रनवे का लड़का और आसमान का वारिस
भारत के सबसे व्यस्त और आधुनिक हवाई अड्डों में से एक के प्राइवेट हैंगर में उस सुबह असामान्य हलचल थी। चमचमाती लाइटें, रेड कारपेट, फूलों की सजावट और सख़्त सुरक्षा—सब कुछ इस बात का संकेत दे रहा था कि आज कोई बहुत बड़ी उड़ान होने वाली है।
यह दिन था थापर एविएशन के इतिहास का सबसे अहम दिन। कंपनी ने हाल ही में अरबों की कीमत वाला अत्याधुनिक प्राइवेट जेट स्काईमास्टर X900 खरीदा था। यह विमान सिर्फ मशीन नहीं, मालिक समीर थापर की प्रतिष्ठा और ताकत का प्रतीक था।
45 साल के समीर थापर—अनुशासन, गुस्सा और जीरो टॉलरेंस के लिए मशहूर।
आज उसी जेट में देश के गृह मंत्री और विदेशी निवेशक उड़ान भरने वाले थे।
यह डील कंपनी को एशिया की नंबर वन बना सकती थी।
सब कुछ परफेक्ट था…
सिवाय किस्मत के।

एक अनदेखा लड़का
उसी चमक-धमक से दूर, रनवे के कोने पर 14 साल का एक दुबला-पतला लड़का झाड़ू और कूड़े की थैली लिए सफाई कर रहा था—ध्रुव।
फटी चप्पलें। मैले कपड़े।
महीने के कुछ हजार रुपये।
बीमार मां का इलाज।
लेकिन उसके सपने… आसमान जितने बड़े।
ध्रुव को जहाज़ों से प्यार था।
वह इंजनों की आवाज से मॉडल पहचान लेता।
रद्दी से मिले एविएशन मैगजीन और मैनुअल रातभर पढ़ता।
लोग उसे पागल कहते।
वह खुद को सीखने वाला कहता।
मुसीबत की शुरुआत
दोपहर 12 बजे VIP मेहमान बैठ चुके थे।
पायलट ने इंजन स्टार्ट किया।
पहला इंजन—सही।
दूसरा इंजन—
“खट… खट… फूं…”
और बंद।
फिर कोशिश।
फिर फेल।
समीर थापर का माथा पसीने से भर गया।
चीफ इंजीनियर सक्सेना और उनकी टीम जांच में लग गई।
सब सिस्टम नॉर्मल दिख रहे थे।
पर इंजन हर बार दम तोड़ देता।
समीर गरजे—
“15 मिनट में ठीक करो, नहीं तो सबकी नौकरी खत्म!”
आवाज़ पहचानने वाला
दूर खड़ा ध्रुव सब सुन रहा था।
उसने वही आवाज पहले पढ़ी थी—एक पुराने मैनुअल में।
वह पास आया।
गार्ड ने धक्का दिया—
“भाग यहां से!”
लेकिन ध्रुव बोला—
“सर, मैं मदद कर सकता हूं।”
समीर ने घूरा—
“तुम?”
ध्रुव ने कहा—
“कंप्यूटर झूठ बोल सकता है, आवाज नहीं।”
सब हंसे।
इंजीनियर बोले—असंभव।
लेकिन ध्रुव ने समझाया—
“कंप्रेसर स्टेज-2 का बाईपास वाल्व चोक है। हवा नहीं मिल रही, इसलिए इंजन घुट रहा है।”
समीर रुक गए।
उन्हें अपना पुराना संघर्ष याद आया।
उन्होंने मौका दिया—
“10 मिनट।”
चमत्कार नहीं, समझ
ध्रुव इंजन पर चढ़ा।
एक पैनल खोला।
टॉर्च से अंदर झांका।
हाथ अंदर डाला—जलन, कालिख, दर्द…
लेकिन उसने पकड़ लिया।
निकाला—
पिघला हुआ प्लास्टिक का टुकड़ा।
वही हवा रोक रहा था।
सेंसर पकड़ नहीं पा रहे थे।
पायलट ने स्टार्ट किया—
इस बार इंजन गरजा।
पूरी ताकत से।
हैंगर तालियों से गूंज उठा।
एक लॉकेट, एक सच्चाई
समीर ध्रुव के पास आए।
नाम पूछा।
तभी उनकी नजर ध्रुव के गले के लॉकेट पर पड़ी—
आधा चांद, बीच में तारा।
उनकी सांस रुक गई।
यह लॉकेट उन्होंने 15 साल पहले अपनी पत्नी प्रिया के लिए बनवाया था।
“यह कहां से मिला?”
ध्रुव बोला—
“मां ने दिया। कहा पापा की निशानी है।”
“मां का नाम?”
“प्रिया।”
समीर की आंखें भर आईं।
बीता हुआ पाप
15 साल पहले…
गरीबी, गलतफहमी, अहंकार।
समीर ने गर्भवती प्रिया को घर से निकाल दिया था।
सोचा बच्चा उसका नहीं।
आज सच सामने था।
उड़ान रद्द, रिश्ता शुरू
समीर घुटनों पर बैठ गए।
“मुझे अपनी मां के पास ले चलो।”
फ्लाइट कैंसिल।
VIP इंतजार करते रह गए।
लग्जरी कार झुग्गियों में पहुंची।
बीमार प्रिया खाट पर पड़ी थी।
दरवाजे पर समीर।
आवाज़ कांपी—
“प्रिया…”
आंसू।
माफी।
सच।
ध्रुव सब समझ गया।
धीरे से पूछा—
“आप मेरे पापा हैं?”
गले लगते ही 15 साल की दूरी पिघल गई।
नई शुरुआत
प्रिया का इलाज हुआ।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में समीर ने सब स्वीकारा।
ध्रुव को वारिस बनाया—
पर सीधे नहीं।
उसे दुनिया के बेहतरीन इंजीनियरिंग कॉलेज भेजा।
ध्रुव पढ़ा।
सीखा।
और सालों बाद अपना इंजन डिजाइन किया।
टेस्ट सफल रहा।
सबसे ज्यादा तालियां समीर ने बजाईं।
आज
समीर के ऑफिस में एक कांच के फ्रेम में रखा है—
वह छोटा सा प्लास्टिक का टुकड़ा।
जो इंजन रोक रहा था।
और जिसने रिश्ते जोड़ दिए।
सीख
मशीनें कचरे से रुकती हैं।
रिश्ते गलतफहमी से।
दोनों को साफ करने के लिए चाहिए—
धैर्य, समझ और दिल।
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