“बूढ़ी माँ को मंदिर में छोड़ गया बेटा… आगे जो चमत्कार हुआ उसने सबको रुला दिया!”

कर्मों का फल – एक मां की आत्मनिर्भरता

भाग 1: ममता की मूरत

कमला देवी ने अपनी पूरी जिंदगी बेटे अजय की परवरिश में लगा दी थी। खेतों में मजदूरी कर, जेवर बेचकर, खुद फटे कपड़ों में रहकर भी अजय को अच्छे कपड़े पहनाए, उसकी पढ़ाई पूरी कराई। मां का एक ही सपना था – मेरा बेटा बड़ा आदमी बने।
समय ने कमला की मेहनत रंग लाई, अजय सचमुच बड़ा आदमी बन गया। लेकिन जैसे-जैसे अजय की जिंदगी में पैसा और शोहरत आई, मां उसके लिए बोझ बनती गई। शहर में रहने वाली उसकी पत्नी सीमा अक्सर ताने देती – “घर छोटा है, खर्चा बड़ा है, ऊपर से आपकी मां… कब तक इन्हें ढोते रहेंगे?”

अजय कभी चुप रह जाता, कभी हल्के गुस्से में मां से कहता – “मां, आप थोड़ा संभल कर रहा करो, क्यों हर बार बीमार हो जाती हो?”
कमला सब सुनती, मगर शिकायत का एक शब्द नहीं लाती। उसके लिए तो बेटे के घर की दहलीज ही मंदिर थी।

सीमा के तानों ने अजय के मन में जगह बना ली। उसने सोचना शुरू कर दिया – “सही कहती है सीमा, मां अब बोझ बन गई है। अगर यह ना रहे तो घर में शांति रहे।”
एक दिन अजय ने ठान लिया – मां से छुटकारा पाना ही होगा। लेकिन गांव की मां को सीधे बाहर निकालना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए उसने एक योजना बनाई।

भाग 2: तीर्थ यात्रा के बहाने

अजय ने मां से कहा – “मां, तुम्हारी बरसों की तमन्ना पूरी करने का समय आ गया है। मैं तुम्हें बाबा वैद्यनाथ धाम के दर्शन कराने ले चलूंगा।”
यह सुनकर कमला की आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने बेटे का चेहरा पकड़ कर आशीर्वाद दिया – “भोलेनाथ तुझे लंबी उम्र दे। बेटा, तूने मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सपना पूरा कर दिया।”

रात भर उन्होंने अपनी सबसे अच्छी साड़ी निकाल कर रखी, पोटली में पुराने बेलपत्र, थोड़े चावल और माला रखी जो बरसों से भगवान को अर्पित करने की सोच रही थी।
सुबह कार में बैठे हुए कमला ने आसमान की ओर देखा और बुदबुदाई – “धन्यवाद भोले, तूने मेरी सुन ली।”
रास्ते भर वह उत्साहित होकर बेटे से बातें करती – बचपन की यादें, मनौतियां, संस्कार।
अजय बस मुस्कुराता रहा, भीतर से जानता था कि मां की खुशी क्षणिक है।

देवघर की सीमा में प्रवेश करते ही माहौल बदल गया – बोल बम के जयकारे, दुकानों पर बेलपत्र, मंदिर की घंटियों की गूंज।
कमला की आंखें भर आईं – “भोलेनाथ, आज मेरी तपस्या पूरी हुई।”
लेकिन उन्हें कहां पता था कि यह यात्रा उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द बनने वाली है।

भाग 3: मंदिर की सीढ़ियों पर इंतजार

मंदिर परिसर में पहुंचकर कमला भीड़ में किसी बच्चे की तरह हर ओर देखने लगी। बेलपत्र की दुकानों पर रुकी, गंगाजल की बोतलें उठाई।
अजय ने मां से कहा – “मां, आप यहीं इस विश्रामालय की सीढ़ियों पर बैठ जाइए। मैं प्रसाद और पूजा की पर्ची लेने जाता हूं, भीड़ में आप थक जाएंगी।”
कमला देवी ने बेटे की बात पर आंख बंद कर भरोसा किया, सीढ़ियों पर बैठ गईं, दोनों हाथ जोड़कर मंदिर की ओर देखने लगीं।

चेहरे पर संतोष, आंखों में आस्था।
“बाबा, जब तक बेटा लौटे, मैं तेरा नाम जपती रहूंगी।”

वक्त बीतने लगा। आधा घंटा, एक घंटा, फिर दो घंटे। सूरज ढलने लगा, लेकिन अजय लौट कर नहीं आया।
कमला देवी बेचैन होकर इधर-उधर देखने लगीं। हर आने-जाने वाले चेहरे में उन्हें बेटे का चेहरा नजर आता।
धीरे-धीरे उनके दिल में शक की चिंगारी उठी – कहीं अजय मुझे छोड़कर तो नहीं चला गया?

लेकिन अगले ही पल उन्होंने खुद को समझाया – “नहीं, मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता। मैंने अपना खून पिलाकर पाला है उसे, वह मुझे अकेला कैसे छोड़ सकता है?”
रात उतर आई थी। मंदिर के शिखर पर दीप जल उठे। श्रद्धालु लौटने लगे।
कमला देवी अब भी थक कर वही सीढ़ियों पर बैठी थीं। भूख से पेट जल रहा था, पांव सुन्न हो रहे थे।
लेकिन दिल बस एक ही बात पर अटका था – “मेरा बेटा आएगा, जरूर आएगा।”

भाग 4: ठंड रात, टूटे सपने

किसी ने आकर पूछा – “माई, कहां से आए हो? अकेली क्यों बैठे हो?”
कमला देवी ने कांपती आवाज में कहा – “मेरा बेटा गया है प्रसाद लेने, वो अभी आता ही होगा।”
पर उस रात वह बेटा कभी नहीं आया। भीड़ छंट गई, मंदिर के बाहर सन्नाटा छा गया।
कमला देवी का दिल अब समझ चुका था – बेटा उन्हें छोड़कर चला गया है।

लेकिन मां का दिल अजीब होता है। धोखा साफ दिखते हुए भी वह बेटे के लिए दुआ ही करती है – “भोलेनाथ, मेरा अजय जहां भी रहे सुखी रहे। अगर उसने मुझे बोझ समझा है तो शायद मेरी किस्मत ही यही थी।”

आंखों से बहते आंसुओं के बीच उन्होंने बाबा धाम के शिखर की ओर देखा और धीमे स्वर में बोलीं – “अब मेरी जिंदगी तेरे हवाले भोले।”

देवघर की रात असामान्य रूप से ठंडी थी। मंदिर परिसर के बाहर धीरे-धीरे भीड़ छंट चुकी थी।
सीढ़ियों पर बैठी कमला देवी अब पत्थर की मूर्ति सी लग रही थीं। आंखों से आंसू बह-बह कर सूख चुके थे।
गला बैठ चुका था, मन में सिर्फ एक ही सवाल – “क्या सचमुच मेरा बेटा मुझे छोड़ गया?”

भाग 5: नया सहारा और आत्मनिर्भरता

रात के तीसरे पहर अचानक उनके आंचल पर किसी ने हल्के हाथ से स्पर्श किया – “माई, आप यहां अकेली क्यों बैठी हैं?”
यह आवाज मंदिर के पुजारी रामलाल की थी।
कमला ने कांपते हुए कहा – “मेरा बेटा गया है प्रसाद लेने, आएगा अभी।”

रामलाल ने उनकी हालत देखी और तुरंत समझ गया कि यह कोई साधारण स्थिति नहीं है।
पास ही खड़ी समाजसेवी महिला सुमन ने जब बूढ़ी मां की आंखों से बहते आंसू और कांपते हाथ देखे तो उसका दिल पिघल गया।
सुमन ने धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा – “मां, आप चिंता मत कीजिए। यहां कोई किसी को अकेला नहीं छोड़ता। बाबा वैद्यनाथ की नगरी में इंसानियत अभी जिंदा है।”

कमला इन शब्दों को सुनकर फूट-फूट कर रो पड़ी। पहली बार उन्हें लगा कि अजनबियों के बीच भी कोई अपना हो सकता है।
सुमन ने उन्हें सहारा देकर उठाया और रामलाल के साथ अपने छोटे से घर ले गई।
वहां उन्हें खाना दिया गया, पानी पिलाया गया।
कमला हरक और खाते हुए रो पड़ती – “आज तक मैं बेटे को खिलाकर ही संतुष्ट होती थी, आज पहली बार अजनबी मुझे खिला रहे हैं।”

उस रात उन्होंने करवटें बदलते हुए यही सोचा – “जिस बेटे को पालने के लिए मैंने अपनी जिंदगी खपा दी, उसी ने मुझे छोड़ दिया। लेकिन शायद भगवान यही चाहते थे कि मैं अब अपने पैरों पर खड़ी हूं, किसी के सहारे नहीं।”

भाग 6: फूलों की दुकान और नई पहचान

सुबह की पहली किरण जब देवघर के आकाश को सुनहरी बना रही थी, तब कमला देवी सुमन के छोटे से घर के आंगन में बैठी थीं।
पिछली रात की थकान और आंसुओं ने उनकी आंखों को लाल कर दिया था, पर दिल में कहीं एक नया संकल्प भी जन्म ले चुका था।

सुमन ने उनके पास बैठते हुए कहा – “मां, जिंदगी किसी एक इंसान के सहारे नहीं रुकती। जिसे तुम अपना सब कुछ मानती थी, उसने ही छोड़ दिया। अब भगवान ने तुम्हें दूसरा रास्ता दिखाने के लिए यहां भेजा है।”

कमला देवी ने उनकी ओर देखा। चेहरा शिकनों से भरा, लेकिन भीतर से दृढ़ता झलक रही थी।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा – “बेटी, सच कहूं तो अब मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती। मैं अपने हाथों से कमाकर जीना चाहती हूं, बस भगवान का नाम मेरे साथ रहे।”

यहीं से उनकी नई यात्रा की शुरुआत हुई।
सुमन और रामलाल ने मिलकर उन्हें मंदिर के बाहर छोटी सी जगह दिला दी।
एक पुरानी टोकरी और कुछ फूल लेकर कमला ने बाबा वैद्यनाथ के दरवाजे पर फूल बेचने का काम शुरू किया।

कांपते हाथों से बेलपत्र और फूलों की माला सजातीं, श्रद्धालुओं से कहतीं – “बाबा के लिए बेलपत्र ले लो, बाबा आशीर्वाद देंगे।”
लोग उनके चेहरे की मासूमियत और आंखों की सच्चाई देखकर रुक जाते। कोई फूल लेता, कोई बिना लिए भी उनके पैर छूकर आशीर्वाद मांगता।

धीरे-धीरे श्रद्धालुओं में यह बात फैल गई – “मां से फूल लो, उनका आशीर्वाद साथ मिलेगा।”
दिन गुजरते गए, छोटा सा काम अब चलने लगा। दुकान टोकरी से बढ़कर छोटी मेज तक पहुंची, फिर दुकान की शक्ल लेने लगी।

अब कमला देवी हर सुबह खुद फूल सजातीं, साफ-सुथरे कपड़े पहनतीं और दुकान पर बैठ जातीं।
उनके चेहरे पर दुख की परछाई धीरे-धीरे मिट रही थी।

भाग 7: सम्मान और आत्मविश्वास

समय के साथ उनकी दुकान मंदिर की सबसे प्रसिद्ध फूलों की दुकान बन गई। लोग दूर-दूर से सिर्फ मां से फूल लेने आते।
कोई कहता – “माई का आशीर्वाद लगता है।”
कोई कहता – “इसलिए फूल सीधे बाबा तक पहुंचता है।”

अब उनके पास न सिर्फ सम्मान था, बल्कि पैसों की कोई कमी भी नहीं रही। लाखों रुपए तक उनकी दुकान से कमाई होने लगी।
लेकिन पैसों से ज्यादा उन्हें इस बात की खुशी थी कि अब वह किसी पर निर्भर नहीं थीं।

मां के चेहरे पर अब दर्द नहीं, बल्कि संतोष और आत्मविश्वास था।
वह अक्सर श्रद्धालुओं से कहतीं – “बाबा वैद्यनाथ की नगरी में जो भी आता है, खाली हाथ नहीं जाता। मुझे बेटा छोड़ गया था, लेकिन बाबा ने मुझे नया परिवार दे दिया।”

भीड़भाड़ वाले मंदिर के बाहर फूलों की खुशबू और श्रद्धा के गीतों के बीच कमला देवी अब किसी छोड़ी हुई मां की नहीं, बल्कि एक आत्मनिर्भर मां की पहचान बन चुकी थीं।

भाग 8: बेटे की वापसी और अंतिम माफी

बरसों बीत गए। देवघर की गलियों में अब एक नाम हर जुबान पर था – “मां की फूलों की दुकान।”
बूढ़ी कमला देवी अब सिर्फ फूल नहीं बेचती थीं, बल्कि हर फूल के साथ आशीर्वाद भी देती थीं।
जिन हाथों ने कभी बेटे के लिए रोटियां सेकी थी, वही हाथ अब लोगों के माथे पर दुआ के लिए उठते थे।

एक दिन मंदिर परिसर में भीड़ में अचानक एक चेहरा दिखा – अजय।
उसके चेहरे पर वही तेज था, लेकिन अब थकावट और परेशानी की गहरी लकीरें थीं।
उसके कारोबार में भारी नुकसान हुआ था, घर टूटने की कगार पर था और पत्नी सीमा भी उसे छोड़कर जा चुकी थी।
अजय अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था।

जैसे ही उसकी नजर फूलों की दुकान पर बैठी मां पर पड़ी, उसके कदम थम गए।
वो वही पत्थर बनकर खड़ा रह गया।
यह वही मां थी जिसे उसने बोझ समझा था, तीर्थ यात्रा के बहाने यहां छोड़ गया था।
लेकिन आज वही मां मंदिर के बाहर सम्मान की मूरत बन चुकी थी।

आंखों से आंसू बह निकले।
वो दौड़कर मां के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा – “मां, मुझे माफ कर दो। मैंने बहुत बड़ा पाप किया। तुम्हें धोखा दिया, तुम्हें छोड़ा और आज देखो मेरी हालत। कृपया मेरे साथ चलो, मां, मैं तुम्हें घर ले जाना चाहता हूं।”

आसपास खड़े श्रद्धालु यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। सबकी नजरें मां पर टिक गईं।
कमला देवी ने बेटे के सिर पर हाथ रखा।
उनकी आंखों से आंसू बहे, लेकिन होठों पर शांत शब्द निकले –
“बेटा, मां अपने बच्चों को कभी श्राप नहीं देती। जिस दिन तूने मुझे यहां छोड़ा था, उसी दिन मैंने तुझे माफ कर दिया था। लेकिन याद रख, इंसान के कर्म ही उसका भाग्य लिखते हैं। तूने मुझे बोझ समझा था, पर बाबा ने मुझे सहारा दिया। अब मेरा घर यही है, मेरा परिवार यही है। मैं तेरे साथ नहीं जाऊंगी।”

अजय ने सिर झुका लिया। उसके पास कहने को शब्द नहीं बचे थे। पछतावे का बोझ उसके कंधों पर और भारी हो गया।
भीड़ में खड़े लोगों की आंखें नम हो गईं। किसी ने धीमे से कहा – “देखो, यही भगवान का न्याय है। जिसने मां को छोड़ा, वो आज खाली हाथ रह गया और जिसे छोड़ा गया, वही मां आज हजारों का सहारा बन गई।”

मां ने अंतिम बार बेटे को उठाया और कहा – “बेटा, अगर तुझे सच में मेरी माफी चाहिए तो जा और अपने कर्म बदल। माता-पिता को बोझ समझना सबसे बड़ा अपराध है। भगवान तुझे सुधरने का अवसर दे, यही मेरी अंतिम दुआ है।”

अजय रोते-रोते वही जमीन पर बैठ गया।
मां ने हाथ जोड़कर मंदिर की ओर देखा और अपनी फूलों की दुकान पर बैठ गईं।
उनके चेहरे पर अब किसी छोड़े गए इंसान का दर्द नहीं था, बल्कि उसे मां का गर्व था।
जो अपने त्याग और आत्मनिर्भरता से समाज को सिखा रही थी कि माता-पिता को कभी बोझ मत समझो।
जिनसे तुम मुंह मोड़ते हो, वही भगवान उन्हें और मजबूत बना देते हैं और तुम्हें पछतावे के सिवा कुछ नहीं मिलता।

भाग 9: सवाल और संदेश

अब एक सवाल आपसे है –
क्या मां का यह फैसला सही था कि उसने बेटे को माफ तो कर दिया, लेकिन उसके साथ कभी नहीं गई?
अगर आप मां की जगह होते, तो क्या यही करते?
अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताइए।

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तब तक खुश रहिए, अपनों के साथ रहिए और रिश्तों की कीमत समझिए।

जय हिंद, जय भारत।