40 साल से बॉर्डर पर खाली टिफिन लेकर खड़ी “पागल” औरत… 😭जब सच सामने आया तो फौजियों ने दी सलामी !

.
.
.

माँ की गंभीर हालत में अस्पताल पहुँचा अरबपति, मंगेतर की हरकत देखकर सन्न रह गया

कहानी की शुरुआत

मुंबई कभी सोती नहीं। यह शहर सांस लेता है शोर में, सपनों में और उन लोगों की तवक़ों में जो हर सुबह यह मानकर उठते हैं कि आज का दिन उन्हें कल से आगे ले जाएगा। अर्जुन मल्होत्रा इस शहर का जाना-पहचाना नाम था। टेक्नोलॉजी सेक्टर में उसकी कंपनी को लोग अगली बड़ी क्रांति कहते थे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, फिनटेक, हेल्थ केयर सॉल्यूशंस—जहां भी भविष्य की बात होती वहां अर्जुन का नाम लिया जाता।

मीडिया उसे सेल्फ-मेड बिलेनियर कहता। निवेशक उस पर भरोसा करते थे। कर्मचारी उसे आदर्श मानते थे। बाहर से देखने पर उसकी जिंदगी एक परफेक्ट ग्राफ की तरह लगती थी। ऊपर जाती हुई बिना किसी गिरावट के। लेकिन अर्जुन जानता था कि हर ग्राफ के पीछे एक कहानी होती है। और उसकी कहानी एक तंग से कमरे से शुरू हुई थी। उस कमरे में एक टूटा हुआ पंखा था। एक पुरानी चारपाई और एक औरत जो हर रात अस्पताल की ड्यूटी से लौटकर भी मुस्कुराना नहीं भूलती थी। उसकी माँ, कमला देवी मल्होत्रा, जो अपने बेटे को कभी महसूस नहीं होने देती कि वह अकेली है।

अर्जुन की जिंदगी की शुरुआत

अर्जुन सात साल का था जब उसके पिता अचानक चले गए। कोई बीमारी नहीं, कोई लंबा विदाई पत्र नहीं। बस एक दिन वह आदमी घर से निकला और फिर कभी वापस नहीं आया। ना कोई फोन, ना कोई खबर। कमला देवी ने कभी उस बारे में ज्यादा बात नहीं की। उन्होंने रोना भी कम ही दिखाया। लेकिन अर्जुन ने देखा था कैसे वह रात में चुपचाप दीवार की ओर मुंह करके लेट जाती थी। कैसे सुबह उठकर फिर वही साड़ी पहनती थी, वही थका हुआ चेहरा और वही मजबूती।

उन्होंने सरकारी अस्पताल में नर्स की नौकरी की। तनख्वाह कम थी, काम ज्यादा। लेकिन उन्होंने कभी अर्जुन को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अकेली है। “तू बस पढ़ाई कर, बाकी मैं देख लूंगी,” वह कहती थी। अर्जुन ने वही किया। उसने पढ़ाई की, फिर और ज्यादा पढ़ाई की। उसने मेहनत की, खुद को साबित किया, और कहीं ना कहीं उस बच्चे के भीतर यह विश्वास जम गया कि अगर वह काफी अच्छा बन जाए, काफी सफल हो जाए तो कोई उसे फिर कभी छोड़कर नहीं जाएगा।

सालों बाद वही बच्चा अब मुंबई के एक ग्लास टावर की ऊपरी मंजिल पर खड़ा था। उस दिन सुबह अर्जुन बोर्ड मीटिंग में बैठा था। बड़ी स्क्रीन पर कंपनी के ग्रोथ चार्ट चल रहे थे। लोग सवाल पूछ रहे थे, तारीफ कर रहे थे। भविष्य की योजनाओं पर चर्चा कर रहे थे। लेकिन अर्जुन का ध्यान कहीं और था। उसके फोन पर अस्पताल से आए मिस्ड कॉल्स की संख्या बढ़ती जा रही थी। कमला देवी पिछले हफ्ते ही अस्पताल में भर्ती हुई थी। निमोनिया, उम्र के साथ शरीर अब पहले जैसा मजबूत नहीं रहा था। डॉक्टरों ने कहा था कि स्थिति गंभीर है लेकिन स्थिर और अर्जुन ने राहत की सांस ली थी। क्योंकि वह जानता था कि वहां कोई और है। रिया कपूर, उसकी मंगेतर, ने बिना कहे जिम्मेदारी संभाल ली थी।

रिया की भूमिका

रिया ने बहुत सहजता से उसकी जिंदगी में जगह बनाई थी। स्मार्ट, आत्मविश्वासी, आधुनिक सोच वाली वह उन लोगों में से थी जो ज्यादा सवाल नहीं करती थीं, लेकिन सही वक्त पर सही बातें कहती थी। जब कमला देवी अस्पताल में भर्ती हुई, रिया ने बिना कहे जिम्मेदारी संभाल ली। “तुम मीटिंग्स देखो,” उसने कहा था। “मैं आंटी के साथ हूं।”

अर्जुन को यह सुनकर अच्छा लगा था, शायद इसलिए नहीं कि रिया अस्पताल में थी, बल्कि इसलिए कि किसी ने बोझ हल्का कर दिया था। फिर भी कुछ था जो उसे बेचैन कर रहा था। उस दिन अस्पताल के कॉरिडोर में एक नर्स ने हल्की आवाज में किसी से कहा था, “वह लड़की बार-बार कागजों के बारे में पूछ रही है।” अर्जुन ने अनसुना कर दिया।

लोग पूछते हैं, चिंता में लोग ज्यादा सवाल करते हैं। इसमें कुछ अजीब नहीं था। और फिर भी उसकी माँ की एक बात उसे याद आई। पिछले महीने जब उसने रिया को घर लाकर औपचारिक तौर पर मिलवाया था, कमला देवी ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया था। सब कुछ ठीक था। लेकिन बाद में जब रिया चली गई, कमला देवी ने बस इतना कहा था, “लड़की ठीक है, पर उसकी आँखें बहुत बेचैन हैं।”

अर्जुन हंस पड़ा था। “माँ, आप भी ना, जमाना बदल गया है।” कमला देवी ने कुछ नहीं कहा था। उन्होंने बस बात बदल दी थी।

अर्जुन का निर्णय

मीटिंग खत्म होने से पहले ही अर्जुन ने फैसला कर लिया। वह जल्दी निकल जाएगा। उसने अपने असिस्टेंट को इशारा किया। कुछ निर्देश दिए और कमरे से बाहर आ गया। लिफ्ट के शीशे में उसने अपना चेहरा देखा। थका हुआ, लेकिन नियंत्रित। वही चेहरा जो हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखता था। लेकिन इस बार उसके सीने में कुछ अलग था।

अस्पताल में अर्जुन का कदम

मुंबई की ट्रैफिक हमेशा की तरह बेतरतीब थी। हॉर्न, आवाजें, लोग—लेकिन अर्जुन की कार जैसे किसी और ही दुनिया में चल रही थी। उसके दिमाग में पुरानी तस्वीरें उभर रही थी। माँ सफेद यूनिफॉर्म में रात की ड्यूटी से लौटती हुई। वह बच्चा जो दरवाजे पर बैठा इंतजार करता था। वह एहसास कि जब माँ घर में होती है तो सब ठीक होता है।

अस्पताल पहुँचते ही वह सीधे आईसीयू की ओर बढ़ा। वहाँ का माहौल हमेशा उसे असहज करता था। ठंडी रोशनी, मशीनों की आवाजें और उन परिवारों की आँखें जिनमें उम्मीद और डर साथ-साथ रहते हैं। कॉरिडोर में उसने रिया को एक डॉक्टर से बात करते देखा। सफेद शर्ट, सलीके से बंधे बाल। वह बिल्कुल वैसी लग रही थी जैसी एक आदर्श बहू दिखनी चाहिए। रिया ने अर्जुन को देखा तो पल भर के लिए चौकी।

“तुम इतनी जल्दी?” उसने पूछा।

“मीटिंग जल्दी खत्म हो गई।” अर्जुन ने कहा।

“आंटी अभी सो रही हैं,” रिया बोली। “डॉक्टर कह रहे थे कि ऑब्ज़र्वेशन जरूरी है। मैं कुछ फॉर्म्स के बारे में पूछ रही थी।”

अर्जुन ने सिर हिलाया। सब कुछ सामान्य था। फिर भी जब वह आईसीयू के दरवाजे के पास पहुंचा तो उसका हाथ दरवाजे के हैंडल पर रुक गया। एक अजीब सी अनुभूति जैसे किसी ने भीतर से कहा हो अभी। अर्जुन ने घड़ी देखी। शाम के 6:10। आमतौर पर वह इस समय नहीं आता था। उसने गहरी सांस ली। और दरवाजा खोल दिया।

कमला देवी और रिया का सच

आईसीयू का दरवाजा खुलते ही ठंडी हवा का एक झोंका अर्जुन के चेहरे से टकराया। यह वही हवा थी जिसे वह पहचानता था। दवाइयों, सैनिटाइज़र और उस अनकहे डर की गंध से भरी हुई जो हर ऐसे कमरे में मौजूद रहती है जहाँ जिंदगी और मौत एक पतली रेखा पर खड़ी होती है। उसने एक कदम अंदर रखा।

कमरा बहुत बड़ा नहीं था। सफेद दीवारें, तेज रोशनी और बीच में एक बिस्तर जिस पर उसकी माँ लेटी थी। कमला देवी का शरीर पहले से भी ज्यादा दुबला लग रहा था। छाती मशीन की लय पर ऊपर-नीचे हो रही थी। चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क लगा था। अर्जुन का गला सूख गया। वह माँ के इतना पास होते हुए भी खुद को असहाय महसूस कर रहा था।

उसने आगे बढ़ने से पहले एक पल रुक कर चारों ओर देखा। सब कुछ सामान्य लग रहा था। मॉनिटर की बीप, इनफ्यूज़न स्टैंड, सफेद चादर और फिर उसकी नजरिया पर पड़ी। वह बिस्तर के एकदम पास खड़ी थी। उसका शरीर थोड़ा झुका हुआ था जैसे वह कमला देवी के चेहरे के करीब कुछ ठीक कर रही हो। उसकी पीठ दरवाजे की तरफ थी इसलिए अर्जुन उसका चेहरा नहीं देख पा रहा था।

अर्जुन ने अपना मुंह खोला। “रिया…” आवाज़ बाहर नहीं आई। उस पल उसे लगा जैसे समय धीमा हो गया हो।

रिया के हाथ में एक तकिया था। वही पतला सफेद तकिया जो आईसीयू में मरीज के सिर को सहारा देने के लिए रखा जाता है। लेकिन वह तकिया सिर के नीचे नहीं था। वह तकिया ऊपर की ओर था। और रिया के दोनों हाथ उसे नीचे की ओर दबा रहे थे। सीधे उसकी माँ के चेहरे पर।

अर्जुन के दिमाग में जैसे कुछ टूट गया। एक सेकंड। बस एक सेकंड। लेकिन उस एक सेकंड में उसने सब कुछ देख लिया। कमला देवी की उंगलियां हल्की सी फड़की। मॉनिटर की बीप अचानक अनियमित हो गई। रिया का शरीर तनाव में जकड़ा हुआ था जैसे वह किसी निर्णय को पूरा करने की कोशिश कर रही हो।

रिया ने अर्जुन की तरफ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था। उस नजर में पकड़े जाने की घबराहट थी। अर्जुन ने उसे एक झटके में पीछे धकेल दिया। रिया संतुलन खोकर दवाइयों की ट्रॉली से टकराई। कांच की शीशियाँ खनखनाईं।

अर्जुन बिस्तर की तरफ झुका। उसकी माँ के हाथ कांप रहे थे जब उसने कमला देवी का हाथ पकड़ा। वह ठंडा था। बहुत ठंडा। मॉनिटर पर लाइनें तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। फिर एक तीखी आवाज गूंजी। अलार्म।

दरवाजा खुला। डॉक्टर और नर्से कमरे में दौड़ते हुए आए।

“सर बाहर जाइए। स्पेस चाहिए। ऑक्सीजन बढ़ाइए।” अर्जुन को पीछे खींच लिया गया। वह लड़खड़ा कर दो कदम पीछे हटा। लेकिन उसकी आँखें माँ से नहीं हटीं। डॉक्टर मास्क ठीक कर रहे थे। कोई इंजेक्शन तैयार कर रहा था। कोई मॉनिटर देख रहा था। सब कुछ बहुत तेजी से हो रहा था।

लेकिन अर्जुन के भीतर सब कुछ जड़ हो चुका था। वह माँ के पास खड़ा था। डॉक्टर ने उसे देखा। “आपकी माँ ने रिस्पॉन्ड किया है,” डॉक्टर ने कहा। “अब स्थिति स्थिर है, लेकिन हमें सावधान रहना होगा।”

अर्जुन ने सिर हिलाया। “मैं समझता हूं।”

उसने एक आखिरी बार माँ की तरफ देखा। “माँ, मैं हमेशा तुम्हारे पास हूं। तुम फिर से ठीक हो जाओगी।”