फटे कपड़ों में इंटरव्यू देने पहुँचा मजदूर का बेटा… चेयरमैन खड़े होकर सलाम करने लगे

सपनों की सिलाई और पसीने की चमक: एक मजदूर के बेटे की महागाथा
सुबह का धुंधलका अभी पूरी तरह छटा भी नहीं था, जब राजगढ़ नाम के एक छोटे से कस्बे की कच्ची गली में एक दुबला-पतला लड़का पुराने से आईने के सामने खड़ा अपनी शर्ट के बटन ठीक कर रहा था। शर्ट पर जगह-जगह से धागे निकल आए थे, कॉलर घिस चुका था और पैंट की सिलाई दो बार हाथ से जोड़ी गई थी। मगर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—डर भी, उम्मीद भी और भीतर कहीं एक गहरी ज़िद भी।
उसका नाम अर्जुन था। वही अर्जुन, जो रोज़ सुबह अपने पिता के साथ ईंट भट्ठे तक जाता था। लेकिन ईंटें ढोने के बजाय, वह रास्ते में पड़े पुराने अखबार उठा लाता था। उन्हीं अखबारों को पढ़-पढ़कर उसने दुनिया देखी थी—बड़े अफसरों की, बड़े शहरों की और बड़े सपनों की।
अध्याय 1: विरासत में मिला संघर्ष
उसके पिता रामलाल पूरे कस्बे में ‘मजदूर रामू’ के नाम से जाने जाते थे। झुकी हुई कमर, फटी हथेलियाँ और धूप में जली हुई त्वचा उनके जीवन की कहानी बयां करती थी। पर बेटे के लिए उनके दिल में हमेशा एक ही बात थी— “तू पढ़ अर्जुन, तू पढ़। हमारी किस्मत भले ही ईंटों में दब गई हो, पर तेरी कलम आसमान छुएगी।”
आज वही दिन था जब अर्जुन शहर के सबसे बड़े उद्योग समूह ‘मेहरा ग्रुप’ में इंटरव्यू देने जा रहा था। गली के मोड़ पर खड़े कुछ लोग उसे देखकर हंस रहे थे। “अरे अर्जुन, ये कपड़े पहनकर इंटरव्यू देगा? शहर वाले तो तुझे गेट से ही भगा देंगे।”
अर्जुन ने एक पल के लिए अपने कपड़ों की तरफ देखा। दिल के अंदर जैसे किसी ने सुई चुभो दी हो। लेकिन अगले ही क्षण उसे पिता की आवाज़ याद आई— “इंसान कपड़ों से बड़ा नहीं होता, इरादों से बड़ा होता है।” उसने बिना जवाब दिए कदम आगे बढ़ा दिए।
अध्याय 2: कांच के महलों की चुनौती
बस शहर की चमकती सड़कों पर पहुँची। ऊँची इमारतें, शीशे की दीवारें और बड़े-बड़े बोर्ड देखकर अर्जुन की आँखें फैल गईं। जब वह ‘मेहरा ग्रुप’ के विशाल गेट पर पहुँचा, तो सिक्योरिटी गार्ड ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
“इंटरव्यू के लिए आया हूँ,” अर्जुन ने कांपती आवाज़ में कहा। गार्ड ने हँसी दबाते हुए उसे अंदर जाने दिया, पर जाते-जाते ताना मारा— “अंदर बड़े लोग बैठे हैं, संभल के।”
अंदर रिसेप्शन एरिया संगमरमर से चमक रहा था। वहां बैठे अन्य उम्मीदवारों के कपड़े महंगे थे, हाथ में ब्रांडेड फाइलें थीं और वे आत्मविश्वास के साथ अंग्रेजी में बात कर रहे थे। अर्जुन एक कोने में चुपचाप बैठ गया। “भाई, तू गलत जगह आ गया क्या? चपरासी की पोस्ट पीछे है,” किसी ने तंज कसा और चारों तरफ हल्की हँसी गूँज गई। अर्जुन ने अपनी फाइल कसकर पकड़ ली और मन ही मन कहा— “मैं यहाँ भीख मांगने नहीं, अपना हक लेने आया हूँ।”
अध्याय 3: वो अविश्वसनीय पल
कुछ देर बाद उसका नाम पुकारा गया— “मिस्टर अर्जुन रामलाल!”
वह धीरे-धीरे उठा। कदम भारी थे, पर आँखें सीधी। जैसे ही उसने इंटरव्यू रूम का दरवाज़ा खोला, कमरे में सन्नाटा छा गया। सामने कई अधिकारी बैठे थे और बीच में कंपनी के चेयरमैन—सफेद बाल, तेज़ निगाहें और सख्त चेहरा। अर्जुन को लगा कि उसके फटे कपड़ों को देखकर उसे बाहर निकाल दिया जाएगा।
मगर अगले ही पल जो हुआ, उसने सबको जड़ कर दिया। चेयरमैन अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए और अर्जुन की तरफ देखते हुए दोनों हाथ जोड़ लिए।
“आइए अर्जुन,” चेयरमैन ने बेहद नरम आवाज़ में कहा। बाकी अधिकारी हैरान थे। जो चेयरमैन कभी किसी बड़े से बड़े उम्मीदवार के लिए नहीं उठते थे, आज एक फटे कपड़ों वाले लड़के के लिए खड़े थे।
“तुम्हारे पिता का नाम रामलाल है ना? जो ईंट भट्ठे में काम करते हैं?” चेयरमैन ने पूछा। “जी सर… पर आप उन्हें कैसे जानते हैं?” अर्जुन हक्का-बक्का रह गया।
अध्याय 4: 25 साल पुराना कर्ज
चेयरमैन की आँखें अतीत में खो गईं। “अर्जुन, आज का इंटरव्यू तुम्हारी डिग्री का नहीं, तुम्हारे साहस का है। तुम्हारे पिता ने 25 साल पहले मेरी जान बचाई थी।”
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। चेयरमैन ने बताया कि कैसे एक निर्माण स्थल पर उनके ऊपर लोहे की भारी बीम गिरने वाली थी और एक मजदूर ने अपनी जान की परवाह किए बिना उन्हें धक्का देकर बचा लिया था। वह मजदूर रामलाल था। रामलाल उस दिन बिना कोई इनाम लिए, सिर्फ ‘इंसानियत’ का नाम देकर चला गया था।
“आज इस कुर्सी पर मैं सिर्फ इसलिए बैठा हूँ क्योंकि उस दिन तुम्हारे पिता वहां थे,” चेयरमैन की आवाज़ भर आई।
परंतु, कंपनी के एक डायरेक्टर ने विरोध किया— “सर, हम भावनाओं की कद्र करते हैं, पर कंपनी नियमों से चलती है। क्या एक पुराने एहसान के लिए हम किसी को नौकरी दे सकते हैं?”
चेयरमैन ने मुस्कुराते हुए अर्जुन की मार्कशीट उठाई। “नियमों की बात है? तो सुनिए— अर्जुन राज्य का टॉपर है। उसने बिना किसी कोचिंग, बिना किसी सुविधा के वो हासिल किया है जो यहाँ बैठे लोगों के बच्चे लाखों खर्च करके भी नहीं कर पाते। मेहनत सबसे बड़ी डिग्री होती है।”
अध्याय 5: ईमानदारी की अग्निपरीक्षा
अर्जुन ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा— “सर, मैं चाहता हूँ कि मेरा इंटरव्यू वैसे ही हो जैसे सबका हुआ है। अगर मैं योग्य हूँ, तभी मुझे रखिए। मैं एहसान के बदले नौकरी नहीं चाहता।”
इस जवाब ने सबका दिल जीत लिया। अगले एक घंटे तक अर्जुन से कठिन सवाल पूछे गए—फाइनेंस, रिस्क मैनेजमेंट और लीडरशिप पर। अर्जुन ने हर सवाल का जवाब अपनी ज़मीनी हकीकत और ज्ञान के आधार पर दिया।
लेकिन तभी एक साजिश हुई। डायरेक्टर के बेटे विक्रम ने, जो खुद उस नौकरी का दावेदार था, अर्जुन के दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ कर दी। उसने सिस्टम में अर्जुन की फाइल को ‘संदिग्ध’ दिखा दिया।
“सर, अर्जुन के सर्टिफिकेट फर्जी लग रहे हैं,” डायरेक्टर ने अचानक कहा। अर्जुन का दिल बैठ गया। पर चेयरमैन ने तुरंत लाइव वेरिफिकेशन का आदेश दिया। कुछ ही मिनटों में सच सामने आ गया—अर्जुन की फाइल असली थी और छेड़छाड़ विक्रम ने की थी।
अध्याय 6: न्याय और नया सवेरा
चेयरमैन ने विक्रम को तुरंत बाहर कर दिया और अर्जुन की ओर मुड़े। “अर्जुन, आज तुम्हारी योग्यता और ईमानदारी दोनों साबित हुई हैं। आज से तुम इस कंपनी के ‘स्पेशल प्रोजेक्ट डायरेक्टर’ हो।”
शाम को जब चेयरमैन की आलीशान काली कार अर्जुन की कच्ची गली में रुकी, तो पूरा कस्बा देखता रह गया। चेयरमैन ने रामलाल के पैरों में झुककर प्रणाम किया।
“रामलाल जी, आपका बेटा आज अफसर बन गया है, पर उससे पहले वह एक महान पिता का बेटा है,” चेयरमैन ने भावुक होकर कहा।
अध्याय 7: बदलाव की लहर
अर्जुन ने नौकरी मिलते ही सबसे पहले मजदूरों के कल्याण के लिए काम शुरू किया। उसने ‘रामलाल श्रमिक सहायता कोष’ की स्थापना की। उसने सुनिश्चित किया कि किसी भी मजदूर का बेटा शिक्षा से वंचित न रहे और किसी की माँ इलाज के अभाव में न मरे।
सालों बाद, कंपनी के वार्षिक समारोह में अर्जुन ने मंच से कहा— “मैं मजदूर का बेटा हूँ और मुझे इस पर गर्व है। क्योंकि मजदूर की औलाद अगर ठान ले, तो वह इतिहास बदल सकती है।”
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। रामलाल सामने वाली पंक्ति में बैठे थे, उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे और दिल में सुकून—कि उनके पसीने की हर बूंद आज एक मोती बनकर चमक रही थी।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता का रास्ता कपड़ों से नहीं, काबिलियत से तय होता है। ईमानदारी और मेहनत का कोई विकल्प नहीं है। यदि आपके इरादे नेक हैं, तो पूरी कायनात आपको सफल बनाने में जुट जाती है।
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