15 साल की बेटी ने दिव्यांग जज से कहा कि उसके पिता को रिहा कर दो, मैं आपको कुछ बताऊंगी…

दिल्ली की 30 हजारी कोर्ट का वह दिन बहुत भारी था। कोर्ट रूम नंबर चार में तिल रखने की भी जगह नहीं थी। चारों तरफ खामोशी और तनाव का ऐसा माहौल था मानो हवा भी थम गई हो। कटघरे में एक साधारण से दिखने वाले आदमी खड़े थे—रवि शर्मा। उनकी उम्र पचपन के आसपास थी, चेहरे पर थकान और आंखों में बेबसी साफ झलक रही थी। रवि शर्मा सरकारी स्कूल में एक लाइब्रेरियन थे। जिंदगी भर किताबों और ईमानदारी के साथ गुज़ारे हुए इंसान। लेकिन आज उन पर करोड़ों का बैंक घोटाला करने का आरोप था।

सारे सबूत, गवाह और दस्तावेज उनके खिलाफ थे। ऐसा लग रहा था कि फैसला उनके ख़िलाफ़ ही जाएगा और उन्हें कम से कम दस साल की सजा मिलेगी। न्याय की कुर्सी पर बैठे थे जस्टिस आनंद सिन्हा—एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही बड़े-बड़े वकील कांप उठते थे। उनकी ईमानदारी, कठोरता और तेज दिमाग ने उन्हें कानून की दुनिया का सबसे सख्त और कड़वा जज बना दिया था।

लेकिन आनंद सिन्हा की अपनी जिंदगी भी दुखों से भरी थी। तीन साल पहले हुए एक भयानक हादसे ने उनकी कमर के नीचे का हिस्सा हमेशा के लिए सुन्न कर दिया था। वह अब व्हीलचेयर पर कैद थे। उस रात की यादें अभी भी उनके ज़ेहन में ताज़ा थीं—तेज हेडलाइट्स, टायरों की चीख और फिर गहरा अंधेरा। हादसा करने वाला ड्राइवर कभी पकड़ा नहीं गया। इस घटना ने न केवल उनके शरीर को अपाहिज बना दिया बल्कि उनकी आत्मा को भी जकड़ लिया था। अब वे कानून को सिर्फ काले और सफेद रंग में देखते थे—न कोई भावना, न कोई हमदर्दी।

उसी भीड़भाड़ भरे कोर्टरूम में दर्शकों की बेंच पर एक नन्हीं सी 15 साल की लड़की बैठी थी—अनन्या। वही रवि शर्मा की बेटी। उसकी आंखें लाल थीं, मगर उनमें आंसू नहीं थे। उनमें एक अजीब सी आग और अटूट विश्वास था—कि उसके पिता निर्दोष हैं।

पिछले कई महीनों से अनन्या की दुनिया बदल चुकी थी। स्कूल के दोस्त उससे दूर हो गए थे, रिश्तेदार मुंह फेर चुके थे। घर की जिम्मेदारी, बीमार मां की देखभाल और जेल में पिता से मुलाकात—यह सब एक मासूम बच्ची ने अकेले संभाल रखा था। रात-रात भर जागकर वह केस की फाइलें पढ़ती, उम्मीद में कि शायद कोई सुराग मिले, कुछ ऐसा जो उसके पिता को बचा सके। उसे याद था कि जिस दिन बैंक में घोटाला हुआ था, उस दिन वह घर पर ही अपने पिता के साथ थी। वह अपने स्कूल प्रोजेक्ट के लिए मदद ले रही थी। लेकिन इस बात का कोई गवाह नहीं था।

मुकदमा अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका था। सरकारी वकील ने सशक्त दलीलें दीं और यह लगभग तय हो गया कि रवि शर्मा दोषी साबित होंगे। जस्टिस सिन्हा ने फैसला अगले दिन सुनाने का आदेश दिया।

उस रात अनन्या सो नहीं पाई। उसे पता था कि अगर कल सुबह का सूरज उगा तो उसका पिता हमेशा के लिए उससे दूर हो जाएगा। उसने ठान लिया कि वह एक आखिरी कोशिश करेगी। उसने किसी तरह जस्टिस सिन्हा का पता लगाया और शाम को उनके विशाल बंगले के बाहर पहुंच गई।

जब सिक्योरिटी गार्ड्स जस्टिस सिन्हा को कार से व्हीलचेयर पर उतार रहे थे, तभी अनन्या दौड़कर उनके सामने आ खड़ी हुई। गार्ड्स ने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन वह शेरनी की तरह दहाड़ी—“मुझे जज साहब से मिलना है!”

आनंद सिन्हा ने उसे पहचाना। यह वही लड़की थी जो हर पेशी में अपने पिता के लिए रोती थी। उन्होंने कठोर स्वर में कहा—“यह अदालत की अवमानना है। तुम जानती हो क्या कर रही हो?”

अनन्या ने कांपती आवाज़ को संभालते हुए कहा—“जज साहब, मेरे पिता को छोड़ दीजिए। वह बेगुनाह हैं। और अगर आप उन्हें सजा नहीं देंगे तो मैं वादा करती हूं कि आपको ऐसा राज बताऊंगी जिससे आप फिर से अपने पैरों पर चलने लगेंगे।”

सन्नाटा छा गया। जस्टिस सिन्हा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्हें लगा यह लड़की उनके सबसे बड़े जख्म का मजाक उड़ा रही है। उन्होंने गरजकर कहा—“दफा हो जाओ यहां से! मेरे लिए न्याय किसी चमत्कार से बड़ा है और मैं चमत्कारों में विश्वास नहीं करता।”

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