Nafarman Bete Ne bhoodhi Maa ko Kuttay k Sath iftari di | Emotional And lessonable story

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नाफरमान बेटा और बूढ़ी माँ की आख़िरी इफ्तारी

रमज़ान का मुबारक महीना था। हर तरफ रौनकें थीं। मस्जिदों में इबादत, गलियों में बच्चों की चहल-पहल, घरों में पकवानों की खुशबू। मगर उसी शहर के एक आलीशान घर के अंधेरे कमरे में एक बूढ़ी माँ की सिसकियाँ गूंज रही थीं।

उस माँ का नाम सकीना बीवी था।

वह कभी इस घर की मालकिन थी। आज उसी घर में पराई से भी बदतर जिंदगी जी रही थी।

सकीना की कुर्बानियाँ

सकीना की शादी बरकत नाम के एक आदमी से हुई थी, जो नशे और जुए का आदी था। शादी के कुछ साल बाद उनका एक बेटा हुआ — हाशिम। सकीना को लगा अब उसका शौहर बदल जाएगा। मगर हालात और बिगड़ गए।

एक रात मामूली झगड़े पर बरकत ने गुस्से में तीन तलाक बोलकर सकीना को घर से निकाल दिया। उस वक़्त हाशिम गोद में था।

लोगों ने कहा, “सकीना, तुम जवान हो, दूसरी शादी कर लो।”

मगर उसने इंकार कर दिया। उसने कहा, “मैं अपनी ममता का सौदा नहीं करूँगी।”

उसने लोगों के घरों में काम किया। बर्तन मांजे, कपड़े धोए, झाड़ू-पोछा किया। खुद भूखी सो जाती, मगर हाशिम को दूध और रोटी जरूर खिलाती। सर्द रातों में अपनी चादर बेटे को ओढ़ा देती और खुद ठिठुरती रहती।

ईद पर खुद पुराने कपड़े पहनती, मगर बेटे के लिए नया कुर्ता खरीदती।

वह हर दिन उससे कहती,
“बेटा, तू ही मेरा सहारा है। पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना।”

हाशिम का बदलता दिल

वक्त गुजरा। हाशिम बड़ा हुआ। पढ़ाई पूरी की। नौकरी लग गई। मगर जैसे-जैसे उसका कद बढ़ा, उसके दिल में गुरूर भी बढ़ता गया।

उसे अपनी माँ की गरीबी से शर्म आने लगी। दोस्तों से कहता — “वो मेरी माँ नहीं, दूर की रिश्तेदार है।”

सकीना का दिल टूटता, मगर वह खामोश रहती।

उसने सोचा शादी के बाद शायद बेटा सुधर जाए।

बहू का आना

हाशिम की शादी सारा नाम की लड़की से हुई। शुरू में सारा ने बहुत सेवा की। मगर जब उसने देखा कि उसका पति अपनी माँ की इज्जत नहीं करता, तो उसके दिल में भी सम्मान खत्म हो गया।

धीरे-धीरे उसने हाशिम के कान भरने शुरू किए।

“तुम्हारी माँ हर वक्त मुझे टोकती रहती हैं।”

“उनकी खांसी से मुझे चिढ़ होती है।”

एक दिन हाशिम ने गुस्से में कहा,
“अम्मी, आप छोटे कमरे में रहिए। हमें प्राइवेसी चाहिए।”

सकीना को घर के पिछवाड़े वाले अंधेरे कमरे में भेज दिया गया।

रमज़ान की परीक्षा

रमज़ान आया। सकीना ने रोजा रखना शुरू किया। मगर अब उसके लिए सहरी और इफ्तार का इंतजाम कोई नहीं करता था।

कभी बासी रोटी मिल जाती, तो पानी में भिगोकर खा लेती।

एक दिन उसने सहरी नहीं की। पूरे दिन भूखी-प्यासी रही।

इफ्तार का वक़्त करीब आया। बाहर दस्तरखान सजा था — फल, शरबत, पकौड़े, बिरयानी।

सकीना लाठी टेकती हुई बाहर आई और बोली —
“बेटा, दो निवाले रोटी के दे दो। सहरी नहीं कर सकी थी।”

हाशिम ने तिरस्कार से देखा और कुत्ते की प्लेट की तरफ इशारा करते हुए कहा —
“अगर इतनी ही भूख लगी है तो जा, मेरे कुत्ते की प्लेट से खा ले!”

यह सुनकर सकीना पत्थर सी हो गई।

वह बोली —
“बेटा, मैं तेरी माँ हूँ।”

हाशिम ने गुस्से में थप्पड़ मार दिया।
“मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा बोझ हो तुम!”

सकीना गिर पड़ी। होंठों से खून निकल आया। मगर बद्दुआ नहीं दी।

वह अपने कमरे में लौट गई।

आखिरी खत

उस रात उसने कांपते हाथों से एक खत लिखा।

“मेरे प्यारे हाशिम,
मैं तुझसे नाराज़ नहीं हूँ। मैंने तुझे उस दिन भी माफ कर दिया था जब तूने पहली बार मुझे माँ कहा था।
बेटा, अगर मेरी वजह से तुझे तकलीफ थी, तो मैं जा रही हूँ।
अपना ख्याल रखना।”

सुबह जब हाशिम कमरे में गया, सकीना सजदे की हालत में दुनिया छोड़ चुकी थी।

हाथ में खत था। आँखें दरवाजे की तरफ खुली थीं — जैसे अब भी बेटे का इंतज़ार हो।

कुदरत का इंसाफ

कुछ ही हफ्तों बाद हाशिम और सारा कार में घूमने जा रहे थे। तेज रफ्तार में ट्रक से टक्कर हो गई।

हाशिम की रीढ़ की हड्डी टूट गई। डॉक्टर ने कहा —
“तुम अब कभी चल नहीं पाओगे।”

सारा ने तलाक के कागज सामने रख दिए।

“मैं एक अपाहिज के साथ जिंदगी नहीं बिता सकती।”

हाशिम अकेला रह गया।

वही कमरा। वही चारपाई। वही तन्हाई।

अब उसे माँ की प्यास याद आती। उसका थप्पड़ याद आता।

कब्र पर पश्चाताप

एक रात वह घिसटते हुए माँ की कब्र तक पहुँचा। मिट्टी से लिपटकर रोया।

“माँ, मुझे माफ कर दो। मैंने जन्नत ठुकरा दी।”

रोते-रोते बेहोश हो गया।

सपने में उसने माँ को नूरानी चेहरे के साथ देखा।

माँ बोली —
“बेटा, माँ बद्दुआ नहीं देती। तौबा कर ले। अल्लाह से माफी मांग।”

सुबह फज्र की अजान के साथ उसकी आँख खुली।

वह कब्र के सहारे खड़ा हो गया।

जैसे किसी ने उसे नई जिंदगी दे दी हो।

प्रायश्चित

हाशिम ने अपना घर बेचकर बूढ़ों और यतीमों के लिए आश्रय बना दिया।

हर इफ्तार पर वह खुद बूढ़ी माँओं को पानी पिलाता।

उनके पैर दबाता।

उसकी जिंदगी का एक ही मकसद था —
“कोई माँ अब भूखी न सोए।”

एक दिन सारा भी बेसहारा होकर उसी आश्रय में आई।

हाशिम ने उसे माफ कर दिया।

क्योंकि उसने सीख लिया था —
नफरत से नहीं, सेवा से जन्नत मिलती है।


संदेश

माँ की आह खामोश होती है, मगर असर गहरा होता है।
जिस घर में बूढ़ी माँ हो, समझ लो अल्लाह ने जन्नत का दरवाजा वहीं खोल दिया है।

अगर आपकी माँ जिंदा है, तो आज ही उनके कदमों में बैठ जाइए।
क्योंकि कब्र पर रोना आसान है,
मगर जिंदा माँ को मुस्कुराना सबसे बड़ा सौभाग्य है।