वह किसी पुराने फैसले को याद कर रही हो। डीएम साहब ने कहा, “मैंने फोन नहीं किया, मां। मुझे लगा जब कुछ बन जाऊंगा, तभी लौटूंगा।” मां ने उसकी आंखों में देखा और बोला, “गलती तुम्हारी नहीं थी।”
डीएम साहब ने सिर झुका लिया। “मां, मुझे डर था कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा, इसलिए मैंने घर छोड़ दिया।”
मां ने एक गहरी सांस ली, “तुम सही कह रहे हो बेटा, डर हर बेटे को लगता है। लेकिन जो डर से लड़ता है, वही बड़ा बनता है।”
भाग 5: डीएम साहब की मां की यादें
मां की कहानियां सुनते-सुनते, डीएम साहब को यह एहसास हुआ कि उनके फैसले अब सिर्फ सरकारी नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हें अपनी मां और परिवार के प्रति जिम्मेदारी भी निभानी थी। डीएम साहब ने धीरे से मां के चेहरे को देखा और कहा, “अब क्या होगा?” मां ने शांत स्वर में कहा, “तू अब बड़ा आदमी बन गया है, बेटा। अब तू अकेला नहीं है।”
डीएम साहब ने उसकी गोदी में सिर रखा और आंसू बहाए। “अब कुछ करने का वक्त है।”
भाग 6: नई राह का आरंभ
12 साल बाद, डीएम साहब ने ना सिर्फ अपनी मां को सम्मान दिया, बल्कि गांव के बच्चों के लिए भी स्कूल की स्थापना की। उन्होंने गांव के विकास के लिए कई कदम उठाए, जिसमें बच्चों को शिक्षा देना और महिलाओं को सशक्त बनाना शामिल था।
डीएम साहब ने अपनी मां की शिक्षा और त्याग को न केवल अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में बल्कि अपने कर्तव्यों में भी स्थान दिया। उन्होंने मां की झोपड़ी को बदलकर एक आश्रय स्थल बना दिया, जहां गाँव की महिलाएं आकर अपने बच्चों को शिक्षा दे सकती थीं।
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