विधवा महिला अकेले ट्रेन से जा रही थी,गुंडों ने हमला कर दिया…फिर जो हुआ |

 

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विधवा महिला अकेले ट्रेन से जा रही थी, गुंडों ने हमला कर दिया… फिर जो हुआ, उसने इंसानियत को जिंदा कर दिया

जबलपुर स्टेशन की वह शाम आम शामों जैसी ही थी।

कुलियों की आवाज़ें, इंजन की सीटी, प्लेटफॉर्म पर दौड़ते मुसाफ़िर और चाय की दुकानों से उठती भाप—सब कुछ वैसा ही था जैसा हर दिन होता है। लेकिन प्लेटफॉर्म नंबर चार पर खड़ी मीरा के लिए यह शाम ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाली थी।

मीरा की उम्र सिर्फ़ पच्चीस साल थी, लेकिन उसकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे बता रहे थे कि उसने उम्र से कहीं ज़्यादा दुख देख लिए हैं।

वह एक विधवा थी।

दो साल पहले, एक सड़क हादसे ने न सिर्फ़ उसका पति छीन लिया था, बल्कि उसके माथे पर समाज की क्रूर मुहर भी लगा दी थी—“मनहूस” होने की।

ससुराल में हर दिन ताने मिलते।
हर नज़र में शक होता।
हर साँस पर पहरा।

आज मीरा उन सब बंधनों से भाग रही थी। वह अपनी बड़ी बहन के पास मुंबई जा रही थी—एक नई शुरुआत की उम्मीद लेकर।

हाथ में एक पुराना सा सूटकेस था और दिल में सैकड़ों डर।


भीड़ और पहला सहारा

जैसे ही महानगरी एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म पर आई, जनरल कोच की तरफ़ भीड़ उमड़ पड़ी। मीरा ने हिम्मत जुटाई और भीड़ को चीरती हुई डिब्बे में घुस गई।

उसके पास कन्फ़र्म टिकट नहीं था।

सिर्फ़ एक उम्मीद थी—
कि टीटी से बात करके कोई कोना मिल जाएगा।

डिब्बे के अंदर का माहौल दमघोंटू था। पसीने की गंध, धक्कामुक्की और ऊँची आवाज़ें।

मीरा एक कोने में खड़ी हो गई।

तभी उसकी नज़र सामने की लोअर बर्थ पर बैठे एक युवक पर पड़ी।

करीब अट्ठाइस–उनतीस साल का।
हल्की दाढ़ी।
आँखों में ठहराव।

उसका नाम था आर्यन

आर्यन एक सिविल इंजीनियर था और मुंबई ड्यूटी ज्वाइन करने जा रहा था।

उसने देखा कि मीरा बार-बार अपना भारी सूटकेस ऊपर रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन भीड़ के धक्कों से लड़खड़ा जा रही है।

आर्यन चुपचाप उठा।
बिना कुछ कहे सूटकेस उसके हाथ से लिया और ऊपर वाली बर्थ पर रख दिया।

मीरा ने झिझकते हुए उसकी ओर देखा।

आर्यन की आँखों में न कोई लालच था, न बेवजह की सहानुभूति।

“आप यहाँ बैठ जाइए,”
उसने अपनी सीट की ओर इशारा किया।

“नहीं… यह आपकी सीट है,”
मीरा ने संकोच से कहा।

आर्यन हल्का सा मुस्कुराया।

“सफ़र लंबा है, और रात का समय है। अभी नहीं बैठेंगी तो आगे जगह भी नहीं मिलेगी। मैं ऊपर चला जाता हूँ।”

मीरा चुपचाप बैठ गई।


टीटी और पहला भरोसा

ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी।

मीरा ने देखा कि आर्यन ऊपर किताब पढ़ रहा है, लेकिन बीच-बीच में नीचे झाँककर यह देखता रहता है कि वह ठीक है या नहीं।

तभी टीटी आया।

मीरा का दिल तेज़ धड़कने लगा।

उसने घबराते हुए अपना जनरल टिकट दिखाया।

टीटी ने सख़्त लहजे में कहा,
“मैडम, गाड़ी फुल है। सीट नहीं मिल सकती।”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

उसी पल ऊपर से आवाज़ आई—

“सर, ये मेरी कज़िन है। मेरी बर्थ पर ही बैठेगी। आप जुर्माना काट दीजिए।”

आर्यन नीचे उतर आया था।

उसने पैसे दिए और रसीद बनवा ली।

मीरा हैरान रह गई।

“आपने झूठ क्यों बोला?”
उसने धीरे से पूछा।

आर्यन खिड़की से बाहर देखते हुए बोला,
“कभी-कभी सच से ज़्यादा ज़रूरी किसी की सुरक्षा होती है।”

मीरा पहली बार किसी अजनबी पर थोड़ा भरोसा कर पाई।


रात और खतरे की आहट

रात गहराती जा रही थी।

इटारसी के पास, डिब्बे के एक कोने से नशे में धुत कुछ लड़कों की फब्तियाँ सुनाई देने लगीं।

मीरा डर के मारे सिमट गई।

आर्यन नीचे आ गया।

वह मीरा और उन लड़कों के बीच दीवार बनकर खड़ा हो गया।

उसकी ठंडी निगाहों ने उन्हें चुप करा दिया।

लेकिन यह सिर्फ़ शुरुआत थी।


अचानक हमला

रात के करीब ग्यारह बजे, ट्रेन एक झटके से जंगल के बीच रुक गई।

चीख-पुकार मच गई।

गार्ड की आवाज़ आई—
“चेन पुलिंग हुई है!”

अंधेरे में मशालों की रोशनी दिखी।

आर्यन समझ गया—
यह कोई सामान्य रुकावट नहीं थी।

उसने मीरा से फुसफुसाकर कहा,
“बैग कसकर पकड़िए, और कोने में बैठिए।”

मीरा का दिल जैसे रुक गया।

तभी दरवाज़ा टूटा।

तीन नकाबपोश डकैत अंदर घुस आए।

हथियार लहराते हुए चिल्लाए—
“जो है निकालो!”

मीरा का शरीर ठंडा पड़ गया।

डकैत की नज़र उसके गले में पड़े पतले से मंगलसूत्र पर पड़ी।

“निकाल इसे!”

मीरा ने हाथ जोड़ दिए।
“भाई साहब… यह मेरे पति की आख़िरी निशानी है।”

डकैत हँसा और हाथ मरोड़ा।

उसी पल आर्यन टूट पड़ा।

उसने डकैत का हाथ पकड़ा और धकेल दिया।

“एक औरत पर हाथ उठाते शर्म नहीं आती?”

संघर्ष शुरू हो गया।

आर्यन अकेला था।
डकैत तीन।

खून बहा।
लेकिन वह डटा रहा।

बाक़ी मुसाफ़िरों में भी हिम्मत आ गई।

शोर सुनकर डकैत भाग निकले।


रात के बाद की सुबह

आर्यन घायल था।

मीरा ने अपने दुपट्टे से उसका ज़ख़्म बाँधा।

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

“आपने अपनी जान जोखिम में क्यों डाली?”

आर्यन हल्का सा मुस्कुराया।

“क्योंकि आपकी आँखों का डर मुझसे सहा नहीं गया।”

सुबह हुई।

मीरा ने पहली बार चैन की साँस ली।


अतीत का सच

आर्यन ने अपना सच बताया।

कैसे एक पुल हादसे में उसे बलि का बकरा बनाया गया।
कैसे उसने अपनी माँ खो दी।
कैसे वह खुद से भाग रहा था।

मीरा ने उसका हाथ थामा।

“अगर आप गुनहगार होते, तो कल रात मेरी रक्षा नहीं करते।”

उस वाक्य ने आर्यन को तोड़ दिया।


मुंबई और आख़िरी परीक्षा

मुंबई पहुँचते ही मीरा के ससुराल वाले पुलिस लेकर आ गए।

बिना वारंट।

आर्यन आगे खड़ा हो गया।

कानून की बातें कीं।
सच सामने रखा।

पुलिस पीछे हटी।

मीरा टूटकर रो पड़ी।


नई शुरुआत

आर्यन उसे एक एनजीओ ले गया—आशियाना

वहीं आर्यन को अपने केस का सामना करना पड़ा।

मीरा ने वादा किया—
“मैं आपके लिए गवाही दूँगी।”

समय बीता।

मीरा ने सिलाई सीखी।
आत्मसम्मान पाया।

आर्यन बेगुनाह साबित हुआ।


अंत नहीं, शुरुआत

दादर स्टेशन पर दोनों मिले।

मीरा अब डरी हुई विधवा नहीं थी।

आर्यन अब भागा हुआ इंसान नहीं था।

दोनों ने हाथ थाम लिया।

भीड़ वही थी।
शोर वही था।

लेकिन उनके भीतर अब डर नहीं था।

इंसानियत जीत गई थी।


समाप्त