डीएम साहब चौराहे का निरीक्षण कर रहे थे, तभी सब्जी बेच रही औरत को देख चौंक गए… फिर आगे जो हुआ।

फुटपाथ की वो औरत: एक डीएम की सच्चाई”
नागपुर की सुबह हर दिन की तरह वैसी ही थी। सड़कों पर दौड़ती बसें, सिग्नल पर रुकती गाड़ियां, ऑटोवालों की जल्दी और फुटपाथ पर अपने हिस्से की जिंदगी के लिए संघर्ष करती भीड़। सीताबड़ी का चौराहा शहर का दिल माना जाता था, लेकिन इस दिल में बेपरवाही भी छुपी रहती थी। रोज़ इस चौराहे से हजारों लोग गुजरते थे, लेकिन कोई ठहर कर किसी की मदद करने या उसके बारे में सोचने का समय नहीं था। सब किसी और की मजबूरी को नजरअंदाज करते हुए अपनी दुनिया में खोए रहते थे।
चौराहे के एक किनारे, जहां फुटपाथ सड़क से थोड़ी सी नीचे उतरता था, वहां एक औरत बैठी थी। उसके पास एक पुरानी चादर थी, जिस पर कुछ सब्जियां सजी हुई थीं—आलू, प्याज, टमाटर, हरी मिर्च और थोड़ा सा धनिया। सब्जियां ज्यादा नहीं थीं, लेकिन जिस तरह से वह रखी गईं थीं, यह साफ दिखाई दे रहा था कि ये दुकान नहीं, बल्कि उसका सहारा थीं।
कमला नाम की इस औरत की उम्र 50 के आसपास रही होगी, लेकिन उसके चेहरे पर उम्र नहीं, थकान और दर्द के निशान थे। यह वो थकान थी जो रोज़ सुबह उठकर खुद से यह कहने से आती है कि, “आज भी किसी तरह दिन निकालना है।” कमला का चेहरा हमेशा शांत और मूक रहता, लेकिन उसकी आँखों में एक गहरी थकान और संघर्ष की कहानी थी।
कमला ज्यादा बात नहीं करती थी। वह बस चुपचाप बैठी रहती, लेकिन जब कोई सामने आता, तो हल्के से सिर हिलाकर, बिना किसी बात के, सब्जी तौल कर दे देती। यह ऐसा व्यवहार था जैसे किसी पुराने दर्द को, किसी पुराने अनुभव को, किसी पुराने किस्से को रोकने की कोशिश करती हो। उसकी आंखों में एक गहरी पहचान छिपी थी—एक पहचान, जो शहर की उस व्यस्त दुनिया में खो चुकी थी।
हर सुबह, जब कमला अपनी चादर को ठीक करती और सब्जियां सजा रही होती, तो उसका ध्यान हमेशा नगर निगम की गाड़ियों पर रहता। पिछले कुछ दिनों से नगर निगम की गाड़ियां आकर फुटपाथ पर अतिक्रमण हटाने का अभियान चला रही थीं। यह अभियान गरीबों के लिए हमेशा एक बड़ा संकट बन जाता है। “तुम्हारी रोजी-रोटी अवैध है,” यह शब्द उन्हें हमेशा सुनने को मिलते थे।
कमला को डर था कि आज फिर उसी अभियान के तहत उसकी चादर और सब्जियां उठा ली जाएंगी। लेकिन वह चुपचाप बैठी रही। उसका डर गहरा था, लेकिन किसी ने कभी उसकी मदद नहीं की थी।
इसी दौरान चौराहे के दूसरे सिरे पर हलचल हुई। तीन सफेद सरकारी गाड़ियां आकर रुकीं, साथ में पुलिस की जीप भी थी। चौराहे की आवाज एक पल के लिए रुक गई। लोग नहीं जानते थे कि कौन आया है, लेकिन सरकारी गाड़ी और पुलिस की गहरी निगाहें यह बता रही थीं कि कोई बड़ा अधिकारी आया है।
फुसफुसाते हुए लोगों ने कहा, “डीएम साहब हैं।” कमला ने सिर नहीं उठाया। उसने बस अपनी चादर और सब्जियां थोड़ा और पास खींच लीं, जैसे वह अपनी जगह से हटने को तैयार नहीं थी। पास बैठे एक छोटे लड़के ने जो आस-पास के किसी सब्जी वाले का बेटा था, धीमे से कहा, “मौसी, आज हटवा देंगे।”
कमला ने कुछ नहीं कहा, बस उसके सिर पर हाथ रख दिया। जैसे वह न केवल बच्चे को, बल्कि अपने डर को भी चुप करा रही हो।
अजय प्रताप सिंह, नगर निगम के डीएम, गाड़ी से उतरे। उनकी उम्र 45 के आसपास थी। उनका चेहरा सधा हुआ था, आंखों में सख्ती और चाल में आत्मविश्वास था, जो एक अधिकारी के साथ आता है। वे चौराहे का निरीक्षण कर रहे थे। उनके साथ नगर निगम के अधिकारी, पुलिस वाले और कुछ फाइलें लिए लोग थे।
अजय ने इधर-उधर एक नजर डाली और बिना किसी आवाज के आदेश दिया, “अतिक्रमण हटाइए, रास्ता साफ दिखना चाहिए।” नगर निगम के कर्मचारी आगे बढ़े, और कुछ सब्जी वाले अपना सामान समेटने लगे। कुछ ने हाथ जोड़ लिए, कुछ ने बहस करने की कोशिश की, लेकिन सरकारी आदेश के सामने किसी की भी आवाज दब जाती थी।
कमला फिर भी नहीं उठी। उसकी आंखें सामने थीं, लेकिन उसकी नजरें कहीं बहुत भीतर थीं—एक ऐसी जगह जहां आज का शोर नहीं पहुंच सकता था।
एक कर्मचारी उसकी चादर की ओर बढ़ा और कहा, “माई, उठो, सामान हटाओ।” कमला ने पहली बार अपनी आवाज उठाई। उसका स्वर शांत था, लेकिन उसमें एक विनती छुपी थी, “साहब, 10 मिनट दे दो।” उसकी आवाज में ना गुस्सा था, ना शिकायत, बस एक थकी हुई विनती थी, जो मजबूरी से निकलती है।
कर्मचारी झुझलाते हुए चादर खींच दी। सब्जियां सड़क पर फैल गईं। एक टमाटर फटकर धूल में मिल गया। कमला झुकी और अपनी सब्जियां समेटने लगी। वह जल्दी कर रही थी, जैसे समय ने उसे रोक दिया हो।
तभी अजय की नजर कमला पर टिक गई। यह दया की नजर नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी पहचान का ठहराव था, जैसे कोई पुरानी जगह की गंध अचानक कहीं और मिल जाए और आदमी रुक जाए।
अजय दो कदम आगे बढ़े, और कमला की आंखों से आंखें मिलाई। उस पल में अजय को कुछ महसूस हुआ—एक रुकावट, एक ठहराव।
कमला की आंखों में भूख नहीं थी, लेकिन एक पुराना दर्द छुपा था। वह कांपते हुए बोली, “अजय…”
अजय की आंखें चौड़ी हो गईं। “आपने मुझे क्या कहा?” उनकी आवाज तनी हुई थी, लेकिन उनकी पूरी शरीर में कुछ टूटने की आवाज थी।
कमला ने घबराते हुए कहा, “नहीं, साहब, गलती से निकल गया।”
लेकिन अजय ने फिर पूछा, “तुम मुझे जानते हो?”
कमला की आंखों में आंसू थे, और उसने चुपचाप कहा, “तेरी मां के जाने के बाद तू मेरे घर रहा था। तीन साल, रात में उठकर रोता था। मां को बुलाता था। मैं तुझे चुप कराती थी। तेरी किताबें, तेरी फीस, तेरे जूते सब मैंने किए।”
अजय का गला भर आया, और वह उसी जगह खड़े रहे। यह वही जगह थी जहां वह कभी छोटे थे, जहां कमला ने उन्हें सहारा दिया था।
कमला ने कहा, “तेरी मां मरते वक्त बोली थी, ‘कमला, मेरे बेटे को पढ़ा देना।’ मैंने पढ़ाया। मैं खुश थी कि तू बच गया। फिर तू चला गया बड़ा होकर अफसर बनकर।”
अजय की आंखों में आंसू थे। वह अब समझ रहे थे कि वह कितना कुछ खो चुके थे।
कमला ने कहा, “रो मत, बेटा। लोग कहेंगे डीएम कमजोर है, लेकिन तू सही रास्ते पर है।”
यह शब्द अजय के दिल में घुस गए, और वह चुप हो गए।
कमला का जीवन न केवल अजय के लिए एक कड़ी चुनौती था, बल्कि वह उसे अपनी पहचान दे रही थी।
अजय ने फैसला किया कि वह सिर्फ एक नीति नहीं बनाएंगे, बल्कि उन सब कमलाओं के लिए कुछ करेंगे, जो रोज़ इसी चौराहे पर बैठकर अपना जीवन जीने की कोशिश कर रही थीं।
इस दिन की शुरुआत में सब कुछ सामान्य था, लेकिन चौराहे पर हुई इस मुलाकात ने अजय के जीवन को बदल दिया। उन्होंने न केवल सरकारी तंत्र को बदलने की कोशिश की, बल्कि अपनी पहचान को भी स्वीकार किया।
कमला का संघर्ष अब अजय के भीतर से बाहर आ रहा था। वह न केवल सरकारी नियमों से लड़ रहे थे, बल्कि उन्होंने उस एक औरत की ताकत और उसकी धैर्य से ही एक नई पहचान पाई।
समाप्त
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