इंस्पेक्टर पत्नी ने रिश्ता तोड़ा… सालों बाद पति SP बनकर लौटा, फिर जो हुआ..
अध्याय 1: सपनों की नींव
रमेश एक साधारण प्राइवेट कंपनी में काम करता था। उसकी तनख्वाह उतनी ही थी जितनी दाल-रोटी और थोड़े से सपनों के लिए काफी हो। लेकिन उसकी आंखों में सबसे बड़ा सपना था—अपनी पत्नी सोनम को पुलिस की वर्दी में देखना। सोनम बचपन से ही पुलिस ऑफिसर बनना चाहती थी और रमेश ने अपनी जरूरतों का गला घोटकर सोनम की किताबों, कोचिंग और हौसलों को कभी कम नहीं होने दिया।
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वक्त ने करवट ली, मेहनत रंग लाई। जब सोनम के कंधों पर सब इंस्पेक्टर के सितारे चमके, उस दिन रमेश की आंखों में खुशी के आंसू थे। उसे लगा जैसे यह जीत सोनम की नहीं, बल्कि उनके “हम” की थी।
अध्याय 2: वर्दी का नशा
शुरुआती दिनों में सब ठीक था। लेकिन जैसे-जैसे सोनम की पहचान थाने और शहर में बढ़ने लगी, घर का माहौल बदलने लगा। अब डाइनिंग टेबल पर हंसी-ठिठोली की जगह फाइलों की चर्चा और सोनम की व्यस्तता ने ले ली थी। रमेश जो कभी सोनम का हमसफर था, अब धीरे-धीरे उसकी जिंदगी के किसी कोने में रखा पुराना फर्नीचर बनता जा रहा था।
समाज और रिश्तेदार जो कभी रमेश की तारीफ करते नहीं थकते थे, अब दबी जुबान में बातें करने लगे—“बीवी थानेदार और पति वही पुरानी साइकिल वाला बाबू।” जब ये बातें सोनम के कानों तक पहुंचतीं, उसे गुस्सा समाज पर नहीं, बल्कि रमेश पर आता। अब रमेश का साधारण होना उसे खटकने लगा था। वह जब भी पुलिस जिप्सी से उतरती और रमेश को पुराने स्कूटर पर सब्जी लाते देखती, उसे शर्मिंदगी महसूस होती। वह भूल गई थी कि उसी स्कूटर के पेट्रोल ने उसे वर्दी तक पहुंचाया था।
अध्याय 3: अपमान की रात
एक शाम पुलिस विभाग की पार्टी थी। सोनम को परिवार सहित आमंत्रित किया गया था। रमेश ने अपनी सबसे अच्छी शर्ट पहनी थी—थोड़ी पुरानी जरूर थी, लेकिन साफ थी। पार्टी में बड़े-बड़े अधिकारी और शहर के रसूखदार लोग थे। सोनम साड़ी में थी, चेहरे पर सफलता का तेज था। वहां मौजूद लोग अंग्रेजी में बातें कर रहे थे, बड़ी गाड़ियों और निवेश की चर्चा हो रही थी। रमेश एक कोने में मुस्कुरा रहा था।
तभी सोनम के एक सीनियर अधिकारी ने रमेश की ओर इशारा करते हुए पूछा, “सोनम, ये सज्जन कौन हैं? तुम्हारे कोई रिश्तेदार?” सोनम के पास दो रास्ते थे—या तो गर्व से कहती कि ये मेरे पति हैं, या अपनी झूठी शान को चुनती। उसने नजरें चुराकर जवाब दिया, “सर, ये बस मेरे घर के कामकाज देखते हैं। फैमिली फ्रेंड है, मदद के लिए आए थे।”
रमेश यह सुन गया। उसके कानों में जैसे पिघला हुआ शीशा डाल दिया गया। जिस पत्नी के लिए उसने अपनी जवानी के साल खपा दिए, आज उसी ने उसे महफिल में “कामकाज देखने वाला” बता दिया। उसने कोई तमाशा नहीं किया, ना चिल्लाया, ना सवाल किया। बस उसकी आंखों की चमक बुझ गई। वह चुपचाप पार्टी से बाहर निकल गया।
अध्याय 4: टूटन और जुदाई
उस रात घर पर खामोशी थी। सोनम लौटी तो रमेश को सोफे पर बैठे पाया। उसे अपनी गलती का एहसास शायद था, लेकिन उसका अहंकार उस एहसास से बड़ा था। बजाय माफी मांगने के, उसने रमेश पर ही चिल्लाना शुरू कर दिया—“तुम वहां कोने में वैसे क्यों खड़े थे? मेरा स्टैंडर्ड अब बदल गया है। लोग क्या सोचेंगे कि इंस्पेक्टर सोनम का पति एक मामूली क्लर्क है। अब हमारे बीच तालमेल नहीं रहा। मेरी दुनिया आसमान में है, तुम जमीन पर। मुझे लगता है हमें अलग हो जाना चाहिए। तुम मेरी तरक्की के रास्ते का पत्थर बन रहे हो।”
रमेश ने सोनम की आंखों में देखा। वहाँ अब अपनी प्यारी सुमी नहीं, बल्कि एक अभिमानी इंस्पेक्टर थी। उसने धीमे स्वर में कहा, “सोनम, पत्थर अगर नींव का हो तो उसे निकाला नहीं जाता, उसके बिना इमारत गिर जाती है। लेकिन अगर तुम्हें लगता है मैं बोझ हूं, तो तुम्हारी उड़ान आसान कर देता हूं।”
रमेश ने उसी रात अपना सामान पैक किया। ना कोई बहस, ना संपत्ति का बंटवारा, ना आरोप। उसने मेज पर घर की चाबियां और शादी की अंगूठी रख दी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। जाते-जाते रमेश ने दरवाजे पर रुक कर कहा, “याद रखना सोनम, वक्त और तकदीर कभी भी बदल सकते हैं। आज तुम वर्दी पर गुमान कर रही हो, कल यही वर्दी झुक भी सकती है। मैं जा रहा हूं ताकि तुम जीत सको, लेकिन दुआ करना कि हम दोबारा ना मिले क्योंकि अगर मिले तो शायद तुम पहचान नहीं पाओगी।”

अध्याय 5: संघर्ष की तपस्या
रमेश अंधेरी तूफानी रात में घर से निकल गया। सोनम ने दरवाजा बंद किया और चैन की सांस ली। उसे लगा मामूली इंसान के चले जाने से उसकी जिंदगी और बेहतर हो जाएगी। लेकिन वह नहीं जानती थी कि उसने सिर्फ पति नहीं, अपनी किस्मत के सबसे मजबूत सितारे को खो दिया था।
रमेश दिल्ली के मुखर्जी नगर पहुंचा, एक छोटी सी कोठरी किराए पर ली। नौकरी भी करनी थी, पढ़ाई भी। उसने नाइट शिफ्ट की नौकरी पकड़ी, दिन में किताबों में डूबा रहता। नींद उसकी आंखों से रूठ चुकी थी। वह खुद से कहता, “सोनम, तुमने मुझे इसलिए छोड़ा क्योंकि मैं साधारण था। अब मैं वापस तभी आऊंगा जब मेरी पहचान तुम्हारी पहचान से बड़ी होगी। बदला लेना मकसद नहीं, उस रमेश को वापस पाना है जिसे तुमने मार दिया था।”
अध्याय 6: नई पहचान
साल दर साल बीत गए। रमेश ने ना दिवाली मनाई, ना होली। उसकी दिवाली तब होती जब वह कठिन विषय समझ लेता, होली तब जब टेस्ट में टॉप करता। संघर्ष के दिन आसान नहीं थे, कई बार पैसे खत्म हो जाते, बीमारी घेर लेती। लेकिन उसने हार नहीं मानी। यूपीएससी के परिणाम का दिन आया। रमेश ने अपना रोल नंबर टाइप किया। स्क्रीन पर उसका नाम चमक रहा था। वह भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के लिए चुना गया था।
हैदराबाद की एकेडमी में ट्रेनिंग के दौरान उसकी परिपक्वता उसे दूसरों से अलग बनाती थी। अब वह बाबूजी नहीं था, ऑफिसर था। ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग का समय आया। नियति ने खेल खेला—रमेश को उसी राज्य, उसी जोन में तैनाती मिली, जहाँ उसकी पुरानी जिंदगी दफन थी।
अध्याय 7: आमना-सामना
बनारस के उस थाने में खबर फैली—नए एसपी आ रहे हैं। सोनम ने सोचा, “कोई भी आए, काम तो हमें ही चलाना है।” लेकिन सिपाही ने कहा, “मैडम, ये सर मैनेज नहीं होते, उनका रिकॉर्ड अलग है।” सोनम मुस्कुरा दी, अपने अनुभव और आकर्षण पर भरोसा था।
अगली सुबह थाने के बाहर पुलिस गाड़ियों का काफिला था। सोनम लाइन में खड़ी थी, गुलदस्ता लिए। काली स्कॉर्पियो आकर रुकी। एक लंबा, कद्दावर शख्स बाहर निकला, डार्क सनग्लासेस, कंधों पर अशोक स्तंभ और सितारे। उसकी पर्सनालिटी इतनी प्रभावशाली थी कि सब सिपाही सैल्यूट में खड़े हो गए। सोनम आगे बढ़ी, “वेलकम सर, मैं सब इंस्पेक्टर सोनम।”
उस अधिकारी ने चश्मा उतारा। सोनम की जुबान जम गई। गुलदस्ता गिर गया। वह चेहरा—रमेश था। एसपी रमेश प्रताप सिंह। रमेश ने सीधे सोनम की आंखों में देखा—ना नफरत, ना प्यार, बस एक बर्फीली खामोशी। “इंस्पेक्टर सोनम, ड्यूटी के वक्त खोल नहीं, फाइलें संभाली जाती हैं। और हां, अपना यूनिफार्म ठीक कर लीजिए, बैज टेढ़ा है।” इतना कहकर रमेश आगे बढ़ गया।
अध्याय 8: इम्तिहान
रमेश ने चार्ज लेते ही पूरे जिले में कानून का राज कायम किया। अपराधी कांपने लगे, लेकिन सबसे ज्यादा डर सोनम को था। रमेश ने कभी अकेले में बात नहीं की, ना कोई ताना, ना जिक्र। उनकी खामोशी सोनम को अंदर ही अंदर खा रही थी।
एक दिन सोनम को मुखबिर से खबर मिली—बिल्डर के गोदाम में तस्करी की बड़ी खेप उतरने वाली है। वह रमेश को बिना बताए टीम लेकर रेड पर गई। लेकिन वहां कोई सामान नहीं मिला, बस खाली बक्से थे। तभी मीडिया और एंटी करप्शन ब्यूरो पहुंच गए। सोनम की जीप से नोटों के बंडल बरामद हुए। सोनम चिल्लाई, “मुझे फंसाया जा रहा है!” लेकिन उसकी आवाज दब गई।
अगले दिन अखबारों की हेडलाइन थी—“महिला सब इंस्पेक्टर रिश्वत लेते हाथों पकड़ी गई।” उसे सस्पेंड कर दिया गया, विभागीय जांच बैठा दी गई। सबसे बड़ा डर—इस जांच की अंतिम रिपोर्ट एसपी रमेश प्रताप सिंह को साइन करनी थी।
अध्याय 9: इंसाफ और माफी
दो दिन बाद सोनम को एसपी ऑफिस में पेश होने का समन मिला। वह लाचार थी, रमेश ताकतवर। रमेश ने सख्त लहजे में कहा, “तुम्हारे खिलाफ सबूत मजबूत है। जीप में पैसा, बिना सूचना के रेड, बिल्डर का बयान। तुम्हें कम से कम 5 साल की जेल हो सकती है।”
सोनम की आंखों से आंसू टपकने लगे। उसने रुंधे गले से कहा, “सर, मैंने पैसे नहीं लिए। मुझे फंसाया गया है। लेकिन आप मेरा यकीन नहीं करेंगे। आप तो चाहते थे कि मैं गिरूं।”
रमेश खिड़की पर जाकर बोले, “अगर मुझे बदला लेना होता तो पार्टी में ही जवाब दे देता। बदला वह लेते हैं जो अंदर से कमजोर होते हैं।” उसने एक पेन ड्राइव मेज पर फेंकी। “इस वीडियो में साफ दिख रहा है कि बिल्डर का आदमी तुम्हारी जीप में पैसे रख रहा है। मैंने बिल्डर और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया है। तुम्हारी बेगुनाही के सबूत कोर्ट और हेड क्वार्टर भेज दिए हैं।”
सोनम सन्न रह गई। जिस आदमी को उसने जलील किया, उसी ने उसकी इज्जत बचाई। वह फूट-फूट कर रोने लगी। “रमेश, मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारी गुनहगार हूं।”
रमेश ने सख्त स्वर में कहा, “इंस्पेक्टर सोनम, भावुक मत हो। मैंने यह एक पति होने के नाते नहीं किया, बल्कि एक ईमानदार ऑफिसर को साजिश का शिकार होते देखना इस वर्दी की तौहीन है। तुम्हारा अहंकार तुम्हें ले डूबा था। आज वर्दी बच गई है, लेकिन अगर गुरूर नहीं टूटा, तो अगली बार कोई नहीं बचा पाएगा।”
अध्याय 10: नई शुरुआत
सोनम ने पहली बार रमेश का असली कद देखा—वह साधारण आदमी नहीं, सच्चा नायक था। उसने धीरे से पूछा, “मेरे लिए इतना रिस्क क्यों लिया?” रमेश ने टोपी सर पर रखते हुए कहा, “क्योंकि किसी ने मुझे एक बार कहा था—पत्थर अगर नींव का हो तो निकाला नहीं जाता। मैं उस रिश्ते को भूल चुका हूं, लेकिन इंसानियत नहीं।”
रमेश के केबिन से बाहर निकलते वक्त सोनम ने उसे फोन पर कहते सुना, “हां मां, नहीं मैं दिवाली घर नहीं आ पाऊंगा। आरती के रिश्ते के लिए आप बात आगे बढ़ा सकती हैं। अब मुझे पुरानी यादों से बाहर निकलना है।”
सोनम ठिठक गई। “आरती… रिश्ता… नई शुरुआत…” शब्द उसे चुभ रहे थे। नौकरी बच गई थी, पर जिंदगी हार रही थी। उसने फैसला किया, चुप नहीं रहेगी। अगर रमेश जा रहा है, तो उसे रोकने की आखिरी कोशिश करेगी।
शाम को रमेश अपने सरकारी आवास के लॉन में बैठा चाय पी रहा था। गेट पर आहट हुई। सोनम खड़ी थी, बिना पुलिस जीप, साधारण रिक्शे में, शादी के दिनों वाली पुरानी सूती साड़ी पहनी थी। रमेश ने कप नीचे रखा, “आओ सोनम, कहो अब कौन सी फाइल रह गई?”
सोनम पास आई, डबडबाई आंखों से देखा। “फाइल नहीं, फैसला बाकी है रमेश। सुना है तुम आरती से शादी कर रहे हो?” रमेश ने कहा, “मां चाहती है मैं घर बसा लूं। तुम्हें खुश होना चाहिए।”
सोनम घुटनों के बल बैठ गई, रमेश का हाथ थाम लिया। “मैं माफी के लायक नहीं हूं। वर्दी और रुतबा ही सब कुछ समझा था। जब दुनिया मेरे खिलाफ थी, तुम ढाल बनकर खड़े हुए। तब समझ आया कि असली कद कुर्सी का नहीं, किरदार का होता है। तुम शादी कर लो, पर जान लो मैं यहां एसपी साहब से नहीं, पुराने रमेश से माफी मांगने आई हूं। अगर तुम फिर से पुराने स्कूटर पर आ जाओ, मैं तुम्हारे पीछे बैठने को तैयार हूं। मुझे साहब नहीं, हमसफर चाहिए।”
रमेश ने कहा, “मां से फोन पर क्या कहा था, जानते हो? मैंने कहा था, मां आरती बहुत अच्छी होगी, पर मेरे दिल के मकान में आज भी कोई किराएदार नहीं, मालकिन बनकर बैठी है। जब तक पुराना पन्ना कोरा ना हो, नई शुरुआत नहीं कर सकता।”
सोनम हैरान रह गई। “तुमने मना कर दिया?” रमेश ने झुककर सोनम को उठाया, कुर्सी पर बैठाया। “हम पुरानी जगह वापस नहीं जा सकते। लेकिन कहते हैं, जब कोई कीमती बर्तन टूटता है, तो उसे सोने से जोड़ा जाता है ताकि वह और खूबसूरत बने। अगर तुम तैयार हो, हम नई शुरुआत कर सकते हैं—जहां सिर्फ रमेश और सोनम होंगे, अफसर नहीं।”
सोनम ने उसका हाथ कसकर थाम लिया, “मैं तैयार हूं रमेश। हर दरार भरने को तैयार हूं।” रमेश मुस्कुराया, सालों बाद वही पुरानी निश्छल मुस्कान। “तो चलो, बनारस के घाट पर आरती का समय हो रहा है। बहुत साल हो गए, साथ में गंगा जी को दिया नहीं चढ़ाया।”
घंटियों की गूंज के बीच दोनों ने मिलकर एक दिया गंगा में प्रवाहित किया। अहंकार हार चुका था, प्रेम जीत गया था।
अध्याय 11: कहानी का सबक
रास्ता मुश्किल होगा सोनम। लोग बातें करेंगे। तैयार हो?
सोनम ने रमेश के कंधे पर सिर रखते हुए कहा, “जब तक तुम साथ हो, हर रास्ता मंजिल है।”
यह कहानी सिखाती है कि पद और पैसा किराए के मकान हैं—आज हैं, कल नहीं होंगे। लेकिन जो बुरे वक्त में साथ खड़ा था, वही आपकी असली संपत्ति है। अहंकार रिश्तों को खाता है, माफी नया जीवन देती है।
अगर आप रमेश की जगह होते, क्या सोनम को माफ करते या नई पहचान के साथ आगे बढ़ जाते? कमेंट में जरूर बताएं।
जय हिंद।
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