Meerut Kapsad Kand Ki Puri Sachai | Police Report

10 जनवरी 2026 की शाम, उत्तराखंड का रुड़की रेलवे स्टेशन। प्लेटफार्म पर आम दिनों की तरह ही भीड़भाड़ थी। यात्री अपनी-अपनी ट्रेनों का इंतजार कर रहे थे। सर्दियों की रात थी, कोहरा हल्का-हल्का छाने लगा था। इसी भीड़ के बीच एक ट्रेन आकर रुकती है, जो सहारनपुर से हरिद्वार की तरफ जा रही थी। ट्रेन की एक बोगी में खिड़की के पास एक लड़का बैठा हुआ था। चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई थी, आंखों में एक अजीब सा डर था। उसके ठीक बगल में एक लड़की बैठी थी, जो खामोश थी, गुमसुम थी।

उस लड़के ने सामने बैठे एक अनजान यात्री से बड़ी विनती करते हुए कहा, “भाई साहब, क्या मुझे आपका फोन मिल सकता है? मुझे घर पर एक बहुत जरूरी कॉल करनी है। मेरा फोन बंद हो गया है।” सामने वाले यात्री ने पहले तो मना किया, लेकिन लड़के की बार-बार गिड़गिड़ाने पर उसका दिल पसीज गया। उसने अपना मोबाइल अनलॉक करके उस लड़के के हाथ में थमा दिया। बस यही वो पल था, यही वो गलती थी जिसका उत्तर प्रदेश की पुलिस पिछले 60 घंटों से इंतजार कर रही थी।

उस लड़के ने कांपते हाथों से एक नंबर डायल किया, वह नंबर किसी और का नहीं बल्कि मेरठ के सरधना इलाके के कपसाड़ गांव के एक झोलाछाप डॉक्टर राजेंद्र का था। फोन कनेक्ट हुआ। उधर से आवाज आई और इधर से लड़के ने सिर्फ इतना कहा, “मैं निकल गया हूं। हम हरिद्वार जा रहे हैं सब। ठीक है ना?” बात मुश्किल से 30 सेकंड की हुई होगी। उसने फोन काट दिया, डिलीट करके मोबाइल वापस कर दिया। वह लड़का निश्चिंत हो गया कि उसने अपने ठिकाने की खबर दे दी है और वह अब सुरक्षित है। लेकिन वह यह नहीं जानता था कि जिस डॉक्टर को उसने फोन मिलाया था, उसका नंबर पिछले 48 घंटों से उत्तर प्रदेश पुलिस की सर्विलांस टीम सुन रही थी। अब वह नंबर और उसकी लोकेशन पुलिस के रडार पर आ चुकी थी।

कहानी की शुरुआत: कपसाड़ गांव की सर्द सुबह

ठीक दो दिन पहले, 8 जनवरी 2026। जगह—उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला, थाना सरधना, गांव कपसाड़। कपसाड़ गांव, जो अपनी खेती और भाईचारे के लिए जाना जाता था, उस दिन वहां एक अजीब सी शांति थी। सुबह करीब 8:00 बज रहे थे। सर्दियां अपने शबाब पर थी। गांव के लोग अपने-अपने काम में लगे थे।

इसी गांव में रहने वाली सुनीता देवी, उम्र करीब 45 साल, अपने घर के काम निपटाकर खेत की तरफ जा रही थी। उनके साथ उनकी 20 साल की बेटी रूबी भी थी। मां और बेटी का रिश्ता ही ऐसा होता है—दोनों बातें करते हुए, हंसते-खेलते गांव के बाहरी रास्ते से जो रजवाहे की पटरी के किनारे-किनारे जाता है, वहां से गुजर रही थी। उनका मकसद था खेत पर काम कर रहे पिता और भाइयों के लिए खाना पहुंचाना और गन्ने की छिलाई में हाथ बंटाना।

उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि आज का सूरज उनके परिवार के लिए एक काली रात लेकर आया है।

हादसा: एक मां की बहादुरी और एक बेटी की चीख

वह लोग खेत के रास्ते पर चल ही रहे थे कि अचानक पीछे से एक सफेद रंग की कार आती है। गांव के कच्चे रास्ते पर कार की रफ्तार सामान्य से थोड़ी ज्यादा थी। कार ने आक्रामक तरीके से बेटी के पास ब्रेक मारे। धूल का गुबार उड़ा और गाड़ी का दरवाजा खुला। गाड़ी से उतरते हैं दो लड़के—एक था पारस सोम, जो इसी गांव का रहने वाला था, और दूसरा था उसका साथी सुनील राजपूत।

पारस की आंखों में खून सवार था। वो सीधा रूबी की तरफ लपका। सुनीता देवी कुछ समझ पाती, इससे पहले ही पारस ने रूबी का हाथ पकड़ लिया और उसे जबरदस्ती कार की तरफ खींचने लगा। रूबी चिल्लाई, “मां बचाओ! यह मुझे ले जा रहा है!”

एक मां के सामने उसकी बेटी को कोई गुंडा उठा ले जाए, यह भला वह कैसे बर्दाश्त करती? सुनीता देवी शेरनी की तरह उन आरोपियों पर झपट पड़ी। उन्होंने पारस को धक्का दिया, उसका कॉलर पकड़ा और अपनी बेटी को उसके चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की। सुनीता देवी ने शोर मचाना शुरू कर दिया, “बचाओ! बचाओ! मेरी बेटी को छोड़ दो!”

खेतों में सन्नाटा था, लेकिन सुनीता की आवाज गूंज रही थी। पारस को लगा कि अगर यह औरत यूं ही चिल्लाती रही तो गांव वाले इकट्ठा हो जाएंगे और उसका खेल बिगड़ जाएगा। उसके सिर पर तो रूबी को साथ ले जाने का जुनून सवार था। जब उसने देखा कि सुनीता देवी उसे छोड़ नहीं रही हैं और लगातार विरोध कर रही हैं, तो उसने वह किया जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।

पास ही गन्ने के खेत में काम करने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक भारी हथियार फरसा रखा था या शायद वह अपने साथ ही लेकर आया था। गुस्से में पागल पारस ने वह फरसा उठाया और पूरी ताकत से सुनीता देवी पर वार कर दिया। एक जोर की आवाज आई और अगले ही पल वह जमीन पर गिर पड़ी। लेकिन वह मां थी, गिरते-गिरते भी उसने अपनी बेटी का हाथ पकड़ने की कोशिश की।

पारस का पागलपन यहीं नहीं रुका। उसने एक के बाद एक कई हमले किए। सुनीता देवी गंभीर रूप से घायल होकर बेसुध होने लगी। उनकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। लेकिन आखिरी सांस तक उनकी नजरें अपनी बेटी रूबी पर थी, जिसे वह आरोपी अब घसीटते हुए गाड़ी में डाल रहे थे। रूबी चीखती रही, “मां! मां!” लेकिन पारस ने उसे गाड़ी में धकेला, तमंचा दिखाया और जान से मारने की धमकी दी। पलक झपकते ही वह कार धूल उड़ाती हुई वहां से गायब हो गई।

पीछे रह गया तो सिर्फ बिखरा हुआ वो खौफनाक मंजर—एक तड़पती हुई मां और खेतों में पसरा हुआ मातम।

गांव में कोहराम

थोड़ी ही देर बाद सुनीता देवी का बेटा नरसी, जो शायद कुछ दूरी पर था या पीछे आ रहा था, वह मौके पर पहुंचता है। वहां का मंजर देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी मां बुरी तरह जख्मी हालत में जमीन पर पड़ी थी, सांसे उखड़ रही थी। उसने दौड़कर मां का सिर अपनी गोद में रखा, “मां! मां! यह किसने किया? रूबी कहां है?”

सुनीता देवी बोलने की हालत में नहीं थी, लेकिन उन्होंने लड़खड़ाती जुबान से सिर्फ इतना इशारा किया कि वह लोग रूबी को ले गए और फिर वो खामोश हो गई। नरसी की चीखों ने आसपास के खेतों में काम कर रहे लोगों को इकट्ठा कर दिया। आनन-फानन में सुनीता देवी को गाड़ी में डालकर मोदीपुरम के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने हालत बेहद नाजुक बताई।

उधर गांव में खबर आग की तरह फैल गई—दलित परिवार की बेटी का अपहरण हो गया है और मां की हत्या कर दी गई है। यह खबर सुनते ही गांव में कोहराम मच गया। जो लोग खेतों में थे वह अस्पताल की तरफ भागे, जो घर पर थे वह थाने की तरफ। पुलिस को सूचना दी गई। लेकिन जब तक पुलिस सक्रिय होती, बहुत देर हो चुकी थी। अस्पताल में इलाज के दौरान शाम करीब 4:30 बजे सुनीता देवी ने दम तोड़ दिया।

जैसे ही मौत की खबर बाहर आई, वहां मौजूद भीड़ का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। यह अब सिर्फ एक हत्या का मामला नहीं बचा था। यह दो जातियों के बीच का संघर्ष बनता जा रहा था। पीड़ित परिवार का आरोप था कि गांव के दबंगों ने, जो ऊंची जाति के हैं, उन्होंने हमारी बेटी की इज्जत को निशाना बनाया और विरोध करने पर मां को मार डाला।

अस्पताल के बाहर खड़ी एंबुलेंस में गुस्से में आई भीड़ ने तोड़फोड़ शुरू कर दी। हालात बिगड़ते देख मेरठ के एसएसपी, एसपी देहात और तमाम बड़े अधिकारी मौके पर पहुंचे। उन्होंने परिवार को समझाने की कोशिश की। लेकिन परिवार की एक ही जिद थी—जब तक हमारी बेटी वापस नहीं आती और कातिल पकड़े नहीं जाते, हम मां का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। हमें अपनी बेटी जिंदा चाहिए और अभी चाहिए।

पुलिस की चुनौती और राजनीति का तूफान

पुलिस के हाथ-पांव फूल गए थे। एक तरफ मर्डर, दूसरी तरफ अपहरण और तीसरी तरफ कानून व्यवस्था का बिगड़ता हुआ माहौल। दलित समाज के बड़े नेता और भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भी सोशल मीडिया पर ऐलान कर दिया कि वह पीड़ित परिवार से मिलने आएंगे। समाजवादी पार्टी के नेता अतुल प्रधान भी मौके पर पहुंच गए। यह मामला अब लखनऊ तक गूंजने लगा था।

पुलिस ने परिवार को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया, फिर 36 घंटे का। लेकिन आरोपी का कोई सुराग नहीं मिल रहा था। 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी, 10 से ज्यादा टीमें, सर्विलांस, मुखबिर तंत्र—सब कुछ झोंक दिया गया था। लेकिन पारस और रूबी जैसे जमीन निगल गई हो या आसमान खा गया हो।

उधर हत्यारा पारस उस मासूम लड़की रूबी को लेकर कहां था? आखिर वह 60 घंटे तक पुलिस को चकमा कैसे देता रहा?

60 घंटे की भागदौड़: रूबी की कैद और पुलिस की खोज

वारदात को अंजाम देने के बाद पारस और रूबी सबसे पहले मुजफ्फरनगर के खतौली पहुंचे। पारस शातिर था, वह जानता था कि मेरठ पुलिस सबसे पहले आसपास के इलाकों में नाकेबंदी करेगी। इसलिए उसने सीधे हाईवे पकड़ा और दिल्ली की तरफ निकल गया। रूबी पूरी तरह से दहशत में थी। उसके कपड़ों पर शायद उसकी मां का खून लगा था, आंखों में आंसू सूखे नहीं थे, और कनपटी पर पारस का तमंचा था।

दिल्ली पहुंचकर उन्होंने एक होटल में पनाह ली। लेकिन पारस को डर था कि दिल्ली में ज्यादा देर रुकना खतरे से खाली नहीं है। वहां से वह अगले दिन यानी 9 जनवरी को गुरुग्राम निकल गए। वहां पारस अपने एक पुराने दोस्त के पास रुका। इस दौरान वह लगातार अपने गांव की खबरों पर नजर रखे हुए था। सोशल मीडिया और न्यूज़ के जरिए उसे पता चल रहा था कि कपसाड़ गांव में आग लगी हुई है, पुलिस उसके घर पहुंच चुकी है, उसके दादा-दादी को हिरासत में ले लिया है, उसके ऊपर 25,000 का इनाम घोषित हो चुका है।

यह सब देखकर पारस घबरा गया। उसे लगा कि अब दोस्त के घर रुकना भी सेफ नहीं है। 9 जनवरी की शाम को ही वह रूबी को लेकर वापस उत्तर प्रदेश की तरफ मुड़ा। वह सहारनपुर के एक गांव टपरी पहुंचा, जहां उसकी बहन रहती थी। एक रात वहां काटी। रूबी इस पूरे सफर में एक जिंदा लाश की तरह उसके साथ थी। ना वह चिल्ला सकती थी, ना भाग सकती थी।

पारस ने उसे साफ कह दिया था, “अगर मुंह खोला तो जैसे तेरी मां को मारा है, तेरे बाप और भाई को भी मार दूंगा।” वो बेचारी लड़की अपने परिवार की सलामती के लिए खामोश रही। उस आरोपी के साथ साए की तरह चलती रही।

अगली सुबह यानी 10 जनवरी पुलिस का दबाव बढ़ता जा रहा था। चंद्रशेखर आजाद गांव पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस उन्हें रोकने के लिए बैरिकेडिंग लगा रही थी। गांव वाले धरने पर बैठे थे। प्रशासन की सांसे अटकी हुई थी।

उधर पारस को लगा कि अब सहारनपुर में भी रुकना ठीक नहीं। उसने प्लान बनाया कि वह रूबी को लेकर हरिद्वार जाएगा और वहां से कहीं और दूर, शायद नेपाल या किसी पहाड़ी इलाके में छिप जाएगा। वह दोनों सहारनपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे और हरिद्वार जाने वाली ट्रेन में बैठ गए। ट्रेन चल पड़ी। पारस को लगा कि वह बच गया। लेकिन कहते हैं ना अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों ना हो, वह एक गलती जरूर करता है। और पारस ने वही गलती रुड़की स्टेशन के पास कर दी।

पुलिस का जाल और गिरफ्तारी

ट्रेन में बैठे एक यात्री से पारस ने फोन मांगा और अपने गांव के झोलाछाप डॉक्टर राजेंद्र को फोन मिला दिया। उसे लगा कि डॉक्टर तो उसका पुराना जानकार है, वह उसे बताएगा कि गांव में क्या चल रहा है। लेकिन वह नहीं जानता था कि डॉक्टर राजेंद्र पुलिस के रडार पर था। जैसे ही वह कॉल कनेक्ट हुई, मेरठ पुलिस के कंट्रोल रूम में एक बीप बजी। टारगेट एक्टिव है। लोकेशन रुड़की रेलवे स्टेशन के पास मूविंग ट्रेन।

एसएसपी विपिन ताड़ा ने तुरंत हरिद्वार पुलिस और जीआरपी से संपर्क किया। “ट्रेन नंबर नोट करो, बोगी नंबर का अनुमान लगाओ और पूरे स्टेशन को घेर लो। वह दोनों उसी ट्रेन में हैं।”

रुड़की स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही सादी वर्दी में पुलिस वाले बोगी में चढ़ गए। हर सीट, हर चेहरे को स्कैन किया जाने लगा और फिर एक कोने वाली सीट पर खिड़की के पास बैठा वो लड़का दिखा, जिसके हुलिए का वर्णन पुलिस के पास था। बगल में वह लड़की भी थी। पुलिस वाले धीरे से उनके पास पहुंचे। पारस को भागने का कोई मौका नहीं मिला। जैसे ही पुलिस ने उसके कंधे पर हाथ रखा, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

“तुम्हारा खेल खत्म पारस,” इंस्पेक्टर ने कड़क आवाज में कहा। उसी वक्त रूबी को भी पुलिस ने अपनी सुरक्षा में ले लिया। रूबी पुलिस को देखते ही रो पड़ी। वह पिछले तीन दिनों से जिस नरक को जी रही थी, उससे आजाद होने की उम्मीद जगी थी। दोनों को गिरफ्तार करके रात में ही मेरठ लाया गया।

मीडिया का शोर और लव स्टोरी का एंगल

लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती। असल ट्विस्ट तो अब आने वाला था। जैसे ही यह खबर फैली कि रूबी और पारस पकड़े गए हैं, मीडिया में एक नई कहानी तैरने लगी। पारस ने पुलिस को पूछताछ में एक तोते की तरह रटा-रटाया बयान दिया। उसने कहा, “साहब, मैंने कोई किडनैपिंग नहीं की। हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं। पिछले 3 साल से हमारा अफेयर चल रहा था। रूबी के घर वाले उसकी शादी कहीं और करना चाहते थे। इसलिए उसने मुझे बुलाया और हम अपनी मर्जी से भागे हैं। उसकी मां की मौत तो बस एक हादसा थी। वो बीच में आ गई और धक्कामुक्की में गिर गई।”

पारस के वकील ने भी कोर्ट में यही दलील दी। सोशल मीडिया पर कुछ पुरानी तस्वीरें भी वायरल होने लगी, जिनमें पारस और रूबी साथ दिख रहे थे। एक तस्वीर हरिद्वार के किसी मंदिर की बताई जा रही थी। गांव के भी कुछ दबी जुबान वाले लोगों ने कहा कि हां, शायद प्रेम प्रसंग था।

इस नए लव एंगल ने पूरे केस को पलटने की कोशिश की। लोग सवाल उठाने लगे—क्या यह वाकई अपहरण था? क्या दलित बनाम ठाकुर का मुद्दा सिर्फ राजनीति थी? क्या लड़की अपनी मां के कातिल के साथ भाग गई थी? गांव वालों की राय भी बंट गई। कुछ ने कहा कि लड़की की भी गलती है, दोनों को बराबर की सजा मिलनी चाहिए।

लेकिन पीड़ित परिवार—रूबी के पिता और भाई का कलेजा फट रहा था। वह चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे, “हमारी बेटी को डराया गया है, यह झूठ है। हमारी मां को मारा गया है। क्या कोई बेटी अपनी मां के कातिल के साथ प्यार करेगी?”

रूबी का बयान: सच की जीत

सबकी निगाहें अब रूबी पर टिकी थी। पुलिस जानती थी कि इस केस का फैसला ना तो पारस के बयान से होगा और ना ही नेताओं के भाषणों से। फैसला होगा रूबी की जुबान से।

11 जनवरी की सुबह, रूबी को कोर्ट में पेश किया गया। सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि परिंदा भी पर ना मार सके। पुलिस उसे मीडिया से बचाकर गुपचुप तरीके से मैजिस्ट्रेट के सामने ले गई। रूबी का बयान बंद लिफाफे में दर्ज होना था, यानी वह जो भी कहेगी, वह सीधे जज साहब सुनेंगे।

कोर्ट रूम के बाहर सन्नाटा था, लेकिन अंदर रूबी का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैजिस्ट्रेट ने उसे भरोसा दिलाया कि वह यहां सुरक्षित है और बिना किसी डर के सच बोले। और तब रूबी ने जो कहा, उसने पारस की सारी लव स्टोरी वाली थ्योरी की धज्जियां उड़ा दी।

रूबी ने रोते हुए, सिसकते हुए जज साहब को बताया, “साहब, वह झूठ बोल रहा है। उसने मेरा अपहरण किया था। उस दिन खेत में उसने मेरे सामने मेरी मां पर जानलेवा हमला किया। मेरी मां तड़प रही थी और वह मुझे घसीट रहा था। मैं चीखना चाहती थी, लेकिन उसने मेरे कनपटी पर कट्टा लगा दिया था। उसने कहा था कि अगर एक शब्द भी बोला तो पूरे परिवार को खत्म कर दूंगा।”

रूबी ने आगे बताया, “पूरे रास्ते चाहे ट्रेन हो या होटल, वो मुझे डरा कर रखता था। वह मुझे बार-बार अपनी मां की उस भयानक हालत की याद दिलाता था। मैं मजबूर थी। मैं अपनी जान से ज्यादा अपने पिता और भाई की जान की फिक्र कर रही थी।”

रूबी का यह बयान उस प्रेम कहानी के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ।

परिवार से मिलन और समाज की संवेदना

कोर्ट से बाहर आते ही जब रूबी को आशा ज्योति केंद्र ले जाया गया, तो वहां उसका सामना अपने पिता और भाई से हुआ। वो मंजर देखकर वहां मौजूद सख्त दिल पुलिस वालों की भी आंखें नम हो गई। रूबी अपने पिता से लिपट कर दहाड़े मारकर रोने लगी, “पापा, मुझे माफ कर दो। मैं मां को नहीं बचा पाई। मैं उनका आखिरी चेहरा भी नहीं देख पाई।”

पिता सत्येंद्र ने अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरा। उनके खुद के आंसू नहीं रुक रहे थे। उन्होंने बस इतना कहा, “बेटी, तू सही सलामत लौट आई, यही बहुत है। तेरी मां तुझे बचाने के लिए ही गई थी।”

रूबी ने अपने परिवार को बताया कि कैसे 60 घंटे उसने मौत के साए में बिताए। कैसे पारस उसे गन्ने के खेतों में छिपा कर रखता था। कैसे वह बार-बार जगह बदलता था। उसने बताया कि वह पारस से नफरत करती है और चाहती है कि उसे उसकी मां की हत्या के लिए फांसी की सजा मिले।

पुलिस जांच और न्याय का संघर्ष

पुलिस की जांच में अब सब कुछ साफ हो चुका था। मेडिकल रिपोर्ट और रूबी के बयान ने पुष्टि कर दी थी कि यह मामला सीधे तौर पर अपहरण और जघन्य हत्या का है। पारस का नाबालिग होने का दावा भी पुलिस की जांच के दायरे में है। पुलिस उसकी जन्मतिथि की जांच करवा रही है। अगर वह बालिग निकलता है, तो उसके गुनाह की माफी की कोई गुंजाइश नहीं होगी।

उधर गांव में जो तनाव था, वह रूबी की वापसी और बयान के बाद थोड़ा कम हुआ। लेकिन गुस्सा अभी भी बरकरार है। सुनीता देवी का अंतिम संस्कार प्रशासन के बहुत मनाने के बाद, भारी सुरक्षा के बीच किया गया। परिवार को 1 लाख का चेक, नेताओं की तरफ से मदद के वादे मिले। लेकिन क्या कोई दौलत उस मां को वापस ला सकती है?

इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे और तारीफ भी हुई। तारीफ इसलिए कि 60 घंटे में आरोपियों को पकड़ लिया। सवाल इसलिए कि आखिर गांव में दिन दहाड़े ऐसी गुंडागर्दी कैसे हो गई? क्यों एक बेटी को खेत जाने के लिए भी डरना पड़ता है?

समाज का आइना और सवाल

चंद्रशेखर आजाद ने सही कहा था—यह सिर्फ एक हत्या नहीं है, यह सत्ता और ताकत का नशा है। एक मां अपने बच्चों की ढाल होती है और उन दरिंदों ने उस ढाल को ही तोड़ दिया। दोस्तों, यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है। हम 2026 में जी रहे हैं, लेकिन आज भी हमारे समाज में जाति का जहर, ताकत का नशा और महिलाओं के प्रति अपराध कम नहीं हो रहे हैं।

पारस सोम जैसे लड़के, जो एक तरफ़ा प्यार या सनक में किसी का हंसता-खेलता परिवार उजाड़ देते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि उनका अंजाम क्या होगा। आज पारस जेल की सलाखों के पीछे है, उसका भविष्य अंधकार में है, उसका परिवार भी शर्मिंदा है। और दूसरी तरफ एक परिवार ने अपनी धुरी—अपनी मां को खो दिया है।

रूबी अब सुरक्षित है, लेकिन उसके दिल पर जो घाव लगा है, वो शायद कभी ना भरे। वो जब भी अपनी आंखें बंद करेगी, उसे अपनी मां का वह दर्दनाक चेहरा और वो आखिरी चीख याद आएगी।

अंतिम संदेश: कानून, समाज और उम्मीद

इस घटना से हमें यह सबक मिलता है कि अपराध चाहे किसी भी वजह से हो—चाहे वह तथाकथित प्रेम हो, रंजिश हो या सनक—उसका अंत हमेशा बुरा होता है। कानून के हाथ लंबे होते हैं और देर-सवेर अपराधी पकड़ा ही जाता है। लेकिन तब तक जो नुकसान हो चुका होता है, उसकी भरपाई कोई अदालत, कोई सरकार नहीं कर सकती।

मैं उम्मीद करता हूं कि रूबी को इंसाफ मिलेगा और उसकी मां की आत्मा को शांति।
यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे समाज में नफरत का कोई इलाज है? क्या हमारी बेटियां कभी बेखौफ होकर खेतों, स्कूलों, सड़कों पर जा सकेंगी? क्या हम अपनी बेटियों को वह सुरक्षा दे पाएंगे, जिसकी वे हकदार हैं?

समाप्ति

आप इस पूरे मामले पर क्या सोचते हैं? क्या आपको लगता है कि पुलिस को और ज्यादा सख्त कदम उठाने चाहिए थे? क्या समाज में फैल रही इस नफरत का कोई इलाज है? अपने विचार कमेंट्स में जरूर बताएं।
इस कहानी का मकसद किसी को डराना या परेशान करना नहीं था, बल्कि आपको सच्चाई से रूबरू कराना था। अगर आपको लगता है कि हमने ईमानदारी से यह कहानी आप तक पहुंचाई है, तो इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि ऐसी मानसिकता रखने वाले लोगों को सबक मिल सके।

अपना और अपने परिवार का ख्याल रखें, सुरक्षित रहें, सतर्क रहें।