गंगा-जमुनी तहजीब की नई इबारत: जब लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘इबादत’ के लिए ‘इंसानियत’ ने पहरा दिया

प्रस्तावना: नफरत के दौर में मोहब्बत का पैगाम

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, जिसे अपनी नफासत, तहजीब और ऐतिहासिक विरासत के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, हाल ही में एक ऐसी घटना की गवाह बनी जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें कुछ छात्र जमीन पर नमाज अदा कर रहे हैं और उनके चारों ओर हिंदू छात्रों ने एक ‘मानव श्रृंखला’ (Human Chain) बनाकर उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान किया है।

यह दृश्य केवल एक विरोध प्रदर्शन की तस्वीर नहीं है, बल्कि यह उस भारत की झलक है जहाँ धर्म दूरियाँ पैदा करने के बजाय दिलों को जोड़ने का काम करता है। लखनऊ विश्वविद्यालय (Lucknow University) के परिसर में घटी यह घटना ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ (Communal Harmony) की एक ऐसी मिसाल है, जो आज के ध्रुवीकरण वाले समय में एक ठंडी फुहार की तरह महसूस होती है।

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भाग 1: विवाद की जड़ — लाल बरादरी मस्जिद और प्रशासन का फैसला

लखनऊ विश्वविद्यालय के भीतर स्थित ‘लाल बरादरी’ एक ऐतिहासिक इमारत है। इसका निर्माण सन 1800 में नसीरुद्दीन हैदर द्वारा कराया गया था। विश्वविद्यालय के अस्तित्व में आने से बहुत पहले बनी यह इमारत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्थल है। इसी परिसर में एक प्राचीन मस्जिद भी है, जहाँ लंबे समय से छात्र और स्थानीय लोग नमाज अदा करते आ रहे हैं।

विवाद तब शुरू हुआ जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के मस्जिद के प्रवेश द्वार पर बैरिकेडिंग कर दी और वहां फेंसिंग (घेराबंदी) लगाने का काम शुरू कर दिया। प्रशासन का तर्क था कि यह सुरक्षा और सौंदर्यीकरण के लिए किया जा रहा है, लेकिन छात्रों ने इसे एक खास समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार माना।


भाग 2: विरोध का स्वर और ‘अल्लाह-हू-अकबर’ की गूँज

रविवार दोपहर जब फेंसिंग के लिए खुदाई शुरू हुई, तो देखते ही देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया। एनएसयूआई (NSUI), समाजवादी छात्र सभा और एआईएसए (AISA) जैसे विभिन्न छात्र संगठनों के नेता और सदस्य मौके पर इकट्ठा हो गए। छात्रों का आरोप था कि विश्वविद्यालय प्रशासन जानबूझकर इस ऐतिहासिक स्थल को सील कर रहा है ताकि वहां धर्म विशेष के लोगों के प्रवेश को रोका जा सके।

नाराजगी इतनी बढ़ गई कि छात्रों ने प्रशासन द्वारा लगाई गई बैरिकेडिंग को गिरा दिया और नारेबाजी करते हुए बिल्डिंग के पास जा पहुँचे। चूंकि मस्जिद का दरवाजा बंद था, इसलिए छात्रों ने मस्जिद के बाहर ही नमाज अदा करने का निर्णय लिया।


भाग 3: वह पल जिसने इतिहास रच दिया — ‘मानव श्रृंखला’

नमाज शुरू होने ही वाली थी कि परिसर में भारी पुलिस बल तैनात हो गया। माहौल में एक अनजाना डर था कि कहीं कोई अप्रिय घटना न घट जाए। इसी बीच, विश्वविद्यालय के हिंदू छात्रों ने एक ऐसा कदम उठाया जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी।

जैसे ही मुस्लिम छात्रों ने नमाज के लिए कतारें बनाईं, हिंदू छात्रों ने उनके चारों ओर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक घेरा बना लिया। उन्होंने एक ‘मानव श्रृंखला’ बनाई ताकि नमाज पढ़ रहे उनके भाइयों को कोई परेशान न कर सके और वे शांतिपूर्वक अपनी इबादत पूरी कर सकें।

यह केवल सुरक्षा नहीं थी, यह एक संदेश था कि—“तुम अपनी इबादत करो, हम तुम्हारे पहरेदार हैं।” जब तक नमाज खत्म नहीं हुई, वह घेरा अडिग रहा। नमाज के बाद हिंदू और मुस्लिम छात्रों ने एक-दूसरे को गले लगाया और शांति का संदेश दिया।


भाग 4: इफ्तार और भाईचारे की मिठास

शाम ढलते-ढलते विरोध प्रदर्शन एक सामूहिक आयोजन में बदल गया। उसी स्थान पर जहाँ दोपहर में नमाज पढ़ी गई थी, शाम को इफ्तार का आयोजन किया गया। हिंदू छात्रों ने अपने हाथों से मुस्लिम छात्रों को खजूर और पकवान परोसे। नफरत की राजनीति और प्रशासनिक खींचतान के बीच, लखनऊ विश्वविद्यालय का वह कोना भाईचारे की खुशबू से महक उठा।

छात्रों का कहना था कि प्रशासन चाहे कितनी भी दीवारें खड़ी कर ले, वे आपसी प्रेम और एकता की दीवारों को कभी गिरने नहीं देंगे।


भाग 5: राजनीतिक और प्रशासनिक पहलू — एक साजिश या प्रक्रिया?

छात्रों ने गंभीर आरोप लगाए कि विश्वविद्यालय परिसर में हाल के दिनों में कई राजनीतिक दिग्गजों के दौरे हुए हैं, जिसके बाद ही मस्जिद को सील करने का निर्णय लिया गया। उनका तर्क है कि चूंकि यह स्थल एएसआई (ASI) के अधीन है, इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन बिना उनकी अनुमति के वहां कोई निर्माण कार्य या घेराबंदी नहीं कर सकता।

रजिस्ट्रार कार्यालय की ओर से जारी एक पत्र के अनुसार, फेंसिंग का कार्य सुरक्षा कारणों से किया जा रहा था। हालांकि, मौके पर प्रशासन का कोई भी जिम्मेदार अधिकारी छात्रों से बातचीत करने नहीं पहुँचा, जिससे आक्रोश और बढ़ गया।


भाग 6: क्यों जरूरी है यह मिसाल?

आज के दौर में जब छोटी-छोटी बातों पर सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाता है, लखनऊ की यह घटना एक प्रकाश स्तंभ की तरह है। यह हमें याद दिलाती है कि:

युवा शक्ति: देश का युवा नफरत की राजनीति से ऊपर उठकर इंसानियत को प्राथमिकता दे रहा है।

संवैधानिक मूल्य: धार्मिक स्वतंत्रता और आपसी सम्मान हमारे लोकतंत्र की आत्मा है।

विश्वविद्यालय की भूमिका: शैक्षणिक संस्थान केवल डिग्री देने की जगह नहीं, बल्कि बेहतर इंसान बनाने की कार्यशाला हैं।


निष्कर्ष: इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं

लखनऊ विश्वविद्यालय की लाल बरादरी मस्जिद के सामने खिंची गई वह ‘मानव श्रृंखला’ भविष्य के भारत की तस्वीर है। यह वह भारत है जिसे नसीरुद्दीन हैदर और हमारे पूर्वजों ने मिलकर संवारा था। यह वह भारत है जहाँ अजान और आरती के सुर आपस में मिलकर शांति का संगीत पैदा करते हैं।

विश्वविद्यालय प्रशासन को चाहिए कि वह छात्रों की भावनाओं का सम्मान करे और बातचीत के जरिए इस विवाद का हल निकाले। दीवारें ईंट और पत्थर की हो सकती हैं, लेकिन जो दीवारें दिलों के बीच खड़ी की जाती हैं, उन्हें गिराना मुश्किल होता है। लखनऊ के छात्रों ने उन अदृश्य दीवारों को गिराकर एक नया इतिहास लिख दिया है।

अंतिम संदेश: नमाज और सुरक्षा का यह तालमेल बताता है कि जब हम साथ खड़े होते हैं, तो नफरत की हर साजिश नाकाम हो जाती है। लखनऊ की तहजीब आज भी जिंदा है और इसे बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी है।


लेख के मुख्य बिंदु (Key Highlights):

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: लाल बरादरी का महत्व और एएसआई का संरक्षण।

विवाद का केंद्र: मस्जिद की घेराबंदी और छात्रों का विरोध।

सांप्रदायिक एकता: हिंदू छात्रों द्वारा बनाई गई मानव श्रृंखला।

सामाजिक संदेश: इफ्तार के माध्यम से एकता का प्रदर्शन।