Inspector उसे दूसरी बीवी बनाकर ले जाना चाहता था, पर वह SP madam थी, फिर उसका क्या अंजाम हुआ?…| dm
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भाग 1 : राघवपुर का बाजार और खामोश अन्याय
सुबह का समय था। राघवपुर गांव का बाजार हमेशा की तरह आज भी रौनक से भरा हुआ था। सब्जियों की ताज़ी खुशबू हवा में घुली हुई थी, फलों की चमक सूरज की किरणों से और निखर रही थी और दुकानदारों की आवाज़ें पूरे माहौल को जीवंत बना रही थीं। कोई ग्राहक से मोलभाव कर रहा था, कोई अपने ठेले पर माल सजा रहा था, तो कोई आने-जाने वालों को आवाज़ देकर बुला रहा था। इसी भीड़-भाड़ और चहल-पहल के बीच बाजार के एक कोने में एक बूढ़ा आदमी अपने ठेले पर फल करीने से सजा रहा था।
उसका नाम था हरि प्रसाद। उम्र भले ही सत्तर के करीब पहुंच चुकी थी, पर उसके हाथों में अब भी मेहनत की वही फुर्ती थी। ठेले पर केले, संतरे, पपीते, सेब और अमरूद इस तरह सजे थे जैसे कोई कलाकार अपनी कला प्रदर्शित कर रहा हो। हरि प्रसाद के चेहरे पर झुर्रियां थीं, लेकिन आंखों में आत्मसम्मान और संतोष की चमक आज भी बाकी थी।
हरि प्रसाद के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी बेटी अनन्या थी। वही अनन्या, जो हाल ही में जिले की एसपी बनी थी। गांव के लोग इतना तो जानते थे कि उसकी बेटी किसी बड़े सरकारी पद पर है, पर कोई नहीं जानता था कि वह वास्तव में पूरे जिले की पुलिस अधीक्षक है। हरि प्रसाद ने कभी इस बात का दिखावा नहीं किया। वह हमेशा मुस्कुरा कर कहता था— “मेरी बेटी की इज्जत उसके काम से है और मेरी इज्जत मेरे काम से।”
फल बेचना उसके लिए केवल रोज़ी-रोटी का साधन नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान और दिल के सुकून का रास्ता भी था। वह किसी पर निर्भर रहना पसंद नहीं करता था। उसकी सोच साफ थी— जब तक हाथ चल रहे हैं, मेहनत करूंगा।
आज ठेला लगाते-लगाते उसे अचानक याद आया कि फल काटने वाला चाकू वह घर पर ही भूल आया है। उसने अपनी जेब से वह नया चमकदार मोबाइल निकाला, जो अनन्या ने कुछ दिन पहले उसे उपहार में दिया था। बूढ़े हाथों में वह मोबाइल थोड़ा अजीब लग रहा था, लेकिन हरि प्रसाद उसे बड़े प्यार से संभाल कर रखता था। उसने अनन्या को फोन किया और बोला, “बिटिया, चाकू घर पर रह गया है। जल्दी बाजार आ जाना।”
अभी फोन रखा ही था कि बाजार की भीड़ अचानक दो हिस्सों में बंट गई। पुलिस की एक जीप आकर रुकी। जीप से इंस्पेक्टर विक्रम ठाकुर उतरा और उसके पीछे दो सिपाही भी। विक्रम का नाम सुनते ही बाजार के ठेले वाले सहम जाते थे। वह हर हफ्ते हफ्ता वसूलता था और जो पैसे न दे, उसके साथ बदसलूकी करना उसके लिए आम बात थी।
विक्रम की नजर इधर-उधर घूमती हुई सीधे हरि प्रसाद पर टिक गई। वह ठेले के पास आया और रौब से बोला, “क्यों बूढ़े? आज हफ्ता तैयार है या फिर आज भी कोई बहाना?”
हरि प्रसाद ने हाथ जोड़ते हुए विनम्रता से कहा, “साहब, अभी-अभी ठेला लगाया है। दोपहर तक दे दूंगा।”
उसी पल विक्रम की नजर हरि प्रसाद के हाथ में पकड़े नए मोबाइल पर पड़ गई। उसके चेहरे पर जलन साफ झलकने लगी। वह व्यंग्य से हंसा, “वाह! महंगा फोन। और कहता है पैसे नहीं हैं। फल बेच-बेचकर इतना बड़ा मोबाइल ले लिया?”

हरि प्रसाद ने धीमे स्वर में कहा, “साहब, यह मोबाइल मेरी बेटी ने दिया है।”
विक्रम तिरस्कार से हंसा। “अच्छा! बेटी देती है और तू हफ्ता नहीं देता? लगता है कोई और धंधा भी चलता है।” उसके साथ खड़े सिपाही भी हंसने लगे।
भीड़ खामोश थी। सब देख रहे थे, पर किसी में बोलने की हिम्मत नहीं थी। हरि प्रसाद की आंखों में आंसू भर आए, पर वह चुप रहा। उसकी यही खामोशी विक्रम को और उग्र कर गई। गुस्से में उसने ठेले को जोर से ठोकर मारी। फल जमीन पर बिखर गए, कुछ कुचल गए और ठेले का पहिया टेढ़ा हो गया।
हरि प्रसाद संभल भी नहीं पाए थे कि विक्रम ने आकर उनके गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। बूढ़ा आदमी लड़खड़ाकर जमीन पर गिर पड़ा। पास ही नींबू बेचने वाला छोटू दौड़कर आया और बोला, “बाबा, उठिए।”
विक्रम ने उसे घूरते हुए डांटा, “हीरो मत बन। वरना तुझे भी गिरा दूंगा।”
भीड़ फिर भी खामोश रही। तभी दूर से एक लड़की तेजी से भीड़ चीरती हुई आई। साधारण सलवार-सूट में, बिना किसी सुरक्षा के— वह थी अनन्या प्रसाद।
जैसे ही उसने अपने पिता को जमीन पर गिरा देखा, उसका दिल कांप उठा। वह दौड़कर आई, पहले अपने पिता को संभाला और फिर छोटू को। उसकी आंखों में गुस्सा और दर्द दोनों थे।
विक्रम ने उसे देखा और उसकी खूबसूरती पर उसकी नजर ठहर गई। घिनौनी मुस्कान के साथ वह बोला, “ओह! यह कौन है? नई-नई फूल जैसी लड़की।”
उसने आगे बढ़कर अनन्या के कंधे पर हाथ रखने की कोशिश की, लेकिन अनन्या ने झटके से उसका हाथ हटा दिया। “दूरी बनाकर रखो,” उसने कड़े स्वर में कहा।
विक्रम हंसा, “तेवर भी तेज हैं। चलो, मेरी सीक्रेट लव बन जाओ। मैं तुम्हारा भी ख्याल रखूंगा और तुम्हारे बूढ़े बाप का भी।”
यह सुनते ही अनन्या का खून खौल उठा। जब विक्रम ने फिर उसे छूने की कोशिश की, तो अनन्या ने पूरी ताकत से उसे थप्पड़ मार दिया। थप्पड़ की आवाज पूरे बाजार में गूंज गई।
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। विक्रम गुस्से से तमतमा उठा, लेकिन तभी उसने देखा कि कई लोग मोबाइल से वीडियो बना रहे हैं। वह खुद को रोक गया और दबी आवाज में बोला, “यह गलती तुझे महंगी पड़ेगी।”
अनन्या ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपने पिता का हाथ थामा और चुपचाप उन्हें सहारा देकर घर की ओर चल पड़ी। उसकी आंखों में जो आग थी, वह बता रही थी कि यह कहानी यहीं खत्म नहीं होगी।
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