Soteli maa ki Badshahi ne mazloom beti par Ramzan mein kya zulam kar daala, Islamic Story

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मोहल्ले की वह गली सचमुच अजीब थी।
टूटी हुई दीवारें, कच्ची छतें, बरसात में टपकते कमरे और धूल से भरी हवा।
लेकिन उस गली के बीचों-बीच एक ऐसा घर था जो बाहर से तो शांत और सादा दिखता था, पर अंदर उसका माहौल जहरीला था।

उस घर में रहती थी छह साल की एक बच्ची – नूर।
नाम की तरह मासूम, बड़ी-बड़ी आंखों में डर और दिल में सब्र का समंदर।

नूर की असली मां उसके पैदा होते ही इस दुनिया से चली गई थी।
उसके बाद उसके अब्बू ने दूसरी शादी कर ली।
नई औरत घर में आई – शकीला।

शकीला खूबसूरत थी, चालाक थी, और सबसे बड़ी बात – वह अपने शौहर को उंगलियों पर नचाना जानती थी।
वह सामने फरिश्ता, पीछे से जाल बुनने वाली मकड़ी थी।

अब्बू – राशिद – अपनी बेटी से बेहद मोहब्बत करते थे।
लेकिन उन्हें अपनी बीवी पर भी आंख बंद करके भरोसा था।
यही भरोसा उनकी सबसे बड़ी कमजोरी था।


दिन का नाटक, रात की सच्चाई

जब राशिद काम से लौटते, तो शकीला का चेहरा बदल जाता।
वह नूर को गोद में उठा लेती, उसके बाल सहलाती और कहती:

“देखो जी, आपकी बेटी कितनी प्यारी है… मेरी जान है यह।”

राशिद का दिल पिघल जाता।
वह शुक्र अदा करते कि उनकी दूसरी बीवी बेटी को अपनी औलाद की तरह रखती है।

लेकिन जैसे ही राशिद सुबह काम पर निकलते, घर का रंग बदल जाता।

“उठो! सारे बर्तन धोने हैं।”
शकीला की आवाज तलवार जैसी तेज होती।

नूर के छोटे-छोटे हाथ कांपते हुए बड़े-बड़े पीतल के बर्तनों की तरफ बढ़ते।
एक बर्तन गिर जाता।

थप्पड़!

“निकम्मी! मेरा मायके से आया सामान तोड़ देगी?”

छह साल की बच्ची के गाल पर लाल निशान उभर आता।
आंसू गिरते, मगर आवाज नहीं निकलती।

उसे मालूम था – रोना भी गुनाह है।


गली का मोची

उसी गली में एक मोची रहता था – करीम।
गरीब था, मगर लालच से भरा हुआ।
वह हमेशा मौके की तलाश में रहता।

उसकी नजर शकीला पर थी।
वह जानता था – जो औरत अपने शौहर से झूठ बोल सकती है, उसे फंसाना मुश्किल नहीं।

धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई।
पहले सलाम-दुआ।
फिर हंसी-मजाक।
फिर “हमदर्दी”।

एक दिन करीम घर में दाखिल हुआ।
राशिद काम पर थे।
नूर कमरे में थी।

नूर ने दरवाजे की आहट सुनी।
धीरे से झांका।

उसने देखा – उसकी सौतेली मां और वह आदमी बहुत करीब बैठे हैं।
हंस रहे हैं।

उसका दिल बैठ गया।
उसे समझ नहीं आया, पर उसे लगा – यह सही नहीं है।


रमज़ान का महीना

फिर रमज़ान आया।

पूरा मोहल्ला इबादत में था।
मस्जिदों में रौनक थी।
सहरी के लिए लोग जाग रहे थे।

नूर भी रोजा रखती थी।
सूखी रोटी और पानी से सहरी करती।
छह साल की उम्र में।

लेकिन शकीला ने नया जुल्म शुरू किया।

“आज से तुम मेरा रोजा भी रखोगी।
अगर मेरा रोजा नहीं रखा तो इफ्तार नहीं मिलेगा।”

नूर ने सिर झुका लिया।
दो रोजे।
गर्मी, प्यास, कमजोरी – फिर भी सब्र।

रात को जब मोहल्ले वाले तरावीह पढ़ने जाते,
करीम चुपके से घर आता।

बंद कमरे में हंसी की आवाजें।
और नूर सजदे में रोती हुई दुआ करती:

“या अल्लाह, मेरी अम्मी को हिदायत दे दे…”


शब-ए-क़द्र की रात

27वीं रमज़ान की सुबह थी।

नूर ने सहरी की।
रोजा रखा।
घर की सफाई शुरू की।

शकीला ने कहा – “आज पूरा घर चमकना चाहिए।”

करीम आने वाला था।

जल्दी में शकीला दरवाजा बंद करना भूल गई।

नूर झाड़ू लगाते हुए कमरे के पास आई।
दरवाजा थोड़ा खुला था।

उसने अंदर देखा।

और उसकी दुनिया हिल गई।

रमज़ान की मुकद्दस रातों में हराम का काम।
हंसी, बेपरवाही।

नूर का रोजा जैसे उसके गले में अटक गया।
वह भागकर अपने कमरे में गई।
रोई नहीं।
बस सजदे में गिर गई।


साज़िश

करीम को शक हो गया कि बच्ची ने देख लिया है।

उसने शकीला से कहा –
“यह बच्ची खतरा है। इसे हटाना होगा।”

उसने एक कहानी गढ़ी –
एक अमीर आदमी बच्चियों को पालता है।
बदले में मोटी रकम देता है।

शकीला पहले झिझकी।
फिर लालच जीत गया।

योजना बन गई।


भागती हुई मासूमियत

अगले दिन शकीला ने प्यार से कहा:

“चलो, तुम्हें नए कपड़े दिलवाने ले चलूं।”

नूर समझ गई – यह मौत की सैर है।

रास्ते में मौका मिला।
वह भागी।

छोटे-छोटे पैरों में छाले।
आंसू, प्यास, डर।

लेकिन उम्मीद – “अब्बू मुझे बचाएंगे।”

वह दौड़ती हुई राशिद के काम की जगह पहुंची।

“अब्बू…”

राशिद ने उसे देखा – हैरान।

नूर ने सब बताया।
करीम, रमज़ान, साज़िश।

राशिद का दिल टूट गया।
पहले यकीन नहीं आया।
फिर उन्होंने कहा – “चलो, अपनी आंखों से देखूंगा।”


सच का सामना

राशिद दीवार फांदकर घर में दाखिल हुए।

बंद कमरे से हंसी की आवाज।

दरवाजा खोला।

और जो देखा –
वह जिंदगी का सबसे बड़ा सदमा था।

“तलाक! तलाक! तलाक!”

तीन शब्द।
और एक झूठ की इमारत ढह गई।

करीम भाग गया।
शकीला जमीन पर गिरकर रोती रही।

राशिद ने दरवाजा खोला।

“निकल जाओ।
मेरी नजरों से दूर।”


सब्र की जीत

घर में अब सिर्फ बाप और बेटी थे।

राशिद रो पड़े।
“मुझे माफ कर दो बेटा… मैं अंधा था।”

नूर ने उनके आंसू पोंछे।

“अब सब ठीक है, अब्बू।”

रमज़ान खत्म हुआ।
मगर इस घर में एक नई शुरुआत हुई।

राशिद ने मेहनत से काम किया।
नूर पढ़ने लगी।
घर में सच्चाई थी – और सुकून भी।

कुछ महीनों बाद एक दिन राशिद ने गली में शकीला को देखा।
फटे कपड़े, भूखी, प्यास से बेहाल।

उन्होंने जेब से कुछ पैसे निकाले।
उसकी हथेली पर रख दिए।

“मैं तुम्हें माफ कर चुका हूं।
अब खुद को माफ करने की कोशिश करो।
और अल्लाह से तौबा करो।”

राशिद वापस मुड़ गए।
नूर का हाथ थामे।


सीख

यह कहानी सिर्फ एक सौतेली मां की नहीं है।
यह कहानी है:

झूठ की असलियत की

लालच के अंजाम की

और सब्र की ताकत की

हर सौतेली मां बुरी नहीं होती।
हर घर में अंधेरा नहीं होता।

लेकिन जब झूठ, हवस और लालच घर में दाखिल हो जाएं –
तो बरकत चली जाती है।

और जब सब्र, सच्चाई और दुआ घर में हों –
तो अल्लाह खुद हिफाज़त करता है।

नूर ने दो रोजे रखे थे –
एक अपना, एक सौतेली मां का।

लेकिन असल में उसने सब्र का रोजा रखा था।
और वही उसकी जीत बन गया।

क्योंकि झूठ चाहे कितना भी बड़ा हो,
एक दिन गिरता जरूर है।
और सच चाहे कितना भी छोटा हो,
एक दिन जीतता जरूर है।