7 साल बाद IPS बना पति… रास्ते में पत्नी फटेहाल फल बेच रही थी, उसके पैरों में गिरकर रो पड़ा, फिर
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7 साल बाद IPS बना पति… रास्ते में पत्नी फटेहाल फल बेच रही थी, उसके पैरों में गिरकर रो पड़ा
प्रस्तावना
यह कहानी एक आम किसान से लेकर IPS अफ़सर बनने तक के संघर्ष और उस प्रक्रिया में हुई अनगिनत बलिदानों और त्यागों की है। यह कहानी रवि और सुमन की है, जहां एक पत्नी ने अपने पति के सपनों को साकार करने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया और सात साल बाद जब वह अफसर बनकर लौटे, तो अपनी पत्नी की गरीबी और संघर्ष को देखकर उनका दिल टूट गया। यह कहानी एक सच्चे रिश्ते, समर्पण और बलिदान की मिसाल है, जो हमें यह सिखाती है कि अगर किसी के पास सच्चा प्यार और त्याग हो, तो वह किसी भी परिस्थिति से उबर सकता है।
अध्याय 1: रवि और सुमन की शुरुआत
रवि एक बेहद होनहार छात्र था, जो अपनी पढ़ाई में हमेशा आगे रहता था। लेकिन वह एक गरीब किसान के घर पैदा हुआ था। उसका जीवन गरीबी और संघर्ष से भरा था। रवि का सपना था कि वह IPS अफ़सर बने और देश की सेवा करे, लेकिन घर की स्थिति के कारण उसने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी।
रवि की शादी सुमन से हुई थी। सुमन एक समझदार और शांत स्वभाव की लड़की थी। शादी के बाद कुछ दिनों तक सब ठीक चला, लेकिन रवि को अपने अधूरे सपनों की कसक थी। रात को वह पुराने किताबों को पलटता रहता था और अपने सपनों के बारे में सोचता था।
एक रात जब सुमन ने रवि को उदास देखा, तो उसने पूछा, “क्या बात है जी, आप सोए नहीं?” रवि ने गहरी सांस ली और कहा, “कुछ नहीं सुमन, बस पुराने सपने याद आ रहे हैं। मैं IPS बनना चाहता था, लेकिन घर के हालात ने मुझे हल और बैल के साथ बांध दिया। अब यह सपना सपना ही रह गया।”

अध्याय 2: सुमन का बलिदान
सुमन ने रवि के सपनों को साकार करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया। अगले दिन सुबह उसने अपने शादी के सारे गहने एक पोटली में बांध कर रवि के सामने रख दिए और कहा, “यह आपके सपनों की चाबी है। आप दिल्ली जाइए, वहां जाकर अपनी तैयारी कीजिए। मुझे एक हारा हुआ पति नहीं चाहिए, बल्कि मुझे एक जीता हुआ अफसर चाहिए।”
रवि हैरान हो गया और बोला, “यह गहने तुम्हारी सुरक्षा हैं, तुम्हें इन्हें नहीं बेचना चाहिए। अगर मैं चला गया तो घर कौन संभालेगा?” सुमन ने उसे दिलासा दिया और कहा, “घर की चिंता मत करो, मैं हूं ना। मैं खेती कर लूंगी और ट्यूशन पढ़ा लूंगी। जैसे भी होगा घर संभाल लूंगी। बस आप अपनी वर्दी लेकर लौटना।”
सुमन की बातों से रवि का दिल पिघल गया और उसने कसम खाई कि वह अपनी पत्नी के इस त्याग को बेकार नहीं जाने देगा। रवि ने दिल्ली जाने का फैसला किया और सुमन ने उसे खुशी-खुशी विदा किया।
अध्याय 3: संघर्ष और बलिदान
रवि दिल्ली गया और अपनी पढ़ाई में जुट गया। सुमन ने रवि के लिए हर महीने पैसे भेजे, लेकिन गांव में असलियत कुछ और ही थी। उस साल सूखा पड़ा और फसल बर्बाद हो गई। सुमन की मां बीमार पड़ गई और सुमन ने सारे पैसे मां के इलाज पर खर्च कर दिए। डॉक्टर ने कहा कि ऑपरेशन बड़े अस्पताल में करना होगा, लेकिन पैसे नहीं थे।
सुमन ने रवि को फोन किया और झूठ बोला, “सब ठीक है, फसल बहुत अच्छी हुई है, मां भी ठीक है।” लेकिन हकीकत यह थी कि सुमन अपना घर गिरवी रख चुकी थी और मां का इलाज करवा रही थी। सुमन ने किसी को भी रवि को सच बताने नहीं दिया, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि रवि का सपना टूटे।
अध्याय 4: 7 साल का इंतजार
सात साल तक रवि अपनी पढ़ाई में जुटा रहा, लेकिन सुमन का संघर्ष बढ़ता गया। उसने अपने गहने बेच दिए, बर्तन बेचे और मां का इलाज करवाया, लेकिन फिर भी मुश्किलें कम नहीं हुईं। कर्ज और गरीबी ने उसे सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया। सुमन ने कभी रवि को अपने दर्द के बारे में नहीं बताया और हमेशा खुश रहने का नाटक किया।
अध्याय 5: रवि की वापसी
सात साल बाद रवि का सिलेक्शन हुआ और वह आईपीएस अफ़सर बन गया। उसकी ट्रेनिंग पूरी हुई और उसे होम कैडर मिल गया, यानी उसकी पोस्टिंग उसी शहर में हुई, जहां उसका गांव था। रवि बहुत खुश था और उसने सोचा कि वह अपनी पत्नी सुमन को सरप्राइज़ देगा। उसने तय किया कि वह अपनी लाल बत्ती वाली गाड़ी से सीधे घर पहुंचेगा और सुमन को रानी की तरह अपने साथ ले आएगा।
जब वह शहर के मुख्य बाजार से गुजर रहा था, तो उसकी नजर सड़क किनारे एक फल बेचने वाली महिला पर पड़ी। वह महिला कोई और नहीं, बल्कि सुमन थी। सुमन के फटे कपड़े, भूख से बिलखता चेहरा और घबराहट रवि के दिल को चीर गई।
अध्याय 6: रवि का दर्द और सुमन की हिम्मत
रवि ने गाड़ी रुकवाने का आदेश दिया और बाहर जाकर सुमन को देखा। उसकी आंखों में आंसू थे और दिल में गहरी वेदना थी। सुमन, जो सात साल पहले रवि को अफ़सर बनाने के लिए अपने सब कुछ छोड़ चुकी थी, आज सड़क पर फल बेच रही थी। रवि ने अपनी पुलिस की टोपी उतारी और सुमन के पैरों में गिरकर रो पड़ा।
सुमन ने उसे उठाया और कहा, “आप यहां क्यों खड़े हैं? लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे?” रवि ने गहरी सांस ली और कहा, “यह वर्दी मेरी नहीं है, सुमन। यह वर्दी तुम्हारी है, क्योंकि तुमने ही मुझे अफ़सर बनाने के लिए सब कुछ त्यागा था।”
अध्याय 7: एक नई शुरुआत
रवि ने सुमन को गाड़ी में बैठाया और अपने घर के रास्ते पर चल पड़ा। उन्होंने गांव के लोग और पुलिस वाले देखकर गर्व से कहा, “यह मेरी पत्नी है।” रवि ने घर की हालत देखकर कसम खाई कि वह उसे फिर से बनाएगा। उन्होंने गांव के साहूकार के खिलाफ कार्रवाई की और उसकी सारी गंदी करतूतें उजागर की।
रवि और सुमन ने मिलकर उस टूटे हुए घर को फिर से बनाया और गांव में महिलाओं के लिए एक रोजगार केंद्र खोला। सुमन अब सिर्फ एक फल बेचने वाली नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुकी थी।
निष्कर्ष
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्चे रिश्ते केवल साथ रहने के नहीं, बल्कि एक दूसरे के सपनों के लिए बलिदान देने के होते हैं। रवि और सुमन की कहानी हमें यह बताती है कि अगर किसी के पास सच्चा प्यार और संघर्ष हो, तो वह किसी भी हालात से उबर सकता है और अपनी मंजिल पा सकता है।
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