पति 2 साल बाद विदेश से पैसा कमाकर लौटा तो देखा पत्नी टूटी फूटी झोपड़ी बाहर चारपाई पर बीमार पड़ी है

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झोपड़ी के बाहर पड़ी चारपाई

सोनापुर की आख़िरी पगडंडी पर खड़ा अर्जुन प्रताप सिंह कुछ पल तक वहीं ठिठका रहा।
उसकी साँसें तेज़ थीं, जैसे सीने के भीतर कोई पुराना डर अचानक जाग उठा हो।

सामने जो दृश्य था, वह उसकी आँखों के भरोसे से बाहर था।

टूटी-फूटी झोपड़ी।
छत से झूलती टीन की चादर।
और झोपड़ी के बाहर, धूप में पड़ी एक पुरानी चारपाई—
जिस पर एक औरत बेसुध सी लेटी थी।

वह औरत उसकी पत्नी थी।

सावित्री।


वापसी

दो साल।
पूरे दो साल बाद अर्जुन विदेश से लौटा था।

गाँव के लोग कहते थे—
“परदेश गया है, अब तो बहुत पैसा कमाकर लौटा होगा।”
“अब पक्का मकान बनेगा।”
“अब सावित्री रानी बनेगी।”

लेकिन अर्जुन की जेब में न कोई भारी नोटों की गड्डी थी,
न चेहरे पर जीत की चमक।

बस थकी हुई आँखें थीं
और भीतर कहीं दबा हुआ एक डर—
कि कहीं देर तो नहीं हो गई।

और आज, इस झोपड़ी के सामने खड़े होकर
उसे पहली बार एहसास हुआ—
देर बहुत हो चुकी थी।


सावित्री

चारपाई पर पड़ी सावित्री पहले जैसी नहीं लग रही थी।

वह लड़की,
जिसकी मुस्कान कभी पूरे घर को रोशन कर देती थी—
आज उसकी आँखें धँसी हुई थीं।
चेहरा सूखा।
होंठों पर पपड़ी।
साँसें हल्की, जैसे हवा भी उसे छोड़ने की तैयारी में हो।

अर्जुन ने काँपते हाथों से उसका नाम लिया—

“सावित्री…”

उसकी पलकों में हल्की सी हरकत हुई।
जैसे कोई बहुत दूर से आवाज़ सुन रहा हो।

उसने आँखें खोलीं।

कुछ पल तक वह अर्जुन को देखती रही,
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली—

“आप… यहाँ कैसे?”

उस एक वाक्य ने अर्जुन को भीतर तक तोड़ दिया।


पीछे छूटते साल

तीन साल पहले,
सोनापुर का वही मिट्टी का घर—
जहाँ गरीबी थी,
पर डर नहीं।

अर्जुन दिन भर खेतों में मज़दूरी करता।
शाम को अगर जेब में दस रुपये भी होते,
तो सावित्री के लिए गुड़ की एक डली ज़रूर ले आता।

सावित्री उस गुड़ को ऐसे रखती,
जैसे कोई कीमती गहना हो।

उनके बीच बातें कम थीं,
समझ ज़्यादा।

लेकिन गरीबी की अपनी एक भाषा होती है—
जो चुपचाप दिल में चुभती रहती है।


परदेश का सपना

एक दिन चौपाल पर शहर से आए एजेंट ने
विदेश की कहानियाँ सुनाईं।

बड़ी कमाई।
दो साल में सब बदल जाने का वादा।

उस रात अर्जुन देर तक करवटें बदलता रहा।

सावित्री ने उसकी बेचैनी महसूस की।

“कुछ कहना चाहते हो?”
उसने धीमे से पूछा।

अर्जुन बोला—

“मैं चाहता हूँ
कि तुम कभी किसी के आगे हाथ न फैलाओ।
तुम बीमार पड़ो तो अच्छे डॉक्टर हों।
छत न टपके।
ज़मीन पर न सोना पड़े।”

सावित्री ने कुछ नहीं कहा।
बस उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।


विदाई

खेत गिरवी रखे गए।
जेवर बिके।
कर्ज़ चढ़ा।

और एक सुबह
अर्जुन के हाथ में विदेश का टिकट था।

विदाई के दिन सावित्री ने नीली साड़ी पहनी।
वही, जो माँ ने शादी में दी थी।

उसने अर्जुन के माथे पर तिलक लगाया।

हाथ काँप रहे थे,
पर आवाज़ स्थिर थी।

“दो साल बस…”
अर्जुन ने कहा।

सावित्री रोई नहीं।
आँसू पोंछ लिए।


अकेलापन

शुरुआत में पैसे आते रहे।

सावित्री ने छत ठीक करवाई।
सास-ससुर की दवाइयाँ लीं।

रात को अर्जुन की आवाज़ सुनकर
थोड़ा चैन मिलता।

फिर धीरे-धीरे हालात बदले।

बुखार आया।
दर्द रहने लगा।

उसने किसी को बताया नहीं।

फोन पर अर्जुन पूछता—
“सब ठीक है?”

वह कहती—
“हाँ।”

क्योंकि वह नहीं चाहती थी
कि परदेश में पसीना बहाता उसका पति
और टूट जाए।


समाज का चेहरा

गाँव में बातें बनने लगीं।

“परदेश गया आदमी बदल जाता है।”
“किसी और के साथ होगा।”

सावित्री चुप रही।

लेकिन अफ़वाहें
घर की दीवारों में उतर आईं।

सास ने ताने देने शुरू किए।

“अब पैसे नहीं आ रहे।”
“बीमार हो तो बोझ बन जाती हो।”

एक दिन वह खेत से लौटते हुए गिर पड़ी।

इलाज नहीं हुआ।
डॉक्टर के लिए पैसे नहीं थे।


घर से बाहर

एक रात तेज़ बुखार में
वह फर्श पर गिर गई।

सुबह सास ने कहा—

“नाटक मत करो।”

उसी दिन
उसे मायके भेज दिया गया।

मायके में भी
ज़्यादा दिन नहीं रखा गया।

“अब बोझ है,”
भाई ने कहा।


झोपड़ी

और यूँ वह पहुँची
गाँव की आख़िरी झोपड़ी में।

फटी चारपाई।
टपकती छत।

लेकिन वहाँ कोई ताना नहीं था।

बस बीमारी थी
और अकेलापन।

वह रात भर तारों को देखती।
हर गुजरते कदम में
अर्जुन की आहट खोजती।


परदेश का सच

उधर अर्जुन की हालत भी
कुछ अलग नहीं थी।

मजदूरी।
कटे हुए पैसे।
मालिक की मार।

अंत में
न नौकरी रही,
न घर।

हवाई अड्डे पर खड़ा अर्जुन
खुद से पूछ रहा था—

“मैं जीतकर लौट रहा हूँ
या हारकर?”


मिलन

जब वह सोनापुर लौटा
तो घर बंद मिला।

पता चला—
सावित्री को घर से निकाल दिया गया।

वह उसी पगडंडी पर दौड़ा।

और झोपड़ी के बाहर
चारपाई पर पड़ी सावित्री को देखा।


अस्पताल

अस्पताल में डॉक्टर ने कहा—

“बीमारी बहुत बढ़ चुकी है।”

अर्जुन बाहर बेंच पर बैठकर रोया।

पहली बार उसे लगा—
उसकी मेहनत बेकार थी।


अंतिम बात

रात को सावित्री ने उसका हाथ थामा।

धीमे से बोली—

“तुम हार नहीं गए।
हम दोनों बस
अपने-अपने दर्द अकेले उठाते रहे।”

उसने आख़िरी इच्छा बताई—

“इस झोपड़ी को
किसी और के काम आने देना।”


अलविदा

सुबह सावित्री चली गई।

अर्जुन चुप खड़ा रहा।

उसने तय किया—

वह अब भागेगा नहीं।


आज

आज सोनापुर की उसी पगडंडी पर
एक आदमी दिखता है—

जो बीमारों को अस्पताल पहुँचाता है।
जो औरतों से कहता है—

“चुप मत रहना।
चुप्पी सबसे बड़ी बीमारी है।”

सावित्री नहीं रही।

लेकिन उसकी कहानी
गाँव की हवा में बस गई।


अंत

यह कहानी
प्यार की जीत की नहीं है।

यह उस कीमत की कहानी है
जो प्यार कभी-कभी
इंसान से माँग लेता है।

और शायद
इसी कीमत में
प्यार की सच्चाई छिपी होती है।