Indresh जी ने सुनाई विवाह से पूर्व गिरधर लाल जी की लीला और महाराज जी द्वारा सुंदर चर्चा!Bhajan Marg

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उत्तर भारत के एक संत-आश्रित नगर में एक विलक्षण संकीर्तन सभा का आयोजन हुआ था, जहाँ पूज्य श्री Indresh जी महाराज ने अपने मधुर स्वर में राधा-कृष्ण की अनुपम लीलाओं को रसपूर्वक सुनाया। इस दिन उन्होंने गिरधर लाल जी की विवाह से पूर्व की लीला का वर्णन किया और साथ ही यह भी बताया कि यह लीला केवल सांसारिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और भावनात्मक रूप से अद्वितीय थी।

सभा की शुरुआत जय जय श्री राधे के उद्घोष से हुई। Indresh जी ने कहा — “अब राधा गिरधर हो गए हैं। ये वही गिरधर लाल हैं जिन्होंने विवाह से पहले ही अपने समस्त परिकर को सुख प्रदान किया।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई सांसारिक विवाह नहीं, बल्कि भाव और भक्ति का उत्सव था।

विवाह की प्रतीकात्मकता

पूज्य महाराज जी ने विस्तार से बताया कि इस विवाह लीला की संपूर्ण व्यवस्था ठाकुर श्री राधा माधव प्रभु के सेवायतों द्वारा की गई थी। हल्दी, मेहंदी, जयमाल, फेरे, सेहरा — सब कुछ युगल रूप में सम्पन्न हुआ। ठाकुर जी मध्य में विराजमान थे और समस्त परिक्रिया श्री राधा और श्री कृष्ण की युगल भावनाओं से अनुप्राणित थी।

यह लीला किसी शास्त्र-नियम या समाजिक बंधनों से परे थी। यह लीला थी उस अपनापन की जो ठाकुर जी को सबसे प्रिय है। जैसा कि Indresh जी ने कहा — “ठाकुर जी को सबसे प्रिय वह है जिसमें प्रियता और अपनापन हो।”

रसिक भक्त और अपनापन

महाराज जी ने बताया कि बड़े-बड़े रसिक संतों की साधना भी इस अपनापन पर आधारित होती है। भजन, तप, सेवा — सबका फल है, लेकिन ठाकुर जी को जो सीधे हृदय से कहा गया ‘आप मेरे हैं’ — वही भाव सबसे अधिक प्रिय है। यही कारण है कि ऐसे भक्तों को रसिक कहा गया है।

उन्होंने श्री हरिवंश जी के पदों से उदाहरण दिया:

“नवल किशोरी नवल किशोर,
नयो नेह नयो रंग नयो रस।”

ब्रज में लीला की अनुभूति

बरसाने की एक साधारण ब्रजवासी सखी, माधुरी, इस लीला में सहसा जुड़ गई। वह कोई विशेष तपस्विनी नहीं थी, पर उसके हृदय में गिरधर के लिए एक अत्यंत अपनापन था। जब ठाकुर जी के समक्ष पर्चियाँ डाली गईं — वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना — और बरसाना निकला, तो माधुरी सखी की आँखें भर आईं।

ठाकुर जी बोले — “ब्याह होएगो।”

फिर संकेत मिला — “पहले दास का ब्याह हो, फिर ठाकुर जी का।”

यह संकेत यह दर्शाता है कि जब तक सेवक पूर्ण रूप से अपनापन से नहीं जुड़ता, सेवा की सामर्थ्य नहीं आती। यह भाव यहीं समाप्त नहीं होता।

विवाह: साधन नहीं, भाव का उत्सव

यह विवाह एक ऐसी लीला थी जहाँ जयमाल भी वही, फेरे भी वही, सेहरा भी वही — पर हर विधि का अर्थ केवल भावनात्मक था। कोई भव्य मंडप नहीं, कोई तामझाम नहीं — बस युगल सरकार मध्य में और उनके सेवक, सखा, सखियाँ भाव-विभोर।

Indresh जी ने कहा — “प्रेम में न तो अपेक्षा होती है, न संकोच। यदि हमारे जीवन में ठाकुर जी के सुख की कामना हो जाए, तो वही सबसे उच्चतम साधना है।”

“जो प्रभु दे, जैसा रखें, उसी में प्रसन्न रहो। यही अपनापन है।”

सेवक का भाव और ठाकुर जी की कृपा

पूज्य महाराज जी ने बताया कि सेवा तभी प्राप्त होती है जब प्राणों से भी गहन अपनापन हो। यह साधना, तप या योग से नहीं, केवल कृपा और भाव से प्राप्त होती है। भगवान ने अर्चा विग्रह का रूप इसलिए लिया ताकि हम उनके साथ प्रेम कर सकें — उन्हें भोग लगा सकें, पहनाएँ, सजा सकें, उनसे संवाद कर सकें।

जब कोई भक्त इस भाव में डूबता है कि —

“मेरे गिरधर को आज क्या भोग लगेगा?
आज लालजी को कौन-सी पोशाक पहनानी है?”

तो यह ही सेवा की सर्वोच्च स्थिति है।

अर्थ नहीं, अर्थवत्ता चाहिए

महाराज जी ने कहा — “आजकल अर्थ को प्रधानता दे दी गई है और कथा गौण हो गई है। पर सत्य यह है कि कथा मुख्य है और अर्थ दास। वैभव तभी हमारे पास रहेगा जब हम श्री ठाकुर जी के चरणों की सेवा में लगे रहेंगे।”

जीवन का अंतिम शयन

उन्होंने अंत में कहा — “जीवन का सार इस बात में नहीं कि हमने कितना पाया, बल्कि इस बात में है कि अंतिम क्षण में हमारा चिंतन कहाँ था। यदि वह चिंतन राधा-कृष्ण में हो — तो जीवन सफल हो गया।”

सभा में उपस्थित ब्रजवासी वृद्ध ने कहा — “महाराज जी, आप ब्रजवासियों के प्राण हैं। श्री जी से प्रार्थना है कि आप स्वस्थ रहें, और हमें आपकी वाणी बारम्बार सुनने को मिले।”

महाराज जी बोले — “जब तक श्री जी की कृपा है, यह सेवा चलती रहेगी। मन आनंदित है — यही जीवन की पूर्णता है।”

निष्कर्ष

वृंदावन की गलियों में आज भी रास चलता है, बस हमारी दृष्टि रासिक नहीं रह गई। श्री राधा और श्री गिरधर हमारे बीच आज भी विराजते हैं, बस उनके दर्शन के लिए अपनापन चाहिए।

यदि हृदय कहे — “ये मेरे हैं,”

तो ठाकुर जी उत्तर देंगे — “तू भी मेरा है।”

और यही लीला है। यही प्रेम है। यही भक्ति का अंतिम सत्य।

जय जय श्री राधे।