सुबह की हवा में सड़ांध घुली हुई थी। रेलवे लाइन के पास पड़ा कूड़े का ढेर सूरज की पहली किरणों में चमक रहा था। प्लास्टिक, सड़ी सब्जियां, फटे अखबार और ऐसी चीज़ें जिनकी पहचान करना भी मुश्किल था। उसी ढेर के पास झुका हुआ एक लड़का अपने फटे बोरे में कूड़ा भर रहा था। उसका नाम अमन था।
लोग उसे नाम से नहीं जानते थे। कोई “कूड़े वाला” कह देता, कोई “अबे हट”। अमन को फर्क नहीं पड़ता था। अगर किसी चीज़ से फर्क पड़ता था, तो वह थी उसके भीतर गूंजती एक आवाज़। जब वह कूड़े में से काम की चीज़ें छांटता, उसके होंठ अपने आप हिलने लगते। कभी कोई पुराना भजन, कभी कोई फिल्मी गीत और कभी बस टूटी-फूटी धुनें। उसकी आवाज़ साफ थी। इतनी साफ कि पास से गुजरते लोग एक पल के लिए रुक जाते।
“अरे, यह तो अच्छा गाता है…”
लेकिन अगले ही पल नाक सिकोड़कर आगे बढ़ जाते।
उस दिन भी ऐसा ही हुआ। एक आदमी ने ₹5 का सिक्का उसकी ओर उछाल दिया।
“ले, गाना बंद कर और काम कर।”

अमन ने सिक्का उठाया, जेब में रखा और फिर से गुनगुनाने लगा। उसके लिए काम और गाना अलग-अलग नहीं थे।
शाम को वह शहर के एक पुराने चौराहे पर पहुँचा। एक टीवी की दुकान के बाहर भीड़ लगी थी। स्क्रीन पर चमकदार लाइटें थीं, तालियां बज रही थीं और मंच पर खड़े लोग मुस्कुरा रहे थे। “सुर संग्राम” — एक रियलिटी शो।
अमन भीड़ के पीछे खड़ा हो गया। एक प्रतियोगी गा रहा था। आवाज़ ठीक-ठाक थी, लेकिन सुर फिसल रहे थे। अमन के भीतर कुछ हिल गया।
“मैं इससे अच्छा गा सकता हूँ,” वह बुदबुदाया।
पास खड़ा एक लड़का हँस पड़ा।
“तू? कूड़ा बीनने वाला?”
अमन चुप रहा। लेकिन उस रात, पहली बार उसने सपना देखा — एक मंच, तेज़ रोशनी और हज़ारों लोग जो उसकी आवाज़ सुन रहे थे।
अमन का बचपन किसी किताब की कहानी जैसा नहीं था। वह ऐसी कहानी थी जिसे कोई लिखना नहीं चाहता। उसकी माँ उसे रेलवे स्टेशन के पास छोड़ गई थी। क्यों छोड़ा, यह किसी को नहीं पता। शायद मजबूरी थी, शायद डर या शायद दुनिया से हार।
उसे बस इतना याद था कि जाते-जाते माँ ने कहा था,
“ज़िंदा रहना सीख लेना।”
स्टेशन पर कुछ लोग थे जो कभी रोटी दे देते, कभी थोड़े पैसे। भूख उसका सबसे पुराना दोस्त थी। रातें ठंडी होती थीं — कभी प्लेटफॉर्म पर, कभी पुल के नीचे।
एक दिन स्टेशन पर एक बूढ़ा आदमी आया। उसके हाथ में टूटा हुआ हारमोनियम था। वह धीमी आवाज़ में, लेकिन दिल से गाता था। अमन पहली बार किसी के पास जाकर बैठा।
“आप रोज़ गाते हो?” उसने पूछा।
बूढ़ा मुस्कुराया।
“जब पेट भरा नहीं होता, तो दिल ज़्यादा बोलता है।”
वही आदमी अमन का पहला गुरु बना। उसने सुरों के नाम नहीं सिखाए, लेकिन यह सिखाया कि गाना क्या होता है। कुछ महीनों बाद वह बूढ़ा आदमी चला गया। कहाँ गया, किसी को नहीं पता। लेकिन उसकी आवाज़ अमन के भीतर रह गई।
स्कूल — यह शब्द अमन ने सिर्फ बोर्ड पर लिखा देखा था। गालियां, धक्के और हंसी — यही उसकी शिक्षा थी।
“कूड़े से कूड़ा ही पैदा होता है।”
यह वाक्य उसने कई बार सुना। और हर बार मन ही मन कहा,
“एक दिन तुम मेरी आवाज़ सुनोगे।”
संगीत अमन के लिए शौक नहीं था। वह उसकी साँस था। बारिश में वह टपकती बूँदों में ताल ढूँढता। ट्रेन के शोर में सुर।
एक दिन उसे कूड़े में एक टूटा हुआ रेडियो मिला — आधा जला, आधा जंग लगा। उसने उसे पास के नल पर धोया, तार जोड़े, कहीं से बैटरी जुगाड़ की। रेडियो चल पड़ा। उसमें से गाना निकला।
अमन की आँखें भर आईं।
वह हर दिन रेडियो सुनता, गानों की नकल करता — कभी सही, कभी गलत — लेकिन रुकता नहीं था।
शहर के एक मंदिर में शाम को भजन होते थे। अमन बाहर बैठकर सुनता। अंदर जाने की हिम्मत नहीं होती थी। एक दिन पुजारी ने कहा,
“बाहर क्यों बैठा है? अंदर आ।”
अमन अंदर गया। उससे गाने को कहा गया। पहली बार उसने भीड़ के सामने गाया। कुछ लोग चौंके, कुछ ने सिर हिलाया। लेकिन किसी ने उसे रोका नहीं।
वह छोटा सा मंच था, लेकिन अमन के लिए पूरी दुनिया।
उसी दिन उसने तय किया —
वह सिर्फ कूड़ा नहीं उठाएगा,
वह अपनी आवाज़ भी उठाएगा।
कुछ दिन बाद उसने पोस्टर देखा —
“सुर संग्राम — आपकी आवाज़ आपकी पहचान है।”
वह देर तक उस लाइन को देखता रहा। पहचान? अब तक उसकी पहचान बस यही थी — कूड़ा बीनने वाला।
ऑडिशन के दिन वह बड़े ऑडिटोरियम पहुँचा। लंबी लाइन थी। लड़के-लड़कियाँ, हाथ में फाइलें, मोबाइल में रियाज़ के वीडियो। अमन चुपचाप सबसे पीछे खड़ा हो गया। लोग उसे घूर रहे थे।
एक गार्ड आया।
“पीछे हट! यह ऑडिशन है।”
“मैं भी ऑडिशन देने आया हूँ,” अमन ने धीरे से कहा।
गार्ड हँस पड़ा।
“पहले नहा कर आ, फिर गाना।”
लोग हँस दिए। अमन को बुरा लगा, लेकिन वह हटा नहीं।
जब उसका नंबर आया, अंदर तीन जज बैठे थे।
“नाम?”
“अमन।”
“पेशा?”
एक पल की चुप्पी।
“कूड़ा बीनता हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अमन ने आँखें बंद कीं। उसे स्टेशन याद आया, भूख, माँ की आवाज़, बूढ़ा आदमी और उसका हारमोनियम। फिर उसने गाना शुरू किया।
पहली पंक्ति में ही कमरा बदल गया।
यह कोई दिखावा नहीं था। बस सच्चाई थी।
गाना खत्म हुआ।
“हम आपको अगले राउंड के लिए चुन रहे हैं,” एक जज ने कहा।
लाइव शो के दिन स्टूडियो रोशनी से भरा था। कैमरे, तालियाँ, संगीत। मंच पर एक जज ने ताना मारा,
“तो तुम कूड़ा बिनते हो?”
हँसी गूँज उठी।
अमन ने माइक पकड़ा। हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने सिर उठाया।
“हाँ,” उसने कहा,
“मैं कूड़ा बिनता हूँ, लेकिन मेरी आवाज़ कूड़े से नहीं निकली।”
स्टूडियो शांत हो गया।
उसने गाना शुरू किया — अपना दर्द, अपनी सच्चाई।
गाना खत्म हुआ।
पहले एक ताली, फिर दूसरी, और फिर पूरा स्टूडियो तालियों से गूँज उठा।
फाइनल की रात, परिणाम घोषित हुआ।
“इस साल का विजेता है — अमन।”
अमन मंच पर खड़ा था। हाथ में ट्रॉफी थी। आँखों में आँसू थे। पहली बार उसे शर्म नहीं आ रही थी।
वह अब सिर्फ कूड़ा बीनने वाला नहीं था।
वह अमन था — एक आवाज़, एक पहचान।
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