Yateem Bachon ko Palny Wali Ghareeb Buhri Maa ki Sachi Kahani – Very Emotional Real Storie Sachi
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“अम्मा का ठेला” – यतीम बच्चों को पालने वाली गरीब बूढ़ी मां की सच्ची कहानी
सुबह का समय था, मगर शहर बहुत पहले जाग चुका था।
गाड़ियों के हॉर्न, बसों के ब्रेक, ऑटोरिक्शा की खड़खड़ाहट, फुटपाथ पर चलते लोगों के कदम – सब मिलकर ऐसा शोर बना रहे थे कि किसी एक आवाज़ को अलग से पहचानना मुश्किल था।
उसी शोर के बीच, फुटपाथ के किनारे, एक पुराना-सा ठेला लगाया जा रहा था।
लोहे का फ्रेम, ऊपर लकड़ी की तख्तियां, कई जगह से घिसा हुआ, थोड़ा-सा टेढ़ा, लेकिन साफ़।
यह ठेला कमल देवी का था।
1. कमल देवी – फुटपाथ की अम्मा
कमल देवी कोई खास दिखने वाली औरत नहीं थीं।
उम्र करीब साठ साल,
बालों में सफेदी,
चेहरे पर धूप और वक्त की बनी लकीरें,
हाथों पर जलने के पुराने निशान।
यही हाथ रोज़ आटा गूंधते, सब्ज़ी काटते, दाल चलाते।
पतली, सादी, पर साफ़ साड़ी,
जिसे वह हर सुबह अच्छे से तह लगाकर पहनती।
उनका रहन-सहन, बोली, चलने का ढंग – सब में सादगी थी, लेकिन भीतर कहीं एक जिद्दी मजबूती भी।
वे पिछले बीस साल से इसी जगह ठेला लगा रही थीं।
शहर बदल गया –
सड़कें चौड़ी हो गईं,
दुकानों के नए चमकदार बोर्ड लग गए,
मोबाइल टावर खड़े हो गए,
कांच की इमारतें बन गईं।
लेकिन कमल देवी वहीं रहीं – उसी फुटपाथ के उस कोने पर।
शायद इसलिए कि उनके पास कहीं और जाने की कोई वजह नहीं बची थी।
सुबह-सुबह ठेला लगाते वक्त वह ज्यादा बात नहीं करतीं।
कुछ पुराने ग्राहक आते –
“अम्मा, एक प्लेट पूड़ी-सब्ज़ी देना।”
“चाय देना।”
वे चुपचाप बनाकर दे देतीं, पैसे ले लेतीं, सिर हिलाकर हल्की मुस्कान दे देतीं।
किसी ने कभी उनसे पूछा नहीं –
“आप कैसी हैं, अम्मा?”
और उन्होंने भी किसी से अपना दुख कहने की आदत बहुत पहले छोड़ दी थी।
समय के साथ इंसान सवाल करना छोड़ देता है – अपने आप से भी, दूसरों से भी।
उस दिन भी सब कुछ पहले जैसा ही था।
उन्होंने देगची चढ़ाई, दाल में नमक डाला, तड़का लगाया, रोटियां सेंकीं और ठेले के सामने तीन प्लास्टिक की कुर्सियां रख दीं –
वही तीन, जो वह हमेशा रखती थीं।
उन्हें खुद भी नहीं पता था कि तीन ही क्यों।
बस बरसों से उनकी आदत में शामिल था।

2. तीन नज़रें – सड़क के उस पार से
दोपहर तक धूप तेज हो गई।
लोगों की भीड़ थोड़ी कम हो गई।
कुछ देर के लिए ठेला सुस्त-सा लगने लगा।
कमल देवी ठेले के पीछे खड़ी चम्मच से दाल चलाती रहीं।
भाप उठती, उनके चश्मे पर हल्का-सा धुंध का परदा बनाती, फिर गायब हो जाती।
तभी उनकी नज़र सड़क के उस पार गई।
वहां तीन बच्चे खड़े थे।
वे ना भाग रहे थे,
ना शोर मचा रहे थे,
ना भीख मांग रहे थे।
बस एक-दूसरे के बेहद पास, कंधे से कंधा सटाकर खड़े थे –
जैसे दुनिया उनसे छीनने के लिए तैयार हो और ये तीनों एक-दूसरे को कसकर पकड़कर खड़े हों।
तीनों लगभग एक ही उम्र के लगते थे –
सात, आठ, या ज्यादा से ज्यादा नौ साल।
एक ही कद, एक जैसा चेहरा, और आंखों में वही खामोश थकान।
कपड़े ढीले-ढाले,
जैसे किसी ने पुराने बैग से निकालकर दे दिए हों।
जूते फटे, पर जूते थे – इसका मतलब कभी नए रहे होंगे।
कमल देवी ने कुछ सेकंड उन्हें देखा,
फिर नजर हटा ली।
उन्होंने न कोई लंबी “आह” भरी,
न कोई डायलॉग बोला –
इतने सालों में उन्होंने ड्रामेबाज़ी करना सीखकर भी भूल चुकी थीं।
उन्होंने बच्चों को वैसे ही देखा,
जैसे कोई ऐसी सच्चाई देखता है जो तकलीफ देती है,
मगर जिसके अस्तित्व से इनकार करने की इजाज़त नहीं होती।
थोड़ी देर बाद, तीनों बच्चे धीरे-धीरे सड़क पार करते हुए ठेले के पास आए।
बहुत पास नहीं – बस इतना कि अगर उन्हें डांट दिया जाए तो तुरंत पीछे हट सकें।
बीच वाले बच्चे ने हिम्मत की।
धीरे से बोला –
“अम्मा… अगर कुछ बचा हो तो…”
उसकी आवाज में आदत नहीं थी।
मांगने की प्रैक्टिस नहीं,
बस शर्मिंदगी और भूख का मिलाजुला वजन।
कमल देवी का हाथ रुक गया।
चम्मच हवा में ठहर गई।
यह सवाल उन्होंने पहले भी सुना था,
लेकिन आज कुछ अलग था।
इन्हें देखकर वह तुरंत यह नहीं कह सकती थीं –
“ये पेशेवर भिखारी हैं”
या
“ये रोज यहां आते हैं।”
ये बच्चे चालाक नहीं लगते थे,
ये भूखे लगते थे।
उन्होंने धीरे से पूछा –
“तुम लोगों की मां है?”
सवाल सख्ती से नहीं पूछा गया था, लेकिन सीधा था।
तीनों ने एक-दूसरे को देखा।
थोड़ी देर चुप रहे,
फिर धीरे-धीरे सिर हिला दिया।
“नहीं।”
बस एक शब्द।
लेकिन वह शब्द कमल देवी के भीतर कहीं गहरे जाकर बैठ गया।
उन्होंने एक पल के लिए देगची की तरफ देखा,
फिर उस छोटे-से पैसे के डिब्बे की तरफ –
जो वैसे भी आज भरा नहीं था।
सच यह था कि आज का दिन अच्छा नहीं गया था।
सड़क पर काम चल रहा था,
लोग कम आ रहे थे।
उनके पास इतना नहीं था कि वे किसी को उदारता दिखाने की हालत में हों।
फिर भी उन्होंने गहरी सांस ली और कहा –
“आओ… इधर आओ।”
आवाज़ में डांट नहीं,
बल्कि बुलावा था।
तीनों बच्चे धीरे-धीरे आगे बढ़े।
कमल देवी ने तीन छोटे कटोरे भरे –
पूरे नहीं,
लेकिन पर्याप्त,
और गर्म।
भूख में गर्मी भी एक नेमत होती है।
तीनों बच्चे स्टूल पर बैठ गए।
पहले तेजी से खाने लगे,
जैसे डर हो कि कोई छीन न ले।
फिर धीरे-धीरे,
जब शरीर को यकीन हो गया कि
“खाना अभी खत्म नहीं होगा।”
कमल देवी उन्हें देखती रहीं।
उन्हें खुद भी नहीं पता था क्यों।
बस उस दिन फुटपाथ उन्हें अलग लग रहा था।
यह सिर्फ खाना नहीं था।
यह एक ऐसा मौन फैसला था,
जिसने खामोशी से बरसों का एक सफर शुरू कर दिया।
3. तीन नाम, एक डर
बीच वाले बच्चे ने कटोरा नीचे रखा।
मुंह पोंछा, नजरें झुका लीं –
“शुक्रिया अम्मा।”
अम्मा।
यह शब्द कमल देवी के दिल में हल्की-सी हलचल लेकर आया।
बरसों से किसी ने उन्हें इस नाम से नहीं पुकारा था।
उन्होंने तुरंत अपने चेहरे पर भाव नहीं आने दिए।
उम्र ने उन्हें सिखा दिया था कि जज़्बातों को चेहरे तक आने में देर करनी चाहिए,
वरना लोग उन्हें कमज़ोरी समझ लेते हैं।
उन्होंने पानी का गिलास आगे बढ़ाते हुए कहा –
“पानी धीरे-धीरे पीओ।
बहुत तेजी से पियोगे तो पेट खराब हो जाएगा।”
तीनों ने चुपचाप सिर हिलाया।
बचा हुआ खाना खत्म किया,
कटोरे नीचे रखे,
पर उठे नहीं।
जैसे डर हो कि अगर उठे, तो यह पल भी खत्म हो जाएगा।
कमल देवी ने पहली बार उनके हाथों पर ध्यान दिया।
हथेलियों पर खरोचें,
उंगलियों पर सूजन,
टूटे हुए नाखून।
ये वे हाथ नहीं थे
जो स्कूल की कॉपी पकड़ते हैं।
ये वे हाथ थे जो
ठंड, भूख और सड़क से परिचित होते हैं।
उन्होंने बात हल्की करने के लिए पूछा –
“तुम लोगों के नाम क्या हैं?”
तीनों ने एक-दूसरे को देखा –
जैसे तय कर रहे हों कि कौन बोले।
आखिरकार बाईं तरफ बैठा बच्चा बोला –
“मैं राहुल हूं।”
बीच वाला हिचकिचाया –
“मैं आकाश।”
दाईं तरफ वाला कुछ देर चुप रहा,
फिर धीरे से बोला –
“मैं विक्रम।”
कमल देवी ने सिर हिलाया।
नामों को अपने मन में अच्छे से बैठा लिया –
जैसे कोई कीमती चीज संभालकर रखी जाती है।
“और कहां रहते हो?”
सवाल हवा में कुछ पल लटक गया।
राहुल ने जमीन की तरफ देखा।
विक्रम ने होंठ भींच लिए।
आकाश ने कहा –
“जहां जगह मिल जाए…”
यह जवाब सुनने के लिए उन्हें तैयार होना चाहिए था,
फिर भी दिल में कुछ टूट-सा गया।
“रात कहां बिताते हो?”
“फ्लाईओवर के नीचे।”
विक्रम ने सीधे जवाब दिया –
जैसे अब शर्म छुपाने की भी ताकत नहीं बची हो।
कमल देवी उस जगह को जानती थीं –
नमी, गत्ते,
सड़कों की आवाज़,
और रात को बदलता हुआ डर।
“किसी शेल्टर होम में क्यों नहीं जाते?”
आकाश ने भाइयों की तरफ देखा।
फिर बोला –
“वो हमें अलग-अलग कर देंगे। कहते हैं, नियम है।”
“और तुम मानते नहीं?”
राहुल ने धीरे से सिर हिलाया –
“अलग हो गए तो… दोबारा नहीं मिलेंगे।
अकेले रहना ज्यादा बुरा है।”
कमल देवी चुप हो गईं।
कुछ नियम कागज़ पर बनते हैं,
लेकिन उनकी कीमत इंसान चुकाता है।
4. “ये मुसीबत बनेंगे” – मोहनलाल का साया
उसी समय ठेले पर एक साया पड़ा।
“अरे ओ कमल देवी!”
यह मोहनलाल था –
मोहल्ले का खुद घोशित रखवाला,
जिसका हर वाक्य
पुलिस, परमिट और नियम से शुरू होकर
रिश्वत, धमकी और शिकायत पर खत्म होता था।
“मुफ्त का खाना बाँट रही हो अब?
बाद में शिकायत मत करना –
ये मुसीबत बन जाएंगे।”
तीनों बच्चे सहम गए।
विक्रम ने मुट्ठी भींच ली,
लेकिन चुप रहा।
कमल देवी सीधी खड़ी हो गईं।
“ये खा रहे हैं… चोरी नहीं कर रहे।”
“आज खाएंगे… कल यहीं डेरा डाल देंगे।
फुटपाथ है ये, आश्रम नहीं।”
मोहनलाल हंसते हुए चला गया।
मगर उसके शब्द वहीं हवा में रह गए –
“मुसीबत।”
आकाश ने धीरे से कहा –
“अम्मा, हम मुसीबत नहीं बनना चाहते।”
कमल देवी ने बच्चों को देखा –
उनके दुबले चेहरे,
डर से सिकुड़ी आंखें।
“मुसीबत वो होती है जो नुकसान करे।
तुम तो बस चुपचाप बैठे हो।”
विक्रम ने नजरें झुका लीं –
“लोग हमें मुसीबत ही समझते हैं।”
कमल देवी जानती थीं –
गरीबी को अक्सर अपराध,
और भूख को बदतमीज़ी समझ लिया जाता है।
उन्होंने बच्चों की तरफ देखा –
“अगर आज रात फ्लाईओवर के नीचे मत जाना।”
तीनों चौंक गए –
“तो कहां जाएं?”
विक्रम ने शक से पूछा।
एक पल को वह खुद भी हिचक गईं,
फिर जैसे कोई फैसला अपने आप ज़ुबान तक आ गया –
“यहीं रहो… मेरे पास।”
ये कोई फिल्मी डायलॉग नहीं था,
ना कोई नाटकीय घोषणा –
बस एक बूढ़ी औरत का,
अपनी छोटी-सी दुनिया में थोड़ा-सा
जगह बना देने का फैसला।
आकाश ने कहा –
“हम मुसीबत नहीं बनना चाहते।”
“शर्त पर रहोगे।”
कमल देवी ने कहा।
तीनों एकदम सीधा होकर बैठ गए।
“कौन-सी शर्त?”
“चोरी नहीं करोगे।”
“हम चोरी नहीं करते।”
विक्रम तुरंत बोला,
आवाज में थोड़ी तल्खी थी।
आकाश ने धीरे से जोड़ा –
“फिर भी इलज़ाम लग जाता है।”
कमल देवी ने सिर हिलाया –
“यहां मेरे पास… सिर्फ सच चलेगा।
और हाथ बटाओगे –
ठेला साफ करना, पानी लाना,
सामान समेटना।
ताकि कोई ये न कहे कि तुम सिर्फ खाने आए हो।”
यह बात तीनों को अच्छी लगी।
विक्रम के चेहरे पर हल्की-सी सख्त मुस्कान आई –
“हम काम कर सकते हैं।”
उसी वक्त कमल देवी की नज़र
आकाश के गले पर पड़ी –
एक पतली-सी जंजीर में
तीन जुड़े हुए गोल छल्लों वाला लॉकेट।
राहुल और विक्रम के गले में भी
वैसा ही लॉकेट था।
“ये कहां से मिला?”
आकाश ने कंधे उचकाए –
“याद नहीं… किसी ने पहनाया था।”
राहुल बोला –
“एक गीत भी था…”
विक्रम ने जमीन की तरफ देखते हुए जोड़ा –
“एक बड़ा-सा लोहे का दरवाज़ा भी था…”
कमल देवी के भीतर कहीं
एक पुरानी याद हल्के से सरक गई –
जैसे बरसों से बंद कोई दरवाज़ा
थोड़ा-सा खुल गया हो।
वह चुप रहीं –
लेकिन समझ गईं –
ये तीनों सिर्फ भूखे नहीं हैं,
ये किसी अधूरी कहानी से गिर पड़े बच्चे हैं।
और शायद,
उनका ठेला उस कहानी के लिए
एक नई शुरुआत बन चुका है।
5. अगली सुबह – तीन मजदूर नहीं, तीन बेटे
अगली सुबह कमल देवी जल्दी जाग गईं।
रात भर उन चेहरों, उन लॉकेटों,
उन शब्दों – “अम्मा” – का ख्याल आता रहा।
जब वह ठेला लगाने पहुंचीं,
वे हैरान रह गईं।
तीनों बच्चे पहले से मौजूद थे।
मुंह धुले हुए,
बाल हाथ से ही सही, पर संवारे हुए,
कपड़े जितना हो सके उतने सलीके से।
राहुल स्टूल साफ कर रहा था।
आकाश पानी भरने के लिए कनस्तर लेकर जा रहा था।
विक्रम देगची के पास खड़ा मदद कर रहा था –
“अम्मा, यह रख दूं?”
“अम्मा, ये चूल्हा मैं जला दूं?”
उन्हें देखकर
कमल देवी के दिल में
एक अजीब-सा सुकून उतरा।
ऐसा सुकून जो सुंदर भी होता है,
और थोड़ा खतरनाक भी –
क्योंकि इंसान फिर अकेलेपन की आदत भूलने लगता है।
ग्राहक आने लगे।
किसी ने चाय मांगी,
किसी ने रोटी-सब्ज़ी।
कुछ लोगों ने इन बच्चों की तरफ
जिज्ञासु नजरों से देखा –
“यह कौन हैं?
क्यों ठेले पर हैं?”
लेकिन ठेला साफ-सुथरा था,
खाना स्वादिष्ट,
सब कुछ व्यवस्थित।
किसी ने खुलकर कुछ नहीं कहा।
लेकिन नजरें,
खासकर मोहनलाल की नजरें,
अब अक्सर उधर टिकने लगीं।
सड़क के उस पार,
दीवार से टिककर,
पान मुंह में दबाए,
मोहनलाल उन्हें देखता रहता –
जैसे कोई गिनती कर रहा हो।
“उसे मत देखो।”
कमल देवी ने धीरे से कहा।
आकाश ने सिर हिलाया,
पर विक्रम की आंखों की सख्ती बता रही थी –
कि वह उस आदमी को भूल नहीं सकता।
6. शिकायत, फाइल और लॉकेट वाला निशान
दोपहर के बाद,
धूप और तेज हो गई।
सड़क पर रफ्तार धीमी पड़ गई।
तभी मोहनलाल आखिरकार
ठेले के पास आ ही गया।
इस बार अकेला नहीं था –
दो लोग साथ थे –
एक के हाथ में फाइल,
दूसरे के पास वायरलेस।
“कमल देवी…”
मोहनलाल ने बनावटी मुस्कान के साथ कहा,
“आजकल बड़ा बिज़ी लग रही हो…”
कमल देवी ने हाथ पोंछते हुए कहा –
“काम है।”
मोहनलाल की नज़र
बच्चों पर टिक गई।
“ये कौन हैं?”
“बच्चे हैं… मदद कर रहे हैं।”
“मदद?
ये फुटपाथ है – आश्रम नहीं।”
फाइल वाला आदमी कागज़ खोलने लगा,
जैसे पहले से तैयार स्क्रिप्ट पढ़ रहा हो।
“हमें शिकायत मिली है –
रास्ते में रुकावट,
और सफाई को लेकर।”
शिकायत –
कमल देवी का दिल एक पल को डूब गया।
शिकायत अक्सर
समस्या की शुरुआत होती है,
समाधान की नहीं।
“मेरा ठेला साफ है…
मैं बरसों से यहां हूं।”
वायरलेस वाला बोला –
“यह हम तय करेंगे।”
राहुल ने अनायास मुट्ठी भींच ली।
विक्रम एक कदम आगे बढ़ा,
लेकिन कमल देवी की नज़र ने उसे रोक दिया।
मोहनलाल ने भीड़ की तरफ देखा –
“देख रहे हो?
पहले खाना बांटती हैं,
फिर ऐसे बच्चे इकट्ठा हो जाते हैं।
फिर अगर चोरी-चकारी हो गई तो
सब रोते हैं।”
“हम चोरी नहीं करते!”
विक्रम से अब सहा नहीं गया।
चारों ओर हल्का सन्नाटा छा गया।
मोहनलाल मुस्कुराया –
“ओह, बोलना भी सीख गए…
तो ज़रा जेबें दिखाओ।”
बस,
कमल देवी आगे बढ़ीं –
“ये बच्चे हैं… अपराधी नहीं।”
वायरलेस वाला बोला –
“शक हो तो जांच हमारा अधिकार है।”
तभी उसकी नज़र
आकाश के गले में चमकते लॉकेट पर पड़ी।
वह एक सेकंड के लिए रुक गया।
“ये निशान…” उसने बुदबुदाया।
मोहनलाल तुरंत चौकन्ना हो गया –
“कौन सा निशान?”
“कुछ नहीं।”
वायरलेस वाले ने बात संभालने की कोशिश की,
लेकिन देर हो चुकी थी।
मोहनलाल की आंखों में
अब एक नई चमक थी –
जिज्ञासा और लालच की मिली-जुली।
कमल देवी समझ गईं –
खतरा अब सिर्फ
“शिकायत” और “फुटपाथ” तक सीमित नहीं रहा।
किसी ने कुछ पहचान लिया है –
और सड़क पर पहचाना जाना
या तो बचा देता है, या…
पूरी तरह गायब कर देता है।
7. सरकारी गाड़ी, चाइल्ड वेलफेयर और “हम अलग नहीं होंगे”
दोपहर के बाद
सड़क के शोर में
एक अजीब-सी बेचैनी घुल गई।
तीनों बच्चे चुपचाप काम कर रहे थे,
लेकिन यह आम चुप्पी नहीं थी –
हर गाड़ी पर नजर जाती,
हर अजनबी चेहरे पर शक होता।
कुछ देर बाद
एक सफेद सरकारी गाड़ी
धीरे से आकर रुकी।
उसके पीछे एक पुलिस जीप।
ना सायरन,
ना हॉर्न –
सब कुछ “नॉर्मल” लगने की कोशिश,
पर कमल देवी का दिल बताता था –
इस तरह की “नॉर्मल” एंट्री
अक्सर “मामले” लेकर आती है।
गाड़ी से
दो लोग और एक औरत उतरी।
औरत के गले में आईडी कार्ड,
हाथ में फाइल।
पुलिस वाला पीछे रहता हुआ।
औरत ने सीधे आकर कहा –
“कमल देवी जी?
हमें सूचना मिली है कि यहां
नाबालिग बच्चे असुरक्षित हालत में हैं।
हमें पुष्टि करनी है।”
“ये बच्चे मेरे साथ हैं।”
कमल देवी ने हिम्मत जुटाकर कहा।
“यहां काम कर रहे हैं।”
औरत ने बच्चों को देखा।
“नाम?”
“राहुल…
आकाश…
विक्रम।”
तीनों एक-दूसरे के पास सटे हुए खड़े थे।
“कोई अभिभावक?”
एक पल की खामोशी।
“हम एक साथ रहते हैं।”
आकाश ने धीमी आवाज़ में कहा।
औरत ने फाइल बंद कर दी।
“हमें इन्हें
चाइल्ड वेलफेयर के तहत
ले जाना होगा।
यही प्रक्रिया है।”
कमल देवी का सीना भारी हो गया।
“अलग-अलग तो नहीं करोगे?”
उनके मुंह से अपने-आप निकल गया।
औरत ने कहा –
“ये मेरे हाथ में नहीं।
नियम है।”
विक्रम चिल्ला पड़ा –
“हम अलग नहीं होंगे!”
पुलिस वाला आगे बढ़ा –
“शोर मत करो।”
कमल देवी तुरंत
विक्रम के सामने खड़ी हो गईं –
जैसे ढाल बन गई हों।
“ये बच्चे हैं…
डरे हुए हैं।”
उसी पल
औरत की नज़र फिर से लॉकेट पर पड़ी।
उसने फाइल खोली,
एक कागज निकाला।
उस पर वही तीन जुड़े हुए गोले बने थे।
उसका लहजा बदल गया –
“ये बच्चे पहले भी दर्ज हो चुके हैं।
हमें इन्हें
हिफ़ाज़ती हिरासत में लेना होगा।”
कमल देवी के पैरों तले
जमीन खिसक गई।
“मैं साथ चलूंगी।
मैं इन्हें अकेला नहीं छोड़ूंगी।”
“आप आ सकती हैं,
फैसला नहीं रोक सकतीं।”
राहुल ने
कमल देवी का आंचल पकड़ा –
“अम्मा…
आप हमें छोड़ देंगी?”
उनकी आंखों में
आंसू छलक आए,
पर उन्होंने खुद को संभाला –
“नहीं…
मैं कहीं नहीं जा रही।”
तीनों को
गाड़ी में बैठाया गया –
कम-से-कम अभी के लिए
एक साथ।
कमल देवी भी उनके साथ बैठ गईं।
गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ,
गाड़ी चल पड़ी।
खिड़की से बाहर देखा –
मोहनलाल सड़क पर खड़ा था,
मंद-सी मुस्कान के साथ।
ठेला,
खाली स्टूल,
ठंडी देगची –
सब पीछे छूटते जा रहे थे।
कमल देवी के मन में
एक ही ख्याल गूंज रहा था –
“ये सुरक्षा नहीं…
ये जुदाई है।”
8. कागज़ी दफ्तर, बंद दरवाजे और तीन खोए हुए नाम
आगे के दिन धुंधले थे।
कागज़ों से भरे दफ्तर,
लंबी कतारें,
हर काउंटर पर नई शक्ल,
हर शक्ल पर वही सवाल –
“आप परिवार नहीं हैं,
हम जानकारी नहीं दे सकते।”
यह एक वाक्य
उनके भीतर उतरता गया –
जैसे किसी ने उनके चारों तरफ
अदृश्य दीवार खड़ी कर दी हो।
पहले हफ्ते
वह रोज़ दफ्तर जाती रहीं।
कभी सुबह सवेरे,
कभी दोपहर में,
कभी शाम को।
कभी कहा गया –
“फाइल आगे भेज दी गई है।”
कभी –
“सिस्टम डाउन है।”
वह हर बार
एक ही बात कहतीं –
“राहुल… आकाश… विक्रम…
इनके बारे में बताइए।”
नाम कागज़ों में नहीं मिलते थे।
केवल नंबर, कोड,
और “प्रोसीजर”।
धीरे-धीरे
उन पर हकीकत साफ हुई –
यह जुदाई
एक रात की नहीं,
बल्कि एक लंबा, अनदेखा रास्ता है।
ठेला फिर से लगने लगा –
क्योंकि पेट भी तो भरना था।
लेकिन अब ठेला पहले जैसा नहीं रहा।
जब वह दाल चलातीं,
तो हाथ रुक जाता।
रोटी सेकतीं,
तो एक रोटी ज्यादा बन जाती –
बिना सोचे ही।
कई बार
वह तीनों स्टूल
अनजाने में पास-पास रख देतीं।
फिर खुद चौककर
उन्हें दूर कर देतीं –
जैसे कोई उन्हें देख रहा हो
और कह देगा –
“ये जगह सिर्फ ग्राहकों के लिए है,
तुम्हारे सपनों के लिए नहीं।”
मोहल्ले ने
दो-चार दिन बातें की –
“बच्चों को उठाकर ले गए…
अच्छा हुआ।
मुसीबत बनते।”
कुछ ने
दूर से सहानुभूति जताई –
“बेचारी अम्मा…”
लेकिन दूरी नहीं घटी।
मोहनलाल अब
अक्सर नज़र आने लगा –
कभी परमिट की बात,
कभी हेल्प के नाम पर वसूली।
कमल देवी देती रहीं –
क्योंकि जब इंसान
पहले ही सबसे बड़ा नुकसान
झेल चुका हो,
तो बाकी छोटी चीजें बचाने के लिए
बहुत कुछ मान लेता है।
9. बरसों बाद – एक दिन, तीन गाड़ियां
समय बीतता गया।
एक साल,
फिर दूसरा।
उनके बाल और सफेद हो गए।
कमर थोड़ी और झुक गई।
हाथों की दरारें गहरी हो गईं।
कुछ पुराने ग्राहक
दुनिया छोड़ गए,
नए लोग आए –
जो उन्हें बस एक
“बूढ़ी ठेले वाली” के रूप में जानते थे,
किसी कहानी के रूप में नहीं।
उनके छोटे-से कमरे में
एक डिब्बा था –
जिसमें तीन चीजें रखीं थीं –
दाल से दागदार एक नैपकिन
एक छोटा-सा प्लास्टिक का चम्मच
और एक कागज –
राहुल की बनाई हुई तस्वीर –
जिसमें ठेला था
और उसके सामने तीन
टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों से बने बच्चे।
उन्होंने वो कागज
मोड़ा हुआ रख छोड़ा था –
जैसे कोई ख़त
जिसे पढ़ा नहीं जा सकता,
लेकिन फेंका भी नहीं जा सकता।
कभी-कभी कोई पूछ लेता –
“अम्मा, वो बच्चे याद आते हैं?”
वह जवाब नहीं देतीं।
बस सड़क की तरफ देखने लगतीं –
क्योंकि कुछ यादें
जुबान पर आते ही
कमज़ोर हो जाती हैं।
फिर,
एक बिल्कुल साधारण-सा दिन।
धूप तेज थी,
हवा में तेल और आटे की मिली-जुली खुशबू।
वह दाल चला रहीं थीं
कि अचानक सड़क हिली-सी महसूस हुई –
एक गहरी, भारी इंजन की आवाज़ –
जो इस सड़क के शोर से अलग थी।
उन्होंने पहले नहीं देखा।
जब जमीन हल्की-सी काँपी,
तब सिर उठाया।
तीन चमचमाती गाड़ियां
सड़क पर आकर रुकी थीं।
उनके हाथ से चम्मच
हल्का-सा फिसल गया।
दिल में वही पुरानी घबराहट –
“फिर कोई मामला? फिर कोई अधिकारी?”
लेकिन इस बार
घबराहट के साथ-साथ
एक हल्का-सा एहसास भी था –
जैसे समय का एक चक्र
पूरा होने वाला हो।
10. “हम वहीं हैं…” – तीन लॉकेट, तीन बेटे लौट आए
तीनों गाड़ियों के दरवाज़े खुले।
तीन आदमी उतरे –
कपड़े सादे,
पर महंगे और सधे हुए।
चाल में आत्मविश्वास,
चेहरों पर जिंदगी के
कई फैसलों की छाप।
वे सीधे
ठेले की तरफ बढ़े –
जैसे रास्ता अच्छी तरह जानते हों।
कमल देवी का दिल जोरों से धड़कने लगा।
कोई नाम याद नहीं आ रहा था,
पर भीतर कुछ कह रहा था –
“ध्यान से देखो…”
वे सामने आकर रुके।
कुछ पल की खामोशी।
तीनों ने
ठेले को,
देगची को,
स्टूलों को,
और फिर कमल देवी को
बहुत ध्यान से देखा –
जैसे किसी तस्वीर से
असली चेहरा खोज रहे हों।
“आप… कमल देवी हैं?”
बीच वाले ने आदर भरी आवाज़ में पूछा।
“जी।”
कमल देवी ने हां में सिर हिलाया।
तीनों ने एक-दूसरे को देखा।
बाईं तरफ वाले ने
जेब से एक छोटी-सी चीज निकाली –
लॉकेट –
तीन जुड़े हुए गोल छल्ले।
कमल देवी की आंखों के सामने
आकाश का सीना,
और उस पर वही लॉकेट उभर आया।
उसने कहा –
“हम… वहीं हैं।”
जमीन जैसे हल्की-सी
डगमगा गई।
“क… कौन?”
उनके होठ हिले,
आवाज़ नहीं निकल पाई।
बीच वाला आगे बढ़ा –
“राहुल।”
दाईं तरफ वाले ने कहा –
“आकाश।”
बाईं तरफ वाले ने
हल्की-सी सख्त मुस्कान के साथ कहा –
“विक्रम।”
तीनों नाम
हवा में गूंजे।
कमल देवी के कानों में नहीं,
सीधे दिल में उतर गए।
उनकी आंखें भर आईं।
सालों पुरानी तस्वीर,
तिनके जैसे पतले शरीर,
फटी हुई चप्पलें,
अब इन युवा चेहरों में मिल गए।
उन्होंने कांपते हाथों से
ठेले का किनारा पकड़ा –
ताकि गिर न जाएं।
11. “आपने हमें छोड़ा नहीं था…” – सच्चाई का कागज
“हमने आपको बहुत खोजा, अम्मा।”
राहुल ने नरमी से कहा।
अब उसकी आवाज़ में
मर्द की गहराई थी,
लेकिन उस दिन वाला
लड़के वाला कंपकंपाहट भी कहीं छुपी थी।
“हमें बताया गया था कि
आपने हमें छोड़ दिया था…
कोई मिलने नहीं आया।”
आकाश ने कहा,
आंखें झुका कर।
“लेकिन हमको भरोसा नहीं आया।”
विक्रम बोला।
“क्योंकि जिस दिन आपने
हमें पहली बार खाना दिया था…
वो छोड़ने का दिन हो ही नहीं सकता।”
कमल देवी रो पड़ीं।
आंसू गालों पर बहने लगे,
पर उन्हें परवाह नहीं थी।
“मैं आई थी…
रोज़ आई…
हर कमरे, हर दफ्तर में
तुम्हारे नाम पूछे।”
राहुल ने जेब से
एक कागज़ निकाला –
पुराना, मोड़ा हुआ।
“हमें पता है, अम्मा।”
उसने कहा।
“यह हमारी फाइल में था।
आपके दस्तख़त…
जिस दिन आपने
हमें ढूंढने की कोशिश की थी।”
कागज पर
सरकारी मुहर,
कुछ टाइप किए हुए शब्द,
और नीचे
थोड़ी टेढ़ी,
थोड़ी हिचकती हुई,
लेकिन साफ़ –
“कमल देवी”।
यह कागज़
उनके लिए सबूत था –
कि वह खामोश नहीं रहीं,
उन्होंने कोशिश की थी।
आसपास लोग इकट्ठा हो गए थे।
कोई फुसफुसा रहा था –
“क्या हो रहा है?”
“ये कौन हैं?”
लेकिन कमल देवी के लिए
उस वक्त कोई और
मौजूद ही नहीं था।
12. “आज दूसरों के लिए लड़ना है” – सच का मोर्चा
“अब तुम कहां हो?”
उन्होंने हिचकते हुए पूछा।
आकाश ने संक्षिप्त जवाब दिया –
“अब हम अपने पैरों पर खड़े हैं, अम्मा।
पढ़े भी हैं, काम भी करते हैं…
और एक काम और कर रहे हैं।”
“कौन सा?”
विक्रम ने कहा –
“ताकि जो हमारे साथ हुआ,
वो किसी और बच्चे के साथ न हो।”
तीनों के पीछे खड़ी
चमचमाती गाड़ियां,
चेहरों पर आत्मविश्वास,
हाथ में फाइलें –
ये सब बता रहे थे
कि वे अब सिर्फ
“बचे हुए अनाथ” नहीं,
बल्कि लड़ने वाले युवा बन चुके हैं।
इसी बीच
मोहनलाल जैसा एक आदमी –
यहां उसे “शर्मा जी” कहते थे –
फाइलें लेकर
आगे बढ़ा।
“यह सब तमाशा क्या है?”
उसने ऊंची आवाज़ में कहा।
विक्रम ने उसकी तरफ देखा –
“तमाशा तब होता है
जब सच छुपाया जाए।
आज हिसाब होगा।”
शर्मा जी हंसा –
“कौन सा हिसाब?
एक बूढ़ी ठेला वाली,
तीन लड़के,
तीन गाड़ियां –
ड्रामा बहुत देख लिया हमने।”
आकाश ने
कमल देवी की तरफ इशारा कर कहा –
“यही अम्मा…
बरसों से आपको
हर महीने पैसे देती रही हैं –
‘फीस’ के नाम पर।
बिना रसीद,
बिना कानून।”
भीड़ में हलचल हुई –
“फीस?”
“किस बात की?”
राहुल ने मोबाइल निकाला –
“हम शोर मचाने नहीं आए…
सबूत के साथ आए हैं।”
उसने स्क्रीन पर
पेमेंट्स दिखाए –
तारीखें, रकम,
ऑडियो रिकॉर्डिंग।
एक वॉइस नोट चलाया –
“पैसे दे दीजिए,
वरना कल इंस्पेक्शन भेजना पड़ेगा…”
सन्नाटा।
शर्मा जी का चेहरा
फक पड़ गया।
“ये नकली है!”
उसने लगभग चीख कर कहा –
“आजकल कोई भी आवाज़ बना सकता है।”
उसी समय
पीछे से एक मजबूत आवाज़ आई –
“हम जांच करेंगे।”
सबने मुड़कर देखा –
एक वरिष्ठ अधिकारी
टीम के साथ खड़ा था।
“हमें लिखित शिकायत मिली है,
सबूतों के साथ।”
शर्मा जी के चेहरे से
रंग उड़ गया।
अफसर ने कहा –
“गलतफहमी तब होती है
जब कागज़ हो,
रसीद हो।
यहां तो पैटर्न है।”
कमल देवी ने
कांपते हुए कहा –
“मैंने दिए हैं पैसे…
डर के मारे…
क्योंकि अगर न देती
तो मेरा ठेला बंद करवा देते।”
भीड़ के दिल में
यह वाक्य सीधा उतर गया।
एक सब्ज़ी वाला आगे आया –
“मुझसे भी लेते रहे हैं।
रसीद कभी नहीं दी।”
फिर चाय वाला,
फिर फल वाला –
एक-एक करके
आवाज़ें उठने लगीं।
ये शिकायतें नहीं थीं –
ये बरसों की दबी हुई आवाजें थीं।
अफसर ने नोट्स लिए –
“आज से इस इलाके में
कोई गैरकानूनी वसूली नहीं होगी।
और जो हुआ है,
उसकी पूरी जांच होगी।”
शर्मा जी को
कर्मचारियों ने आगे बढ़ाया।
कोई हथकड़ी नहीं,
कोई नाटक नहीं –
बस एक खामोश पतन।
कमल देवी ने आंखें बंद कर लीं।
उन्हें खुशी नहीं थी,
ना बदला लेने का अहसास।
बस एक बोझ था
जो बरसों से सीने पर रखा था,
आज धीरे-धीरे उतर रहा था।
राहुल ने धीरे से
उनके कंधे पर हाथ रखा –
“अम्मा…
आपने पहला कदम उठाया था।
इसीलिए हम भी चल पाए।”
विक्रम ने भीड़ की तरफ देखा –
“अगर आज सच बोलना
मुश्किल लगता है,
तो कल जीना
और मुश्किल हो जाएगा।”
आकाश ने अपने लॉकेट को पकड़ा –
“हमें अलग किया गया था…
लेकिन सच
हमें वापस यहां ले आया।”
कमल देवी की आंखों में
आंसू थे –
इस बार डर के नहीं,
बल्कि हल्के होने के।
13. “अम्मा का ठेला” – एक नाम, जो भूख से बड़ा हो गया
भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी।
अफसर अपनी टीम के साथ चला गया।
शर्मा जी ले जाए गए।
सड़क,
जो बरसों तक
खामोश तमाशबीन रही थी,
आज पहली बार
कुछ सीखकर लौटी थी।
शाम ढलने लगी।
हल्की ठंडक उतर आई।
तीनों युवक अब भी
ठेले के पास खड़े थे।
“हमें अब जाना होगा, अम्मा।”
राहुल ने नरमी से कहा।
कमल देवी चौंकी –
“कहां?”
सवाल ज़ुबान पर आते ही
उन्हें खुद डर लगा –
“कहीं ये सब सपना तो नहीं?
कहीं ये भी चले गए तो?”
आकाश ने मुस्कुराकर कहा –
“हम वापस आएंगे…
लेकिन आज नहीं।
आज आपको आराम की ज़रूरत है।”
विक्रम ने
ठेले के एक कोने को
सीधा किया –
जैसे कुछ पुराना कर्ज़ चुका रहा हो।
“और एक बात…
अगर आप इजाज़त दें तो…”
“क्या?”
“हम चाहते हैं कि
यह ठेला अब
आपके नाम से जाना जाए।”
“किस नाम से?”
राहुल ने मुस्कुराकर कहा –
“‘अम्मा का ठेला’।”
“अम्मा” –
यह शब्द
फुटपाथ की हवा में ठहर गया।
कमल देवी कुछ पल चुप रहीं।
फिर बहुत धीमे से सिर हिलाया –
“अगर इस नाम से
किसी भूखे का पेट भर जाए…
तो मेरे लिए
इतना ही काफी है।”
तीनों उनके पास आए।
ना कोई औपचारिकता,
ना कोई बड़े वादे।
बस खामोशी में
एक समझ –
कि यह रिश्ता
कागज़ पर लिखा नहीं,
दिल पर लिखा गया है।
“जहां भी रहो…”
उन्होंने कहा,
“सही बने रहना।”
राहुल ने मुस्कुराकर जवाब दिया –
“यही तो आपने हमें सिखाया था, अम्मा।”
तीनों गाड़ियों की ओर चले गए।
गाड़ियां धीरे-धीरे
सड़क से बाहर हो गईं –
बिना शोर,
बिना हॉर्न –
जैसे आए थे,
वैसे ही गरिमा के साथ।
कमल देवी ने
ठेला समेटा।
आज उन्होंने
पैसों की गिनती नहीं की।
सीधे घर की तरफ चल पड़ीं।
उनका छोटा-सा कमरा,
जो बरसों तक
सिर्फ “सोने की जगह” था,
आज उन्हें
घर जैसा लगा।
14. अंत नहीं, शुरुआत – डर के बिना ठेला
अगली सुबह
मोहल्ले के कुछ बच्चे
ठेले के पास जमा थे।
एक नया बोर्ड लगा था –
सादा,
बिना चमक,
पर साफ़ –
“अम्मा का ठेला”
कमल देवी ने
चूल्हा जलाया,
देगची चढ़ाई,
पहला कटोरा भरा।
एक बच्चे को दिया –
“आराम से खाना…
जल्दी नहीं है।”
वह हल्के से मुस्कुराई।
इस बार मुस्कान
चेहरे पर टिक गई,
भागी नहीं।
कुछ ही हफ्तों में
इलाके में
नियमित परमिट जारी हो गए।
किसी से “फीस” नहीं मांगी गई,
कोई छिपी धमकी नहीं,
कोई अनौपचारिक वसूली नहीं।
लोग अब
सवाल पूछते थे,
और
जवाब मिलते थे।
कुछ समय बाद
एक दूसरी बूढ़ी औरत
ठेले पर आई,
चुपचाप बैठ गई।
कहा –
“तुम्हारी वजह से
मैंने भी बोलना सीख लिया।”
उस दिन
कमल देवी ने समझ लिया –
उनकी कहानी
सही जगह पर
खत्म नहीं,
बल्कि पूरी हुई है।
सीख
कुछ कहानियां
दौलत से शुरू नहीं होतीं।
कुछ के अंत में
ताली, इनाम, पुरस्कार नहीं होते।
कुछ घर
दीवारों से नहीं,
इंसानियत से बनते हैं।
कमल देवी के पास
ना पैसा था,
ना ताकत,
ना ओहदा।
फिर भी
उन्होंने तीन भूखे,
बेघर बच्चों को
अम्मा कहने लायक
एक ठिकाना दिया।
और बरसों बाद
वही बच्चे
लौटकर आए –
सिर्फ धन्यवाद कहने नहीं,
बल्कि उस सिस्टम से
लड़ने,
जो उन्हें कभी
छीनकर ले गया था।
कभी अगर
आपको शहर की किसी सड़क पर
कोई बूढ़ी औरत
ठेला लगाते दिखे,
या कोई गरीब आदमी
किसी बच्चे को
एक कटोरा खाना दे दे,
तो जल्दी-जल्दी
उसे “मुसीबत” कहकर
मत गुजर जाइए।
हो सकता है,
वही किसी के लिए
पूरी दुनिया हो –
जैसे
“अम्मा का ठेला”
राहुल, आकाश और विक्रम के लिए
हमेशा रहेगा।
समाप्त।
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