Sab Kuch Qanoon Ke Mutabiq Tha | Phir Bhi Kuch Aisa Hua Jo Kisi Ne Socha Nahi || Old History

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सब कुछ क़ानून के मुताबिक था… फिर भी जो हुआ, किसी ने सोचा नहीं

1. छोटा शहर, बड़ा बाज़ार, और एक बुज़ुर्ग अम्मा

शहर के पुराने हिस्से में एक भीड़भाड़ वाला बाज़ार था। सड़कों पर सब्ज़ियां, फल, कपड़े, खिलौने, चाय–नाश्ते की दुकानें – हर तरफ़ हलचल ही हलचल। इसी बाज़ार के कोने में, फुटपाथ के किनारे, हर रोज़ एक बुज़ुर्ग औरत बैठा करती थी – शांतादेवी, जिन्हें सब प्यार से शांता अम्मा बुलाते थे।

छोटा सा सिर, सफ़ेद बालों में ढीली सी चोटी, चेहरे पर झुर्रियां, पर आंखों में एक अजीब सी चमक। उनके सामने एक बेंत की टोकरी होती – भरपूर हरे-हरे अमरूदों से भरी।

सुबह-सुबह जब बाकी दुकानदार अभी दुकानें खोल ही रहे होते, शांता अम्मा पहले से बैठी होतीं, अपने अमरूद सलीके से सजाकर। राह चलते बच्चों को पुकारतीं –
आओ बेटा, मीठे अमरूद ले लो। सारी रात जाग कर चुने हैं। रिज़्क थोड़ा सही, मगर हलाल है।

किसी को यकीन न होता कि यह वही औरत है, जिसकी एक बेटी मुल्क की सरहद पर फौज में अफसर है, और दूसरी इसी ज़िले की डीएम – कविता वर्मा

लेकिन यह बात, यह सच, शांता अम्मा ने अपने दिल में ही छुपा रखा था।

2. दो हीरे बेटियां, एक मज़दूर मां

कभी-कभी शाम को, जब अमरूद बेचकर वह थक जातीं, तो खुद ही धीरे से बुदबुदातीं –
मेरी दो बेटियां थीं। दोनों को मैंने हीरे की तरह पाला। बड़ी बेटी अनाया वर्मा – सरहद पर फौज में अफसर। सर्दी हो, गर्मी हो, वर्दी निभाती है, देश की रखवाली करती है। और छोटी… कविता वर्मा… इसी शहर की डीएम। जब लोग कहते हैं ‘मैडम डीएम साहिबा’, तो मेरा सीना फक्र से चौड़ा हो जाता है।

इतनी बड़ी-बड़ी पोस्ट पर बेटियां, मगर मां आज भी अमरूद बेचती है – यह उसकी मजबूरी कम, उसकी खुद्दारी ज़्यादा थी। वह बेकार बैठकर बेटियों पर बोझ नहीं बनना चाहती थी। उसे लगता – अपने हाथ की मेहनत से कमाया हुआ निवाला ही सबसे मीठा होता है।

पर एक बात वो हमेशा छुपाती रही –
उसकी बेटियों को पता ही नहीं था कि मां आज भी बाज़ार में बैठकर अमरूद बेचती है।

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3. वर्दी वाला, अमरूद और ज़ुल्म

एक दिन दोपहर की धूप तेज़ थी। बाज़ार लोगों से भरा हुआ था। शांता अम्मा अपनी जगह पर बैठी थीं। तभी दो पुलिस वाले बाज़ार में दाख़िल हुए। उनमें से एक – इंस्पेक्टर वकरम राठौर – शहर में अपने रौब, गुस्से और बदतमीज़ी के लिए मशहूर था।

वकरम राठौर अपनी दबंग चाल से चलते हुए शांता अम्मा के सामने आकर रुक गया। उसने टोकरी में झांककर कहा –
ओए अम्मा, ये अमरूद कैसे हैं? मीठे हैं भी या ऐसे ही बेच रही हो?

शांता अम्मा मुस्कुराईं –
साहब, मेहनत से चुने हैं, मीठे हैं। चाहे तो चख लीजिए।

राठौर ने बिना पूछे एक अमरूद उठा लिया, जोर से काटा, थोड़ा सा चबाया, फिर मुंह बिचकाकर बोला –
ये क्या बेचा है तूने? ज़रा सा भी ज़ायका नहीं! बिलकुल फेंका, बेमज़ा! यही तेरे मीठे अमरूद हैं?

अम्मा घबराकर बोलीं –
साहब, कभी-कभी एक-दो कम मीठे हो जाते हैं, आप दूसरा चख लीजिए, मैं…

चुप!” – राठौर गरजा।
तेरे अमरूद का एक दाना भी मीठा नहीं है। तूने मुझे बेवकूफ बनाया। सुन, मैं एक रुपया भी नहीं दूंगा, समझी?

शांता अम्मा की आंखों में आंसू भर आए –
साहब… मेहनत से लाई हूं… उधार मत रखिए, थोड़ा ही दे दीजिए…

राठौर का गुस्सा अब अहंकार में बदल चुका था। उसने टोकरी को ठोकर मारी। सारी टोकरी उलट गई। अमरूद सड़क पर लुढ़क गए, किसी पर गाड़ी का पहिया चढ़ा, कोई लोगों के पैरों के नीचे रौंदा गया।

पूरा बाज़ार देख रहा था – कोई कुछ न बोला।

शांता अम्मा वहीं सड़क पर बैठ गईं। हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखा –
या अल्लाह… मेरी सारी मेहनत… सब बर्बाद हो गई। मेरी मेहनत भी गई, मेरी इज्जत भी… और सब चुप हैं। वर्दी के आगे सब खामोश हैं।

राठौर हंसते हुए बोला –
मैंने जो करना था, कर दिया। अब रास्ता मेरा है। हटो सब।
और वह आगे बढ़ गया।

4. एक गवाह, एक मोबाइल, और सच की शुरुआत

उसी बाज़ार में, थोड़ा दूर खड़ा था आकाश – एक युवा लड़का, जो रोज़ यही बाज़ार में छोटे-मोटे काम किया करता था। वह बचपन से शांता अम्मा को जानता था। अक्सर उनसे उधार अमरूद खा लेता, और बाद में पैसे दे जाता।

जब उसने इंस्पेक्टर को टोकरी उलटते देखा, उसके अंदर आग भड़क उठी।
ये गलत हो रहा है… ये जो हो रहा है, गलत है।

बाकी लोग डर से खामोश थे, पर आकाश के हाथ खुद-ब-खुद मोबाइल की तरफ बढ़ गए। उसने पूरा वाक़या रिकॉर्ड कर लिया – इंस्पेक्टर की आवाज, टोकरी उलटना, अम्मा की गुहार – सब कुछ।

रात को वह वीडियो देखकर खुद से बोला –
अगर इसे ऐसे ही फोन में रखकर छोड़ दिया, तो ज़ुल्म जीत जाएगा। इसे सही जगह पहुंचाना होगा।

उसे याद आया –
शांता अम्मा की एक बेटी फौज में अफसर है – अनाया वर्मा।

आकाश ने थोड़ी कोशिश से एक नंबर हासिल किया और वीडियो अनाया को भेज दिया, साथ में सिर्फ एक मैसेज:
अनाया दीदी, देखें… आज बाज़ार में आपकी मां के साथ क्या हुआ।

5. बार्डर पर तैनात बेटी का फटता दिल

हज़ारों किलोमीटर दूर, बार्डर पर, बर्फ और कंटीली तारों के बीच, कैप्टन अनाया वर्मा अपनी पोस्ट पर थी। रात का वक्त था, ड्यूटी का तनाव, हथियारों की आवाज, वायरलेस की खड़खड़ाहट – सब सामान्य था।

अचानक मोबाइल वाइब्रेट हुआ। अनजाना नंबर, वीडियो मैसेज।

पहले तो उसने सोचा –
बॉर्डर पर हूं, कौन क्या भेज रहा है?

लेकिन दिल ने कहा – खोलकर देख।

जैसे ही वीडियो चला –
वो बाज़ार, वो अमरूद, वो अम्मा, जिनके चेहरे को अनाया ने बचपन से प्यार किया था…
और फिर, इंस्पेक्टर का धक्का, अमरूदों का सड़क पर बिखरना, अम्मा का रोता हुआ चेहरा।

अनाया की सांसें थम गईं।
ये… ये सब मेरी मां के साथ हुआ है? ये कैसे हो सकता है? वर्दी में होकर वो ये ज़ुल्म कर रहा है?

वो खुद भी वर्दी में थी। उसके अंदर का सिपाही और बेटी दोनों एक साथ जाग उठे।

दिल चाहता है अभी वहीं पहुंचूं, और उस वर्दी को खींचकर उतार दूं। लेकिन मैं फौज में हूं। मेरा मोर्चा यहां है।

उसने हड़बड़ाकर फोन उठाया, नंबर मिलाया –
कविता!

6. दूसरी बेटी – डीएम कविता वर्मा की कसम

शहर की ऊंची इमारत में बने कलेक्टरेट ऑफिस में, डीएम कविता वर्मा मीटिंग में बैठी थी। फोन वाइब्रेट हुआ – दीदी अनाया

ब्रेक में उसने फोन उठाया –
हां दीदी, सब ठीक?

दूसरी तरफ़ से कोई औपचारिक बात नहीं, सिर्फ एक सख्त आवाज –
कविता, मैंने तुझे एक वीडियो भेजी है। इसे अभी के अभी देख। एक सेकंड भी ज़ाया मत करना।

कॉल कट गई।
कविता ने वीडियो खोला। कुछ ही सेकंड में उसे अपनी मां का चेहरा दिखा – सड़क पर बिखरे अमरूद, मां की रुंधी हुई आवाज, इंस्पेक्टर का अहंकार।

उसके हाथ कांप गए।
ये… ये अम्मा हैं… मेरी अम्मा… सड़क पर फूट-फूट कर रो रही हैं… और एक मामूली इंस्पेक्टर ने उनकी इज्जत मिट्टी में मिला दी…

उसकी आंखों में आंसू आए, पर तुरंत उसने उन्हें रोक लिया।
नहीं… मैं सिर्फ बेटी नहीं हूं। मैं इस जिले की डीएम हूं। मुझे जज़्बात में बहने की इजाज़त नहीं… लेकिन ये बर्दाश्त भी नहीं होगा।

अनाया फिर फोन पर आई –
मैं छुट्टी लेकर आ रही हूं। उसे छोड़ूंगी नहीं।

कविता ने गहरी सांस ली –
नहीं दीदी। आपकी ज़रूरत सरहद पर है। ये मेरा इलाका है। ये लड़ाई मैं लड़ूंगी – और कानून के दायरे में रहकर लड़ूंगी।

अनाया की आवाज में नर्मी और गर्व दोनों थे –
ठीक है। मगर उसे ऐसी सज़ा मिलनी चाहिए कि उसकी रूह कांप जाए।

कविता ने कहा –
आप फिक्र मत कीजिए दीदी। अब ये मेरा काम है।

7. बेटी, मगर पहले डीएम नहीं – सिर्फ एक आम शिकायतकर्ता

कविता शाम तक ऑफिस का काम निपटाकर सीधे घर पहुंची। मां एक कोने में चुपचाप बैठी थीं। आंखों में हल्की सुर्खी थी, चेहरा थका हुआ।

अम्मा…” – कविता ने अंदर आते ही कहा।
मैं आ गई हूं। आप चुपचाप अकेले क्यों बैठी हैं? आपने मुझे एक लफ्ज़ भी क्यों नहीं बताया?

शांता अम्मा ने चौंककर देखा –
कविता… तू… सब खैरियत तो है?

अम्मा, आपने मुझे बताया क्यों नहीं कि आपके साथ बाज़ार में क्या हुआ?

अम्मा ने धीमी आवाज में कहा –
क्या बताती बेटी? मैं नहीं चाहती थी कि तुम लोगों को कोई परेशानी हो। वो पुलिस वाला है, छोड़ो उसकी बात। तू इतने दिनों बाद आई है, आज मैं तुमको देखकर खुश हूं।

कविता ने मां के हाथ थाम लिए –
अब आप गरीब और अकेली नहीं हैं मां। आपकी बेटी आपके साथ खड़ी है। और वो बेटी इस ज़िले की जिम्मेदार है। जिसने भी आपके साथ बदसलूकी की है, उसे उसकी कीमत चुकानी होगी। मैं आपकी खोई हुई इज्जत वापस लाऊंगी।

लेकिन कविता ने एक फैसला किया –
वो डीएम बनकर सीधे थाने नहीं जाएगी।

अगर मैं डीएम बनकर थाने जाऊंगी, तो सब मेरे कदमों में झुक जाएंगे, चाय-पानी कराएंगे, और असली मुजरिम कभी सामने नहीं आएगा।

उसने अपने भरोसेमंद एडीएम उमित को फोन किया –
उमित, ध्यान से सुनो। मैं अभी सादे कपड़ों में कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज करवाने जा रही हूं। तुम दो घंटे बाद एसपी, डीएसपी और सीनियर अफसरों की टीम के साथ थाने पहुंचना। जब तक मैं इशारा न करूं, कोई कदम नहीं उठाना।

जैसा आप कहें मैडम।

8. थाने का असली चेहरा

अगले दिन दोपहर, एक साधारण सलवार-सूट पहने, चेहरे पर कोई मेकअप नहीं, बाल हल्के-से बांधकर, कविता अकेली कोतवाली थाने पहुंची। वहां पुलिस वाले चाय पी रहे थे, हंस-बोल रहे थे। किसी ने उसे पहचानने की कोशिश तक नहीं की – और यही वो चाहती भी थी।

रिसेप्शन पर बैठा सिपाही बोला –
हां, क्या काम है?

मुझे एक शिकायत दर्ज करवानी है।

काउंटर के पीछे से आवाज आई –
अरे यार, रोज़ का यही हाल है… हर कोई शिकायत लेकर आ जाता है।

थोड़ी देर बाद इंस्पेक्टर वकरम राठौर खुद बाहर आया, इठलाते हुए –
क्या हुआ, किसने परेशान किया?

कविता ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा –
कल बाजार में… इंस्पेक्टर साहब ने।

राठौर हंसा –
किस इंस्पेक्टर की बात कर रही है?

आप ही की। आपने कल बाजार में एक बुज़ुर्ग औरत की अमरूद की टोकरी सड़क पर फेंक दी थी। वो मेरी मां है। मैं उनकी बेटी हूं।

राठौर के होंठों पर व्यंग्य भरी मुस्कान आ गई –
ओहो… तो तू उस बुढ़िया की बेटी है! सड़क पर गंदगी फैलाने वालों का यही अंजाम होता है। फैलाएगी तो लाठी पड़ेगी ना। चल, भाग यहां से। कोई एफआईआर नहीं लिखी जाएगी।

कविता शांत स्वर में बोली –
लेकिन ये गैरकानूनी है। आपने वर्दी का गलत इस्तेमाल किया है।

राठौर गरज उठा –
चुप! हमें कानून सिखाएगी? ज्यादा ज़बान चलाई तो तुझे ही अंदर कर दूंगा – सरकारी काम में रुकावट डालने के जुर्म में। निकल यहां से।

कविता ने धीमे लेकिन ठोस शब्दों में कहा –
मैं रिपोर्ट लिखवाए बगैर नहीं जाऊंगी।

तभी बाहर से हड़कंप की आवाज आई –
सर! सर! बाहर बड़ी-बड़ी गाड़ियां आ रही हैं… लाल बत्ती वाली! एसपी साहब, दूसरे अफसर… सब आ रहे हैं।

राठौर के चेहरे पर रंग उड़ने लगे।
ये… ये क्या हो रहा है?

कुछ ही मिनटों में एसपी, डीएसपी और जिले के बड़े अफसर थाने में दाख़िल हुए। उनके साथ आया – ज़िले का ताकतवर नेता बलदेवेंद्र यादव

9. परत खुलती है: बेटी नहीं, डीएम

बलदेवेंद्र यादव अंदर आते ही बोला –
इतनी घबराहट क्यों है राठौर? मैं कोई अजनबी तो नहीं हूं। कैसे हो? कामधंधा ठीक चल रहा है ना? आज कोई ‘मुर्गा-वुर्गा’ फंसा या नहीं?

राठौर ने घबराकर मुस्कुराने की कोशिश की –
आपकी कृपा है सर, सब ठीक… आइए बैठिए…

इसी बीच उसकी नजर कविता पर पड़ी। पहले तो उसने उसे आम लड़की समझा था, अब बलदेवेंद्र के पीछे आते अफसरों की निगाहें उस पर रुकी हुई देख कर उसे कुछ शक हुआ।

बलदेवेंद्र ने भी कविता को पहचाना –
अरे, ये तो कविता है… कविता वर्मा! ज़िले की डीएम साहिबा!

राठौर के हाथ से तो मानो ज़मीन खिसक गई –
डी… डी… डीएम मैडम!?

वही लड़की, जिसे उसने अभी-अभी धक्के देकर निकालने की कोशिश की थी, वही लड़की – इस ज़िले की सबसे बड़ी प्रशासनिक अफसर निकली।

राठौर हकलाया –
मैडम… नमस्ते… मैं… मैं तो आपको एक आम औरत समझ रहा था… आप फोन कर देतीं तो मैं खुद हाज़िर हो जाता…

एसपी ने ठंडी आवाज में कहा –
इंस्पेक्टर, तमीज़ से खड़े हो जाओ। तुम ज़िले की डीएम कविता वर्मा के सामने हो।

राठौर की सारी अकड़ हवा हो चुकी थी।

10. धमकी भरा फोन और असली खेल

थाने में मीटिंग हुई। वीडियो प्ले होकर सबके सामने चलाया गया – राठौर की करतूत का एक-एक फ्रेम।

कुछ ही देर में बलदेवेंद्र यादव चुपचाप निकल गया, पर मामला यहीं खत्म नहीं था।

उसी रात, कविता के फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।
डीएम साहिबा, शहर में ज़्यादा उड़ने की कोशिश मत कीजिए। इंस्पेक्टर तो बस मोहरा था… खेल तो अब शुरू होगा।

कविता ने ठंडेपन से पूछा –
कौन बोल रहा है?

दूसरी तरफ़ सिर्फ एक हल्की हंसी आई, फिर कॉल कट गया।

कविता ने नाम ज़ुबान से नहीं लिया, पर दिमाग में सिर्फ एक ही शक था –
बलदेवेंद्र यादव।

उसे समझ आ चुका था – ये लड़ाई अब सिर्फ इज्जत की नहीं, उसकी मां की जान की भी है।

उसने उसी वक्त एसपी को फोन किया –
दो सादे कपड़ों में पुलिस वाले मेरी मां के घर के आस-पास तैनात कर दीजिए। मुझे कोई रिस्क नहीं चाहिए।

11. पलटवार – नशीला माद्दा और बनावटी केस

कुछ दिन चुपचाप निकल गए। लगा जैसे तूफान गुजर गया हो।

फिर एक सुबह, जब शांता अम्मा अमरूद बेच रही थीं, अचानक कुछ पुलिस गाड़ियां आईं। अजनबी चेहरे, तेजी से बढ़ते कदम।

एक अफसर आगे बढ़ा –
यही है वो जगह। सब पीछे हट जाएं।

बाक़ी पुलिसवालों ने शांता अम्मा की टोकरी, गाड़ी और आस-पास का सामान खंगालना शुरू कर दिया।
हमें इतला मिली है कि इन अमरूदों की आड़ में नशीला सामान (ड्रग्स) रखा जाता है। तलाशी लो।

कुछ ही मिनटों में एक कांस्टेबल चिल्लाया –
सर! मिल गया… नशीला माद्दा!

शांता अम्मा के होश उड़ गए –
नहीं साहब! ये मेरा नहीं है। किसी ने मुझे फंसा दिया है। मैं तो बस अमरूद बेचती हूं।

पर उस दिन किसी को सुनने की जल्दी नहीं थी।
गाड़ी में बिठाओ इन्हें।

उसी दिन शाम की ख़बरों में सुर्खी चली –
डीएम कविता वर्मा की मां नशीला माद्दा बेचने के इलज़ाम में गिरफ्तार।

कविता का खून खौल उठा –
ये बलदेवेंद्र यादव का मास्टर स्ट्रोक है। इसने मुझ पर नहीं, मेरी सबसे बड़ी कमजोरी – मेरी मां – पर वार किया है।

अब उसके सामने दो रास्ते थे –

    अपनी पोजिशन का इस्तेमाल करके सीधे केस खारिज करवा दे, या
    कानून के दायरे में रहकर, सबूत के साथ खेल खत्म करे।

उसने दूसरा रास्ता चुना।
अगर मैं भी कानून तोड़ूंगी, तो उनमें और मुझ में क्या फर्क रह जाएगा?

12. जनता के सामने सच – और चुपचाप की जाने वाली जांच

कविता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलवाई। सामने कैमरे, माइक्रोफोन, सवालिया नजरें।

वो माइक के सामने खड़ी हुई और बोली –
मैं जानती हूं, आप सबके जेहन में सवाल हैं। मेरी मां पर संगीन इल्जाम लगे हैं। मगर कानून सबके लिए बराबर है – चाहे वो एक आम नागरिक हो, या डीएम की मां। इसीलिए मैंने कोई खास रियायत नहीं दी। ये लड़ाई कानून के दायरे में लड़ी जाएगी – और इंसाफ जीतेगा।

बाहर से वो बेहद मजबूत दिख रही थी, अंदर तूफान था।
लेकिन हार मानने का सवाल ही नहीं था।

कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उसने आकाश को बुलाया – वही लड़का जिसने पहला वीडियो रिकॉर्ड किया था।

आकाश, तुम रोज़ बाजार में रहते हो। मुझे उस दिन की हर छोटी-बड़ी बात बताओ – मां की टोकरी के पास कौन-कौन आया था? कोई अजनबी, कोई शक़ी हरकत?

आकाश ने थोड़ा सोचा, फिर बोला –
मैडम, एक आदमी था… बार-बार टोकरी के आस-पास मंडरा रहा था। उसने एक बार टोकरी के पास झुककर कुछ रखा भी था। चेहरा साफ़ नहीं दिखा, पर अंदाज़ से लग रहा था, लोग उसे जानते थे।

कविता ने तुरंत सीसीटीवी फुटेज मंगवाई – आस-पास की दुकानों, ट्रैफिक कैमरों, हर जगह से।
एक वीडियो में एक धुंधली सी झलक मिली – एक आदमी शांता अम्मा की टोकरी के पास झुककर कुछ रख रहा है। हुलिया पहचानने लायक नहीं, मगर उसके साथ पहले भी दिखा था इंस्पेक्टर वकरम राठौर

कड़ियां जुड़ने लगीं –
नशीला माद्दा किसी ने टोकरी में रखा, पुलिस को “सूचना” मिली, रेड हुई, केस लग गया – सब सोची-समझी साजिश थी।

13. जाल – अफवाह, घबराहट और गिरफ़्तारी

कविता ने एक और चाल चली। उसने तय किया –
हम सीधे किसी पर उंगली नहीं उठाएंगे। पहले इन्हें खुद घबराने देंगे।

पुलिस के कुछ भरोसेमंद लोगों के जरिए बाज़ार में यह खबर फैलाई गई
सीसीटीवी फुटेज में नशीला माद्दा रखने वाले आदमी का चेहरा साफ़ दिख गया है। पुलिस जल्द ही उसे गिरफ्तार करने वाली है।

ये बात कुछ ही घंटों में इंस्पेक्टर वकरम राठौर तक पहुंची। वो तुरंत अपने सरपरस्त, बलदेवेंद्र यादव के आदमियों से मिलने लगा।

एक रात, एक गुप्त कमरे में बातचीत हुई –
वकरम, पुलिस कह रही है कि सीसीटीवी में सब साफ़ दिख गया है। तूने वहां कुछ तो नहीं छोड़ दिया ना? वो आदमी पकड़ा नहीं जाना चाहिए। कुछ भी करना पड़े, कर। वरना हम सब फंस जाएंगे।

यह बात भी रिकॉर्ड हो रही थी – पुलिस की निगरानी में।

अगली सुबह, जब वो शख्स, जिसने टोकरी में नशीला सामान रखा था, शहर से निकलने की कोशिश कर रहा था, पुलिस ने उसे घेरकर पकड़ लिया। पूछताछ में उसने बेलगाम होकर सब कुछ उगल दिया –
मुझे इंस्पेक्टर साहब ने कहा था… बलदेवेंद्र यादव के इशारे पर…

अब सारा खेल उजागर हो चुका था।

14. आखिरी मुक़ाबला – कानून की जीत

कुछ ही दिनों बाद, बलदेवेंद्र यादव के फॉर्महाउस पर सुबह-सुबह पुलिस और प्रशासन की टीम पहुंची। कविता खुद भी वहां थी।

बलदेवेंद्र अभी नींद से पूरी तरह जागा भी नहीं था कि बाहर सायरन, गाड़ियों और पुलिस की आवाज़ें सुनाई दीं।

दरवाज़ा खुला, कविता अंदर आई –
सुबह बखैर, बलदेवेंद्र यादव।

वो हड़बड़ा कर उठा –
मैडम… ये… ये सब क्या है?

कविता की आवाज़ ठंडी लेकिन ठोस थी –
अब कानून बोलेगा, यादव साहब। जिस खेल की बिसात आपने बिछाई थी, अब उसी पर आपको मात मिलेगी। आपके आदमी पकड़े जा चुके हैं, और उन्होंने आपके सारे राज उगल दिए हैं।

यादव ने आखिरी कोशिश की –
आप मुझे हाथ नहीं लगा सकतीं। आपके पास मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं है।

कविता ने हाथ में पकड़ा हुआ काग़ज़ आगे बढ़ाया –
ये आपकी गिरफ्तारी का वारंट है। सबूत मिटाने, साजिश रचने और गवाह को धमकाने के आरोप साबित हो चुके हैं। हमारे पास आपकी फोन रिकॉर्डिंग है, जिसमें आप गवाह को धमकी दे रहे हैं। अब आप हमारे साथ थाने चलेंगे।

कुछ ही पल में, वही बलदेवेंद्र यादव, जिसके इशारे पर पूरा थाना हिलता था, हथकड़ियों में जकड़ा पुलिस वैन में बैठा था।

उधर, शांता अम्मा पर लगे सारे इल्जाम अदालत ने झूठे करार दिए। उन्हें बाइज़्जत बरी कर दिया गया।

15. मां की इज्जत वापस – और घर की असली रोशनी

जिस दिन शांता अम्मा जेल से बाहर आईं, कविता और अनाया दोनों गेट के बाहर खड़ी थीं। अनाया को छुट्टी मिल गई थी, और वह भी भागी चली आई थी।

मां को देखते ही दोनों बहनें दौड़ पड़ीं –
अम्मा!

शांता अम्मा की आंख से आंसू बह निकले –
नहीं बेटी, तुम दोनों ने मेरा सर फخر से बुलंद कर दिया है। मुझे अब किसी चीज़ का गम नहीं।

कविता ने मां की टोकरी की तरफ देखा – जो अब खाली थी।
अब आपको अमरूद बेचने की ज़रूरत नहीं है, मां।

शांता अम्मा मुस्कुराईं –
बेटी, अमरूद नहीं बेचूंगी तो लोगों से मिलूंगी कैसे? लेकिन अब अकेली नहीं बैठूंगी… कभी तुम आ जाना, कभी अनाया… अब घर सच में घर लगेगा।

अनाया ने मज़ाक में कहा –
अब जब छुट्टी पर आऊंगी तो घर सच में घर जैसा लगेगा, न मां?

कविता ने हां में सिर हिलाया –
हां दीदी, अब सब साथ हैं। यही असल सुक़ून है।

तीनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा। उस छोटे से घर में, जो कभी अमरूद की टोकरी की खुशबू से भरता था, अब इंसाफ, इज्जत और मोहब्बत की खुशबू बस गई थी।

16. कहानी का मक़सद

कहानी खत्म होती है, पर जो सवाल छोड़ जाती है, वो ज़रूरी हैं।

वर्दी ताकत देती है, पर अगर वही वर्दी ज़ुल्म की ठोकर बन जाए तो?
कानून सबके लिए बराबर है – ये बात काग़ज़ पर लिखी रहे, या सच में जी भी जाए?
एक मां, जिसने पूरी उम्र मेहनत की, उसकी इज्जत सड़क पर रौंद दी जाए तो क्या बेटियों का फर्ज सिर्फ रोना है, या खड़े होकर लड़ना भी है?

कविता वर्मा का सबसे बड़ा कदम यही था कि उसने अपनी ताकत का इस्तेमाल गैरकानूनी तरीके से नहीं, बल्कि कानून को सही दिशा में मोड़ने के लिए किया। उसने बदला नहीं लिया, इंसाफ लिया। उसने कुर्सी का रौब नहीं दिखाया, कुर्सी की जिम्मेदारी निभाई।

और यही इस पूरी कहानी का असली सबक है:

ज़ुल्म चाहे वर्दी में हो या बिना वर्दी,
ताकत चाहे कुर्सी की हो या पैसे की,
अगर कोई एक इंसान भी सच के लिए डट जाए,
तो खेल का रुख बदल सकता है।