मास्टरजी ने देखा कि उनका गरीब टॉपर छात्र अब चाय बेच रहा है… फिर उन्होंने जो किया…

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“मास्टरजी ने देखा कि उनका गरीब टॉपर छात्र अब चाय बेच रहा है… फिर उन्होंने जो किया…”

गुरु और शिष्य की अनमोल कहानी

कहते हैं कि नसीब की लकीरें इंसान के माथे पर नहीं, बल्कि वक्त के हाथों में होती हैं। कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां हमारी काबिलियत और हमारी हकीकत के बीच जमीन-आसमान का फर्क होता है।

यह कहानी बनारस के एक छोटे से मोहल्ले की है, जहां के एक साधारण गणित के शिक्षक रमाशंकर उपाध्याय ने अपने जीवन के 40 साल बच्चों को पढ़ाने में बिता दिए। वह हमेशा कहते थे, “मेहनत का कलम घिसो, तकदीर खुद-ब-खुद बदल जाएगी।”

रमाशंकर जी सेवानिवृत्त हो चुके थे। लेकिन आज भी जब वह अपनी पुरानी साइकिल पर बाजार से गुजरते, तो उनके पढ़ाए हुए कई बच्चे, जो अब डॉक्टर, इंजीनियर और बड़े सरकारी अफसर बन चुके थे, उन्हें झुककर प्रणाम करते। यही उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी थी।

एक सर्द शाम और चाय की टपरी

दिसंबर की एक सर्द शाम थी। रमाशंकर जी अपनी पेंशन के कागज सही करवाने के लिए शहर के कचहरी इलाके में गए थे। पूरा दिन सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते उनके घुटनों में दर्द होने लगा था। ठंड बढ़ रही थी और कोहरा धीरे-धीरे शहर को अपनी चादर में लपेट रहा था।

थकान मिटाने के लिए उन्होंने सड़क किनारे एक चाय की छोटी सी दुकान देखी। चाय की महक ने उन्हें वहां रुकने पर मजबूर कर दिया।

उन्होंने अपनी मफलर को कसते हुए सोचा, “एक कप अदरक वाली चाय मिल जाए तो शरीर में थोड़ी गर्माहट आ जाएगी।”

वह दुकान के पास पहुंचे। वहां एक युवक बड़ी फुर्ती से गिलास धो रहा था और साथ ही चाय छान रहा था। उसने पुरानी, फटी हुई जर्सी पहन रखी थी। भाप के कारण उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

रमाशंकर जी ने बेंच पर थोड़ी जगह बनाई और बैठते हुए कहा, “बेटा, एक कड़क अदरक वाली चाय देना। चीनी कम रखना।”

युवक का हाथ एक पल के लिए रुक गया। वह आवाज… वह जानी-पहचानी रबदार आवाज… उसकी पीठ रमाशंकर जी की तरफ थी, लेकिन वह समझ चुका था कि यह आवाज किसकी है। उसने अपना चेहरा छिपाने के लिए पीठ फेर ली।

गुरु और शिष्य का सामना

जब वह युवक कांपते हाथों से चाय का गिलास लेकर रमाशंकर जी के पास आया, तो उसकी नजरें जमीन पर गड़ी हुई थीं। जैसे ही उसने गिलास मेज पर रखा, रमाशंकर जी ने उसके हाथ को गौर से देखा। उसकी उंगलियों में अब पेन की जगह चाय के जलने के निशान थे।

रमाशंकर जी की आंखें चमक उठीं। उन्होंने तुरंत कहा, “सोमेश?”

यह नाम सुनते ही युवक का हाथ रुक गया। उसने घबराकर ऊपर देखा। उसकी आंखें मास्टरजी से मिलीं।

यह वही सोमेश था, जो दस साल पहले पूरे जिले का टॉपर बना था। वही सोमेश, जिसने 99% अंक लाकर पूरे स्कूल का नाम रोशन किया था। जिस पर रमाशंकर जी को इतना गर्व था कि उन्होंने पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी थी।

लेकिन आज वही सोमेश, कलेक्टर की कुर्सी पर बैठने के बजाय सड़क किनारे चाय बेच रहा था।

गुरु का दिल बैठ गया

रमाशंकर जी का दिल बैठ गया। उनके हाथ से लाठी छूटकर जमीन पर गिर गई। जिस छात्र के भविष्य की मिसालें वह आज भी अपने नए छात्रों को देते थे, उसे इस हालत में देखकर उनके अंदर का शिक्षक जैसे मर गया।

माहौल में एक अजीब सी खामोशी छा गई। सोमेश की आंखें भर आईं, लेकिन उसने अपने आंसुओं को रोक लिया। वह वहां से भाग जाना चाहता था।

“बाबूजी, शायद आपको कोई गलतफहमी हुई है। मैं सोमेश नहीं हूं,” उसने झूठ बोलने की कोशिश की।

लेकिन रमाशंकर जी ने उसकी कलाई कसकर पकड़ ली।

“गलतफहमी मुझे नहीं, शायद जमाने को हो सकती है। मैंने तुम्हें शून्य से अनंत तक का सफर सिखाया है। एक पिता अपने बेटे को भूल सकता है, लेकिन एक गुरु अपने सबसे होनहार शिष्य को कभी नहीं भूल सकता।”

सोमेश अब और झूठ नहीं बोल सका। वह रमाशंकर जी के पैरों में गिर गया और फूट-फूट कर रोने लगा।

सोमेश की कहानी

कुछ देर बाद जब सोमेश के आंसू थमे, तो रमाशंकर जी ने उसे एक बेंच पर बैठाया।

“बता, यह सब कैसे हुआ? तेरी स्कॉलरशिप, तेरी इंजीनियरिंग, तेरे सपने सब कहां गए?”

सोमेश ने भारी आवाज में कहना शुरू किया, “गुरुजी, किताबों के सवाल हल करना आसान था, लेकिन जिंदगी के सवाल बहुत कठिन निकले। फाइनल ईयर में पिताजी को दिल का दौरा पड़ा और वह चल बसे। घर की सारी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। डिग्री तो डिस्टिंक्शन के साथ मिल गई, लेकिन नौकरी के लिए रिश्वत मांगी गई। प्राइवेट कंपनियों ने अनुभव न होने का बहाना बनाकर नौकरी देने से मना कर दिया। इसी भागदौड़ में मां बीमार हो गईं। उनकी किडनी खराब हो गई। इलाज के लिए खेत और घर गिरवी रखना पड़ा। आखिर में मैंने अपनी डिग्रियां बक्से में बंद कर दीं और यह चाय की दुकान खोल ली।”

सोमेश की कहानी सुनकर रमाशंकर जी सन्न रह गए। उनकी आंखों में आंसू थे।

गुरु का त्याग

रमाशंकर जी ने अपनी जेब से वह मोटा लिफाफा निकाला, जिसमें पिछले छह महीने की पेंशन और ग्रेच्युटी का पैसा था।

“यह लो, इलाज के लिए जितना चाहिए, इसमें है।”

सोमेश ने मना किया, “गुरुजी, यह आपकी जिंदगी भर की कमाई है। मैं इसे नहीं ले सकता।”

लेकिन रमाशंकर जी ने डांटते हुए कहा, “यह भीख नहीं है, सोमेश। यह एक गुरु का अपने शिष्य पर विश्वास है। इसे रख ले। यह मेरा आदेश है।”

सोमेश की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने लिफाफा लेकर अपने सीने से लगा लिया।

सोमेश की मेहनत

सोमेश ने मां का ऑपरेशन करवाया। ऑपरेशन सफल रहा। लेकिन उसने तय कर लिया कि वह हार नहीं मानेगा।

उसने चाय की दुकान अपने दोस्त को सौंप दी और सिविल सर्विसेज की तैयारी में जुट गया। किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे, तो वह रद्दी की दुकानों से पुरानी किताबें लाता और स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ाई करता।

लोग उसका मजाक उड़ाते। “देखो, चाय वाला अब कलेक्टर बनेगा।” लेकिन सोमेश ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया।

सोमेश की सफलता

दो साल बाद, सोमेश ने यूपीएससी की परीक्षा में टॉप किया। उसकी पोस्टिंग उसी जिले में डीएम के रूप में हुई।

उसने सबसे पहले अपने गुरु रमाशंकर जी को ढूंढा।

गुरु का सम्मान

सोमेश नीली बत्ती वाली गाड़ी में रमाशंकर जी के घर पहुंचा। उसने अपने गुरु को साष्टांग प्रणाम किया और कहा, “गुरुजी, आपने कहा था कि एक दिन मैं लाल बत्ती वाली गाड़ी में आऊंगा। देखिए, आज मैं आ गया।”

सोमेश ने रमाशंकर जी को सरकारी आवास में रहने का न्योता दिया। “अब आप मेरे साथ रहेंगे। यह मेरा आदेश है।”

गुरु दक्षिणा

अगले दिन, सोमेश ने अपने पहले आदेश में सभी सेवानिवृत्त शिक्षकों की रुकी हुई पेंशन और एरियर को तुरंत जारी करने का आदेश दिया।

रमाशंकर जी की आंखों में आंसू थे। उन्होंने सोमेश को गले लगाया और कहा, “आज मेरा जीवन सफल हो गया।”

एक नई इबारत

यह कहानी सिर्फ एक गुरु और शिष्य की नहीं, बल्कि उस विश्वास की है, जो इंसान को हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देता है।

“शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पीता है, वह दहाड़ता है।”

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