“सॉलीट्यूड हाउस का रहस्य: अनंता संप्रदाय की सच्चाई”


परिचय:

क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ रहस्य इतने गहरे और भयावह होते हैं कि उन्हें दफनाना ही बेहतर होता है? कुछ सच्चाईयां इतनी विचलित करने वाली होती हैं कि उन्हें जानने के बाद रात में नींद आना मुश्किल हो जाता है। मुंबई के 1934 के उस भयानक मामले की तरह जिसे सरकार ने 70 साल तक छुपाए रखा। इस कहानी में एक ऐसी गहरी सच्चाई छिपी है, जिसे जानने के बाद आपके पैरों तले से जमीन खिसक सकती है। तो आइए, इस डरावनी कहानी की शुरुआत करते हैं, जो आज भी लोगों के मन में शंका और भय का कारण बनी हुई है।

भाग 1: मीरा सुल्लावन का रहस्य

1934 में मुंबई, जो उस समय बॉम्बे के नाम से प्रसिद्ध था, ब्रिटिश राज के अधीन एक व्यस्त और विकसित बंदरगाह शहर था। कोलाबा के पत्थर की संकरी गलियों में जहां औपनिवेशिक इमारतें अरब सागर की नम हवा में सड़ रही थीं, एक महिला रहती थी जिसका नाम मीरा सुल्लावन था। उसके बारे में पड़ोसी कहते थे कि वह अजीब थी। शांत, बहुत ज्यादा शांत।

मीरा का फ्लैट वेदर रोड पर एक पुरानी इमारत की तीसरी मंजिल पर था, जिसका नाम “सॉलीट्यूड हाउस” था। वह अकेली रहती थी और कोई नहीं जानता था कि वह कहां से आई थी। कुछ कहते थे कि वह पुणे से थी, कुछ कहते थे कि वह कोलकाता से आई थी, लेकिन किसी ने कभी पूछने की हिम्मत नहीं की। मीरा की आंखों में कुछ था – एक खालीपन, एक गहरा अंधेरा, जो देखने वाले की रीड में ठंडक भर देता था।

मार्च 1934 की एक सोमवार सुबह मिसेज गुलाब देसाई, जो मीरा की निचली मंजिल पर रहती थीं, ने पहली बार उस गंध को महसूस किया। यह एक अजीब गंध थी, मीठी, लेकिन साथ ही सड़ी हुई, जैसे फूलों को किसी बंद कमरे में छोड़ दिया गया हो। शुरू में उन्होंने सोचा कि शायद किसी ने सब्जियां सड़ने के लिए छोड़ दी हैं, लेकिन गंध बढ़ती गई। दिन दर दिन तेज और तेज। बुधवार तक पूरी इमारत में वह गंध फैल चुकी थी। पड़ोसी खिड़कियां बंद करके घूम रहे थे, लेकिन कुछ काम नहीं आया। गंध दीवारों के माध्यम से रिस रही थी।

भाग 2: मीरा के फ्लैट का खुलासा

मिस्टर कावास जी मोदी, जो दूसरी मंजिल पर रहते थे, ने बाहर आकर चिल्लाना शुरू कर दिया, “यह क्या बदबू है? कोई तो कुछ करो!” मिसेज देसाई ने तीसरी मंजिल की ओर देखा और धीरे से कहा, “मीरा बहन, तीन दिन से उनका दरवाजा नहीं खुला और यह गंध उन्हीं के फ्लैट से आ रही है।” चार लोग इकट्ठे हुए — मिस्टर मोदी, मिसेज देसाई, उनके पति रमेश, और इमारत का चौकीदार दिनेश कुमार। वे धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगे, और जैसे-जैसे वे तीसरी मंजिल के पास पहुंचे, गंध और तेज होती गई।

तीसरी मंजिल पर पहुंचते-पहुंचते दिनेश को उल्टी होने लगी। उसने अपनी नाक पर कपड़ा दबाया और कहा, “साहब, मैं नहीं जा सकता। यह गंध, यह मौत की गंध है।” रमेश देसाई ने मीरा के दरवाजे पर दस्तक दी, एक बार, दो बार, तीन बार, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। उन्होंने जोर से पुकारा, “मीरा बहन, आप ठीक हैं?”

सन्नाटा केवल उस भयानक घुटन भरी गंध के साथ था। मिस्टर मोदी ने पुलिस को फोन करने का निर्णय लिया। आधे घंटे में कोलाबा पुलिस स्टेशन से दो कांस्टेबल आए और उनके साथ थे सब इंस्पेक्टर विजय राव। एक लंबा, पतला आदमी, जिसकी मूंछें मोटी और काली थीं। उसने दरवाजे को देखा, फिर गंध को सूंघा और उसका चेहरा गंभीर हो गया। “दरवाजा तोड़ो,” उसने कांस्टेबलों से कहा। दो कांस्टेबलों ने कंधे से दरवाजे को धक्का दिया। एक बार, दो बार। तीसरी बार में दरवाजा खुला और जो उन्होंने अंदर देखा, वह उनकी सबसे बुरी कल्पना से भी परे था।

फ्लैट अंधेरा था। खिड़कियां बंद थीं और भारी मखमली पर्दे लटके हुए थे। फर्श पर मक्खियां भिनभिना रही थीं, हजारों मक्खियां। दीवारें काली थीं, लेकिन करीब से देखने पर पता चला कि वे काली नहीं थीं। वे कुछ और चीज से ढकी हुई थीं। कुछ गहरा और चिपचिपा। सब इंस्पेक्टर राव ने अपनी टॉर्च जलाई और लिविंग रूम में रोशनी फैली। वहां सोफे पर बैठी हुई थी मीरा सुल्लावन।

उसका सिर पीछे की ओर झुका हुआ था। उसकी आंखें खुली थीं, लेकिन उनमें कोई जीवन नहीं था। उसके गले पर गहरे निशान थे। उसकी त्वचा धूसर थी और उसके मुंह से खून सूख गया था। एक कांस्टेबल ने बाहर भागकर उल्टी कर दी, दूसरा दीवार के पास खड़ा रहा कांपता हुआ। लेकिन सब इंस्पेक्टर राव आगे बढ़ा।

भाग 3: रहस्यमय कमरे का खुलासा

राव ने फ्लैट के अंदर की ओर देखा। एक छोटा सा हॉल, एक बेडरूम, एक रसोई और फिर कोने में एक दरवाजा, एक छोटा सा धातु का दरवाजा, जिस पर ताला लगा हुआ था। राव ने दरवाजे के पास जाकर ताले को देखा। यह एक पुराना ताला था, लेकिन मजबूत। उसने कांस्टेबल से कहा, “इसे तोड़ो।” कांस्टेबल ने एक लोहे की छड़ से ताले पर प्रहार किया। एक बार, दो बार। तीसरी बार में ताला टूट गया। दरवाजा धीरे-धीरे खुला और उसके पीछे से जो निकला, वह केवल अंधेरा था और एक गंध — एक और भी भयानक गंध।

राव ने टॉर्च अंदर की ओर की। यह एक छोटा सा कमरा था, शायद 10 फीट चौड़ा और 10 फीट लंबा। दीवारें नंगी थीं। फर्श पत्थर का था और बीच में एक मेज। एक लकड़ी की पुरानी मेज और उस मेज पर रखी हुई थीं चीजें। भयानक चीजें। सात छोटी बोतलें, हर एक में कुछ तरल, एक पीला, एक लाल, एक भूरा, और हर बोतल पर एक लेबल हाथ से लिखा हुआ।

पहली बोतल पर लिखा था “आनंद 1928।” दूसरी पर “प्रिय 1929।” तीसरी पर “मीना 1930…” राव का दिल धड़कने लगा। उसने बाकी बोतलों को पढ़ा। सुनीता 1931, कमला 1932, राधा 1933 और आखिरी बोतल खाली थी। उस पर कुछ नहीं लिखा था।

भाग 4: भयानक तथ्य का खुलासा

राव ने अलमारी में एक लकड़ी का बक्सा देखा और उसे खोला। अंदर थीं तस्वीरें — सात तस्वीरें। हर एक में एक महिला और हर महिला की आंखों में वही खालीपन था। वही गहरा अंधेरा जो मीरा की आंखों में था। लेकिन सबसे भयानक था वह नोटबुक। एक मोटी चमड़े की नोटबुक, जो बक्से के नीचे रखी थी। राव ने उसे उठाया और पहला पन्ना खोला। वहां सुंदर हिंदी लिपि में लिखा था:

“प्रयोग संख्या एक, तारीख 15 जनवरी 1928
विषय: आनंद कपूर, आयु 19, धर्म हिंदू, जाति ब्राह्मण
विवरण: गोरी त्वचा, काली आंखें, स्वस्थ शरीर
उद्देश्य: आत्मा का निष्कर्षण और संरक्षण
विधि: श्वासावरोध के माध्यम से धीमी मृत्यु
अंतिम शब्द: ‘भगवान, मुझे बचाओ’
परिणाम: आत्मा संग्रहित, तरल रूप में बोतल क्रमांक एक में।”

राव के हाथ कांप रहे थे। उसने अगला पेज पलटा और अगला… हर पेज पर एक नया प्रयोग, एक नई महिला, एक नई मौत और हर एक में वही विधि, वही उद्देश्य: आत्मा का निष्कर्षण।

भाग 5: अनंता संप्रदाय और मीरा का रहस्य

अधिक पढ़ने के बाद, राव ने पाया कि मीरा सुल्लावन केवल एक हत्यारा नहीं थी, बल्कि एक शिकारी थी। एक शिकारी जो अपने शिकार को ध्यान से चुनती थी। नोटबुक में एक प्रविष्टि थी जो विशेष रूप से परेशान करने वाली थी। यह प्रिया शर्मा के बारे में थी।

“प्रिया को मनाने में तीन सप्ताह लगे। मैंने उसे एक बाजार में देखा। वह अकेली थी, दुखी थी। मैंने उससे बात की, दोस्ती की। उसे अपने घर आने के लिए आमंत्रित किया। उसने पहले मना किया, लेकिन मैंने धैर्य रखा। धीरे-धीरे उसने मुझ पर भरोसा किया और जब वह मेरे फ्लैट में आई, मैंने दरवाजा बंद कर दिया। उसने समझने की कोशिश की, भागने की कोशिश की, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। मैंने उसे गुप्त कमरे में ले जाकर बांध दिया और फिर धीरे-धीरे उसकी जिंदगी ले ली। उसकी आत्मा को संरक्षित किया। बोतल क्रमांक दो में।”

यह सब पढ़कर राव के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। वह महसूस कर रहा था कि यह केवल एक हत्या का मामला नहीं था, बल्कि एक खौफनाक तंत्र था, जो आत्माओं का संग्रह कर रहा था। और मीरा सुल्लावन वह शिकारी थी, जो उन आत्माओं का शिकार कर रही थी।

समाप्ति:

कहानी ने जब अपने अंतिम चरण में कदम रखा, तो राव ने महसूस किया कि मीरा सुल्लावन का मामला केवल एक और हत्या का मामला नहीं था, बल्कि एक गहरी तंत्र विद्या का परिणाम था, जो कई लोगों की जान ले चुका था। इस अंधेरे रहस्य को सुलझाना और समाज को इसके बारे में बताना अब उसकी जिम्मेदारी बन गई थी।