अहंकार की वर्दी और ममता की पुकार: एक IPS की वापसी
रामपुर की लाल मिट्टी और सुनहरे सपने
झारखंड के धनबाद जिले से दूर बसा एक छोटा सा गांव, रामपुर। यहाँ की हवा में सादगी थी और लोगों के हाथों में मेहनत की लकीरें। इसी गांव की गलियों में रमेश और रश्मि का बचपन बीता। रमेश एक सीधा-साधा लड़का था, जिसकी दुनिया अपनी छोटी सी किराना दुकान और बूढ़े मां-बाप के इर्द-गिर्द सिमटी थी। वहीं रश्मि, गांव के स्कूल टीचर की बेटी, जिसकी आंखों में बड़े शहर के आसमान को छूने के सपने थे।
रश्मि के पिता उसे हमेशा कहते, “बेटी, तुझे आईपीएस बनना है। तुझे वो वर्दी पहननी है जिसे देखकर लोग सलाम ठोकें।” रश्मि ने इस सपने को अपनी आत्मा बना लिया। रमेश उसे अक्सर पढ़ाई करते देखता और मन ही मन उसकी लगन का कायल हो जाता।
दोस्ती, प्यार और सफलता की सीढ़ी
समय बीतता गया। रश्मि दिल्ली चली गई और रमेश गांव में ही रहा। रमेश अक्सर रश्मि की पढ़ाई का खर्चा उठाने में चोरी-छिपे उसके पिता की मदद कर देता। जब रश्मि ने यूपीएससी की परीक्षा पास की और वह आईपीएस बनी, तो पूरे गांव में दिवाली जैसा माहौल था।
सफलता के इस चरम पर रश्मि ने अपने पिता से कहा, “पापा, मैं शादी रमेश से ही करूँगी। उसने मेरा तब साथ दिया जब मेरे पास कुछ नहीं था।” रमेश के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। एक साधारण दुकानदार और एक आईपीएस अधिकारी की शादी हुई। सबको लगा कि यह कहानी का सुखद अंत है, लेकिन असली परीक्षा तो अब शुरू होने वाली थी।
सत्ता का नशा और दरकते रिश्ते
शादी के बाद रश्मि की पोस्टिंग पटना में हुई। रमेश भी उसके साथ गया। लेकिन शहर के उस आलीशान बंगले में रमेश खुद को एक कैदी की तरह महसूस करने लगा। रश्मि दिन-भर ड्यूटी पर रहती, अपराधियों को पकड़ती, बड़े अफसरों के साथ मीटिंग्स करती। जब वह घर लौटती, तो रमेश उसे प्यार से खाना परोसता।
धीरे-धीरे रश्मि के व्यवहार में बदलाव आने लगा। उसे लगने लगा कि उसका पति उसके “स्टेटस” के लायक नहीं है। एक शाम, जब रमेश ने उसे प्यार से खाना खाने को कहा, तो रश्मि भड़क उठी। “मैं दिन-भर कानून व्यवस्था संभालती हूँ और तुम बस रसोई तक सीमित हो? हम अलग-अलग दुनिया के लोग हैं, रमेश। तुम मेरे लिए एक बोझ बन गए हो।”
रमेश का आत्मसम्मान टूट गया। उसने बिना किसी बहस के तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए। रश्मि ने उसे 50 लाख रुपये देने चाहे, लेकिन रमेश ने सिर्फ अपनी फटी हुई झोली उठाई और चुपचाप गांव लौट आया।
5 साल का लंबा सन्नाटा
रमेश गांव की उसी पुरानी झोपड़ी में रहने लगा। गांव वाले पूछते, तो वह सिर्फ मुस्कुरा देता। लेकिन रश्मि को एक बात नहीं पता थी—तलाक के समय वह गर्भवती थी। उसे इसका एहसास तब हुआ जब रमेश गांव जा चुका था। गुस्से और उलझन में उसने बच्चे को जन्म तो दिया, लेकिन अपनी “करियर” और “प्रतिष्ठा” के डर से उसे एक चिट्ठी के साथ रमेश के पास भेज दिया कि वह उसे नहीं पाल सकती।
रमेश ने उस मासूम बच्चे, आरव, को सीने से लगा लिया। उसने गांव वालों को कभी नहीं बताया कि रश्मि ने बच्चे को ठुकरा दिया है। उसने अकेले मजदूरी की, दुकान चलाई और आरव को मां और बाप दोनों का प्यार दिया।
सच का सामना: जब एसपी रश्मि लौटी
5 साल बाद, रश्मि अब एक जिले की एसपी बन चुकी थी। उसके पास सब कुछ था—रुतबा, गाड़ी, बंगला—पर सुकून नहीं था। एक दिन पुरानी यादों और पछतावे ने उसे घेर लिया। वह अपनी लाल बत्ती वाली गाड़ी लेकर रामपुर पहुंची।
जैसे ही उसकी गाड़ी रमेश की झोपड़ी के सामने रुकी, गांव वाले दंग रह गए। रश्मि वर्दी में उतरी और सीधे झोपड़ी के अंदर गई। वहां का नजारा देखकर उसके पैर जम गए।
सामने एक छोटा सा बच्चा, बिल्कुल रमेश जैसा दिखने वाला, सो रहा था। रमेश उसे पंखा झल रहा था। रश्मि की आंखों से आंसू छलक पड़े। “ये… ये मेरा बेटा है?” उसने कांपती आवाज में पूछा।
रमेश ने शांति से जवाब दिया, “नहीं रश्मि, ये मेरा बेटा है। तुमने तो इसे 5 साल पहले एक चिट्ठी के साथ लावारिस छोड़ दिया था। तुमने कहा था कि तुम अपनी दुनिया में खुश हो।”
प्रायश्चित और नया सवेरा
रश्मि को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने अपनी वर्दी की ओर देखा, जो उसे अब पत्थर की तरह भारी लग रही थी। उसने महसूस किया कि अपराधियों को पकड़ना आसान है, लेकिन टूटे हुए रिश्तों को जोड़ना सबसे कठिन।
गांव वालों के सामने रश्मि ने अपनी गलती मानी। उसने फैसला किया कि वह इस्तीफा दे देगी। “रमेश, मुझे ये वर्दी नहीं चाहिए। मुझे मेरा परिवार चाहिए। क्या तुम मुझे एक मौका दोगे?”
रमेश ने उसे वह पुराना तलाक का कागज दिखाया जो उसने आज तक संभाल कर रखा था। “अगर तुम सच में रुकना चाहती हो, तो इसे फाड़ दो। लेकिन याद रखना, इस बार तुम एक आईपीएस की तरह नहीं, बल्कि आरव की मां और मेरी पत्नी की तरह रुकोगी।”
रश्मि ने कांपते हाथों से उन कागजों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। छोटा आरव जागा और पहली बार अपनी मां की गोद में गया। गांव का वह सन्नाटा, जो 5 साल से पसरा था, अब आरव की किलकारियों और रश्मि के सुबकने की आवाजों से भर गया।
निष्कर्ष
रश्मि ने इस्तीफा दे दिया और गांव में ही रहकर बच्चों को पढ़ाने और महिलाओं को जागरूक करने का काम शुरू किया। उसने साबित कर दिया कि सफलता का शिखर तब तक अधूरा है जब तक आपके पास उसे साझा करने के लिए अपना परिवार न हो।
सीख: सफलता के नशे में कभी उन कंधों को मत भूलना, जिन्होंने आपको वहां तक पहुंचने में सहारा दिया था। पद और पैसा वापस आ सकते हैं, लेकिन खोया हुआ समय और रिश्ते कभी नहीं।
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