विधवा महिला की घर पर लड़का रोज अगरवाती बनाने जाता था !

देवकी और राजू: एक उलझी हुई दास्तान

दोस्तों, आज की यह कहानी बिहार के गया जिले के एक छोटे से गाँव की है। यह कहानी हमें सिखाती है कि कैसे कभी-कभी भावनाएं और अकेलापन इंसान को ऐसे रास्तों पर ले जाते हैं, जहाँ से वापसी बहुत मुश्किल होती है।

गाँव का छोटा सा उद्योग

गया के एक शांत गाँव में देवकी नाम की एक बहुत ही सुंदर महिला रहती थी। देवकी के जीवन में शांति तो थी, लेकिन अकेलापन भी बहुत था। उसके पति का निध/न करीब 10-12 साल पहले ही हो चुका था। उसकी एक ही बेटी थी, जिसकी शादी वह काफी समय पहले कर चुकी थी। बेटी अपने ससुराल में खुश थी और कभी-कभी ही अपनी माँ से मिलने आती थी।

देवकी ने अपने खाली समय और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने घर पर ही एक छोटा सा लघु उद्योग शुरू किया था। वह अगरबत्ती बनाने का काम करती थी। इस काम में मदद के लिए गाँव की कई महिलाएँ, लड़कियाँ और कुछ लड़के भी उसके घर आते थे। देवकी उन सबको काम के बदले महीने का वेतन देती थी। सभी मज़दूर देवकी का बहुत सम्मान करते थे क्योंकि वह स्वभाव से बहुत दयालु और मिलनसार थी।

राजू का प्रवेश

इन्हीं मज़दूरों के बीच राजू नाम का एक युवक भी था। राजू उम्र में छोटा था, लेकिन काम में बहुत ही निपुण और होशियार था। वह अपनी अगरबत्तियाँ सबसे जल्दी और सफाई से बनाता था। राजू के घर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। उसकी माँ नहीं थी और पिता शराब/ के आदी थे, जो कुछ भी कमाते थे वह न/शे में उड़ा देते थे।

राजू अपनी शादी के लिए पैसे जमा करना चाहता था, इसलिए वह देवकी के यहाँ बहुत मन लगाकर काम करता था। देवकी राजू की मेहनत और उसकी मासूमियत से बहुत प्रभावित थी। राजू भी देवकी का बहुत ख्याल रखता था। अक्सर काम पर आते समय वह देवकी के लिए मिठाइयाँ या चॉकलेट ले आता था। धीरे-धीरे देवकी को राजू से एक गहरा लगा/व हो गया।

अकेलापन और आकर्षण

देवकी का जीवन काफी समय से एकाकी था। पति के चले जाने के बाद उसने कभी किसी के साथ कोई संबं/ध नहीं बनाया था। वह अक्सर खाली समय में फिल्में देखना पसंद करती थी। राजू को भी फिल्मों का शौक था। अक्सर काम खत्म होने के बाद या छुट्टी वाले दिन दोनों साथ बैठकर मोबाइल पर फिल्में देखते थे।

एक बार देवकी की तबीयत खराब हो गई, तो राजू ने पूरी रात उसके घर रुककर उसकी सेवा की। राजू की इस निस्वार्थ सेवा ने देवकी के दिल में उसके लिए जगह बना दी। देवकी भी राजू को कभी-कभी बाहर घुमाने ले जाती थी। दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता पनपने लगा था, जिसकी भनक फैक्ट्री की अन्य महिलाओं को भी थी।

दशहरा मेला और वो रात

दशहरे का समय था। देवकी ने राजू को साथ में मेला घूमने का निमंत्रण दिया। राजू पहले तो हिचकिचाया, लेकिन अपनी “आंटी” (जैसा वह देवकी को बुलाता था) का दिल रखने के लिए वह साथ चला गया। मेले में दोनों ने खूब आनंद लिया। रात को देवकी ने राजू को एक फिल्म दिखाने के लिए थिएटर ले गई। फिल्म देखते-देखते रात के 12 बज गए।

जब वे थिएटर से बाहर आए, तो काफी रात हो चुकी थी। राजू ने अपने घर जाने की बात कही, लेकिन देवकी ने कहा, “राजू, इतनी रात को घर जाना ठीक नहीं है। तुम आज मेरे ही घर रुक जाओ। सुबह नाश्ता करके काम पर लग जाना।” राजू ने देवकी की बात मान ली और उसके घर रुक गया।

कमरे में सन्नाटा था। दोनों को नींद नहीं आ रही थी। उस रात भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। देवकी ने राजू को अपनी ओर आक/र्षित करना शुरू किया। राजू पहले तो सहम गया और उसने अपनी उम्र का हवाला देते हुए मना भी किया, लेकिन देवकी की मीठी बातों और अकेलेपन की पुकार के आगे वह खुद को रोक नहीं पाया। उस रात दोनों के बीच नि/जी संबं/ध बन गए।

आत्मग्लानि और दूरी

अगली सुबह जब राजू की आँख खुली, तो उसे बहुत आत्मग्लानि महसूस हुई। उसे लगा कि उसने अपनी आंटी के साथ ऐसा करके बहुत बड़ी गलती की है। वह बिना बताए वहां से भाग निकला और अपने घर चला गया। वह एक हफ्ते तक काम पर नहीं आया।

देवकी को भी अपनी गलती का अहसास हुआ, लेकिन साथ ही वह राजू के बिना बेचैन भी थी। वह खुद राजू के घर गई। राजू ने उससे बात करने से मना कर दिया। देवकी ने रोते हुए कहा, “राजू, मुझे माफ कर दो। मैं बहुत अकेली थी और खुद पर काबू नहीं रख सकी। पति की मौ/त के बाद आज तक मैं किसी पु/रुष के संप/र्क में नहीं आई थी।”

राजू का दिल पिघल गया। उसने कहा कि वह भी अब अपनी इच्छा से देवकी के साथ रहना चाहता है। दोनों ने फिर से मिलने का समय तय किया।

घटना और उसका परिणाम

एक रात राजू फिर से देवकी के घर आया। उस रात वे फिर से एक-दूसरे के करीब आए। लेकिन देर रात कुछ ऐसा हुआ कि देवकी की हालत बिगड़ गई। शायद वह अपनी उम्र और शारीरिक सीमाओं के कारण उस थका/वट को झेल नहीं पाई। देवकी बेहोश हो गई। राजू डर गया और उसे लगा कि शायद देवकी को कुछ हो गया है। वह घबराकर रात में ही भाग गया।

अगली सुबह जब काम करने वाली महिलाएँ आईं, तो उन्होंने देवकी को बेहोशी की हालत में पाया। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। तीन दिन बाद जब देवकी को होश आया, तो उसकी बेटी और पुलिस वहां मौजूद थे। देवकी ने राजू का नाम लिया, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं बताई। उसने सिर्फ इतना कहा कि राजू ने उसके साथ जबरद/स्ती की है।

पुलिस और सत्य का खुलासा

पुलिस ने राजू को गिरफ्ता/र कर लिया। राजू ने थाने में रोते हुए सारी सच्चाई बताई कि इसमें देवकी की भी रजामंदी थी। पुलिस फिर से अस्पताल गई और देवकी से कड़ाई से पूछताछ की। आखिरकार देवकी ने सच स्वीकार कर लिया कि राजू निर्दोष है और उसने ही उसे बुलाया था।

पुलिस ने राजू को छोड़ दिया और देवकी ने अपना केस वापस ले लिया। 10 दिनों बाद देवकी ठीक होकर घर लौट आई।

कहानी का अंत

गाँव में राजू की बहुत बदनामी हुई। लोग उस पर उंगलियाँ उठाने लगे। शर्म के मारे राजू ने गाँव छोड़ दिया और पंजाब चला गया। वहाँ उसने कड़ी मेहनत की और बाद में एक अच्छी लड़की से शादी कर अपना घर बसा लिया।

देवकी आज भी अपना अगरबत्ती का छोटा सा कारखाना चला रही है। अब वह पहले से अधिक शांत और गंभीर रहती है। उसने अपनी भावनाओं पर काबू पाना सीख लिया है।

निष्कर्ष: यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि क्षणिक सुख के लिए की गई गलतियाँ पूरे जीवन की बदनामी का कारण बन सकती हैं। भावनाओं में बहकर मर्यादाओं को लांघना कभी भी सुखद नहीं होता। समाज में अपनी छवि और अपनों की सुरक्षा का ध्यान रखना हर इंसान की जिम्मेदारी है।

जय हिंद।