जूते पॉलिश करने वाला लड़का और 20 करोड़ की मशीन
“मैम… मैं इस इंजन को ठीक कर सकता हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
फिर एक ठहाका गूंजा।
“क्या बकवास है!”
“इसे पता भी है ये क्या बोल रहा है?”
“हम 10 दिन से फँसे हैं और ये बच्चा मशीन ठीक करेगा?”
लेकिन उस 15 साल के लड़के की आँखों में डर नहीं था।
बस एक अजीब-सा भरोसा था।

बेंगलुरु, अगस्त 2023
इलेक्ट्रॉनिक सिटी की सुबहें आमतौर पर कॉफी, कारों और कॉर्पोरेट शोर से भरी होती हैं।
लेकिन उस दिन हवा में अजीब-सी बेचैनी थी।
काँच और स्टील से बनी एक भव्य इमारत—
आर्यावर्त रोबोटिक्स लिमिटेड।
भारत की सबसे प्रतिष्ठित ऑटोमेशन कंपनी।
जिसकी मशीनें दुनिया के कई देशों में काम कर रही थीं।
लेकिन आज…
उसकी सबसे कीमती मशीन खामोश थी।
हाइड्रोलिंक H900
20 करोड़ की लागत।
पूरे प्रोजेक्ट की रीढ़।
10 दिनों से बंद।
हर दिन करोड़ों का नुकसान।
साख, भरोसा, सब दाँव पर।
जर्मनी, जापान, कोरिया—
दुनिया के बेहतरीन इंजीनियर आए।
सेंसर बदले।
सॉफ्टवेयर रीइंस्टॉल हुआ।
वायरिंग बदली।
लेकिन मशीन…
जैसे जिद पर अड़ी थी।
वेदांत मल्होत्रा
कंपनी के फाउंडर।
कभी आत्मविश्वास का दूसरा नाम।
आज उनकी आँखों में थकान थी।
डर था।
“क्या हम बच्चों की तरह कंपनी चला रहे हैं?”
उनकी आवाज मीटिंग रूम में गूंजी।
किसी के पास जवाब नहीं था।
फुटपाथ पर बैठा एक लड़का
इसी इमारत के बाहर,
फुटपाथ पर बैठा था एक दुबला-पतला लड़का।
फटे कपड़े।
घुटनों तक धूल।
हाथ में जूते पॉलिश का ब्रश।
नाम—आरव।
वह जूते चमका रहा था,
लेकिन उसकी नज़रें मशीन सेक्शन पर थीं।
लाल चेतावनी लाइट।
बार-बार बजता अलार्म।
आरव बुदबुदाया—
“गलत जगह देख रहे हैं ये लोग…
असली समस्या बैकअप यूनिट में है।”
कोई नहीं सुन रहा था।
क्योंकि दुनिया
जूते पॉलिश करने वाले बच्चों की बात नहीं सुनती।
रात का स्कूल
दिन में फुटपाथ।
रात में—एक पुराना गैराज।
वहीं उसका असली स्कूल था।
उसके नाना—
कभी इसी कंपनी में सीनियर इंजीनियर थे।
अब एक बूढ़े मैकेनिक।
वे कहते थे—
“मशीन को देखो मत, सुनो।
हर मशीन बोलती है।”
आरव सच में सुन सकता था।
मौका नहीं मिलता, छीना जाता है
उस दिन मशीन सेक्शन में फिर सायरन बजा।
System Critical Error.
गार्ड घबराए।
इंजीनियर दौड़े।
आरव ने हिम्मत की।
“बस पाँच मिनट… मशीन देखने दीजिए।”
गार्ड ने धक्का दे दिया।
लोग हँसे।
“पागल है।”
“इसे क्या पता मशीन क्या होती है।”
आरव गिरा।
रोया नहीं।
क्योंकि उसके लिए
वह मशीन उसकी माँ की दवा थी।
उसके नाना की इज्जत थी।
उसकी पहचान थी।
एक नज़र, जो सब बदल गई
शाम को वेदांत बाहर आए।
थके हुए।
फिर उन्होंने उसी लड़के को देखा।
वही आँखें।
वही बेचैनी।
“ये बच्चा यहाँ क्यों आता है?”
गार्ड बोला—
“सर, कहता है मशीन ठीक कर देगा।”
वेदांत ने आरव से पूछा—
“तुम मशीन को क्यों देखते रहते हो?”
आरव बोला—
“सर, मुझे मशीनें पसंद हैं।”
कुछ इंजीनियर हँसे।
लेकिन वेदांत नहीं हँसे।
“इसे अंदर लाओ।”
20 करोड़ की मशीन और 15 साल का बच्चा
पूरा हॉल चुप।
आरव मशीन के चारों ओर घूमने लगा।
छूकर।
सुनकर।
महसूस करके।
फिर रुका।
“सर… मशीन खराब नहीं है।
इसे जानबूझकर रोका गया है।”
सन्नाटा।
“मेन प्रेशर वाल्व आधा घुमाया गया है।
और ये स्क्रू ढीली है।”
स्क्रू सच में ढीली थी।
अब यह खराबी नहीं—
साजिश थी।
10 मिनट
आरव ने वायरिंग ठीक की।
पाइप सही किया।
“अब चालू कर सकते हैं।”
वेदांत ने कहा—
“तुम ही ऑन करो।”
बटन दबा।
एक…
दो…
पाँच सेकंड…
लाल लाइट बंद।
हरी लाइट जल उठी।
मशीन जाग गई।
20 करोड़ की मशीन।
15 साल के हाथों से।
सच, जो खून में था
“तुम हो कौन?”
वेदांत ने पूछा।
“मैं जूते पॉलिश करता हूँ।
मेरी माँ बीमार हैं।”
“नाम?”
“नंदिनी शर्मा।”
वेदांत का चेहरा सफेद पड़ गया।
15 साल पुरानी कहानी।
टूटा रिश्ता।
खोया प्यार।
डीएनए टेस्ट।
सच सामने आया।
आरव उनका बेटा था।
अंत नहीं, शुरुआत
नंदिनी का इलाज शुरू हुआ।
नाना को सम्मान मिला।
आरव स्कूल गया।
लेकिन सबसे बड़ी बात—
अब जब आरव मशीनों से बात करता है,
तो दुनिया उसकी सुनती है।
क्योंकि कभी-कभी
किस्मत पहले हमें फुटपाथ पर बैठाती है,
ताकि जब उठाए…
तो पूरी दुनिया खड़ी होकर देखे।
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