Ek Sher Budhi Maa Ki mayyat Ko Kandha Dekar Dafnane Ke liy Le Gaya? Moral story in Urdu in Hindi
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जब एक शेर ने बूढ़ी माँ की मय्यत को कंधा दिया
“कलमा-ए-शहादत… अशहदु अन् ला इलाहा इल्लल्लाह…”
फजर की अज़ान की आवाज़ अभी हवा में पूरी तरह घुली भी नहीं थी कि गाँव की गलियों में एक अजीब-सी सरगोशी फैलने लगी।
“जल्दी चलो…
मय्यत को एक शेर दफना रहा है…”
लोग पहले हँसे।
फिर ठिठके।
और फिर दौड़ पड़े।
क्योंकि यह कोई आम बात नहीं थी।

अम्मा हाजरा
गाँव के आख़िरी सिरे पर, जंगल से सटे हुए एक कोने में, मिट्टी और टिन की चादरों से बनी एक टूटी-फूटी झोपड़ी थी। उसी झोपड़ी में रहती थी अम्मा हाजरा।
सफ़ेद बाल, झुर्रियों से भरा चेहरा, काँपते हाथ और होंठों पर हमेशा अल्लाह का ज़िक्र।
हाथ में तस्बीह और आँगन में चंद मुर्गियाँ—यही उसकी दुनिया थी।
अम्मा हाजरा अंडे उबालती, एक पुरानी बाल्टी में रखती और शाम ढलते ही गलियों में निकल जाती—
“अंडे ले लो… गरम अंडे ले लो…”
ठंड चाहे कितनी भी हो, उसके जिस्म पर न जर्सी होती, न जूते। बस एक टूटी चप्पल और सिर पर पुरानी-सी चादर।
इन्हीं अंडों से उसका गुजर-बसर चलता था।
और इसी मिट्टी में उसकी सारी ज़िंदगी दफ़न थी।
एक ज़ख़्मी शेर और एक माँ का दिल
एक शाम, जब अंडे बिक चुके थे और अम्मा थककर एक दरख़्त के नीचे बैठी थी, अचानक जंगल की तरफ़ से एक दर्द भरी दहाड़ सुनाई दी।
अम्मा काँप गई।
लेकिन जब उसने आगे बढ़कर देखा, तो उसकी रूह काँप उठी।
एक शेर—
ज़ख़्मी,
ज़मीन पर रेंगता हुआ,
उसके पंजे में काँच का टुकड़ा धँसा था।
ख़ून बह रहा था।
अम्मा पीछे हटी। जान हर किसी को प्यारी होती है।
लेकिन फिर उसका दिल बोला—
“यह भी तो अल्लाह की मख़लूक है…”
काँपते हाथों से उसने अपनी चादर फाड़ी, झुकी और धीरे-धीरे काँच निकाल दिया।
शेर ने दर्द से दहाड़ मारी…
लेकिन हमला नहीं किया।
मानो समझ गया हो—
यह हाथ दुश्मन का नहीं, माँ का है।
जब ज़ख़्म बाँध दिया गया, शेर ने सर उठाया और भारी मगर नरम आवाज़ में कहा—
“अम्मा… आज से मैं तेरा बेटा हूँ।”
अम्मा की आँखों से आँसू बह निकले।
“मैं तुझे औलाद समझकर ही मदद की है, बेटा…”
शेर बोला—
“मेरा नाम रख दे।”
अम्मा ने कहा—
“बादल।”
और वह जंगल में ग़ायब हो गया।
असली बेटा, जो परदेस चला गया
अम्मा हाजरा का एक बेटा और भी था—
जावेद।
जिसे उसने नौ महीने पेट में रखा,
भूखी रहकर पाला,
जिसके लिए अंडे बेचे,
रात-रात भर जागी।
लेकिन शादी के बाद जावेद बदल गया।
बहू आई तो ताने आए।
फिर आवाज़ें ऊँची हुईं।
फिर माँ की रोटी कम हुई।
एक दिन जावेद शहर चला गया—
माँ को उसी झोपड़ी में छोड़कर।
अम्मा ने कभी बद्दुआ नहीं दी।
बस दरवाज़ा खुला रखती रही।
लालच की इंतिहा
सालों बाद जावेद और उसकी बीवी लौटे।
चेहरे पर नक़ली मुस्कान, आँखों में लालच।
“अम्मा, यह घर बेच दो,”
बहू ने कहा।
अम्मा की तस्बीह हाथ से गिर गई।
“यह घर… तेरे बाप की निशानी है…”
मगर लालच अंधा होता है।
उस रात…
अम्मा का बायाँ अंगूठा काट दिया गया।
ताकि ज़बरदस्ती दस्तख़त करवाए जा सकें।
जावेद खड़ा देखता रहा।
माँ चीखती रही।
जंगल की पुकार
ख़ून से लथपथ, दर्द से तड़पती, अम्मा जान बचाकर जंगल की तरफ़ भागी।
दरख़्त के नीचे गिरकर उसने आसमान की तरफ़ देखा—
“ए मेरे बेटे बादल…
आज तेरी माँ तुझे पुकार रही है…”
जंगल में सन्नाटा छा गया।
फिर…
एक दहाड़।
बादल आ गया।
उसने ज़ख़्म देखा,
आँखों में आग भर गई।
“माँ, किसने किया?”
अम्मा ने बस इतना कहा—
“बदला नहीं चाहिए, बेटा…
बस मेरा बेटा सुधर जाए।”
बादल झुक गया।
क़ुदरत का इंसाफ़
कुछ ही दिनों में—
बहू बीमारी से मर गई।
जावेद कर्ज़ में डूब गया।
घर, पैसा, इज़्ज़त—सब छिन गया।
वह भीख माँगने लगा।
माँ की बद्दुआ नहीं,
माँ की ख़ामोशी काम आई।
आख़िरी वसीयत
मरते वक़्त अम्मा हाजरा ने बादल से कहा—
“मेरा जनाज़ा तू उठाएगा।”
और एक सुबह…
अम्मा रुख़्सत हो गई।
वह मंज़र जिसे गाँव ने कभी नहीं देखा
असली बेटा नहीं आया।
मगर बादल आया।
उसने अम्मा की मय्यत अपनी मज़बूत बाहों में उठाई।
कब्रिस्तान की तरफ़ चला।
लोग रो पड़े।
किसी ने कहा—
“आज साबित हो गया,
माँ खून से नहीं, रहम से बनती है।”
क़ब्र पर पहरा
आज भी लोग कहते हैं—
शाम ढले,
अम्मा हाजरा की क़ब्र पर
एक शेर बैठा रहता है।
ख़ामोश।
वफ़ादार।
बेटे की तरह।
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