सड़क किनारे भीख माँगने वाले बच्चे की कहानी – इंसानियत का आलम

दिल्ली की भीड़भाड़ भरी सड़कों पर हर दिन लाखों लोग अपनी मंज़िल की ओर भागते हैं। किसी के हाथ में मोबाइल होता है, किसी के सिर पर काम का बोझ, किसी के मन में चिंता, किसी के चेहरे पर नकली मुस्कान। उसी सड़क के एक किनारे, ट्रैफिक के शोर के बीच, एक छोटा-सा बच्चा बैठा करता था — उसका नाम था वीर। उम्र होगी मुश्किल से आठ साल। उसके नंगे पैर मिट्टी से सने रहते, फटी हुई कमीज़ हवा में लहराती, और आंखों में एक ऐसी मासूमियत थी जो भूख, दर्द और बेबसी के बावजूद बुझी नहीं थी। वीर हर आने-जाने वाले को बड़ी उम्मीद से देखता। कभी हाथ फैलाकर कहता, “साहब, कुछ खाने को दे दो,” तो कभी चुपचाप उन लोगों को देखता जो अपनी चमचमाती कारों में बैठे उसकी तरफ नज़र तक नहीं डालते थे। लेकिन वीर के चेहरे पर फिर भी उम्मीद की हल्की सी चमक बनी रहती थी। जैसे वो कह रहा हो — “शायद आज कोई रुक जाएगा, शायद आज कोई दया दिखा देगा।”
मगर दोस्तों, वीर की ज़िंदगी हमेशा ऐसी नहीं थी। कुछ साल पहले वो भी एक छोटे से कमरे में अपने माता-पिता के साथ हंसी-खुशी रहता था। उसके पिता रमेश मजदूरी करते थे और मां लक्ष्मी घरों में बर्तन साफ करती थी। गरीब ज़रूर थे, लेकिन अपने बेटे के सपनों पर यकीन था। रमेश अकसर कहा करते — “वीर, तू पढ़ेगा, बड़ा आदमी बनेगा, हमें इस गरीबी से निकाल ले जाएगा।” लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। एक रात जब रमेश और लक्ष्मी मज़दूरी के बाद घर लौट रहे थे, एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी। दोनों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। उस वक्त वीर महज़ पाँच साल का था। कुछ पल में ही उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई। पड़ोसी कुछ दिन तक उसके खाने-पीने का इंतज़ाम करते रहे, लेकिन धीरे-धीरे सब अपने कामों में व्यस्त हो गए। किसी ने कहा, “हम कब तक इसे पालेंगे?” और एक दिन वीर सचमुच अकेला रह गया।
उस दिन से उसकी ज़िंदगी फुटपाथ की हो गई। वही उसका घर बन गया, वही उसका बिस्तर, वही उसकी किस्मत। वो कभी मंदिर के बाहर बैठता, कभी बस स्टैंड के पास। कभी किसी दुकान के कोने में सिकुड़कर सो जाता। पेट की आग बुझाने के लिए लोगों से भीख मांगता। कई बार दिनभर कुछ नहीं मिलता, तो कूड़े के ढेर से बासी रोटी उठाकर खाता। लेकिन जो बात सबसे हैरान करने वाली थी, वो ये कि उस सबके बावजूद उसने कभी शिकायत नहीं की। जब दूसरे बच्चे स्कूल जाते, वो दूर खड़ा होकर देखता और मुस्कुराता। शायद सोचता, “काश मैं भी पढ़ पाता।”
तीन साल बीत गए। अब वीर आठ साल का हो चुका था। उसकी आंखों में अनुभव की परिपक्वता आ गई थी, लेकिन दिल अब भी मासूम था। एक दिन दोपहर के वक्त वो सड़क किनारे बैठा था। धूप सिर पर थी और पेट में भूख। तभी उसने देखा, एक आदमी फोन पर बात करता हुआ उसकी तरफ आ रहा था। वो आदमी अच्छे कपड़े पहने था, कान में मोबाइल लगाए बहुत तेज़ बोल रहा था। वो था विक्रम — दिल्ली का नामी उद्योगपति। मगर उस वक्त वो इतना व्यस्त था कि उसे सड़क पर आती तेज़ रफ्तार कार का एहसास तक नहीं हुआ।
वीर पहले तो चुपचाप देखता रहा, फिर अचानक उसकी सांसें तेज़ हो गईं। उसे याद आया वो हादसा जिसने उसके माता-पिता की जान ली थी। उसने चिल्लाकर कहा, “साहब हट जाइए, गाड़ी आ रही है!” लेकिन विक्रम ने सुना नहीं। वीर बिना सोचे दौड़ा और उसे ज़ोर से धक्का दे दिया। अगले ही पल कार हवा की तरह उनके पास से गुजर गई। अगर वीर एक सेकंड भी देर करता, तो शायद विक्रम आज ज़िंदा नहीं होता।
विक्रम ज़मीन पर गिरा, उसका फोन टूट गया। वो गुस्से में बोला, “अरे तूने मुझे धक्का क्यों दिया?” लेकिन जब उसने पीछे मुड़कर देखा और कार को इतने करीब से निकलते देखा, तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया। उसने राहत की सांस ली और उसी बच्चे की ओर देखा जिसने उसकी जान बचाई थी। वीर डर से पीछे हट गया। वो सोच रहा था कि अब उसे डांट पड़ेगी। लेकिन विक्रम उसके पास आया, उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला — “बेटा, तुमने मेरी जान बचाई है। क्यों किया ऐसा?” वीर ने सिर झुकाकर कहा — “साहब, मेरे माता-पिता भी सड़क पर ऐसे ही मर गए थे। मैं नहीं चाहता था कि आपके बच्चों को भी वही दर्द मिले जो मुझे मिला।”
विक्रम के दिल में जैसे किसी ने चोट मारी। एक छोटा-सा बच्चा, जो खुद भूखा है, जिसने दुनिया से कुछ नहीं पाया, वो किसी और की जान बचाने की परवाह करता है! उसने पास की दुकान से खाना खरीदा और वीर को दिया। वीर कांपते हाथों से खाने लगा। हर निवाला ऐसे खाता जैसे ये किसी दावत का नहीं, ज़िन्दगी का तोहफ़ा हो। विक्रम ने देखा और उसकी आंखें नम हो गईं। उसे लगा — यह बच्चा गरीब नहीं है, यह तो अमीर है — दिल से, सोच से, और इंसानियत से।
विक्रम ने कहा — “बेटा, अब तुम मेरे साथ चलो।” वीर थोड़ा घबराया। उसके दिल में डर था, क्योंकि कई बार लोग उसे बहला-फुसलाकर ले गए थे और बाद में भगा दिया था। मगर विक्रम की आवाज़ में सच्चाई थी। वो धीरे-धीरे उठा और उसके साथ चल पड़ा। विक्रम उसे अपनी कार में लेकर अपने घर पहुंचा। वह घर किसी महल से कम नहीं था। बड़े गेट, बगीचे, झूमर और नौकर। वीर ने ऐसा घर पहले कभी नहीं देखा था। वह दरवाजे पर ठिठक गया। तभी विक्रम की पत्नी शालिनी बाहर आई। उसने देखा कि उसके पति के साथ एक गंदे, फटे कपड़ों वाला बच्चा खड़ा है। उसने हैरानी से पूछा — “विक्रम, यह कौन है?”
विक्रम ने पूरी कहानी सुनाई। शालिनी की आंखों में भी आंसू आ गए, लेकिन उसने झिझकते हुए कहा — “लेकिन विक्रम, यह तो सड़क का बच्चा है। लोग क्या कहेंगे?” विक्रम मुस्कुराया — “लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर अगर हम इंसानियत छोड़ देंगे तो फिर इंसान कहलाने का हक नहीं रहेगा। शालिनी, यह बच्चा अब हमारा बेटा होगा।” शालिनी कुछ पल चुप रही, फिर वीर के पास जाकर उसके सिर पर हाथ फेरा — “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?” “वीर,” उसने धीरे से कहा। शालिनी बोली — “वीर, अगर तुम चाहो तो यहीं रहो। तुम्हें हम अपने बेटे की तरह रखेंगे, पढ़ाएंगे, लिखाएंगे और वो सब देंगे जो एक मां अपने बच्चे को देती है।” वीर की आंखों में पानी भर आया — “क्या सच में? मुझे अब सड़क पर नहीं रहना पड़ेगा?” विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा — “नहीं बेटा, अब तुम्हारी नई ज़िंदगी शुरू होती है।”
उस रात पहली बार वीर ने छत के नीचे चैन की नींद सोई। पहली बार उसके सिर के नीचे तकिया था, ऊपर पंखा घूम रहा था, और पेट भरा हुआ था। उसने आंखें बंद कीं और मन ही मन कहा — “धन्यवाद, अल्लाह।” अगले दिन विक्रम ने उसका स्कूल में दाखिला करवा दिया। वीर ने पहली बार यूनिफॉर्म पहनी। आईने में खुद को देखकर मुस्कुराया — “अब मैं भी स्कूल जा रहा हूं।”
शुरुआत आसान नहीं थी। स्कूल में कुछ बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते — “अरे ये तो भिखारी है।” कुछ उसकी अंग्रेज़ी पर हंसते। लेकिन वीर ने किसी की बात का बुरा नहीं माना। वो सोचता — “अगर मैं मेहनत करूंगा तो एक दिन सब मुझे सम्मान देंगे।” वो हर दिन पढ़ता, क्लास में सबसे पहले आता, सबसे देर तक बैठता। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी। टीचर्स उसकी तारीफ करने लगे। और विक्रम हर शाम उसे देखकर मुस्कुराता — “मुझे तुम पर गर्व है बेटा।”
समय बीतता गया। वीर पढ़ाई में अव्वल आया, खेलों में भी आगे रहा। विक्रम का घर अब खुशियों से भर गया था। मगर हर खुशी के साथ कुछ न कुछ ईर्ष्या भी आती है। विक्रम का छोटा भाई रवि इस बात से जलने लगा कि उसका भाई एक अनाथ बच्चे को बेटा बना बैठा है। रवि की पत्नी ममता अकसर कहती — “अगर विक्रम की कोई संतान नहीं हुई तो सारा धन उस भिखारी को मिलेगा।” धीरे-धीरे रवि के मन में ज़हर भरता गया। वो विक्रम से दूर रहने लगा, उसके घर आना-जाना बंद कर दिया।
उधर वीर बड़ा होता गया, अपनी मेहनत और सादगी से सबका दिल जीतने लगा। विक्रम और शालिनी उसे बेटे से भी बढ़कर प्यार करते। लेकिन रवि का बेटा करण बिगड़ता गया। पार्टी, नशा, गलत संगत — सब उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया। जबकि वीर ईमानदारी और मेहनत से अपना रास्ता बना रहा था। रवि के व्यापार में भी घाटा होने लगा। कर्ज बढ़ा, पार्टनर अलग हुए, और वो धीरे-धीरे टूटने लगा।
एक दिन रवि हताश होकर विक्रम के पास गया। विक्रम ने उसे देखते ही गले लगा लिया — “भाई, तुम्हारे चेहरे से ही समझ गया हूं कि कुछ परेशानी है। बताओ।” रवि की आंखों में आंसू थे — “भाई, मेरा सब कुछ चला गया। मैंने हमेशा तुझे गलत समझा। जब तू इंसानियत निभा रहा था, मैं तुझे रोक रहा था। आज वही बच्चा तेरे घर की जान है और मेरा बेटा मेरी शर्म।” विक्रम ने उसका हाथ थामा — “भाई, देर आए दुरुस्त आए। इंसानियत कभी देर से भी अपनाओ तो सुकून देती है। तुम चिंता मत करो। मैं तुम्हारा सारा कर्ज चुका दूंगा। तुम और भाभी मेरे साथ रहो।”
जब वीर को पता चला कि उसके चाचा मुश्किल में हैं, वो तुरंत उनके पास गया, उनके पैर छुए और बोला — “चाचा, अब हम सब एक हैं। आप भी मेरे अपने हैं।” उसकी सादगी ने रवि का दिल पिघला दिया। रवि फूट-फूट कर रो पड़ा। वहीं उसका बेटा करण भी अपने पिता की हालत देखकर टूट गया। वो रात को पिता के पास आया — “पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने गलती की। अब मैं बदल जाऊंगा।” रवि ने उसे गले लगा लिया।
विक्रम ने करण को अपने ऑफिस में रखा। वीर ने उसे संभाला, सिखाया, और कहा — “भाई, मेहनत करने में कभी शर्म मत करना।” धीरे-धीरे करण भी सुधर गया। कुछ सालों में परिवार फिर से एक हो गया। विक्रम, शालिनी, रवि, ममता, वीर और करण — सब एक छत के नीचे थे। अब घर में ईर्ष्या नहीं, अपनापन था। हंसी गूंजती थी। वीर की आंखों में वो संतोष था जो सिर्फ नेक इंसान को मिलता है।
दोस्तों, यह कहानी सिर्फ एक भिखारी बच्चे की नहीं, बल्कि इंसानियत की जीत की है। यह बताती है कि इंसान की असली पहचान उसके कपड़ों से नहीं, उसके कर्मों से होती है। वीर ने साबित कर दिया कि अगर दिल साफ हो तो हालात चाहे जितने भी बुरे हों, किस्मत एक दिन झुकती है।
तो अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो याद रखिए — हर सड़क किनारे बैठा बच्चा सिर्फ भीख नहीं मांगता। कोई-कोई तो इंसानियत का सबसे बड़ा सबक सिखा जाता है।
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उस दिन के बाद ऑफिस का पूरा माहौल बदल गया। अब कोई भी किसी की औकात या कपड़ों से तुलना नहीं करता था। सब एक-दूसरे की मदद करने लगे। अर्जुन सबसे प्रेरणा देने वाला इंसान बन गया। रिया भी अब पूरी तरह बदल चुकी थी। वह विनम्रता से छोटे काम करने लगी और धीरे-धीरे सबका विश्वास जीतने की कोशिश करने लगी।
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रिया फूट-फूट कर रो पड़ी। उसके सारे सपने, घमंड और अभिमान पल भर में टूट गए थे। बाकी सभी कर्मचारी भी कांप गए। सब सोचने लगे, “हे भगवान, हमने भी कल उस चायवाले की हंसी उड़ाई थी। अब अगर मालिक को याद आ गया तो हमारी भी छुट्टी हो जाएगी।”
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