नमस्कार दोस्तों,

ज़रा कल्पना कीजिए… हिमाचल की ऊँची पहाड़ियों में भयंकर बर्फ़बारी हो रही है। चारों तरफ़ सफ़ेद चादर बिछी है। तेज़ बर्फ़ीला तूफ़ान चल रहा है। ऐसे हालात में दो नाबालिग-से दिखने वाले लड़के एक पहाड़ी इलाके में फँस जाते हैं। मोबाइल की बैटरी खत्म हो चुकी है। परिवार से संपर्क टूट चुका है। चारों तरफ़ सन्नाटा, ठंड और मौत का साया है।

ये कोई फ़िल्मी कहानी नहीं, बल्कि चंबा ज़िले की एक सच्ची और बेहद दर्दनाक घटना है। दो मौसेरे भाई — 19 साल के विकसित राणा और 13 साल के पीयूष भरमानी — वीडियो और रील बनाने के शौक़ में पहाड़ों की ओर निकल पड़े। दोनों पहाड़ों के ही रहने वाले थे, ट्रैकिंग और घूमने का अनुभव भी था। लेकिन कुदरत के आगे इंसान की तैयारी अक्सर छोटी पड़ जाती है।

23 जनवरी को भरमाणी माता मंदिर के दर्शन के बाद दोनों और ऊँचाई की ओर चले गए। उनके साथ टेंट, स्लीपिंग बैग और ज़रूरी सामान था। लेकिन तभी मौसम ने अचानक करवट बदली। तेज़ बर्फ़बारी और बर्फ़ीला तूफ़ान शुरू हो गया। पहाड़ों के रास्ते, खाइयाँ और पगडंडियाँ बर्फ़ से ढक गईं। न यह समझ आ रहा था कि रास्ता कौन-सा है और खतरा कहाँ छिपा है।

दोपहर तक परिवार से बात हुई। विकसित ने बताया कि वे ‘गोट’ नाम की जगह पर पहुँचे हैं, लेकिन मोबाइल की बैटरी खत्म होने वाली है। इसके बाद संपर्क पूरी तरह टूट गया। जब दोनों घर नहीं लौटे, तो परिवार की चिंता बढ़ती गई। तलाश शुरू हुई — पहले स्थानीय लोग, फिर पुलिस, फिर एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और आखिरकार भारतीय वायुसेना तक को सर्च ऑपरेशन में लगाया गया।

ड्रोन उड़ाए गए, पहाड़ियों की खाक छानी गई, लेकिन तीन दिनों तक कोई सुराग नहीं मिला। बर्फ़, कोहरा और खराब मौसम हर कोशिश को नाकाम कर रहे थे। इस दौरान उनका टेंट और सामान तो मिल गया, लेकिन दोनों लड़कों का कहीं पता नहीं चला।

तीसरे दिन जब मौसम कुछ साफ़ हुआ, तब वायुसेना के हेलीकॉप्टरों ने फिर से सर्च शुरू किया। और फिर वह दृश्य सामने आया, जिसने पूरे देश को भावुक कर दिया। एक पहाड़ी पर, एक पेड़ के पास, पीयूष भरमानी का निर्जीव शरीर मिला। और उसके बिल्कुल पास बैठा था उसका पालतू कुत्ता।

चार दिन। चार दिन तक वह कुत्ता बर्फ़ में, भयानक ठंड में, बिना खाए-पिए, अपने मालिक की लाश के पास डटा रहा। रेस्क्यू टीम जब पास पहुँची तो वह भौंकने लगा, किसी को पास नहीं आने दे रहा था। मानो आख़िरी पहरेदार बनकर अपने दोस्त की रक्षा कर रहा हो।

कुत्तों को भी ठंड लगती है। वे भी काँपते हैं, गर्म जगह ढूँढते हैं। लेकिन उस कुत्ते ने न ठंड की परवाह की, न भूख की। न उसने वहाँ से भागने की कोशिश की। वह बस वहीं रहा — अपने मालिक के साथ।

यह कहानी सिर्फ़ दो लड़कों की त्रासद मौत की नहीं है, बल्कि उस बेज़ुबान जानवर की भी है, जिसने वफ़ादारी की वो मिसाल पेश की, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। इंसान अक्सर अपने रिश्तों में स्वार्थ, ईर्ष्या और गणनाएँ ले आता है। लेकिन एक कुत्ता सिर्फ़ प्रेम और समर्पण जानता है।

दुनिया भर में कुत्तों की वफ़ादारी की कहानियाँ मशहूर हैं — जापान का हाचिको, स्कॉटलैंड का ग्रेफ्रायर्स बॉबी, और न जाने कितनी सच्ची घटनाएँ। लेकिन हिमाचल की बर्फ़ीली पहाड़ियों में बैठा यह कुत्ता भी उसी कतार में खड़ा हो गया है।

विकसित और पीयूष अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी मौत बेहद दुखद है। लेकिन उनके साथ-साथ एक और कहानी हमेशा याद रखी जाएगी — एक कुत्ते की कहानी, जिसने चार दिनों तक बर्फ़ में खड़े होकर यह साबित कर दिया कि वफ़ादारी आज भी ज़िंदा है।

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी इंसान से ज़्यादा इंसानियत जानवरों में दिखाई देती है।