खेत का मजदूर और शहर की लड़की, ये कहानी जिंदगी भर याद रहेगा |
अधूरी चाहत का आखिरी नंबर: देवराज और अवंतिका की दास्तान
बिहार के मधुबनी जिले का एक छोटा सा गाँव, जहाँ की मिट्टी में मेहनत की खुशबू और लोगों के दिलों में सादगी रची-बसी है। यह कहानी 10 मई 2022 की है, जब कड़ाके की धूप और भीषण गर्मी ने जनजीवन को बेहाल कर रखा था। 21 साल का देवराज अपने गन्ने के खेत में पसीने से लथपथ होकर गुड़ाई कर रहा था।
अचानक, दूर से ढोल-नगाड़ों की आवाज उसके कानों में पड़ी। देवराज ने अपना काम रोका और देखा कि लगभग 150 लोगों का एक हुजूम उसी के रास्ते से होकर पास की नदी की ओर जा रहा था। वह थका हुआ था, इसलिए तमाशा देखने और थोड़ी देर सुस्ताने के लिए रास्ते के किनारे लगे घने आम के पेड़ों की छाया में बैठ गया। उसे क्या पता था कि यह दोपहर उसके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित होने वाली है।
वह मुलाकात और पहली चोट
जुलूस पास आया। ये लोग पास की बुआ के घर आयोजित एक धार्मिक अनुष्ठान के लिए नदी से कलश भरने जा रहे थे। भीड़ में कुछ शहर के लड़के-लड़कियां भी थे, जो गाँव के इस माहौल को किसी पिकनिक की तरह ले रहे थे। देवराज को फटे हाल और मिट्टी में सना हुआ देखकर वे उसका मजाक उड़ाने लगे।
उन्हीं में एक खूबसूरत और पढ़ी-लिखी लड़की थी—अवंतिका। जब उसके दोस्तों ने देवराज की गरीबी का मजाक उड़ाया, तो अवंतिका ने उन्हें टोकते हुए कहा, “तुम लोग किसी और ग्रह से आए हो क्या? ये किसान हैं, इन्हीं की वजह से तुम खाना खाते हो।”
उसी भीड़ में अवंतिका का छोटा भाई चिराग भी था, जिसे बहुत तेज प्यास लगी थी। उसने देवराज के पास जूट के बोरे से ढकी ठंडी बोतल देखी और पानी मांगा। देवराज ने सहृदयता से बोतल दे दी। लेकिन तभी अवंतिका के एक रसूखदार मामा वहाँ आ गए। उन्होंने देवराज को नीची नजर से देखते हुए डांटा और सबके सामने उसे दो तमाचे जड़ दिए। उनका तर्क था कि ‘पता नहीं किस जात-बिरादरी का है और पानी कैसा है’।
अवंतिका को यह देखकर बहुत दुख हुआ। जब भीड़ आगे बढ़ी, तो वह पीछे रुक गई और देवराज से माफी मांगी। उसने देवराज की उसी बोतल से पानी पीकर यह साबित किया कि वह इन भेदभावों में यकीन नहीं रखती। उस पल देवराज के मन में अवंतिका के लिए एक सम्मान और आकर्षण पैदा हो गया।
नदी का किनारा और एक जानलेवा हादसा
एक घंटे बाद, देवराज भी नहाने के लिए उसी नदी पर पहुँचा। उसने देखा कि डीजे बज रहा है और वही भीड़ मस्ती कर रही है। देवराज संकोचवश दूर हटकर दूसरे किनारे पर नहाने लगा। उसकी नजर चिराग पर थी, जो धीरे-धीरे गहरे पानी की ओर बढ़ रहा था।
शोर इतना था कि किसी को चिराग की चीख सुनाई नहीं दी। देवराज ने खतरे को भांप लिया और अपनी जान की परवाह किए बिना तैरकर चिराग के पास पहुँचा। जब तक अवंतिका को होश आया, चिराग डूब चुका था। लेकिन देवराज ने सही समय पर उसे बाहर निकाल लिया। चिराग की जान बच गई। अब पूरे गाँव और उस भीड़ के लिए देवराज एक ‘हीरो’ था।
तीन दिन का साथ और एक उपहार
अगले दिन, अवंतिका अपनी स्कूटी से देवराज के खेत पर पहुँची। वह उसे शुक्रिया कहना चाहती थी। उसने देवराज को बताया कि चिराग चार बहनों का इकलौता भाई है और वह उनके परिवार की जान है। अगले दो दिनों तक अवंतिका रोज देवराज से मिलने आती रही। वे घंटों बातें करते। देवराज ने बताया कि वह 12वीं तक पढ़ा है पर घर की तंगी और पिता की बीमारी के कारण आगे नहीं पढ़ पाया।
अवंतिका ने उसे मुंबई आकर काम करने की सलाह दी। आखिरी दिन, उसने देवराज को एक छोटा सा ‘पर्स’ गिफ्ट किया और कहा, “कल मैं शायद न मिल पाऊं क्योंकि हमें मुंबई लौटना है।” देवराज अगले दो दिनों तक खेत पर उसका इंतजार करता रहा, पर अवंतिका नहीं आई। वह उदास मन से अपने काम में लग गया, पर वह पर्स हमेशा अपने पास रखा।
मुंबई की गलियाँ और इत्तेफाक
नवंबर में अपनी बहन की शादी करने के बाद, देवराज मुंबई चला गया। वहाँ उसने एक टेक्सटाइल कंपनी में काम करना शुरू किया। मुंबई की भीड़ में वह रोज इस उम्मीद में निकलता कि शायद कभी अवंतिका दिख जाए। दो साल बीत गए, पर कोई सुराग नहीं मिला।
2025 की एक शाम, जब वह गेटवे ऑफ इंडिया पर टहल रहा था, उसकी मुलाकात एक स्कूली टूर से हुई। वहाँ एक लड़का चिल्लाया, “देवराज भैया!” वह चिराग था। चिराग अब बड़ा हो गया था। देवराज ने उत्साह में पूछा, “दीदी कैसी हैं?” चिराग ने जवाब दिया, “दीदी की तो शादी हो गई।”
यह सुनते ही देवराज के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका दिल टूट गया। उसने भारी मन से अपना नंबर चिराग को दिया और घर लौट आया।
वह कॉल और आखिरी पछतावा
उसी रात, देवराज के फोन पर एक कॉल आया। वह अवंतिका थी। “कैसे हो देवराज? कभी फोन क्यों नहीं किया?” अवंतिका की आवाज में शिकायत थी। देवराज ने कहा, “मेरे पास तुम्हारा नंबर कहाँ था?” अवंतिका हैरान रह गई, “क्या तुमने उस पर्स को ध्यान से नहीं देखा? उसमें मैंने एक छोटे कागज पर अपना नंबर लिखकर रखा था।”
देवराज ने तुरंत वह पर्स खोला। एक गुप्त जेब के अंदर सचमुच एक पुराना कागज था जिस पर अवंतिका का नंबर लिखा था। देवराज रोने लगा। उसने बताया कि उसे लगा था वह नंबर उसे कभी नहीं दे सकती, इसलिए उसने कभी ढूंढा ही नहीं।
अवंतिका ने रोते हुए कहा, “मैं तुमसे 99% प्यार करने लगी थी। मैं उन आखिरी दो दिनों में भी तुमसे मिलने आना चाहती थी, पर पिताजी मुझे दूसरे रिश्तेदारों के यहाँ ले गए और वहीं से हम मुंबई निकल आए। मुझे लगा तुमने मुझे कभी याद ही नहीं किया।”
निष्कर्ष
दोनों गेटवे ऑफ इंडिया पर मिले। एक-दूसरे को गले लगाकर खूब रोए। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। अवंतिका की शादी हो चुकी थी और देवराज के पास अब केवल यादें थीं। उन्होंने एक-दूसरे को खुश रहने की दुआ दी और अपने रास्ते अलग कर लिए।
एक छोटा सा नंबर, जो तीन साल तक देवराज की जेब में था, पर उसकी अज्ञानता ने उसे कभी मिलने नहीं दिया। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि “सही समय पर व्यक्त की गई भावनाएं और थोड़ी सी सावधानी जिंदगी बदल सकती है।”
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