रिश्तों का कत्ल: जब रक्षक बना भक्षक, तो भांजी ने सीने में उतार दीं चार गोलियां

अध्याय 1: बीकानेर का वह शांत गाँव जसरासर

राजस्थान की तपती रेतीली धरती पर बसा बीकानेर जिला अपनी वीरता और संस्कृति के लिए जाना जाता है। इसी जिले के जसरासर गाँव में मीनू देवी का परिवार रहता था। मीनू देवी, जिनके पति सतपाल की सात साल पहले एक लंबी बीमारी के कारण मृत्यु हो गई थी, एक संघर्षशील महिला थीं। उनके पास सात एकड़ जमीन और चार-पांच दुधारू पशु थे, जिनकी मदद से वे अपनी इकलौती बेटी गौरी को कॉलेज भेज रही थीं।

गौरी, जो बीए प्रथम वर्ष की छात्रा थी, गाँव की सबसे होनहार लड़कियों में गिनी जाती थी। घर में मीनू देवी का देवर राकेश भी रहता था। राकेश की एक आँख नहीं थी, जिस कारण उसकी शादी नहीं हो पाई थी। वह अपनी भाभी मीनू के साथ खेती में हाथ बँटाता था और अपनी भतीजी गौरी को अपनी सगी बेटी की तरह मानता था। गाँव वालों को लगता था कि इस छोटे से परिवार में सब कुछ ठीक है, लेकिन नियति ने कुछ और ही लिख रखा था।

अध्याय 2: गलत संगत और राकेश का पतन

16 सितंबर 2025 की सुबह मीनू देवी और गौरी खरीदारी के लिए शहर गईं। घर पर राकेश अकेला था। तभी उसका दोस्त बिरजू वहां पहुँचा। बिरजू एक आवारा और शराबी किस्म का व्यक्ति था। उसने राकेश को फुसलाकर शराब पिलाई और उसे गाँव की एक बदचलन महिला कविता के घर ले गया।

राकेश, जो पहले कभी इन रास्तों पर नहीं चला था, शराब के नशे और बिरजू की बातों में आकर उस दलदल में फँस गया। धीरे-धीरे राकेश का चरित्र बदलने लगा। उसने कविता को पैसे देने शुरू किए और उसके पास बार-बार जाने लगा। जब भाभी मीनू को इस बात का पता चला, तो उसने राकेश को समझाने की कोशिश की और कविता को भी धमकी दी।

अध्याय 3: जब देवर बना दरिंदा

भाभी की डाँट और कविता की दूरी ने राकेश के भीतर एक कड़वाहट भर दी। उसके मन में अपनी ही भाभी के प्रति गंदे विचार आने लगे। 2 अक्टूबर 2025 को जब गौरी कॉलेज की छुट्टी के कारण घर पर थी, राकेश ने मीनू को चारा काटने के बहाने खेत में बुलाया।

खेत के एकांत कमरे में राकेश ने शराब पी और अपनी भाभी मीनू के साथ जबरदस्ती की। उसने न केवल मीनू की अस्मत लूटी, बल्कि उसे धमकी दी कि अगर उसने किसी को बताया, तो वह गौरी को भी मार देगा। मीनू डर के मारे खामोश हो गई, लेकिन उसकी चुप्पी ने घर में एक खौफनाक सन्नाटा पैदा कर दिया।

अध्याय 4: रक्षक मामा की काली छाया

मीनू को डर था कि राकेश गौरी के साथ कुछ गलत न कर दे। इसी डर से उसने गौरी को उसके मामा अजीत कुमार के घर भेज दिया। अजीत एक पुलिस दरोगा था, और मीनू को लगा कि उसकी बेटी वहां सबसे सुरक्षित रहेगी। लेकिन वह नहीं जानती थी कि अजीत वर्दी की आड़ में एक भेड़िया छिपाए बैठा है।

अजीत कुमार, जो रिश्वत और अय्याशी के लिए बदनाम था, अपनी भांजी गौरी पर बुरी नजर रखने लगा। 6 नवंबर 2025 को जब अजीत की पत्नी आराधना घर पर नहीं थी, अजीत गौरी को खेत दिखाने के बहाने ले गया। वहां उसने अपनी भांजी की मासूमियत को तार-तार कर दिया।

गौरी ने विरोध किया, लेकिन एक ताकतवर पुलिसवाले के सामने उसकी एक न चली। अजीत ने उसे जान से मारने की धमकी दी। गौरी किसी तरह घर लौटी और अपनी मामी आराधना के सामने फूट-फूट कर रो पड़ी।

अध्याय 5: तीन औरतों का संकल्प और खूनी प्रतिशोध

आराधना अपनी भांजी के साथ हुए इस अन्याय को बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने तुरंत गौरी की माँ मीनू को फोन किया। मीनू भागते हुए अपने भाई के गाँव पहुँची। वहां तीनों औरतों—माँ, भांजी और मामी—ने मिलकर उस दरिंदे को खत्म करने का फैसला किया।

रात के 11 बजे, जब अजीत नशे में धुत होकर घर लौटा, तो उसने अपनी बहन मीनू को वहां देखकर आगबबूला हो गया। उसने अपनी लाइसेंसी पिस्तौल निकाली और अपनी ही बहन पर तान दी। आराधना ने पीछे से डंडा मारकर पिस्तौल नीचे गिरा दी।

तभी 19 साल की गौरी ने झपटकर पिस्तौल उठाई। उसकी आँखों में बरसों का गुस्सा और अपमान की आग थी। उसने बिना सोचे-समझे ट्रिगर दबा दिया। एक के बाद एक चार गोलियां अजीत के सीने में जा लगीं। दरोगा मामा मौके पर ही ढेर हो गया।

अध्याय 6: S.P. साहब का दौरा और बड़ा खुलासा

गोलियों की आवाज सुनकर पड़ोसी विशाल कुमार ने पुलिस को फोन किया। जब बीकानेर के पुलिस अधीक्षक (S.P.) मौके पर पहुँचे, तो वे दृश्य देखकर दंग रह गए। उनके सामने एक 19 साल की लड़की हाथ में पिस्तौल लिए खड़ी थी।

थाने ले जाकर जब गौरी से पूछताछ हुई, तो उसने जो कहानी सुनाई, उसे सुनकर S.P. साहब के भी पसीने छूट गए। गौरी ने बताया कि कैसे उसके चाचा और उसके सगे मामा ने रक्षक होने का दावा करके उसकी और उसकी माँ की जिंदगी बर्बाद कर दी।

पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए जसरासर गाँव से राकेश को भी गिरफ्तार कर लिया। एक ही रात में दो दरिंदों का हिसाब हो गया।

निष्कर्ष: न्याय की तराजू और समाज का सवाल

बीकानेर की यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? जहाँ एक माँ अपनी बेटी को बचाने के लिए रक्षकों के पास भेजती है, वहां भी उसे दरिंदगी मिलती है। कानून अब गौरी के भाग्य का फैसला करेगा, लेकिन गाँव के लोगों का मानना है कि गौरी ने जो किया, वह आत्मरक्षा और सम्मान की लड़ाई थी।

गौरी आज जेल की सलाखों के पीछे है, लेकिन उसकी आँखों में अब डर नहीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून है। उसने साबित कर दिया कि जब रक्षक भक्षक बन जाए, तो काली का रूप धारण करना ही अंतिम विकल्प बचता है।


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