65 की जा बुढ़िया ठंड से काप रही थी बेचारी के पास कमल नही था / ये कहानी बिहार की हैं

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ठंडी रात की वह अनोखी मुलाकात

बिहार के बलिया जिले के एक छोटे से गाँव में नंदिनी नाम की एक बुज़ुर्ग महिला रहती थी। उम्र लगभग पैंसठ साल के आसपास थी, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी जीवन की चमक बाकी थी। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा जरूर था, पर उसकी सादगी और सौम्यता उसे अलग ही आकर्षण देती थी। गाँव के लोग अक्सर कहते थे कि नंदिनी ने अपने जीवन में बहुत दुख देखे हैं, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा एक शांत मुस्कान रहती थी।

नंदिनी के पति का देहांत कई साल पहले हो चुका था। उसके बाद से वह अकेली ही अपने छोटे से घर में रहती थी। उसका एक बेटा था, जिसका नाम रवि था। रवि अपनी पत्नी के साथ दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। काम की व्यस्तता और शहर की भागदौड़ के कारण वह कई सालों से गाँव नहीं आ पाया था।

समय बीतता गया, और नंदिनी के मन में अपने बेटे को देखने की इच्छा दिन-ब-दिन बढ़ती गई। हर त्योहार पर वह सोचती कि शायद इस बार उसका बेटा घर आएगा, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती। आखिर एक दिन उसने तय किया कि अब वह खुद ही दिल्ली जाकर अपने बेटे से मिलेगी।

एक सुबह उसने अपने छोटे से बैग में कुछ कपड़े रखे, थोड़ा सा खाना बांधा और गाँव के रेलवे स्टेशन की ओर निकल पड़ी। सर्दियों का मौसम था। हवा में ठंडक थी और आसमान में हल्की धुंध छाई हुई थी।

जब वह स्टेशन पहुँची, तभी बिहार से दिल्ली जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर खड़ी हो गई। जल्दी-जल्दी में नंदिनी जनरल डिब्बे में चढ़ गई। उस समय डिब्बे में ज्यादा भीड़ नहीं थी, इसलिए उसे नीचे की सीट मिल गई।

ट्रेन धीरे-धीरे चल पड़ी। बाहर अंधेरा बढ़ने लगा और ठंडी हवा खिड़कियों से अंदर आने लगी। रात का सफर लंबा था। नंदिनी अपने साथ कोई कंबल या गर्म कपड़ा नहीं लाई थी। शुरुआत में तो उसने खुद को समेट कर बैठने की कोशिश की, लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती गई, ठंड बढ़ती चली गई।

आधी रात के करीब नंदिनी ठंड से कांपने लगी। उसके हाथ-पैर सुन्न होने लगे थे। वह सीट पर लेटी हुई थी, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी।

ठीक सामने वाली सीट पर एक युवक कंबल ओढ़कर लेटा हुआ था। उसका नाम सुमित था। वह भी दिल्ली ही जा रहा था, काम की तलाश में। वह एक साधारण परिवार का लड़का था और अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था।

कुछ देर बाद सुमित की नजर नंदिनी पर पड़ी। उसने देखा कि वह ठंड से कांप रही है। यह देखकर उसके मन में दया आ गई।

वह धीरे से उठा और बोला,
“आंटी, आपको बहुत ठंड लग रही है क्या?”

नंदिनी ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा,
“हाँ बेटा, थोड़ी ठंड तो लग ही रही है, लेकिन क्या करें… सफर लंबा है।”

सुमित ने तुरंत अपना कंबल थोड़ा सा आगे बढ़ाते हुए कहा,
“मेरे पास बड़ा कंबल है। अगर आप चाहें तो इसका आधा हिस्सा आप भी ओढ़ सकती हैं।”

पहले तो नंदिनी थोड़ी झिझकी, लेकिन ठंड इतनी ज्यादा थी कि उसने आखिरकार उसकी बात मान ली। वह कंबल का एक हिस्सा ओढ़कर बैठ गई।

कुछ ही देर में दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई। सुमित ने बताया कि वह दिल्ली काम की तलाश में जा रहा है क्योंकि उसके परिवार पर कर्ज है और वह अपने माता-पिता की मदद करना चाहता है।

नंदिनी ने भी अपने जीवन की कहानी सुनाई—कैसे उसके पति का जल्दी देहांत हो गया और कैसे उसने अपने बेटे को अकेले ही पाल-पोसकर बड़ा किया।

बातों-बातों में दोनों के बीच एक अजीब सा अपनापन बन गया। ठंडी रात में ट्रेन की खिड़कियों से आती हवा और डिब्बे में फैली खामोशी के बीच वे दोनों जीवन के अनुभव साझा करते रहे।

रात धीरे-धीरे बीतती गई। ट्रेन कभी रुकती, कभी चल पड़ती। कभी दूर किसी स्टेशन की रोशनी दिखाई देती, तो कभी अंधेरा चारों ओर छा जाता।

सुमित को नंदिनी में अपनी माँ की छवि दिखाई देने लगी। उसे लगा कि अगर उसकी माँ भी कभी ऐसे सफर पर होती, तो शायद कोई अजनबी ही उसकी मदद करता।

नंदिनी को भी सुमित में अपने बेटे की झलक दिखाई दे रही थी। उसे लगा जैसे उसका अपना बेटा उसके सामने बैठा हो और उससे बातें कर रहा हो।

सुबह होने लगी। आकाश में हल्की रोशनी फैलने लगी और ट्रेन धीरे-धीरे दिल्ली स्टेशन की ओर बढ़ने लगी।

जब ट्रेन दिल्ली पहुँची, तो दोनों उतरने लगे। प्लेटफॉर्म पर भीड़ थी, आवाजें थीं, और शहर की भागदौड़ का शोर था।

नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बेटा, तुम्हारी वजह से यह सफर आसान हो गया।”

सुमित ने भी सम्मान से सिर झुकाया और बोला,
“आंटी, मुझे भी ऐसा लगा जैसे मैं अपनी माँ के साथ सफर कर रहा था।”

कुछ पल के लिए दोनों चुप रहे। फिर सुमित ने कहा,
“अगर आपको कोई दिक्कत हो तो आप मुझे फोन कर सकती हैं।”

नंदिनी ने अपना मोबाइल नंबर उसे दे दिया।

फिर दोनों अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े—एक अपने बेटे के घर की ओर, और दूसरा अपने सपनों की तलाश में।

लेकिन उस ठंडी रात की वह मुलाकात दोनों के दिलों में हमेशा के लिए एक याद बनकर रह गई—एक ऐसी याद, जिसमें एक अजनबी ने दूसरे अजनबी की मदद की थी, और कुछ घंटों के सफर ने दो अनजान लोगों के बीच एक अनोखा रिश्ता बना दिया था।