नए साल पर दो औरतों ने नौकर के साथ किया कारनामा/पुलिस के भी होश उड़ गए

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नए साल का कांड: दो औरतें, एक नौकर और पुलिस

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का एक छोटा सा गाँव, जहाँ हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त रहता है। इसी गाँव में रहती थीं सरिता देवी। सरिता की उम्र करीब 35 साल थी, उनका पति पांच साल पहले कैंसर से गुजर गया था। घर में एक छोटा बेटा और ससुर जगदीश कुमार थे। परिवार के भरण-पोषण के लिए सरिता ने अपने घर में ही कपड़ों और कॉस्मेटिक का छोटा सा दुकान खोल रखा था। गाँव की महिलाएँ अक्सर उसकी दुकान पर आती थीं।

सरिता का जीवन बाहर से सामान्य दिखता था, लेकिन अंदर ही अंदर वह अकेलापन और इच्छाओं से जूझ रही थी। पति की मौत के बाद उसकी कई इच्छाएँ अधूरी रह गई थीं। गाँव के ही पास में रितेश नाम का एक लड़का रहता था, जो 11वीं कक्षा का छात्र था। रितेश देखने में सुंदर था और पढ़ाई में अच्छा था। सरिता अक्सर उसे देखती थी और मन ही मन आकर्षित होती थी। एक दिन उसने रितेश को पढ़ाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उसकी माँ ने मना कर दिया। सरिता की उम्मीदें टूट गईं।

इधर ससुर जगदीश कुमार खेत में काम करते थे, लेकिन उम्र और बीमारी के कारण अब उनका शरीर जवाब देने लगा था। एक दिन खेत में चक्कर आकर गिर पड़े। गाँव वालों ने अस्पताल पहुँचाया। डॉक्टर ने सलाह दी कि अब उन्हें ज्यादा काम नहीं करना चाहिए। उनके दोस्त ने सुझाव दिया कि घर और खेत के काम के लिए एक नौकर रख लें। सरिता और जगदीश दोनों को यह विचार पसंद आया।

कुछ ही दिनों में गाँव के मोहन सिंह नामक युवक की तलाश कर ली गई। मोहन 26 साल का था, माता-पिता का साया सिर से उठ चुका था, अकेला रहता था और काम की तलाश में था। जगदीश ने मोहन को घर बुलाया और काम पर रखने का प्रस्ताव दिया। मोहन ने खुशी-खुशी काम स्वीकार कर लिया। अब मोहन खेत, घर और दुकान का काम देखने लगा।

सरिता ने मोहन को देखा तो मन में एक नया आकर्षण जाग उठा। जवान, मेहनती और ईमानदार लड़का था। धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत बढ़ने लगी। एक दिन जगदीश कुमार ने बताया कि उन्हें तीन दिन के लिए रिश्तेदार के यहाँ शादी में जाना है। सरिता ने कहा, “आप बेफिक्र जाइए, मैं सब संभाल लूंगी।”

ससुर के जाने के बाद सरिता ने मोहन को घर बुलाया। शाम को दुकान का काम निपटाने के बाद सरिता ने मोहन से कहा, “आज तुम मेरे साथ थोड़ा वक्त बिताओ।” मोहन पहले तो हिचकिचाया, “मालकिन, मैं ऐसा नहीं कर सकता।” लेकिन सरिता ने धमकी दी, “अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी तो मैं शोर मचाऊंगी, सबको बोल दूंगी कि तुमने जबरदस्ती की कोशिश की। पुलिस तुम्हें पकड़ लेगी।” मोहन डर गया और सरिता के साथ समय बिताने पर मजबूर हो गया।

तीन दिन तक ससुर बाहर रहे, और इन दिनों में सरिता और मोहन के बीच शारीरिक संबंध बनते रहे। मोहन भी संतुष्ट हो गया, लेकिन भीतर ही भीतर डरता रहा। ससुर के लौटने के बाद यह सिलसिला कुछ दिनों के लिए रुक गया।

गाँव में उषा नाम की महिला थी, जो सरिता की दोस्त थी। उसके पति अरब में काम करते थे और साल में एक-दो बार ही आते थे। उषा भी अकेलापन महसूस करती थी। एक दिन वह सरिता की दुकान पर कपड़े लेने आई और बोली, “तू बड़ी खुश रहती है, तेरा पति तो नहीं है। क्या राज है?” सरिता ने अपनी सच्चाई बताई कि वह मोहन के साथ अपनी इच्छाएँ पूरी करती है। उषा ने भी मोहन के साथ समय बिताने की इच्छा जताई।

सरिता ने योजना बनाई। अपने बेटे को नानी के घर भेज दिया। ससुर को नींद की दवा दे दी ताकि वे सो जाएँ। फिर मोहन और उषा को घर बुलाया। मोहन ने पहले मना किया, लेकिन सरिता ने फिर धमकी दी। साथ ही शक्तिवर्धक गोलियाँ दूध में डालकर मोहन को पिलाई ताकि वह दोनों महिलाओं को संतुष्ट कर सके।

मोहन ने दोनों के साथ समय बिताया, लेकिन गोलियों के साइड इफेक्ट से उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। उसे पसीना, बेचैनी और घबराहट होने लगी। थोड़ी देर बाद मोहन बेहोश हो गया और उसकी मौत हो गई।

सरिता और उषा घबरा गईं। लाश को छुपाने का फैसला किया। साइकिल पर लाश डालकर खेत में फेंकने चलीं, लेकिन गाँव के सूरज कुमार ने देख लिया। शोर मच गया, लोग इकट्ठा हो गए। पुलिस बुला ली गई। पुलिस ने दोनों महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया।

पोस्टमार्टम में पता चला कि मोहन की मौत हार्ट फेल होने से हुई, शक्तिवर्धक गोलियों के ओवरडोज से। पुलिस ने दोनों को जेल भेज दिया। गाँव में चर्चा होने लगी कि कैसे दो महिलाओं ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए एक गरीब युवक की जान ले ली।

इस घटना ने पूरे गाँव को हिला दिया। लोग सोचने लगे कि हवस और लालच किस हद तक इंसान को गिरा सकते हैं। सरिता और उषा अब जेल में थीं, और मोहन की मौत एक दर्दनाक सबक बन गई।

सीख:
इच्छाओं की अंधी दौड़ में इंसान कभी-कभी ऐसा कदम उठा लेता है, जिसका अंजाम बहुत खतरनाक होता है। रिश्तों में विश्वास, मर्यादा और संवेदनशीलता जरूरी है। किसी की मजबूरी का फायदा उठाना अपराध है।