IPS मैडम दुल्हन बनकर पहुंची,जहां दरोगा गांव की बेटियों से शादी कर करता था हैवानियत! फिर जो हुआ..😱

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उत्तर भारत के एक दूरस्थ जिले में बसे छोटे से गाँव भैरवपुर में सूरज हर रोज उगता था, लेकिन इंसाफ नहीं। खेत हरे थे, नदी बहती थी, मंदिर की घंटियाँ बजती थीं—फिर भी हवा में एक अजीब सा डर घुला रहता था। यह डर किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि एक इंसान का था—रंजीत सिंह।

रंजीत कभी थाने में दरोगा हुआ करता था। वर्दी पहनता था, कानून की बातें करता था, पर उसके हाथ खुद कानून से सने हुए थे। घूसखोरी, मारपीट, महिलाओं से दुर्व्यवहार—शिकायतें बढ़ीं तो उसे निलंबित कर दिया गया। पर पद छिन जाने से उसकी ताकत कम नहीं हुई। वर्षों की नौकरी में उसने ऐसा जाल बुन लिया था कि थाने के कई कर्मचारी आज भी उसके इशारों पर चलते थे। नेता उसके दोस्त थे, डॉक्टर उसके एहसानमंद, और कुछ अफसर उसके हिस्सेदार।

धीरे-धीरे उसने डर का एक साम्राज्य खड़ा कर लिया। गाँवों में उसकी अनुमति के बिना कोई बड़ा काम नहीं होता था—खेत की खरीद-बिक्री, दुकान का उद्घाटन, यहाँ तक कि शादियाँ भी। लेकिन उसकी दरिंदगी का सबसे घिनौना रूप तब सामने आता जब किसी घर में बेटी की शादी होती।

उसने एक अमानवीय “नियम” बना रखा था—गाँव में जो भी नई दुल्हन आएगी, विदाई से पहले एक रात उसके घर जाएगी। जो परिवार मना करता, उस पर झूठे केस, मारपीट, या रहस्यमय हादसे हो जाते। कई बेटियाँ अपमान सहकर चुप रहीं, कई परिवारों ने डर के कारण आवाज ही नहीं उठाई। कुछ लड़कियाँ तो शादी के बाद कभी सामान्य जीवन जी ही नहीं पाईं।

लोग जानते थे कि यह अपराध है, पर पुलिस में शिकायत करने का मतलब था अपनी ही बर्बादी को न्योता देना। जिसने भी हिम्मत की, या तो वह सड़क हादसे में मारा गया, या आत्महत्या का केस बनाकर फाइल बंद कर दी गई। डर धीरे-धीरे आदत बन चुका था।

इसी गाँव में रहता था राजेंद्र मिश्रा—सीधा-सादा, ईमानदार और स्वाभिमानी इंसान। उसकी एक ही बेटी थी—रियांशी। पढ़ी-लिखी, शांत स्वभाव की, और अपने पिता की आँखों का तारा। राजेंद्र हर दिन उसे देखता और भीतर ही भीतर काँप उठता। उसे पता था कि जिस दिन रंजीत की नजर उस पर पड़ी, उसकी दुनिया उजड़ सकती है।

आखिरकार रियांशी के लिए एक अच्छा रिश्ता मिल गया। पड़ोस के कस्बे का पढ़ा-लिखा लड़का, सुसंस्कृत परिवार। शादी की तारीख तय हुई। घर में रौनक लौट आई। हल्दी, मेहंदी, रिश्तेदारों की चहल-पहल—सब कुछ सपने जैसा लग रहा था।

लेकिन राजेंद्र का दिल हर पल धड़क रहा था। उसने शादी की खबर छुपाकर रखी, ताकि रंजीत तक बात न पहुँचे। विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ। सात फेरे पड़े, मंगलसूत्र बंधा, सबने राहत की साँस ली। सुबह विदाई का समय आया ही था कि एक मोटरसाइकिल घर के बाहर आकर रुकी।

रंजीत का आदमी था।

“संदेश है,” उसने ठंडी आवाज में कहा, “अगर बेटी की विदाई करनी है तो पहले उसे मालिक के पास भेजो। नियम सबके लिए बराबर है।”

राजेंद्र के हाथ से पगड़ी गिर पड़ी। जिस तूफान से वह सालों से डर रहा था, आज वह दरवाजे पर खड़ा था।

गाँव वाले इकट्ठा हुए, पर सबकी आँखों में डर था। कोई खुलकर साथ देने को तैयार नहीं। राजेंद्र की पत्नी सुषमा फूट-फूट कर रोने लगीं। रियांशी सन्न थी—मेहंदी अभी सूखी भी नहीं थी।

राजेंद्र के मन में एक पल को आत्महत्या का विचार आया। पर अगले ही क्षण एक पिता जाग उठा—“नहीं। मैं अपनी बेटी को उस दरिंदे के हवाले नहीं करूँगा।”

उसने निर्णय लिया। वह सीधे जिला मुख्यालय जाएगा।

वह दुल्हन बनी बेटी को ऑटो में बिठाकर शहर पहुँचा। स्थानीय थाने की ओर उसने देखा भी नहीं—उसे पता था वहाँ शिकायत करना आत्मघाती होगा। वह सीधे जिला पुलिस कार्यालय पहुँचा, जहाँ नई-नई पोस्ट हुई थीं आईपीएस अधिकारी तनिष्का राठौर।

तनिष्का राठौर—युवा, दृढ़ और ईमानदार अधिकारी। उन्होंने कठिन परीक्षा पास कर यह वर्दी इसलिए चुनी थी कि अपराधियों से सीधे टकरा सकें। जिले में उनकी सख्ती की चर्चा थी, पर उन्हें अभी इस गहरे सड़ांध का अंदाज़ा नहीं था।

राजेंद्र घुटनों के बल उनके सामने गिर पड़ा।
“मैडम, मेरी बेटी की इज्जत बचा लीजिए।”

तनिष्का चौंक गईं। सामने दुल्हन के जोड़े में काँपती लड़की, और उसके पिता की टूटी आवाज।

“शांत हो जाइए। पूरी बात बताइए।”

राजेंद्र ने वर्षों का दबा हुआ सच उगल दिया—रंजीत का आतंक, नई दुल्हनों पर अत्याचार, पुलिस की मिलीभगत, झूठे केस, गायब फाइलें, और कम से कम अस्सी बेटियों की बर्बादी।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

तनिष्का की मुट्ठियाँ भींच गईं। “इतने साल… और किसी ने आवाज नहीं उठाई?”

“उठाई थी मैडम,” राजेंद्र बोला, “पर जो उठा, वो बचा नहीं।”

तनिष्का की आँखों में अब सिर्फ आक्रोश था।
“नाम?”

“रंजीत सिंह।”

कुछ पल की खामोशी के बाद तनिष्का ने कहा, “आपकी बेटी अब मेरी जिम्मेदारी है।”

उन्होंने तुरंत एक योजना बनाई। “आज दुल्हन मैं बनूँगी।”

राजेंद्र और रियांशी स्तब्ध रह गए।

तनिष्का ने अपनी विशेष टीम को बुलाया। सादी वर्दी में अधिकारी पहले ही गाँव की ओर रवाना कर दिए गए। चारों दिशाओं से घेराबंदी की योजना बनी। डीएम को सूचित किया गया। पूरी कार्यवाही कानूनी दायरे में, पर निर्णायक।

शाम ढली। तनिष्का ने लाल जोड़ा पहना, घूँघट डाला। अंदर बुलेटप्रूफ जैकेट थी। कमर में सर्विस पिस्टल।

राजेंद्र उन्हें लेकर रंजीत के घर पहुँचा।

दरवाजा खुला। रंजीत मुस्कुराया—“आखिर समझदारी आ ही गई।”

दुल्हन को भीतर ले जाया गया। कमरे का दरवाजा बंद हुआ।

रंजीत ने घूँघट उठाने को हाथ बढ़ाया।

अगले ही पल उसकी कलाई लोहे की पकड़ में जकड़ गई।

चटाक! एक जोरदार तमाचा।

घूँघट उठा—सामने थीं आईपीएस तनिष्का राठौर।

“खेल खत्म, रंजीत सिंह।”

उसने छूटने की कोशिश की, पर पिस्टल उसकी कनपटी पर टिक चुकी थी।

“तूने अस्सी से ज्यादा बेटियों की जिंदगी बर्बाद की है। आज तेरी बारी है।”

बाहर से टीम अंदर घुसी। कुछ ही मिनटों में रंजीत हथकड़ी में था।

लेकिन असली झटका अभी बाकी था।

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तनिष्का ने तुरंत छापेमारी के आदेश दिए। चार थानों पर एक साथ कार्रवाई हुई। 21 पुलिसकर्मी निलंबित और गिरफ्तार। पाँच दारोगा, दो स्थानीय नेता, और सात डॉक्टर जो फर्जी मेडिकल रिपोर्ट बनाते थे—सब पकड़े गए। पुराने केस दोबारा खोले गए। पीड़ित परिवारों को सुरक्षा दी गई।

जिला हिल गया।

गाँव में पहली बार लोग खुलकर रोए—डर से नहीं, राहत से।

मीडिया के सामने तनिष्का ने कहा,
“जब हम अन्याय सहते हैं, तो हम उसे मजबूत बनाते हैं। डर खत्म होते ही अत्याचार खत्म होता है।”

राजेंद्र मिश्रा की बेटी रियांशी की विदाई दो दिन बाद पूरे सम्मान के साथ हुई। इस बार गाँव के लोग सिर ऊँचा करके खड़े थे। कोई धमकी नहीं, कोई डर नहीं।

मुकदमा चला। गवाह सामने आए। वर्षों का दबा सच अदालत में गूँजा। रंजीत और उसके साथियों को कठोर सजा मिली।

कुछ महीनों बाद, इस बड़े रैकेट का पर्दाफाश करने और दर्जनों बेटियों की अस्मिता बचाने के लिए आईपीएस तनिष्का राठौर को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया।

लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार वह था जब एक वृद्ध महिला ने उनके हाथ पकड़कर कहा—“बेटी, तुमने हमें जीने का हक वापस दिया है।”

भैरवपुर में अब भी सूरज रोज उगता है। फर्क बस इतना है कि अब उसके साथ उम्मीद भी उगती है।

यह कहानी सिर्फ एक दरिंदे की गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि उस क्षण की है जब एक समाज ने खामोशी तोड़ने की हिम्मत की। जब एक ईमानदार वर्दी ने साबित किया कि सिस्टम कितना भी सड़ा क्यों न हो, अगर इरादा साफ हो तो बदलाव संभव है।

और सबसे बड़ी बात—जब एक बेटी ने दूसरी बेटियों के लिए दुल्हन बनकर जाल बिछाया, तब इतिहास ने देखा कि न्याय कभी-कभी घूँघट ओढ़कर भी आता है।