9 SAAL KA YATEEM BACHA😢EK ROTI KI BHOOK NE AISI KAHANI LIKHI KE SUN KAR RONE LAG JAOGE
एक यतीम भूखा बच्चा जो भूख से बिलख रहा था। मगर उसकी जालिम चाची ने उसे अपने घर के कुत्तों के साथ बांध दिया। बच्चे ने भूख के हाथों मजबूर होकर कुत्ते की ही रोटी चुरा ली और उसको खाने लगा। मगर फिर जो उसको सजा दी गई और जो कुछ उसके साथ हुआ वो देखकर आपका दिल भी रो पड़ेगा।
गांव की गलियां धूप की तपिश से चमक रही थी। उसी गांव के एक पुराने मगर साफ सुथरे घर के सहन में एक नन्हा सा बच्चा 9 साल का राजू सहमा सहमा सा दरख्त के नीचे बैठा था। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे और हाथ में एक सूखी बांसी रोटी दबी हुई थी जो ना जाने कितने दिन पुरानी थी। लेकिन कसमत की सितम जरीफ ही यह थी कि वही उसका पेट भरने का सहारा थी। वो खौफ के मारे इधर-उधर देखता और फिर कांपते हाथों से रोटी को तोड़ने की कोशिश करता।
धूप की तपिश ने उसका चेहरा सुरख कर रखा था। पसीने के कतरों ने उसके नन्हे जिस्म को मजीद बेहाल कर दिया था। मगर यह उसकी सजा थी। इतने में घर के अंदर से कदमों की आहट सुनाई दी। उसकी चाची नजमा बीवी सहन में आकर गरजा आई। “खा लिया हो तो अब जाकर काम कर और सुन ले राजू। दोबारा अगर जरा सी भी गलती हुई तो इस बार सजा उससे भी बड़ी होगी।” सहमे हुए राजू ने फौरन सर झुका दिया और कपकपाती आवाज में बोला “चाची अब कोई गलती नहीं होगी।”
नजमा बीवी ने मुंह पर नखरा सजाकर सर्द लहजे में कहा “जा भैंसों को पानी पिला और घास डाल।” यह सुनते ही राजू रोटी का आखिरी टुकड़ा मुंह में डालकर दौड़ गया। नजमा बीवी गुरूर से नाक चढ़ाती हुई वापस अंदर चली गई।

यह घर दरअसल फारूक साहब का था। फारूक अपनी बीवी नजमा और अपने बच्चों के साथ यहीं रहता था। मगर कभी यह घर राजू के वालिदैन का था। वालिदैन के इंतकाल के बाद उसके चाचा और चाची ने ना सिर्फ इस घर पर कब्जा कर लिया बल्कि राजू की जिंदगी को भी गुलामी और जुल्म में जकड़ दिया था। दिनभर उस पर सख्तियां की जाती और नन्हे दिल पर नाइंसाफी के पहाड़ टूटते रहते।
राजू भागता हुआ भैंसों के पास पहुंचा। उसने जल्दी-जल्दी उनके आगे चारा डाला। पानी की बाल्टियां भर कर रखी और गोबर साफ करने में लग गया। सूरज की तपिश और दिन भर की मशक्कत ने उसके नन्हे हाथों में छाले डाल दिए थे। मगर यह उसकी रोजाना की ड्यूटी थी। कभी-कभी थकन के लम्हों में उसकी आंखें भर आती और जहन के पर्दों पर मां का मेहरबान चेहरा उभर आता। वो मां जो उसे कभी कोई सख्त काम ना करने देती थी। जो अपने लाडले को स्कूल भेजती थी और रात को अपने हाथों से खाना खिलाती थी। एक साल पहले मां के जाने के बाद जैसे उसकी सारी दुनिया ही उजड़ गई थी। तब से भूख, मशक्कत और जुल्म ही उसके साथ ही रह गए थे।

दिन का वक्त खत्म हुआ और शाम ढल गई। जब वो अंदर आया तो मंजर और भी करबनाक था। दस्तर ख्वान पर उसकी चाची के बच्चे बैठे मजे से खाना खा रहे थे। खुशबुओं से भरा सालन, नरम रोटियां और मीठे का सामान। वो उन्हें देखता रहा मगर कुछ बोल ना सका। खाने के बाद जो कुछ बचा कुचा था वह चुपचाप उठाया गया और राजू के हवाले कर दिया गया। वह बोझिल कदमों के साथ अपने कमरे की तरफ बढ़ा। कमरा कम और एक तंग व तारीख स्टोर ज्यादा लगता था। जहां पुराने सामान के ढेर और नमी की बसी हुई थी। राजू कोने में बैठ गया और बचा हुआ खाना खाने लगा। यह ठंडा और चिकना चब
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