जब SP मैडम मजदूर बनकर गाँव पहुँची ; जहाँ गाँव का प्रधान मजदूरों पर जुल्म करता था , फिर जो हुआ

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जब SP मैडम मजदूर बनकर गाँव पहुँची — और प्रधान का जुल्म उजागर हो गया

रामपुर ज़िले की हवा में एक अजीब-सी ख़ामोशी थी—जैसे खेतों की मिट्टी भी कुछ कहना चाहती हो, पर डर के कारण चुप हो। शहर की धूल और शोर से दूर यह इलाका ऊपर से जितना शांत दिखता था, भीतर उतना ही बेचैन था। लोगों की आँखों में उम्मीद की चमक थी, लेकिन उस चमक के पीछे भय की परतें भी जमी थीं।

इसी रामपुर की कमान संभालने आई थीं—युवा, तेज़ और अपने उसूलों की पक्की आईपीएस अधिकारी अनुप्रिया सिंह। नाम जितना सरल, इरादे उतने ही फौलादी। उनके आने की खबर से पुलिस लाइन में हलचल थी, पर उससे भी ज़्यादा हलचल गांवों के चूल्हों के पास थी—जहाँ लोग धीमी आवाज़ में एक-दूसरे से पूछते थे:

“नई SP मैडम कैसी होंगी?”
“क्या सच में न्याय दिला पाएँगी?”
“या फिर बाकी अफसरों की तरह फाइलों में खो जाएँगी?”

अनुप्रिया ने चार्ज संभाला। पहली मीटिंग में उन्होंने अपराध-रजिस्टर, विकास-रिपोर्ट, पंचायत-रिकॉर्ड—सब देखा। बाहर से ज़िला सामान्य लग रहा था: छोटी-मोटी चोरियाँ, ज़मीनी विवाद, घरेलू झगड़े, शराब के मामले। लेकिन अनुप्रिया जानती थीं—जो सतह पर दिखता है, असली तूफ़ान अक्सर उसके नीचे पलता है।

1. गुमनाम चिट्ठी और भीतर उठता तूफ़ान

चार्ज संभाले एक हफ्ता भी नहीं बीता था। शाम का वक्त था। ऑफिस से निकलने ही वाली थीं कि एक चपरासी उनके पास आया, हाथ में एक सादा-सा लिफाफा।

“मैडम… ये… आपके लिए आया है,” चपरासी ने धीमे से कहा।

अनुप्रिया ने लिफाफा देखा। न कोई नाम, न पता। बस लिखा था—“SP साहिबा के लिए”

उन्होंने तुरंत खोला। अंदर एक कागज़ था—टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट, जैसे लिखने वाला बहुत डरा हुआ हो या पढ़ा-लिखा कम हो। चिट्ठी पढ़ते ही अनुप्रिया के चेहरे की कठोरता बदल गई। आँखों के किनारों पर गुस्सा भी था और दर्द भी।

“मैडम जी, हम बिशनपुर गाँव के गरीब मजदूर हैं। मनरेगा में महीनों से काम कर रहे हैं—तालाब खोदा, सड़क पर मिट्टी डाली—पर मजदूरी नहीं मिली। प्रधान हरपाल सिंह कहता है बजट नहीं आया। पर हमें पता चला पैसा कब का आ चुका है। प्रधान हमारे पैसे खा रहा है। उसके गुंडे धमकाते हैं—शिकायत की तो जान से मार देंगे। हमारे बच्चे भूखे सोते हैं। आप ही हमारी आखिरी उम्मीद हैं। हमें बचा लीजिए।”

नीचे किसी का नाम नहीं था।

अनुप्रिया ने चिट्ठी दो-तीन बार पढ़ी। हर शब्द जैसे दिल में तीर बनकर धँस रहा था। उन्हें गुस्सा प्रधान पर आ रहा था, पर उससे भी ज़्यादा चिंता उन मजदूरों की थी—जो इतना डरते थे कि अपना नाम तक लिख नहीं सके।

उन्होंने तुरंत अपने भरोसेमंद इंस्पेक्टर विजय शर्मा को बुलाया। शर्मा अनुभवी थे—जिले की हर नस उन्हें पता थी।

अनुप्रिया ने चिट्ठी बढ़ाई, “शर्मा… ये पढ़ो।”

शर्मा ने पढ़ते ही लंबी साँस ली। “मैडम, मामला बहुत गंभीर है। हरपाल सिंह कोई साधारण प्रधान नहीं। उसके ताल्लुकात विधायक रतन चौधरी से हैं। अगर हम सीधा छापा मारेंगे, वो सबूत मिटा देगा, गवाह डरा देगा… हमारे हाथ कुछ नहीं लगेगा।”

अनुप्रिया खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गईं। बाहर अंधेरा उतर रहा था। कुछ सेकंड—बहुत लंबे लग रहे थे। फिर वह पलटीं, आँखों में ऐसा निर्णय था जो बहस नहीं चाहता।

“तुम ठीक कह रहे हो, शर्मा। सीधे तरीके से मगरमच्छ नहीं पकड़ा जाएगा। जाल बिछाना होगा—और ऐसा, जिसकी उसे भनक तक न लगे।”

शर्मा ने पूछा, “कैसा जाल, मैडम?”

अनुप्रिया का स्वर शांत था—पर उसके नीचे चट्टान जैसी कठोरता।
“इस बार जांच कोई टीम नहीं करेगी। इस बार जांच… मैं खुद करूंगी।

“आप? कैसे?” शर्मा घबरा गए।

अनुप्रिया ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—वह मुस्कान जिसमें तूफान छिपा होता है।
मजदूर बनकर।

शर्मा के चेहरे का रंग उड़ गया। “मैडम, आप SP हैं! आपकी जान को खतरा हो सकता है। ये पागलपन है!”

अनुप्रिया ने बेहद स्थिर स्वर में कहा, “पागलपन नहीं, जरूरत है। मजदूरों का भरोसा जीतना होगा। उनके बीच रहकर दर्द समझना होगा। वर्दी में गई तो वे डरेंगे, बोलेंगे नहीं। मुझे ‘अनु’ बनना होगा—एक बेबस मजदूर, जिसे सिर्फ दो वक्त की रोटी चाहिए।”

शर्मा जान गए—अब मैडम को कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने सिर झुकाया।
“हुक्म दीजिए, मैडम।”

2. “अनु” का जन्म और बिशनपुर की मिट्टी

अगली सुबह SP की सरकारी गाड़ी हेडक्वार्टर से निकली—सबको दिखाने के लिए कि मैडम बाहर जा रही हैं।
पर गाड़ी में अनुप्रिया नहीं थीं।

अनुप्रिया तो जिले के एक कोने में एक छोटे कमरे में अपना रूप बदल रही थीं। महंगी साड़ी की जगह फीकी पुरानी सूती साड़ी। ब्रांडेड सैंडल की जगह टूटी चप्पल। बाल बिखरे। चेहरे पर हल्की धूल—ताकि शहर की चमक मिट जाए। हाथ में एलुमिनियम का तसला और फावड़ा।

आईने में खुद को देखा तो एक पल के लिए खुद भी पहचान न पाईं। सामने SP नहीं थी—एक थकी, गरीब मजदूर औरत थी, जिसकी आँखों में मजबूरी का सन्नाटा था।

उन्होंने धीमे से कहा, “ठीक है… मिशन शुरू।”

बस हिचकोले खाती हुई कच्ची सड़क पर चली जा रही थी। भीतर मजदूरों की भीड़, पसीने और बीड़ी की गंध। अनुप्रिया—अब अनु—कोने में बैठी सब देख रही थीं। लोग उन्हें अजीब नजरों से देख रहे थे—नया चेहरा था।

गाँव के अड्डे पर उतरकर अनु ने आसपास देखा। टूटे घर, नंगे पैर बच्चे, सूखे चेहरे। गरीबी ऐसे फैली थी जैसे हवा में धुआँ घुला हो।

वह सीधे उस जगह पहुँचीं जहाँ मनरेगा का काम चल रहा था—सूखा पड़ा तालाब गहरा किया जा रहा था। पचास के करीब मजदूर—पुरुष, महिलाएँ—चुपचाप फावड़े चला रहे थे। धूप आग उगल रही थी, पर पेट की आग उससे भी ज्यादा थी।

अनु मुंशी के पास गईं। अपनी आवाज में पूरी लाचारी घोल दी।

“साहब… कोई काम मिलेगा? बहुत गरीब हूं। बच्चों ने दो दिन से कुछ नहीं खाया…”

मुंशी ने ऊपर से नीचे देखा—नई लगती है।
“कहाँ से आई है?”
“पास के गाँव से… वहाँ काम नहीं मिला…”
“ठीक है, लग जा। दिन का जो बनेगा, मिलेगा।”

अनु मजदूरों में शामिल हो गईं। फावड़ा उठाया, जमीन पर चलाया। पुलिस ट्रेनिंग से शरीर मजबूत था, पर यह श्रम अलग था—यह भूख का श्रम था। कुछ ही घंटों में हाथों में जलन, पीठ में दर्द, माथे से पसीना। तसला सिर पर उठा-उठाकर चलना—पहली बार अनु को एहसास हुआ कि “रोज़गार” शब्द जितना छोटा है, मजदूर का दिन उतना लंबा।

3. राधा की दोस्ती, डर की दीवार

दोपहर में सबने पोटली खोली। किसी के पास सूखी रोटी-नमक, किसी के पास प्याज। अनु ने अपनी रोटी-अचार निकाली।

तभी पास बैठी एक औरत—उम्र 35-40, चेहरे पर वक्त से पहले झुर्रियाँ—उसने पूछा,
“नई आई हो बहन?”

“हाँ दीदी…”

“कहाँ से?”

अनु ने पहले से तैयार कहानी सुनाई—पति नहीं, बच्चे हैं, पेट पालना है। औरत का नाम था राधा। राधा की आँखों में हमदर्दी उतर आई।

“हम सबका यही हाल है बहन। दिन भर मरते हैं… और हाथ में कुछ नहीं आता।”

अनु ने मौका देखा। “क्यों दीदी? मुंशी तो कह रहा था 200 रोज मिलेंगे…”

राधा हँसी—कड़वी हँसी।
“कहने को तो बहुत कुछ है बहन। तीन महीने से एक पैसा नहीं मिला। प्रधान हरपाल कहता है बजट नहीं आया। और ज्यादा पूछो तो गुंडे घर आकर धमकाते हैं।”

साथ बैठी कमला अचानक डर गई। “राधा चुप! कोई सुन लेगा तो मुसीबत! नई आई है… क्यों डरा रही?”

अनु समझ गई—डर बहुत गहरा है। लोग सच बोलते हुए भी काँपते हैं।
उसने बात बदल दी, “दीदी पानी मिलेगा?”

राधा ने अपनी बोतल से पानी पिलाया। एक छोटा-सा रिश्ता बन गया—विश्वास का।

शाम को मुंशी ने हाजिरी लगाई और वही रटी-रटाई बात कही—“पैसे आएँगे तब मिलेंगे।”

अनु रात को गांव के बाहर पुराने मंदिर के चबूतरे पर लेटीं। शरीर दर्द से टूट रहा था, मगर मन उससे भी ज्यादा। उन्हें लगा—वर्दी में बैठकर “योजनाएँ” बनाना आसान है, लेकिन गरीबी जीना… बहुत मुश्किल।

4. प्रधान हरपाल का जुल्म और अनु का बढ़ता संकल्प

तीसरे दिन प्रधान हरपाल सिंह चमचमाती जीप में आया। उतरने की ज़रूरत नहीं समझी। दो गुंडे साथ। मुंशी भागकर गया, सिर झुकाकर खड़ा हो गया।

प्रधान ने शीशा नीचे किया, “काम तेज कर! बहानेबाज़ी नहीं चाहिए!”

फिर उसकी नजर मजदूरों पर पड़ी—आँखों में घमंड और नफरत।
एक बूढ़े मजदूर ने हिम्मत की, “मालिक… पैसे कब मिलेंगे? घर में फाके हैं…”

प्रधान हँसा। “जब मिलेंगे तब दूंगा। ज्यादा होशियार बना तो काम भी छीन लूंगा। चुपचाप काम करो!”

जीप धूल उड़ाती निकल गई। मजदूरों के चेहरे पर गुस्सा था, लाचारी थी, पर आवाज़ नहीं थी।

उसी रात राधा रोती हुई अनु के पास आई।
“बहन… मेरी बेटी को तेज बुखार है… डॉक्टर के पैसे नहीं… प्रधान से उम्मीद थी… पर वो जल्लाद…”

अनु का दिल काँप गया। उसने तुरंत अपनी साड़ी के पल्लू में छिपाए कुछ पैसे निकाले और राधा के हाथ में रख दिए।
“ये रख लो दीदी। बच्ची को डॉक्टर को दिखाओ।”

राधा ने मना किया। “तुम खुद गरीब हो…”
अनु ने उसका हाथ दबाया। “अभी बच्ची जरूरी है। इसे उधार समझ लो।”

राधा ने उन्हें गले लगा लिया। “तुम देवी हो…”

उस रात अनु सो नहीं पाईं। उन्हें चिंता भी थी और एक सुकून भी—विश्वास बनने लगा था। और विश्वास, कई बार किसी दस्तावेज़ से बड़ा सबूत होता है।

5. गुंडों की दस्तक और अनु का असली रूप झलकता है

अगले दिन शाम को अनु राधा के घर पहुँचीं। घर छोटा, टूटा—अंदर बच्ची बुखार में तप रही थी। बूढ़ी सास माथे पर पट्टी रख रही थी। राधा पत्थर बनी बैठी थी।

अचानक दरवाज़े पर दो आदमी—प्रधान के गुंडे।
एक बोला, “ओए राधा! प्रधान ने बुलाया है!”

राधा काँपी। “मैं नहीं आ सकती… बेटी बीमार है…”

गुंडा हँसा। “बीमार है तो क्या? हिसाब देना पड़ेगा। तूने ही सबको भड़काया!”

वह राधा को खींचने लगा।

और यहीं अनु का खून खौल उठा। वह भूल गई कि वह मजदूर बनी है। वह आगे बढ़ी, गुंडे का हाथ झटक दिया।

“छोड़ उसका हाथ! औरत पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे हुई?”

गुंडे हैरान—एक साधारण औरत में इतनी हिम्मत?
दूसरा गुर्राया, “ज्यादा बोल मत, वरना कुचल देंगे। तू कौन है?”

अनु की आवाज़ पत्थर जैसी हो गई।
“मैं कौन हूँ, ये जानने की जरूरत नहीं। पर इतना याद रख—मैं डरती नहीं।”

गुंडे हँसे। “चल, इसको भी ले चलते हैं—प्रधान के पास।”

वे अनु की ओर बढ़े।
अब अनु के पास विकल्प नहीं था। उसने एक गुंडे के पेट में जोरदार लात मारी, दूसरे की कलाई पकड़कर ऐसी मोड़ी कि वह चीख उठा। दोनों जमीन पर। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था।

अनु दहाड़ी, “निकालो यहाँ से!”

गुंडे भाग गए।

राधा और सास सन्न। राधा ने काँपती आवाज़ में पूछा,
“तुम… तुम कौन हो, अनु? तुम मामूली औरत नहीं…”

अनु ने खुद को संभाला। अभी सच बताने का समय नहीं था।
उसने बस कहा, “मैं तुम्हारी बहन हूँ, दीदी। और बहन… बहन को अकेला नहीं छोड़ती।”

फिर उसने राधा को और पैसे दिए। “सरकारी अस्पताल ले जाओ। इलाज होगा। मैं सब संभालूँगी।”

राधा चली गई। अनु के भीतर निर्णय और गहरा हो गया। अब आखिरी चाल चलनी थी।

6. आखिरी चाल: प्रधान की हवेली में तूफान

उस रात अनु ने किसी तरह इंस्पेक्टर शर्मा से संपर्क किया।
“शर्मा, कल सुबह ठीक 11 बजे फोर्स लेकर बिशनपुर के बाहर तैयार रहना। मेरे इशारे का इंतजार।”

अगली सुबह अनु काम पर नहीं गई। वही सादी साड़ी पहनी और सीधे प्रधान की हवेली की ओर चल पड़ी। गाँव के लोग देखते रहे—मानो वह मौत को बुलावा दे रही हो।

हवेली… सच में हवेली थी। ऊँची दीवारें, बड़ा गेट, दरबान।
दरबान ने रोका, “कौन है तू?”

अनु ने शांत पर मजबूत आवाज में कहा, “प्रधान से मिलना है। कहो कल वाली औरत आई है।”

अंदर बुला लिया गया।

अंदर का ऐश देखकर अनु का खून ठंडा पड़ गया। चमचमाते सोफे, बड़ा टीवी, महंगी सजावट—सब गरीबों की मेहनत से।

बीच में प्रधान हरपाल सिंह राजा की तरह बैठा। गुंडे आसपास।
प्रधान ने घूरा, “तो तू है वो! मेरे आदमियों पर हाथ उठाया?”

अनु बिना डरे बोली, “हिम्मत तो तुम्हारी है, प्रधान—गरीबों की मजदूरी खाकर भी शर्म नहीं आती।”

गुंडे हँसे। प्रधान का चेहरा तमतमा गया।
“एक मजदूर होकर मुझसे सवाल करती है? तुझे पता नहीं मैं क्या चीज हूँ!”

अनु ने कहा, “मैं जानती हूँ तुम क्या चीज हो—चोर। तुम इनका हक खा रहे हो। मैं एक ही बात कहने आई हूँ—इनकी पाई-पाई लौटाओ।”

प्रधान ने गुस्से में आदेश दिया, “इस औरत को इतना मारो कि ये बोलना भूल जाए। फिर गांव के बाहर फेंक दो—ताकि कोई सवाल न पूछे!”

गुंडे बढ़े।

लेकिन अनु हिली नहीं। डर का कोई निशान नहीं।
उसने अपनी आवाज़ बदली—अब वह मजदूर की नहीं, अफसर की लगी।
“मैंने तुम्हें मौका दिया था, प्रधान… लेकिन तुम जैसे लोग सीधी भाषा नहीं समझते।”

फिर उसने घूंघट हटाया।

कमरे में सन्नाटा।
इसी पल बाहर पुलिस सायरनों की आवाज़। हवेली घिर चुकी थी। कमांडो गेट तोड़कर अंदर घुस आए। इंस्पेक्टर शर्मा सबसे आगे।

प्रधान के हाथ-पैर काँपने लगे।
और तब… अनु ने अपने पल्लू के नीचे पहनी वर्दी को स्पष्ट किया—आईपीएस की चमकती पहचान।

उसकी आवाज़ अब गरजी:
“पहचाना मुझे, हरपाल सिंह? मैं SP अनुप्रिया सिंह हूँ। पाँच दिन से तुम्हारे गाँव में मजदूर बनकर थी। तुम्हारे हर गुनाह का सबूत है मेरे पास—सरकारी फंड का गबन, धमकी, धोखाधड़ी… सब।”

प्रधान गिर पड़ा। “माफ कर दो मैडम… पैसे लौटा दूँगा!”

अनुप्रिया ने ठंडे स्वर में कहा, “माफी अब कोर्ट में मांगना।”
फिर शर्मा को इशारा—“अरेस्ट हिम।”

हथकड़ी लगी। गुंडे भी पकड़े गए।

7. गाँव की जागती उम्मीद

खबर आग की तरह फैल गई। मजदूर हवेली के बाहर जमा हो गए।
जब उन्होंने प्रधान को हथकड़ी में देखा, कई लोग रो पड़े—खुशी से, राहत से।

उन्होंने अनुप्रिया को देखा—वर्दी में—और विश्वास नहीं कर पाए कि वही “अनु” थी जो उनके साथ मिट्टी ढोती थी।

अनुप्रिया ने माइक लिया।
“अब डरने की जरूरत नहीं। आपका गुनहगार पकड़ा गया। आपकी मेहनत का एक-एक पैसा आपको मिलेगा—ये मेरा वादा है।”

गाँव “SP मैडम ज़िंदाबाद” के नारों से गूंज उठा।

राधा भी बेटी के साथ आई। उसने हाथ जोड़ दिए।
“मैडम… हम पहचान ही नहीं पाए… आपने हमारी जान बचा ली।”

अनुप्रिया ने उसे उठाया, गले लगाया।
“मैंने कुछ नहीं किया, दीदी। तुमने डर के बावजूद सच जिया। बस याद रखना—अन्याय सहना मत।”

प्रधान की संपत्ति की जांच हुई। रिकॉर्ड जब्त हुआ। बकाया मजदूरी सीधे खातों में आई। बिशनपुर की हवा से डर का बोझ उतर गया।

पर अनुप्रिया जानती थीं—एक हरपाल गया, तो दूसरा उठेगा।

8. अगली आँधी: जहरीली शराब और बड़ा मगरमच्छ

छह महीने बीत गए। एक दिन इंस्पेक्टर शर्मा का फोन आया—आवाज़ काँप रही थी।
“मैडम… अनर्थ हो गया। सोहनपुर में जहरीली शराब से आठ लोगों की मौत… पंद्रह अस्पताल में…”

अनुप्रिया के हाथ से फाइल गिर गई। वह तुरंत टीम लेकर निकल पड़ीं।

गाँव का दृश्य दिल दहला देने वाला था। चीखें, रोना, लाशें, बेहोश बच्चे। कई घरों में एक रात में विधवापन उतर आया था।

अनुप्रिया एक घर में गईं—वहाँ कमला… वही कमला जो कभी उन्हें चुप रहने को कहती थी—पति की लाश से लिपटकर रो रही थी।

कमला चिल्लाई, “मैडम… सब खत्म हो गया… मैं बच्चों को लेकर कहाँ जाऊँ?”

अनुप्रिया का दिल गुस्से और दुख से भर गया।
“मैं इन मौतों के जिम्मेदारों को पाताल से भी निकालूंगी।”

पर इस बार कोई बोलने को तैयार नहीं था। ठेका मालिक फरार। शराब बाँटने वाले गायब। ऊपर से दबाव—विधायक रतन चौधरी का फोन आया:

“SP साहिबा, ज्यादा उछल-कूद मत कीजिए। गरीब लोग खुद पीकर मरते हैं। मामला दबाइए।”

अनुप्रिया को यकीन हो गया—तार विधायक तक जाते हैं।
पर सबूत?

वर्दी में हर दरवाजा बंद था। गवाह डरते थे। तब अनुप्रिया ने वही रास्ता चुना जो पहले सफल हुआ था—अंडरकवर।

9. ढाबा, ‘भारती’ और मौत का नेटवर्क

अनुप्रिया ने पता लगाया—अवैध शराब का नेटवर्क हाईवे से चलता है। ढाबे अपराधियों के अड्डे हैं।
उन्होंने फैसला किया—ढाबा चलाएँगी।

दो हफ्ते बाद हाईवे पर 30 किमी दूर एक बंद ढाबा खुला। बोर्ड लगा—“भारती का ढाबा — घर जैसा खाना”
मालकिन: भारती (यानी अनुप्रिया)
साथ में “छोटा भाई”—असल में एक अंडरकवर कांस्टेबल।

कहानी: भारती विधवा है, पेट पालने को ढाबा चला रही।

धीरे-धीरे ट्रक ड्राइवर आने लगे। खाना अच्छा था। महफिलें जमने लगीं। शराब, बातें, सौदे। भारती चुपचाप बर्तन धोती, पर कान जागते रहते।

एक रात बात निकली—“इस बार पटियाला का रेट बढ़ गया… चौधरी साहब रिस्क नहीं लेना चाहते… माल तगड़ा चाहिए।”

अनुप्रिया समझ गई—पटियाला कोड वर्ड है। चौधरी = विधायक।
और “भंगा” नाम सामने आया।

शर्मा ने पता लगाया—भंगा विधायक का खास गुंडा है।

कुछ दिन बाद एक जीप रुकी। भारी-भरकम आदमी उतरा—आँखें खौफ। ढाबे पर सब चुप।
अनुप्रिया ने मन में कहा—“यही भंगा है।”

भंगा बैठा, “ओए खाना ला… बढ़िया वाला।”

खाते-खाते पूछ बैठा, “हफ्ता कौन देता है? ढाबा चलाना है तो हिस्सा देना पड़ेगा।”

अनुप्रिया ने डर का नाटक किया।
भंगा बोला, “कल से मेरा आदमी आएगा। आधा हिस्सा देगा, समझी?”

अब मछली जाल में थी। भंगा रोज़ आने लगा। और उसी बीच अनुप्रिया ने ढाबे में छिपे कैमरे-रिकॉर्डर लगा दिए।

धीरे-धीरे सच्चाई खुली—विधायक चुनाव के लिए पैसे जुटा रहा था; जहरीली शराब उसी का धंधा।
हरपाल भी जमानत पर बाहर आ चुका था और नेटवर्क में मदद कर रहा था।

पर शराब बनती कहाँ थी?
एक रात भंगा नशे में बोला—“कल सुबह 5 बजे पुरानी मिल पहुँचना… नया माल ठिकाने लगाना है।”

अनुप्रिया का दिल धड़क उठा।
पुरानी चीनी मिल—सालों से बंद—वहीं मौत का कारखाना!

उन्होंने शर्मा को मिस्ड कॉल किया—इमरजेंसी संकेत—और मैसेज: “पुरानी मिल, सुबह 5 बजे।”

भंगा को रोकना जरूरी था। अनुप्रिया ने “स्पेशल चाय” दी—हल्की नींद की दवा मिलाकर। भंगा और उसके साथी सो गए।

10. ऑपरेशन ‘पुरानी मिल’ और विधायक का अंत

सुबह 4:30—दर्जनों पुलिस गाड़ियाँ मिल की तरफ।
अब भारती नहीं—SP अनुप्रिया सिंह ऑपरेशन लीड कर रही थीं।

मिल घेर ली गई। अंदर मशीनें चल रही थीं, केमिकल की गंध, ड्रमों में जहरीली शराब।
तभी गाड़ी आई—विधायक रतन चौधरी और हरपाल उतरे।

विधायक बोला, “कितना माल तैयार?”
हरपाल बोला, “सब… आज रात बाँट देंगे।”

यही सबसे बड़ा सबूत था—जुबानी कबूलनामा।

इशारा हुआ—फोर्स अंदर घुसी। भगदड़। विधायक भागा, हरपाल भागा—पर दोनों पकड़े गए।

विधायक धमकी देने लगा, “मैं एक मिनट में तेरी वर्दी उतरवा दूँगा!”

अनुप्रिया आगे आईं। सितारे चमके।
“मैं SP अनुप्रिया सिंह हूँ, विधायक जी। और अब आपकी ‘कुर्सी’ उतरेगी। आपके खिलाफ हत्या, अवैध कारोबार, चुनावी धांधली—सबका केस चलेगा।”

उन्होंने खुद विधायक को हथकड़ी पहनाई।

हरपाल सिंह अनुप्रिया को देखकर सन्न रह गया—“दूसरी बार… वही जाल!”

11. न्याय का सुकून, पर लड़ाई जारी

अगले दिन खबर पूरे राज्य में फैल गई। एक विधायक की गिरफ्तारी—राजनीतिक गलियारों में भूचाल।
सोहनपुर की औरतें ऑफिस आईं। कमला हाथ जोड़कर बोली:

“मैडम… आपने हमारे पतियों के कातिलों को पकड़ लिया। हम ये एहसान नहीं भूलेंगे।”

अनुप्रिया ने शांत स्वर में कहा,
“ये एहसान नहीं, मेरा फर्ज था। अब अपने बच्चों को पढ़ाओ—ताकि वे कभी ये दिन न देखें।”

फिर वह खिड़की से बाहर देखने लगीं। उन्हें पता था—यह लड़ाई खत्म नहीं।
एक चौधरी जाएगा, दूसरा आएगा।
पर वह भी हर बार… नया रूप, नई रणनीति—अन्याय के खिलाफ खड़ी रहेगी।

क्योंकि उन्होंने यह खाकी वर्दी रुतबे के लिए नहीं पहनी थी—कर्ज चुकाने के लिए पहनी थी। समाज के लिए।