SP मैडम को भिखारी समझ सबने मजाक बनाया लेकिन हकीकत सामने आते ही सबके होश उड़ गए
.
.

.
# **SP मैडम को भिखारी समझ सबने मज़ाक बनाया, लेकिन हकीकत सामने आते ही सबके होश उड़ गए**
बई की वह शाम कुछ अलग ही थी। आसमान जैसे फट पड़ा हो। काली घटाएं शहर पर झुक आई थीं और बारिश ऐसी बरस रही थी कि सड़कें नालों में बदल गई थीं। दफ्तरों से निकलती गाड़ियां हेडलाइट की पीली रोशनी में रेंग रही थीं, और हर मोड़ पर पानी का भंवर सा बन जाता। पुलिस कमिश्नर ऑफिस की ऊँची इमारत के बाहर यही दृश्य था—लाल-पीली बत्तियाँ, पानी की धाराएँ, और भीगे हुए लोग जो भागते हुए भी धीमे पड़ जाते। इसी इमारत के तीसरे फ्लोर पर, एक केबिन में, एएसपी अंजलि राठौर अपनी टेबल पर झुकी हुई थीं। चेहरे पर कठोरता थी, आँखों में स्थिरता। उनका नाम ही अपराधियों के पसीने छुड़ा देता था। विभाग में लोग उन्हें “लेडी सिंघम” कहते—पर अंजलि को इन उपाधियों से कोई लगाव नहीं था। वह बस काम जानती थीं: अपराध की जड़ तक पहुँचना, और पीड़ित को न्याय दिलाना। उनके सामने एक मोटी फाइल खुली थी। पन्नों में दर्ज बयान, घटनास्थल की तस्वीरें, और उन पर लाल स्याही से किए गए चिन्ह। बाहर बिजली चमकती, भीतर ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में अंजलि की उँगलियाँ तेजी से पन्ने पलट रही थीं। तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई। “आओ,” अंजलि ने बिना सिर उठाए कहा। दरवाज़ा खुला और हवलदार पाटिल अंदर आया। वह सामान्यतः तेज और आत्मविश्वासी रहता, लेकिन आज कुछ झिझक रहा था। उसके चेहरे पर संकोच था। “मैडम…” पाटिल ने धीरे से कहा, “एक औरत आई है। बहुत रो रही है। कह रही है कि उसे आपसे ही मिलना है। मैंने उसे कल आने को कहा था… मगर वो यहाँ से हिलने को तैयार नहीं। कपड़े पूरी तरह भीगे हैं।” अंजलि ने फाइल बंद की। उनकी भौंहें तन गईं। “पाटिल,” उन्होंने कड़क आवाज़ में कहा, “मैंने कितनी बार कहा है—किसी फरियादी को दरवाज़े से मत लौटाओ। अंदर भेजो।” पाटिल ने सिर झुकाया और तुरंत बाहर चला गया। कुछ ही पलों में एक बुजुर्ग महिला केबिन के अंदर आई। उम्र लगभग साठ-पैंसठ के बीच होगी। साड़ी जगह-जगह से फटी हुई थी, किनारों पर कीचड़ लगा था और बाल भीगे होकर माथे पर चिपके थे। चेहरा पीला, आँखों में अजीब-सा खौफ—जैसे वह मौत को सामने देख कर भागी हो। वह भीतर आई तो दरवाज़े के पास ही काँपती खड़ी रह गई, मानो यकीन न हो रहा हो कि कोई उसकी बात सुनेगा। अंजलि ने कुर्सी से उठकर उसे सहारा दिया। “माँ जी, बैठिए,” उन्होंने नरमी से कहा। “आप घबराइए मत।” बुजुर्ग महिला बैठ तो गई, पर उसके हाथ ऐसे काँप रहे थे कि अंजलि ने जब पानी का गिलास पकड़ाया तो आधा पानी फर्श पर गिर गया। महिला के होंठ काँप रहे थे। “शांत हो जाइए,” अंजलि ने धीमे स्वर में कहा। “लंबी साँस लीजिए। मैं यहीं हूँ। बताइए—क्या हुआ?” बुजुर्ग महिला की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह फूट-फूट कर रोने लगी। “मैडम साहब…” वह सिसकते हुए बोली, “अनर्थ हो गया है। घोर पाप हो रहा है। भगवान के घर में शैतान बैठे हैं। मेरी मदद कीजिए… वरना मासूम बच्चियाँ मर जाएँगी।”
अंजलि की आँखें चौड़ी हो गईं। वे तुरंत गंभीर हो उठीं। “कौन बच्चियाँ?” अंजलि ने पूछा। “आप कहाँ की बात कर रही हैं?” महिला ने अपने पल्लू से आँसू पोंछे। “मेरा नाम सावित्री है। मैं शहर के बाहर ‘नारी छाया सुधार गृह’ में सफाई का काम करती हूँ। दुनिया समझती है कि वो अनाथ और बेसहारा लड़कियों का सहारा है… मगर वो सहारा नहीं, मैडम—वो नर्क है। नर्क!” यह सुनते ही अंजलि के चेहरे की कठोरता बढ़ गई। उन्होंने पाटिल को इशारा किया। “दरवाज़ा बंद कर दो।” कमरे का वातावरण भारी हो गया। बाहर बारिश की आवाज़, भीतर सावित्री की हिचकियाँ। अंजलि ने कुर्सी आगे खींची और बहुत ध्यान से सुनने लगीं। “माँ जी, बिना डरे सब बताइए,” अंजलि ने कहा। “जो भी आप जानती हैं, सब।” सावित्री ने काँपती आवाज़ में बोलना शुरू किया। शब्द जैसे उसके गले में फँस रहे थे, मगर मजबूरी ने उन्हें बाहर धकेल दिया। “वहाँ का जो मुख्य अधिकारी है… जगन माथुर… वो इंसान नहीं, दरिंदा है। जो भी नई लड़की आती है—जिसका कोई वारिस नहीं, या जो कमजोर है—उसे अपने कमरे में बुलाता है। सुधार गृह की आड़ में… वो वैश्यालय चला रहा है। लड़कियों को नशीली दवाएँ दी जाती हैं। जो विरोध करे, उसे पागलखाने वाले वार्ड में डाल देते हैं… बिजली के झटके… दवाइयाँ… मारपीट…” अंजलि की साँसें धीमी हो गईं। उनकी आँखों में गुस्सा उतर आया। “कल रात,” सावित्री ने कहा और उसकी आवाज़ टूट गई, “मुन्नी… मुन्नी नाम की एक उन्नीस साल की लड़की ने… फाँसी लगा ली। लेकिन उन्होंने पुलिस को खबर नहीं दी। रात के सन्नाटे में… उसकी लाश पीछे के नाले में फेंकवा दी। मैडम, मैंने अपनी आँखों से देखा है।” अंजलि की उँगलियाँ मुट्ठी में बदल गईं। उनके भीतर कुछ उबलने लगा, जैसे खून में आग मिल गई हो। पाटिल ने अनजाने में ही निगल लिया—वह भी सन्न रह गया। सावित्री रोते-रोते बोली, “मुझे भी धमकी दी गई है—अगर मुँह खोला तो चोरी के झूठे इल्जाम में जेल भिजवा देंगे। पर मुझे अपनी फिक्र नहीं है। बस…
उन बच्चियों को बचा लीजिए।” अंजलि कुछ सेकंड चुप रहीं। फिर वह धीमे स्वर में बोलीं, “माँ जी, आपने सही किया जो आईं। अब आप सुरक्षित हैं। और जो आपने बताया… वो राक्षस बचेगा नहीं।” अंजलि ने एक क्षण में फैसला कर लिया। वह उठीं और पाटिल से बोलीं, “टीम तैयार करो। गाड़ी निकालो।” पाटिल ने तुरंत “जी मैडम” कहा—पर उसी पल अंजलि रुक गईं। उन्होंने खिड़की की तरफ देखा। बारिश का शोर। शहर की रौशनी। फिर सावित्री की काँपती आँखें—और ‘नारी छाया’ का नाम, जिसे वे पहले भी सुन चुकी थीं। कई रसूखदार लोग वहाँ दान देते थे। अखबारों में जगन माथुर की तस्वीरें आतीं—समाजसेवक, दानवीर, नारी सुरक्षा का मसीहा। अंजलि जानती थीं—अगर वह अभी वर्दी में, पुलिस बल के साथ वहाँ जाएँगी तो जगन माथुर जैसे शातिर आदमी सबूत मिटा देगा। लड़कियों को धमकाकर चुप करा देगा। सीसीटीवी फुटेज “गायब” हो जाएगी। और फिर कोर्ट में वही पुरानी कहानी—“सब झूठ, पुलिस साजिश, समाजसेवी को बदनाम करने की चाल।” अंजलि ने गहरी साँस ली। “नहीं,” उन्होंने कहा। “छापा अभी नहीं पड़ेगा।” पाटिल चौंक गया। “मैडम?” अंजलि की आँखों में ठंडी चमक आ गई। “अगर शेर का शिकार करना है, तो जाल बिछाना होगा। हम वर्दी में गए तो वे सतर्क हो जाएँगे। हमें उनके बीच… उन्हीं जैसा बनकर घुसना होगा।” पाटिल समझ गया—मैडम कोई बड़ा कदम उठाने वाली हैं। अगले दो दिन अंजलि ऑफिस नहीं आईं। कमिश्नर को उन्होंने एक “अत्यंत गोपनीय” योजना बताई। जानकारी बस तीन लोगों तक सीमित थी—कमिश्नर, इंस्पेक्टर शिंदे, और हवलदार पाटिल। बाक़ी किसी को भनक भी नहीं। अंजलि ने अपना पूरा हुलिया बदल दिया। वह तेज, सधी हुई एएसपी नहीं रहीं। बालों को बिखेर कर तेल से चिपका लिया, चेहरे पर धूल और कालिख मल ली। एक पुरानी मैली, फटी साड़ी पहन ली। चाल में लड़खड़ाहट, आँखों में विक्षिप्तता का अभिनय। और एक नया नाम—“कमली”। योजना साफ थी: अंजलि बस स्टैंड पर ‘पागल’ जैसी हरकतें करेंगी, स्थानीय पुलिस उन्हें पकड़ेगी और नियम के अनुसार मानसिक रूप से असहाय, लावारिस महिला को ‘नारी छाया सुधार गृह’ भेज देगी—और अंजलि भीतर से सबूत इकट्ठा करेगी। दोपहर के ठीक दो बजे दादर बस स्टैंड पर हंगामा मच गया। एक औरत हवा में हाथ नचा रही थी, कभी हँसती, कभी रोती, कभी ज़मीन पर बैठकर बड़बड़ाती। अचानक उसने एक फल वाले का ठेला उलट दिया। सेब और संतरे पानी में बहने लगे। लोग डरकर पीछे हट गए। “पुलिस को बुलाओ!” किसी ने चिल्लाया। “ये पागल किसी को मार डालेगी!” कुछ ही देर में पुलिस जीप आई। दो महिला हवलदारों ने बड़ी मुश्किल से उसे पकड़ा। कमली छटपटाई—“छोड़ो मुझे! मुझे मेरे राजा के पास जाना है!” थाने में इंस्पेक्टर ने देखा—औरत का कोई पहचान पत्र नहीं, कोई बताने वाला नहीं, और दिमागी हालत ठीक नहीं लग रही। उसने आदेश दिया, “इसे नारी छाया सुधार गृह भेजो।” अंजलि के भीतर एक ठंडी जीत की लहर दौड़ी—मगर यह जीत असली युद्ध की शुरुआत थी। शाम होते-होते अंजलि उर्फ कमली एक सरकारी वैन में थी। लोहे की जालियों के पीछे से उसने मुंबई को देखा। दिल जोर से धड़क रहा था, लेकिन डर अपने लिए नहीं—इस बात का कि कहीं अभिनय में कोई कमी न रह जाए। उसके ब्लाउज की सिलाई में एक सूक्ष्म बटन कैमरा छिपा था और साड़ी के कॉलर में माइक्रोफोन जैसी एक माइक्रोचिप। यह सब इंस्पेक्टर शिंदे ने तकनीकी टीम की मदद से तैयार कराया था। रिकॉर्डिंग चालू थी—हर आवाज़, हर गाली, हर धमकी, हर चेहरा… सब सबूत बनने वाला था। वैन रुकी तो सामने एक पुरानी हवेली जैसी इमारत थी। लोहे का बड़ा गेट, ऊँची दीवारें, और बोर्ड पर लिखा था—**“नारी छाया सुधार गृह”**। गेट खुला। एक गार्ड ने अंजलि को धक्का दिया। “चल अंदर, नौटंकी!” अंजलि लड़खड़ाकर गिरी। हाथ मिट्टी में सन गया। जब उसने सिर उठाया तो गार्ड्स की आँखों में हमदर्दी नहीं—हवस थी। उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। सावित्री सच कह रही थी—यह जगह सच में नर्क थी। अंदर का नजारा बाहर से बिल्कुल उल्टा था। बाहर एक बगीचा और सफेद दीवारें—अंदर कदम रखते ही फिनाइल की तीखी बदबू, नमी, और सड़ा हुआ सन्नाटा। एक बड़े हॉल में लगभग पच्चीस लड़कियाँ बैठी थीं। किसी के बाल काट दिए गए थे, किसी के कपड़े फटे थे। सबसे डरावनी बात—कोई बोल नहीं रहा था। सबकी नजरें नीचे थीं, जैसे बोलना गुनाह हो। तभी एक मोटी औरत डंडा लेकर आई। आँखों में कठोरता, चेहरे पर क्रूरता। “बसंती”—वही वार्डन। “नई वाली!” बसंती चिल्लाई। “इधर आ!” अंजलि ने पागलों जैसी हंसी निकाली। “ही-ही… राजा जी…?” बसंती ने जोर से थप्पड़ मारा। “चुप! यहाँ तेरा राजा नहीं। अब मैं तेरी राजा हूँ, मैं ही मंत्री। उस कोने में जा।” अंजलि रोने का नाटक करते हुए कोने में बैठ गई, मगर उसकी तेज नजरें हर कोना स्कैन कर रही थीं। सीसीटीवी कैमरे लगे थे—पर कुछ तार कटे हुए, कुछ सिर्फ दिखावे के। मतलब साफ: वे निगरानी नहीं, डर का नाटक करते थे। रात को खाना मिला—पानी जैसी दाल, जली रोटियाँ। अंजलि ने मुश्किल से एक निवाला निगला। उसे पता था—यह सिर्फ भूख नहीं, यह नियंत्रण की भूख थी, जिसे वे लड़कियों पर थोपते थे। लाइटें धीमी हुईं। लड़कियाँ चुपचाप अपनी जगह लेट गईं। तभी एक दुबली-पतली लड़की चुपके से अंजलि के पास आ बैठी। उसकी उम्र मुश्किल से बीस के आसपास होगी। उसने धीमे से पूछा, “दीदी… तुम सच में पागल हो या नाटक?” अंजलि एक पल को चौंकी, लेकिन अभिनय जारी रखा—बड़बड़ाई, हँसी, फिर रोना। लड़की ने इधर-उधर देखा, फिर फुसफुसाई, “मेरा नाम रेखा है। मैं भी शुरू में नाटक करती थी… सोचा था छोड़ देंगे। पर यहाँ नाटक काम नहीं आता। अगर बचना है तो बदसूरत बन जाओ या बीमार हो जाओ। अगर सुंदर दिखी… बड़े साहब तुम्हें बुला लेंगे।” अंजलि का कलेजा कांप उठा। उसने रेखा का हाथ दबाया और पहली बार बहुत धीमे, अपने असली लहजे में कहा, “डरो मत। मैं आ गई हूँ। अब सब ठीक होगा।” रेखा की आँखों में आशा चमकी, मगर डर ने उसे तुरंत बुझा दिया। उसने कुछ कहना चाहा, तभी लोहे के मुख्य गेट के बंद होने की भारी आवाज़ गूंजी—धड़ाम! घड़ी में रात के 11 बज चुके थे। और यही वह वक्त था जब “सुधार गृह” की नकाब उतरती थी। दिन के उजाले में जो गार्ड ‘संतरी’ बनते, रात में जल्लाद बन जाते। गलियारों में भारी जूतों की आवाज़ गूंजने लगी। हाथों में शराब की बोतलें, डंडे, और आँखों में बेहया चमक। वे सलाखों पर डंडा मारते हुए निकलते—ठक-ठक-ठक—और वह आवाज़ हर लड़की के दिल में कील की तरह गड़ती। किसी कोठरी में टॉर्च मारकर गंदी फब्तियाँ। कोई लड़की जरा-सा हिली नहीं कि धमकी। डर ऐसा कि कोई आँख मिलाने की हिम्मत न करे। अंजलि कोठरी के कोने में लेटी थी। बाहर से कमली—अंदर से पुलिस। उसका बटन कैमरा रिकॉर्ड कर रहा था। हर गाली, हर धमकी, हर चेहरे का एंगल। उसके कान चौकन्ने थे। उसकी सांसें नियंत्रित थीं। उसने रेखा को देखा—वह थर-थर कांप रही थी। अंजलि का मन हुआ उसे गले लगा ले, पर मिशन—एक छोटी गलती सब खत्म कर सकती थी। रात के लगभग 12 बजे होंगे, जब गैलरी के दूसरे छोर से दो भारी कदम सुनाई दिए। किसी ने फुसफुसाकर कहा, “कालिया… शेरा…”
कमरे में मौत का सन्नाटा छा गया। लड़कियाँ साँस रोककर लेट गईं। कदम पास आते गए। दो बड़े साए सलाखों के सामने रुके। चाबियों का गुच्छा खनका। शेरा की आवाज़ गूंजी, “ओए! सो गई क्या सब?” कालिया ने ताला खोला और अंदर घुसते ही अंजलि की आँखों पर टॉर्च मारी। अंजलि तुरंत चिल्लाई, “सूरज निकल आया! मेरा राजा आ गया क्या?” शेरा हँसा, फिर जूते से हल्का धक्का मारा। “अबे नौटंकी! तेरा सूरज नहीं, तेरा काल आया है। उठ!” कालिया ने उसके बाल पकड़े और झटके से खड़ा किया। अंजलि ने दर्द का अभिनय किया। “छोड़ो… दर्द हो रहा है…” कालिया उसके कान के पास फुसफुसाया, “आज तेरी किस्मत खुलेगी पगली। बड़े साहब ने याद किया है।” रेखा की हिम्मत टूट गई। वह जानती थी “बड़े साहब” का मतलब क्या होता है। वह आगे बढ़ी, गिड़गिड़ाई, “नहीं भैया… इसे मत ले जाओ… ये पागल है… इसे कुछ समझ नहीं आता…” शेरा ने घृणा से देखा और उसके पेट में जोरदार लात मारी। रेखा दर्द से जमीन पर गिर गई। अंजलि के अंदर आग भड़क उठी। उसका मन हुआ—यहीं दोनों की हड्डियाँ तोड़ दे। मगर उसने खुद को बाँध लिया। अभी नहीं… अभी नहीं। वह पागलों जैसी हंसी हँसने लगी, “ही-ही… मैं राजा के पास जा रही… टॉफी मिलेगी!” दोनों गुंडे हँसे और उसे खींचते हुए बाहर ले गए। जाते-जाते अंजलि ने रेखा की तरफ देखा—और मन ही मन कसम खाई: *रेखा, बस कुछ देर और… तेरा एक-एक आँसू इन पापियों पर तेजाब बनकर गिरेगा।* वे उसे एडमिन ब्लॉक की तरफ ले गए। नीचे जहां गंदगी, ऊपर जहां मार्बल। दीवारों पर फैंसी लाइटें, गलियारे में परफ्यूम की गंध। अंजलि समझ गई—यह “सुधार गृह” नहीं, संगठित अपराध का आलीशान अड्डा था। ऊपर की मंज़िल पर एक कमरे के नीचे रोशनी दिख रही थी। कालिया ने कंधा दबाया, “अंदर जाकर ज्यादा नाटक मत करना। साहब जो बोले, चुपचाप करना। वरना कोमा में भेज देंगे।” दरवाज़े पर दस्तक हुई। भीतर से भारी, नशे में डूबी आवाज़ आई, “भेज दो।” कालिया ने अंजलि को धक्का दिया और दरवाज़ा बंद कर दिया। अब वह उस पिंजरे में थी—जहाँ शेर शिकार का इंतज़ार करता है। मगर शेर को पता नहीं था—आज पिंजरे में शिकार नहीं, शिकारी आया है। कमरा किसी दफ्तर जैसा नहीं था। मेज पर महंगी शराब, काजू-बादाम, चिकन; दीवारों पर भद्दे चित्र; मोटे कारपेट; कोनों में बड़े गुलदस्ते। लेदर की कुर्सी पर बैठा था जगन माथुर—पचास के पार, मोटा पेट, चेहरे पर घमंड और आँखों में गंदी चमक। अंजलि दरवाज़े से सटकर खड़ी रही, हाथ छाती पर बाँध लिए, जैसे डरी हुई हो। मगर उसकी नजरें सब रिकॉर्ड कर रही थीं—कमरे की व्यवस्था, टेबल, दराज़, खिड़की, हर चीज़। जगन उठकर लडखड़ाता हुआ उसकी तरफ आया। “आओ कमली… डरो मत। मैं कोई भूत नहीं।” अंजलि ने कांपती आवाज़ में नाटक किया, “मुझे घर जाना है… मेरी माँ मुझे ढूँढ रही होगी…” जगन ठहाका मारकर हँसा। “मैं ही तेरा राजा हूँ।” वह अंजलि के पल्लू को छूने बढ़ा तो अंजलि पीछे हट गई और चिल्लाई, “दूर रहो! मुझे हाथ मत लगाओ!” जगन के चेहरे पर झुंझलाहट आई। “यहाँ मेरी मर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलता।” अंजलि ने जान-बूझकर उसे उकसाया। तुतलाते हुए बोली, “मैं पुलिस को बता दूँगी…” जगन फिर हँसा—ऐसी हँसी जिसमें सत्ता का नशा था। “पुलिस? नेता? जज? सब मेरी जेब में हैं। बाहर गेट पर खड़े पुलिसवाले मुझे सलाम ठोकते हैं।” अंजलि के कान जैसे गर्म हो गए—मगर उसने खुद को शांत रखा। उसका बटन कैमरा यह “कबूलनामा” रिकॉर्ड कर रहा था। वह चाहती थी कि जगन और बोलता रहे, और अपना अपराध खुद बयान करे। जगन ने शराब का घूंट लिया और बोलता गया, “मुन्नी बहुत शोर मचाती थी। मैंने उसे… खत्म कर दिया। पुलिस ने रिपोर्ट में आत्महत्या लिख दिया।” अंजलि की मुट्ठियाँ कस गईं। उसकी आँखों में आग, मगर चेहरा ठंडा। वह बस एक कदम दूर थी उस वक्त से, जब अभिनय खत्म होगा। जगन ने फिर आगे बढ़कर कहा, “तू सुंदर है। मुझे खुश करेगी तो रानी बनकर रहेगी।” उसने अंजलि का कंधा जोर से पकड़ा—जैसे कपड़े फाड़ने वाला हो। और उसी क्षण… कमली मर गई। अंजलि राठौर जाग उठीं। उनका शरीर एकदम सीधा हो गया। आँखों में वही आग, वही ठंडी क्रूर चमक, जिससे बड़े-बड़े अपराधी काँप जाते थे। आवाज़ बदल गई—अब उसमें विक्षिप्तता नहीं, आदेश था। “हाथ दूर रख, जगन माथुर,” अंजलि ने कड़क आवाज़ में कहा, “वरना यह हाथ शरीर से अलग करने में मुझे एक सेकंड नहीं लगेगा।” जगन हकबका गया। “क…कौन है तू?” अंजलि ने एक कदम आगे बढ़कर कहा, “तू जिसे कमली समझ रहा था, वो एएसपी अंजलि राठौर है। और तेरे हर जुर्म का वीडियो-ऑडियो सबूत मेरे पास है।” जगन का नशा उतर गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। उसने तुरंत दराज की तरफ छलांग लगाई—रिवॉल्वर निकालने के लिए। पर अंजलि ने उससे पहले वार किया। एक फुर्तीली किक—धड़ाम! दराज़ बंद, जगन की उंगलियाँ उसमें दब गईं। वह चीखा। अंजलि ने उसके कॉलर को पकड़ा, उसे मेज पर पटका, और टूटे काँच का टुकड़ा उसकी गर्दन पर रख दिया। जगन कांपने लगा। “पैसे ले लो,” वह गिड़गिड़ाया। “करोड़ों… मैं सब दे दूँगा…” अंजलि ने उसके गाल पर जोरदार तमाचा मारा। “ये सौदेबाज़ी तेरे जैसे कायरों की आदत है। मेरी कीमत—इन लड़कियों की आज़ादी है।” फिर अंजलि ने अपने कॉलर में लगे माइक्रोफोन पर बहुत शांत, मगर ठोस स्वर में कहा— “**कोड अल्फा-वन। रेड शुरू।**” और अगले ही क्षण… बाहर सायरन गूंज उठे। वूऊँ—वूऊँ—वूऊँ! जगन की आँखें फट गईं। “न…नहीं… ये कैसे—” नीचे गेट टूटने की आवाज़ आई। भारी बूटों की दौड़। “पुलिस! कोई हिलेगा नहीं!” इंस्पेक्टर शिंदे की अगुवाई में पचास से ज्यादा पुलिसवाले अंदर घुस चुके थे। उन्होंने पूरे परिसर को घेर लिया। गार्ड्स हथियार उठाने भी न पाए कि हथकड़ियाँ चढ़ गईं। बसंती चीखती रही—पर अब उसकी चीख किसी को डराने वाली नहीं थी। अंजलि जगन को घसीटते हुए कमरे से बाहर लाई। नीचे हॉल में लड़कियाँ कांपती खड़ी थीं। जब उन्होंने देखा कि वार्डन और गार्ड्स घुटनों पर हैं, और सामने “कमली” अब पुलिस की वर्दी जैसी रौब वाली अंजलि राठौर बन चुकी है—तो उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। अंजलि ने ऊँची आवाज़ में कहा, “अब तुम सब आज़ाद हो। किसी को डरने की जरूरत नहीं।” रेखा आगे आई। उसकी आँखों में आँसू थे—पर ये आँसू डर के नहीं, राहत के थे। उसने काँपते हाथ से जगन को चप्पल मारी। एक चप्पल—जैसे वर्षों का अपमान वापस दे रही हो। उसके बाद बाकी लड़कियों ने भी अपनी भड़ास निकाली। कोई रोई, कोई हँसी, कोई बस जमीन पर बैठकर सिसकती रही—क्योंकि कुछ जख्म शब्दों से नहीं भरते। और तभी… सावित्री अम्मा दौड़ती हुई आईं। उन्होंने अंजलि को देखा तो उनकी आँखें भर आईं। अंजलि ने उन्हें गले लगा लिया। “आपने हिम्मत की, माँ जी,” अंजलि ने कहा। “अगर आप चुप रहतीं, तो ये सब चलता रहता।” सावित्री ने काँपती आवाज़ में बस इतना कहा, “भगवान ने तुम्हें भेजा है बिटिया…” अगली सुबह अखबारों में एक ही खबर थी: **“एएसपी अंजलि राठौर का साहसिक ऑपरेशन: ‘नारी छाया’ के नाम पर चल रहा देह-धंधा और यातनागृह बेनकाब”** टीवी चैनलों पर डिबेट हुईं। नेताओं की बोलती बंद। जिन रसूखदारों के नाम जगन के साथ जुड़े थे, वे बचने की कोशिश करने लगे—पर अंजलि ने जो सबूत जुटाए थे, वे सिर्फ एक आदमी के खिलाफ नहीं थे। वे एक पूरी सड़ी हुई व्यवस्था पर चोट थे। कोर्ट में केस फास्ट-ट्रैक पर चला। वीडियो रिकॉर्डिंग, ऑडियो कबूलनामे, बरामद दवाइयाँ, मेडिकल रिपोर्ट, और लड़कियों के बयान—सबने मिलकर जगन माथुर के लिए बचने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा। अंततः अदालत ने फैसला सुनाया—**उम्रकैद।** “नारी छाया सुधार गृह” का पूरा स्टाफ बदल दिया गया। नई, प्रशिक्षित महिला अधिकारी नियुक्त हुईं। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई। काउंसलर रखे गए। और सबसे बड़ी बात—लड़कियों को पहली बार इंसान की तरह देखा गया, केस की फाइल नहीं। कुछ हफ्तों बाद अंजलि फिर वहाँ पहुँचीं। इस बार वर्दी में। वही जगह—पर हवा बदली हुई थी। हॉल में अब सन्नाटा नहीं था। आँगन में लड़कियाँ खेल रही थीं। किसी के चेहरे पर डर नहीं, बस हल्की-सी मुस्कान—जो बहुत समय बाद लौटती है। रेखा दौड़कर आई। “मैडम…” उसके शब्द काँप गए, “आप… आप फरिश्ता हो।” अंजलि ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “नहीं रेखा। मैं फरिश्ता नहीं। मैं बस वर्दी वाली एक औरत हूँ। और एक बात याद रखना—गलत सहना भी गुनाह है। आवाज उठाना जरूरी है।” रेखा ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में अब नई रोशनी थी—जिंदगी शुरू करने की। अंजलि ने वहाँ से जाते-जाते सावित्री अम्मा को देखा। सरकार ने उन्हें वहाँ का केयरटेकर बनाया था—क्योंकि जिसने सच के लिए जान की बाज़ी लगाई, वह उस जगह का सबसे बड़ा संरक्षक था। बारिश अब नहीं थी। आसमान साफ था। अंजलि अपनी गाड़ी की ओर बढ़ीं। उनके अगले मिशन की फाइल शायद इंतज़ार कर रही थी—क्योंकि शहर में अपराध खत्म नहीं होते, बस उनके चेहरे बदलते रहते हैं। पर आज… कम से कम आज, कुछ मासूमों ने चैन की साँस ली थी। और यह कहानी यही सबक छोड़ गई— **सच्चाई की एक चिंगारी भी बुराई को राख कर सकती है।** **और सावित्री अम्मा की तरह आवाज उठाना जरूरी है—क्योंकि चुप्पी ही पापियों की ताकत बढ़ाती है।**
News
Eisenhower’ı Ağlatan Telefon Görüşmesi — Patton’ın Her Şeyi Değiştiren 4 Kelimesi
Eisenhower’ı Ağlatan Telefon Görüşmesi — Patton’ın Her Şeyi Değiştiren 4 Kelimesi . . . Eisenhower’ı Ağlatan Telefon Görüşmesi: Patton’ın Her…
Kız Çocuk Her Gün Yaşlı Adama Kahvaltı Getirdi — Bir Gün Askeri Subaylar Geldi
Kız Çocuk Her Gün Yaşlı Adama Kahvaltı Getirdi — Bir Gün Askeri Subaylar Geldi . . . Her Gün Yaşlı…
Milyoner Erken Döndü Ve Eşini Böyle Gördü… Hizmetçi Fısıldadı: “Sessiz Ol”
Milyoner Erken Döndü Ve Eşini Böyle Gördü… Hizmetçi Fısıldadı: “Sessiz Ol” . . . Milyoner Erken Döndü ve Eşini Böyle…
Mafya Patronunun Kız Kardeşini Kurtarmak İçin Sınavı Kaçırdı — Ertesi Gün Kapısına Rolls-Royce Geldi
Mafya Patronunun Kız Kardeşini Kurtarmak İçin Sınavı Kaçırdı — Ertesi Gün Kapısına Rolls-Royce Geldi . . . Mafya Patronunun Kız…
8 Yıl Sonra! Mezardaki Ayakkabıları Suçlu mu Bıraktı?
8 Yıl Sonra! Mezardaki Ayakkabıları Suçlu mu Bıraktı? . . . 8 Yıl Sonra! Mezardaki Ayakkabıları Suçlu Mu Bıraktı? 1994…
…Beni kurtar… ve sana ne istersen vereceğim.” Ona yalvardı. Çiftçi kabul etti… ta ki bayılana kadar.
…Beni kurtar… ve sana ne istersen vereceğim.” Ona yalvardı. Çiftçi kabul etti… ta ki bayılana kadar. . . . Beni…
End of content
No more pages to load


