IAS की तैयारी करने वालों की सबसे बड़ी बीमारी यही है |

झुग्गी से लाल बत्ती तक: एक आईएएस की अनकही दास्तान और वो ‘फरिश्ता’ परिवार

यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती, लेकिन इसकी जड़ें उस कड़वी सच्चाई में दबी हैं जिसे हम ‘संघर्ष’ कहते हैं। यह कहानी है कर्नाटक के बागलकोट जिले के एक छोटे से गांव से निकले नवनीत कुमार की, जिन्होंने गरीबी को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया।

अध्याय 1: एक कठिन शुरुआत और टूटे गहनों का सहारा

कर्नाटक के बागलकोट जिले में सूर्यनाथ नाम के एक दिहाड़ी मजदूर रहते थे। उनके पांच बच्चे थे—तीन बेटियां और दो बेटे। परिवार की माली हालत ऐसी थी कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी किसी जंग से कम नहीं था। लेकिन सूर्यनाथ का सबसे बड़ा बेटा, नवनीत, बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल था। साल 2016 में जब उसने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की, तो उसकी आंखों में एक ऐसा सपना पला जो उसके गांव के किसी लड़के ने देखने की हिम्मत नहीं की थी—’आईएएस अधिकारी’ बनने का सपना।

नवनीत ने अपने पिता से कहा, “पिताजी, मैं दिल्ली जाकर यूपीएससी की तैयारी करना चाहता हूँ।”

सूर्यनाथ का दिल बैठ गया। उन्होंने कहा, “बेटा, घर में खाने के लाले पड़े हैं, भाई-बहनों की पढ़ाई रुकी है, मैं तुम्हें दिल्ली कैसे भेजूं?” लेकिन नवनीत की जिद और उसकी काबिलियत के आगे पूरा परिवार झुक गया। नवनीत की मां और उसकी बूढ़ी दादी ने अपने पास रखे पुराने गहने बेच दिए। उसकी छोटी बहन, जो खुद कॉलेज जाने वाली थी, उसने अपने भाई के सपने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी। सूर्यनाथ ने नवनीत के हाथ में 70-80 हजार रुपये रखते हुए भारी मन से कहा, “बेटा, जो कुछ है यही है। एक-दो साल देख लो, अगर नहीं हो पाए तो चुपचाप घर लौट आना, कोई गलत कदम मत उठाना।”

अध्याय 2: दिल्ली की चमक और झुग्गियों का अंधेरा

नवनीत जब दिल्ली के मुखर्जी नगर पहुँचा, तो वहां की चकाचौंध और कमरों के किराए ने उसे डरा दिया। जहां कमरों का किराया 6-8 हजार रुपये था, वहां नवनीत का बजट महीने का मात्र 3 हजार रुपये था। वह पैदल चलते-चलते मुखर्जी नगर से दूर ‘तमारपुर’ की झुग्गियों में जा पहुँचा।

वहां उसे ₹700 महीने में एक छोटा सा कमरा मिला। वह घर शारदा नाम की एक महिला का था। शारदा के पति उन्हें छोड़ चुके थे और वह अपनी तीन बेटियों और एक छोटे बेटे का पेट पालने के लिए दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करती थीं। सबसे बड़ी बेटी, अंशिका (20 साल), घर की जिम्मेदारी संभालने में मां की मदद करती थी।

झुग्गी का वह माहौल पढ़ाई के लिए बिल्कुल भी अनुकूल नहीं था। हर तरफ शोर, गंदे नाले की बदबू और आए दिन होने वाले झगड़े। लेकिन नवनीत ने अपनी किताबों को ही अपनी दुनिया बना लिया।

अध्याय 3: संघर्ष के साथी और शारदा का मातृत्व

शुरुआत में शारदा के कुछ रिश्तेदारों ने नवनीत को वहां से भगाने की कोशिश की। वे लोग उस जमीन और मकान पर कब्जा करना चाहते थे। एक दिन तो उन लोगों ने नवनीत का खाना बनाने वाला छोटा सिलेंडर भी छीन लिया और उसका सामान बाहर फेंक दिया। उस रात नवनीत भूखे पेट सोने की तैयारी कर रहा था, तभी उसकी कुंडी खटखटी।

बाहर अंशिका खड़ी थी। उसने कहा, “चलिए, मां बुला रही है, खाना खा लीजिए।” नवनीत ने मना किया, पर अंशिका उसे हाथ पकड़कर जबरदस्ती ले गई। वहां शारदा रो रही थी। उस रात शारदा ने नवनीत से कहा, “बेटा, अब से तुम अकेले नहीं बनाओगे। जो हम खाएंगे, वही तुम्हें भी खिलाएंगे। तुम बस पढ़ाई पर ध्यान दो।”

शारदा और अंशिका ने नवनीत को अपने परिवार का हिस्सा बना लिया। जब नवनीत के पैसे खत्म हो गए और वह पहले प्रयास में प्रीलिम्स (Prelims) फेल हो गया, तो वह घर लौटने लगा। तब शारदा ने उसे रोका और कहा, “पैसे की चिंता मत करो, मैं एक-दो घरों में और काम पकड़ लूंगी, पर तुम जाओ मत।” अंशिका ने भी अपनी छोटी सी नौकरी शुरू की ताकि वह नवनीत के लिए किताबें और फॉर्म के पैसे जुटा सके।

अध्याय 4: सफलता का शोर और ढोल-नगाड़े

नवनीत का संघर्ष अब सिर्फ उसका नहीं, बल्कि उस पूरे परिवार का था। अंशिका रात-रात भर जागकर नवनीत के लिए पंखा झेलती थी ताकि वह बिना किसी बाधा के पढ़ सके। लाइट जाने पर वे मोमबत्तियां जलाकर उसे रोशनी देती थीं।

साल 2019 का वह दिन आया जब यूपीएससी का परिणाम घोषित हुआ। नवनीत अपने छोटे से कमरे में कंप्यूटर स्क्रीन पर अपना रोल नंबर देख रहा था। जैसे ही उसे अपनी सफलता का पता चला, वह फूट-फूटकर रोने लगा। अंशिका और शारदा दौड़कर आईं। नवनीत ने लड़खड़ाती आवाज में कहा, “आंटी… मैं आईएएस बन गया!”

उस दिन तमारपुर की उस झुग्गी में ऐसा जश्न मना जैसा कभी किसी ने नहीं देखा था। ढोल-नगाड़े बजने लगे और पूरा इलाका उस लड़के को देखने आया जिसने गरीबी को मात दे दी थी।

अध्याय 5: एक अधूरा वादा और नई शुरुआत

सफलता के बाद नवनीत को अपने गांव कर्नाटक जाना था। वह अपने साथ शारदा, अंशिका और उनके पूरे परिवार को लेकर गया। गांव में उनका भव्य स्वागत हुआ। नवनीत ने अपने पिता से कहा, “पिताजी, आज मैं जो कुछ हूँ, इन लोगों की वजह से हूँ।”

जब शारदा और अंशिका वापस दिल्ली लौटने की तैयारी करने लगीं, तो नवनीत ने अंशिका का हाथ थाम लिया। उसने कहा, “क्या तुम्हारा जाना जरूरी है? अगर तुम चली गई तो मेरी यह सफलता अधूरी रहेगी। अंशिका, मैं तुमसे प्यार करता हूँ और तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता हूँ।”

अंशिका की आंखों में आंसू आ गए। उसने भी नवनीत को हमेशा चाहा था, पर कभी कहने की हिम्मत नहीं की थी। परिवार की सहमति से, नवनीत की ट्रेनिंग पूरी होने के बाद साल 2022 में दोनों की शादी हो गई।

निष्कर्ष

आज नवनीत कुमार महाराष्ट्र कैडर में एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं। शारदा अब किसी के घर काम नहीं करतीं, बल्कि अपने आईएएस दामाद के साथ एक आलीशान घर में रहती हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसानियत और कड़ी मेहनत से किसी भी परिस्थिति को बदला जा सकता है। नवनीत ने न केवल अपना सपना पूरा किया, बल्कि उस परिवार को भी एक नई जिंदगी दी जिसने अंधेरे में उसका हाथ थामा था।

शिक्षा: सफलता के रास्ते में आने वाली रुकावटें अक्सर आपको यह बताने आती हैं कि आपका साथ देने वाले ‘फरिश्ते’ कौन हैं।