जिस माँ ने जन्म दिया, उसी को घर से निकाला गया… फिर माँ ने ऐसा किया कि सब रो पड़े 😭

रजनी देवी की वापसी : एक मां की इज्ज़त और कानून की ताकत
भाग 1 : शुक्ला निवास का सन्नाटा
लखनऊ के आलमबाग इलाके में स्थित एक पुरानी लेकिन मजबूत कोठी, हाउस नंबर 42, जिसे लोग शुक्ला निवास के नाम से जानते थे। यह घर ईंट और पत्थर का नहीं, बल्कि स्वर्गीय हरीश शुक्ला और उनकी धर्मपत्नी रजनी देवी की जिंदगी भर की मेहनत, कमाई और पसीने से बना था। हरीश जी शिक्षा विभाग में ईमानदार अधिकारी थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी एक-एक पैसा जोड़कर यह घर बनाया था ताकि उनका बुढ़ापा और उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
साल 2019 में हरीश जी का देहांत हो गया। उनके जाने के बाद घर में रह गए थे तीन लोग – उनकी पत्नी रजनी देवी (68 वर्ष), उनका इकलौता बेटा विकास (32 वर्ष) और विकास की पत्नी सुमन।
रजनी देवी का पूरा संसार उनका बेटा था। उन्होंने अपने बेटे को पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, खुद पुरानी साड़ियां पहनी, रूखा-सूखा खाया, लेकिन बेटे की हर जरूरत पूरी की। विकास अब मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी करता था और उसकी शादी सुमन से हुई थी, जो आधुनिक विचारों वाली महिला थी।
शुरुआत में सब ठीक चला, लेकिन समय के साथ घर का माहौल बदलने लगा। हरीश जी की मौत के बाद विकास और सुमन को लगने लगा कि अब इस घर के मालिक वही हैं। रजनी देवी, जो कभी इस घर की मालकिन थीं, धीरे-धीरे अपने ही घर में एक अनचाही मेहमान बनती जा रही थीं।
भाग 2 : दिवाली की रात, रिश्तों की दरार
14 नवंबर 2023, दिवाली की रात। लखनऊ शहर रोशनी से नहाया हुआ था, हर ओर हंसी-खुशी की आवाजें, मिठाइयों की खुशबू, पटाखों का शोर। लेकिन शुक्ला निवास में सन्नाटा था, ऐसा सन्नाटा जो तूफान आने से पहले होता है।
रजनी देवी ने सूती साड़ी पहन रखी थी। उनका मन था कि दिवाली पर पूरे घर में दिए जलाए जाएं। वह रसोई में गईं, जहां सुमन काम कर रही थी। प्यार से बोलीं, “बहू, आज दिवाली है। मैंने दिए भिगोकर रखे हैं, लाओ मैं उन्हें आंगन और तुलसी के पास रख देती हूं।”
सुमन ने छिड़कर कहा, “माता जी, आप रहने दीजिए। तेल और घी का धुआं मुझे बर्दाश्त नहीं होता। वैसे भी बिजली वाली झालर लगा दी है, इन मिट्टी के दियों की क्या जरूरत है?”
रजनी देवी का दिल बैठ गया। बोलीं, “शगुन के लिए ही सही, पांच दिए तो जलाने दो। तुम्हारे ससुर जी को दिए बहुत पसंद थे।”
तभी विकास आ गया। ऑफिस के काम से परेशान, मां की बात सुनकर गुस्से में बोला, “मां, आप फिर शुरू हो गईं! सुमन को पुराने जमाने के ये चोंचले पसंद नहीं। चुपचाप अपने कमरे में क्यों नहीं बैठतीं?”
रजनी देवी की आंखों में आंसू आ गए। बोलीं, “बेटा, यह मेरा भी तो घर है। क्या मैं अपनी मर्जी से भगवान के आगे एक दिया भी नहीं जला सकती? मैंने और तुम्हारे पिताजी ने यह घर कितने अरमानों से बनाया था?”
विकास को यह बात चुभ गई। उसका अहंकार जाग उठा। चिल्लाया, “बस बहुत हो गया आपका यह राग! जब देखो तब मैंने घर बनाया, मैंने घर बनाया कि रट लगाए रहती हो। आज मैं इस घर का खर्चा चलाता हूं, बिजली का बिल मैं भरता हूं, खाने का राशन मैं लाता हूं, तो इस घर में नियम भी मेरे चलेंगे।”
सुमन ने आग में घी डालते हुए कहा, “देख रहे हो विकास? माताजी को शांति से एक वक्त की रोटी नहीं पचती। रोज कोई ना कोई नाटक चाहिए। आज त्यौहार के दिन भी क्लेश शुरू कर दिया।”
रात के 8:45 हो रहे थे। बाहर पटाखों का शोर बढ़ रहा था, लेकिन घर के अंदर रिश्तों की मर्यादा तार-तार हो रही थी।
भाग 3 : मां का अपमान और घर से निकाला जाना
गुस्से में विकास ने वो किया जिसकी उम्मीद कोई मां अपने बेटे से नहीं करती। उसने अपनी मां का हाथ पकड़ा, जिस हाथ ने उसे बचपन में उंगली पकड़कर चलना सिखाया था। आज उसी हाथ को बेदर्दी से पकड़कर घसीटते हुए घर के मुख्य दरवाजे तक ले गया।
रजनी देवी रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, “बेटा, क्या कर रहा है? बाहर बहुत ठंड है बेटा, लोग क्या कहेंगे? छोड़ दे मेरा हाथ, मुझे दर्द हो रहा है।”
लेकिन विकास के सिर पर शैतान सवार था। उसने गेट के बाहर मां को धक्का दे दिया। “मुझे इस घर में शांति चाहिए, और वह शांति आपके रहते कभी नहीं मिलेगी। आप जाइए यहां से। अब मेरे घर में आपके लिए कोई जगह नहीं है। आप हमारे लिए बोझ बन चुकी हैं।”
रजनी देवी ने गेट पकड़ लिया, सुमन की तरफ देखा, “बहू, तुम तो औरत हो, तुम तो समझो, तुम भी कल मां बनोगी। रोक लो मेरे बेटे को।” सुमन ने मुंह फेर लिया, “माता जी, यह सब आपके कर्मों का फल है। हमें अपनी जिंदगी जीने दीजिए।”
विकास ने एक झटका दिया और रजनी देवी सड़क पर जा गिरी। रात के 9:00 बज चुके थे, नवंबर की ठंड थी, तापमान गिरकर 15 डिग्री सेल्सियस हो गया था। रजनी देवी ठंडी सड़क पर गिरी पड़ी थीं, घुटने छिल गए थे। विकास ने उनका थैला भी बाहर फेंक दिया, जिसमें उनकी दो पुरानी साड़ियां, कुछ दवाइयां और एक रामायण की किताब थी।
“यह रहा आपका सामान, अब दोबारा इस घर की तरफ मुड़कर मत देखना। आज से आप हमारे लिए मर गईं।” लोहे का भारी गेट बंद हो गया।
आसपड़ोस के लोग तमाशा देख रहे थे, लेकिन कोई मदद करने आगे नहीं आया।
भाग 4 : वृद्धाश्रम की ओर
रजनी देवी कुछ देर तक बंद गेट को देखती रहीं, फिर अपना थैला उठाया, घुटनों की धूल झाड़ी और लड़खड़ाते कदमों से सड़क पर चल दीं। स्ट्रीट लाइट की रोशनी में उनकी छाया लंबी होती जा रही थी।
नुक्कड़ पर एक ऑटो वाला खड़ा था। रजनी देवी ने कांपती आवाज में कहा, “बेटा, क्या तुम मुझे जानकीपुरम छोड़ दोगे?” ऑटो वाले ने देखा कि बुजुर्ग माताजी इतनी रात को अकेली हैं, उसका दिल पसीज गया। “हां माता जी, बैठिए।”
रजनी देवी ऑटो में बैठीं, “बेटा, मुझे समर्पण वृद्धाश्रम ले चलो।” यह नाम उन्होंने कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा था, उन्हें क्या पता था कि इतनी जल्दी इसकी जरूरत पड़ जाएगी।
ऑटो जानकीपुरम की तरफ चल पड़ा। दिवाली की रोशनी अब रजनी देवी को चिढ़ा रही थी। हर तरफ खुशी थी, बस एक मां का दिल खून के आंसू रो रहा था।
भाग 5 : कानून की ताकत
अगले तीन दिन तक विकास और सुमन बहुत खुश थे। उन्हें लगा कि उन्होंने बहुत बड़ा जंग जीत लिया है। अब यह 80 लाख का मकान पूरा उनका है। लेकिन कहते हैं न, पाप का घड़ा एक ना एक दिन भरता जरूर है।
17 नवंबर 2023, सुबह 10:30 बजे। विकास ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था, तभी घर की घंटी बजी। दरवाजा खोला, सामने एक आदमी – एडवोकेट विवेक तनखा।
विवेक तनखा ने शांत आवाज में कहा, “क्या यह स्वर्गीय हरीश शुक्ला जी का निवास है?” विकास ने कहा, “जी हां, मैं उनका बेटा विकास शुक्ला हूं। कहिए क्या काम है?”
वकील ने कार्ड दिया, “मैं लखनऊ हाई कोर्ट में वकील हूं, और आपके पिता का लीगल एडवाइजर भी।”
विकास का माथा ठनका। वकील ने कहा, “मैं यहां आपकी माताजी श्रीमती रजनी देवी के बुलावे पर आया हूं।” रजनी देवी का नाम सुनते ही विकास और सुमन के चेहरे का रंग उड़ गया।
वकील ने फाइल से वसीयत निकाली – “मैं हरीश शुक्ला, पुत्र स्वर्गीय राम प्रसाद शुक्ला, घोषणा करता हूं कि मेरी मृत्यु के बाद मेरी समस्त संपत्ति की एकमात्र मालकिन मेरी धर्मपत्नी श्रीमती रजनी देवी होंगी।”
अगर बेटा या बहू रजनी देवी का सम्मान नहीं करते या प्रताड़ित करके घर से निकालने की कोशिश करते हैं तो उन्हें इस संपत्ति से पूरी तरह बेदखल माना जाएगा।
वकील ने कहा, “आप इस घर में सिर्फ मेहमान की तरह रह रहे थे, मालिक को घर से निकालकर आपने बड़ी कानूनी गलती की है। कानून के मुताबिक अगर आप किसी बुजुर्ग को उसके अपने घर से निकालते हैं तो यह गंभीर अपराध है। इसमें आपको 3 महीने की जेल और भारी जुर्माना हो सकता है, और पुलिस कमिश्नर के आदेश पर आपको 24 घंटे के अंदर यह घर खाली करना होगा।”
विकास के पैरों तले जमीन खिसक गई। सुमन रोने लगी। “वकील साहब, प्लीज ऐसा मत कीजिए, हम सड़क पर आ जाएंगे, हमारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।”
भाग 6 : माफी और मां की शर्तें
वकील ने कहा, “माताजी ने आपको एक मौका दिया है। आपको समर्पण वृद्धाश्रम जाना होगा, वहां सबके सामने अपनी मां से माफी मांगनी होगी और उन्हें पूरे सम्मान के साथ वापस घर लाना होगा। लेकिन अब शर्तें उनकी होंगी, आपकी नहीं।”
18 नवंबर 2023, दोपहर 3 बजे। विकास और सुमन जानकीपुरम के समर्पण वृद्धाश्रम पहुंचे। वहां का माहौल घर जैसा था, बुजुर्ग बातें कर रहे थे। रजनी देवी कुर्सी पर बैठी थीं, उनके चेहरे पर सुकून था।
विकास मां के पैरों में सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा, “मां, मुझे माफ कर दो। मैं बहुत बुरा बेटा हूं। मुझे नहीं पता था कि मैं क्या कर रहा हूं। प्लीज मां, घर चलो। मैं जेल नहीं जाना चाहता।”
सुमन भी हाथ जोड़कर रो रही थी। “माता जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं भूल गई थी कि आप हैं तो यह घर है।”
रजनी देवी ने गंभीर आवाज में कहा, “विकास, उठो। तमाशा मत करो। मैं घर चलूंगी, लेकिन मेरी कुछ शर्तें हैं, और यह शर्तें अब कानूनी होंगी।”
शर्तें:
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घर की नेमप्लेट बदलेगी – अब ‘रजनी सदन’ लिखा जाएगा।
घर की तिजोरी की चाबी मेरे पास रहेगी, पेंशन का पैसा मेरे पास आएगा, तुम अपनी सैलरी से हर महीने ₹10,000 मुझे दोगे।
मेरा कमरा मेरा ही रहेगा, उसमें मेरा मंदिर रहेगा, घर में पूजा और आरती होगी। अगर तुम्हें पसंद नहीं, तो अपने कमरे का दरवाजा बंद कर सकते हो।
भविष्य में कभी भी तुमने मुझे ऊंची आवाज में बात की या मेरे सम्मान को ठेस पहुंचाई तो मैं सीधा पुलिस को बुलाऊंगी।
यह सब कागज पर लिखा गया, विकास और सुमन ने साइन किए।
भाग 7 : घर की नई रोशनी
19 नवंबर 2023 की शाम, रजनी देवी सम्मान के साथ अपने घर लौटीं। मोहल्ले के लोग देखने आए। पांच दिन पहले जिस मां को धक्के मारकर निकाला गया था, आज वही मां सिर ऊंचा करके घर में दाखिल हो रही थी, बेटा और बहू सिर झुकाए पीछे चल रहे थे।
रजनी देवी ने घर में कदम रखा, सबसे पहले तुलसी के पास जाकर एक दिया जलाया – वही दिया जो दिवाली की रात जलाना चाहती थीं। उस दिए की रोशनी ने घर के अंधेरे को दूर कर दिया।
विकास और सुमन को समझ आ गया था – घर ईंटों से नहीं, बुजुर्गों के आशीर्वाद से बनता है। मां-बाप की खामोशी उनकी कमजोरी नहीं होती, उनके पास भी कानून की ताकत होती है, बस वे ममता की वजह से उसका इस्तेमाल नहीं करते। लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है, तो रजनी देवी जैसी माताओं को दुर्गा बनना पड़ता है।
सीख और संदेश
आज रजनी देवी उस घर में सम्मान के साथ रह रही हैं। विकास और सुमन अब डरते हैं कि कहीं मां नाराज ना हो जाए। वे उनकी हर जरूरत का ध्यान रखते हैं। शायद धीरे-धीरे यह डर फिर से प्यार में बदल जाए।
यह कहानी हमें सिखाती है:
कभी भी अपने माता-पिता को कमजोर मत समझो। उन्होंने तुम्हें चलना सिखाया है, तो तुम्हें झुकाना भी जानते हैं।
हर बुजुर्ग को अपने कानूनी अधिकारों का पता होना चाहिए। सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 इसलिए बना है ताकि कोई भी बच्चा अपने मां-बाप को बेघर ना कर सके।
अपनी संपत्ति अपने जीते जी बच्चों के नाम करने की गलती कभी मत करना।
मां-बाप भगवान का रूप होते हैं। उनकी सेवा करो, उनका दिल मत दुखाओ। दौलत तो कमा लोगे, लेकिन मां-बाप का प्यार किसी बाजार में नहीं मिलता।
समाप्त
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