तलाकशुदा जज पत्नी की अदालत के बाहर जूते पॉलिश कर रहा था गरीब पति… फिर जो हुआ, इंसानियत रो पड़ी…

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तलाकशुदा जज पत्नी की अदालत के बाहर जूते पॉलिश कर रहा था गरीब पति... फिर जो  हुआ, इंसानियत रो पड़ी... - YouTube
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तलाकशुदा जज पत्नी की अदालत के बाहर जूते पॉलिश कर रहा था गरीब पति… फिर जो हुआ, इंसानियत रो पड़ी

प्रस्तावना

सुबह की हल्की धुंध अभी तक जिला अदालत के परिसर से पूरी तरह छटी नहीं थी। हवा में फाइलों की गंध, पुराने कागजों की नमी और रोजमर्रा के झगड़ों की थकान घुली हुई थी। वकीलों की काली कोटों की कतारें, टाइप राइटर की आवाजें और हर चेहरे पर एक ही सवाल। आज किसकी किस्मत का फैसला होगा? इन्हीं सबके बीच अदालत की ऊंची सीढ़ियों के बिल्कुल नीचे जमीन से सटा हुआ बैठा था एक आदमी जिसकी मौजूदगी पर कोई ध्यान नहीं देता था। वो आदमी रोज यहीं बैठता था। रोज इन्हीं सीढ़ियों के नीचे जहां कानून ऊपर बैठता है और इंसानियत अक्सर नीचे दब जाती है।

उस आदमी का नाम था अजय सिंह। उम्र करीब 40 के आसपास। लेकिन चेहरे पर उम्र से कहीं ज्यादा थकान थी। आंखों के नीचे गहरे काले घेरे, माथे पर स्थाई शिकन और हाथों में ऐसी दरारें। जैसे जिंदगी ने बार-बार उन्हें तोड़ने की कोशिश की हो। सामने रखी थी लकड़ी की एक छोटी सी पटरी, एक डिब्बे में काली और भूरे रंग की पॉलिश और एक पुराना ब्रश जिसके बाल आधे घिस चुके थे। अजय उसी ब्रश से जूते चमकाता था। कभी वकीलों के, कभी क्लर्कों के, कभी किसी अफसर के। कोई उसे नाम से नहीं जानता था। सबके लिए वह बस जूते पॉलिश वाला था।

लेकिन अजय हमेशा ऐसा नहीं था। कभी उसने भी इसी अदालत के भीतर कदम रखा था। सिर उठाकर फाइलें हाथ में दबाकर कानून की भाषा में बात करते हुए। कभी उसने भी इसी जगह इंसाफ के सपने देखे थे। और सबसे बड़ी बात, कभी उसकी पत्नी इसी अदालत में जज नहीं थी। तब वह सिर्फ राधिका थी। राधिका सिंह, उसकी राधिका।

अतीत की परछाई

अजय का ब्रश चल रहा था। लेकिन उसकी सोच कहीं और थी। हर बार जब कोई सरकारी गाड़ी अदालत के गेट पर रुकती, उसका दिल अपने आप तेज धड़कने लगता। उसे बिना देखे ही पहचान हो जाती थी कि कौन सी गाड़ी किसकी है। और उस दिन भी वही हुआ। सफेद रंग की सरकारी कार, आगे नीली बत्ती और पीछे सुरक्षाकर्मी, अजय का हाथ अचानक रुक गया। ब्रश जूते पर ही ठहर गया। उसे देखने की जरूरत नहीं थी। फिर भी उसकी सांसें भारी हो गईं।

“जज मैडम आ गई है,” किसी ने पीछे से कहा। जज मैडम, यह शब्द अजय के कानों में हथौड़े की तरह पड़े क्योंकि यह जज मैडम कोई और नहीं, राधिका थी। राधिका कार से उतरी। सफेद साड़ी, काला कोट, बाल सलीके से बंधे हुए। चेहरे पर वही सख्त भाव जिसे पूरा शहर न्याय कहता था। उसकी चाल में आत्मविश्वास था। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं। जैसे वह इंसान नहीं, कानून की कोई मूर्ति हो। वकील झुककर नमस्ते करने लगे। स्टाफ रास्ता बनाने लगा और हर कोई उसके फैसलों की ताकत को जानता था।

लेकिन जैसे ही राधिका की नजर नीचे बैठी उस आकृति पर पड़ी, उसका कदम एक पल के लिए रुक गया। बहुत हल्का सा। इतना हल्का कि कोई और समझ ही ना पाए। लेकिन उसके भीतर कुछ हिल गया। वह चेहरा वही चेहरा जिसे उसने सालों पहले अपनी जिंदगी से अलग कर दिया था। समय ने उसे बदल दिया था। तोड़ दिया था। लेकिन पहचान मिटा नहीं पाया था। अजय ने उसी पल सिर उठा लिया। शायद उसे महसूस हो गया था कि कोई उसे देख रहा है। उनकी नजरें टकराई। सिर्फ एक सेकंड के लिए। लेकिन उस एक सेकंड में आठ साल की चुप्पी टूट गई। वह चुप्पी जिसमें सवाल थे, शिकायतें थीं और बहुत सारा अधूरा दर्द था।

अजय की आंखें तुरंत झुक गईं। उसने खड़े होने की कोशिश नहीं की। उसने कोई शिकायत नहीं की। बस धीरे से बोला, “जूते पॉलिश करा लीजिए, मैडम।” यह शब्द राधिका के सीने में कई गहरे चुब गया। जिस आदमी ने कभी उसे प्यार से राधिक कहा था, आज वही आदमी उसे मैडम कह रहा था। आसपास खड़े लोग फुसफुसाने लगे। कुछ वकील पहचान गए थे। कुछ को बस कहानी का अंदाजा हुआ था। “यही है वो, जज मैडम का तलाकशुदा पति। यह जूते पॉलिश करता है।”

सवाल हवा में तैर रहे थे। लेकिन राधिका के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसने खुद को संभाला, अपने भीतर उठे तूफान को दबाया और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गई। लेकिन उसके कदम भारी थे। आज पहली बार उसे लगा कि अदालत के भीतर बैठी जज नहीं, बल्कि अदालत के बाहर बैठा आदमी ज्यादा सच के करीब है।

यादों की चमक

अजय ने फिर से ब्रश चलाना शुरू कर दिया। लेकिन अब जूते नहीं चमक रहे थे। यादें चमक रही थी। उसे वह दिन याद आया जब दोनों ने साथ बैठकर भविष्य के सपने देखे थे। जब राधिका ने कहा था कि वह जज बनेगी और अजय ने कहा था कि वह कानून को इंसानियत से जोड़ने की कोशिश करेगा। लेकिन फिर वह दिन भी आया जब एक केस ने सब कुछ बदल दिया। जब राधिका ने कानून चुना और अजय ने सच। और उसी दिन उनका रिश्ता अदालत में हार गया।

राधिका क्वार्टर में बैठ गई। सामने फाइलों का ढेर था रोज की तरह। लेकिन आज हाथ कांप रहे थे। उसने पहली फाइल खोली। नाम पढ़ते ही उसकी सांस अटक गई। “अजय सिंह”। आज का पहला केस एक गरीब आदमी का केस। और वो गरीब आदमी, वही था।

क्या यह सिर्फ इत्तेफाक था? या किस्मत ने जानबूझकर दोनों को आमनेसामने खड़ा कर दिया था? अदालत की घंटी बजी। मुकदमा शुरू होने वाला था और इस बार फैसला सिर्फ कानून का नहीं होना था। इस बार इंसानियत भी कटघरे में थी।

अदालत का सामना

अदालत की घंटी बजी तो पूरे हॉल में एक अजीब सी खामोशी फैल गई। लोग अपनी-अपनी जगह संभालने लगे। कुर्सियों की खड़खड़ाहट थम गई और सबकी नजरें सामने बैठी जज राधिका सिन्हा पर टिक गई। लेकिन उस दिन राधिका की आंखों में वह ठहराव नहीं था जो आमतौर पर उसके चेहरे पर दिखता था। उसके सामने रखी फाइल खुली थी। लेकिन शब्द धुंधले हो रहे थे। नाम साफ दिख रहा था “अजय सिंह”। वही नाम जो कभी उसकी पहचान था। आज एक केस नंबर बन चुका था।

राधिका ने खुद को सख्त किया। उसने खुद से कहा कि यह अदालत है। यह जगह भावनाओं की नहीं है। यहां सिर्फ कानून बोलता है। लेकिन दिल को समझाना आसान नहीं होता। जैसे ही पेशकार ने आवाज लगाई, “अजय सिंह बनाम राज्य।” राधिका के कानों में वह दिन गूंज उठा जब पहली बार अजय और राधिका इसी अदालत में एक साथ आए थे। लेकिन तब वह पति-पत्नी थे। जज और आरोपी नहीं।

अजय को कटघरे में लाया गया। वही झुका हुआ चेहरा, वही थकी हुई आंखें। लेकिन आज जूतों की पॉलिश नहीं, हाथों में हथकड़ी थी। अदालत के बाहर बैठा आदमी आज अदालत के अंदर खड़ा था। फर्क बस इतना था कि अब वह ऊपर नहीं देख सकता था। राधिका ने एक पल के लिए नजर उठाई। फिर तुरंत नीचे झुका ली। उसे डर था, अगर ज्यादा देख लिया तो जज नहीं रह पाएगी।

वकील ने केस पढ़ना शुरू किया। आरोप मामूली नहीं थे। एक सरकारी ठेके में गड़बड़ी, दस्तावेजों की हेराफेरी और एक अफसर पर दबाव डालने का आरोप। सब कुछ ऐसा जो कागजों में अपराध था। लेकिन राधिका जानती थी कि अजय ऐसा आदमी नहीं है या शायद वह खुद को यही समझा रही थी। क्योंकि सच्चाई यह भी थी कि अजय की जिंदगी तब से गिरती चली गई थी, जब से वह उससे अलग हुई थी।

अतीत की दरारें

राधिका को याद आया कि कैसे आठ साल पहले जब वह जज बनने ही वाली थी, अजय एक बड़े केस की पैरवी कर रहा था। एक ऐसा केस जिसमें एक ताकतवर उद्योगपति, एक मंत्री और पूरा सिस्टम शामिल था। अजय के पास सबूत थे। ऐसे सबूत जो कई बड़े नामों को बेनकाब कर सकते थे। उसी समय राधिका को चेतावनी मिली थी। या तो अजय को पीछे हटाओ या फिर तुम्हारी नियुक्ति रुक जाएगी। उस रात दोनों के बीच पहली बार सच में लड़ाई हुई थी।

राधिका ने कहा था कि यह उसका सपना है, उसका संघर्ष है और वह किसी भी कीमत पर जज बनेगी। अजय ने कहा था कि अगर सच को दबाकर कुर्सी मिले तो वह कुर्सी नहीं, सौदा है। दोनों सही थे और दोनों गलत। लेकिन उस रात फैसला हो गया था। अजय ने केस नहीं छोड़ा। राधिका ने रिश्ता। अदालत में तलाक हुआ था। बिना आंसू, बिना ड्रामे। बस दो दस्तखत और एक चुप्पी जो सालों तक पीछा करती रही।

राधिका ऊपर चढ़ती गई। पहले जज, फिर सीनियर जज और अजय नीचे गिरता गया। केस जीत गया, लेकिन सिस्टम से हार गया। लाइसेंस रद्द हुआ, काम बंद हुआ, दोस्त छूटते गए और आखिरकार वही आदमी अदालत के बाहर जूते पॉलिश करने लगा। उसी अदालत के बाहर, जहां उसकी पत्नी इंसाफ बांटती थी।

फैसले की घड़ी

क्वार्टर में राधिका की आंखें भर आईं। लेकिन उसने उन्हें बहने नहीं दिया। उसने हथौड़ा उठाया, आवाज सख्त की और अगली तारीख दी। सबको लगा यह एक आम केस है। लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह केस सिर्फ अजय का नहीं है। यह राधिका की आत्मा का भी केस है।

अदालत से निकलते वक्त राधिका ने खिड़की से बाहर देखा। अजय को फिर से सीढ़ियों के पास बैठा देख लिया। वही पटरी, वही ब्रश। जैसे कुछ बदला ही ना हो। लेकिन राधिका जानती थी आज कुछ बदल चुका है। आज कानून और इंसानियत फिर से आमने-सामने खड़े हो चुके हैं। और कहीं ना कहीं इस बार फैसला सिर्फ अजय का नहीं होने वाला था।

सच्चाई की लड़ाई

अगले दिन अदालत में माहौल बदला था। मीडिया के कैमरे बाहर खड़े थे। खबर फैल चुकी थी कि जज राधिका सिन्हा के सामने उनके तलाकशुदा पति का केस चल रहा है। लोग इसे सनसनी बना रहे थे। लेकिन राधिका के लिए यह तमाशा नहीं था। यह उसकी जिंदगी का सबसे कठिन इम्तिहान था।

जैसे ही अजय को कटघरे में लाया गया, उसकी नजर अनजाने में राधिका से टकरा गई। इस बार दोनों ने नजरें नहीं चुराई। कुछ पल के लिए समय थम सा गया। उस खामोशी में बहुत कुछ था। प्यार, गुस्सा, पछतावा और अधूरा सच।

फिर राधिका ने हथौड़ा उठाया और कार्यवाही शुरू की। उसकी आवाज सख्त थी लेकिन दिल कांप रहा था। सरकारी वकील ने आरोपों को दोहराया। दस्तावेज पेश किए गए। सब कुछ कागजों में सही लग रहा था। लेकिन राधिका की नजरें उन खाली जगहों को देख रही थी, जहां सच छुपाया गया था। उसने सवाल पूछने शुरू किए। ऐसे सवाल जिनसे सरकारी वकील असहज हो गया।

अदालत में फुसफुसाहट फैल गई। पहली बार किसी ने देखा कि जज राधिका सिंह किसी केस में इतनी गहराई से उतर रही है। अजय चुपचाप खड़ा था। वो जानता था कि सच बोलने की कीमत क्या होती है। लेकिन आज कहीं ना कहीं उसे उम्मीद हो रही थी। शायद इसलिए कि सामने बैठी जज सिर्फ कानून नहीं थी। वह उस आदमी को जानती थी। वह जानती थी कि अजय कभी झूठ के साथ खड़ा नहीं हुआ।

सिस्टम के खिलाफ

कार्यवाही के अंत में राधिका ने केस को अगली सुनवाई के लिए रखा और एक आदेश दिया। विक्रम मल्होत्रा को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का। यह आदेश किसी बम से कम नहीं था। पूरे क्वार्टर में सन्नाटा छा गया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि कोई जज उस नाम को इतनी सीधी चुनौती देगा।

अदालत के बाहर अजय ने यह खबर सुनी। पहली बार उसकी आंखों में नमी आई। वो नमी हार की नहीं थी। वो नमी उम्मीद की थी। उसने आसमान की तरफ देखा। जैसे सालों बाद किसी ने उसकी बात सुन ली हो।

और वहीं राधिका अपनी कुर्सी से उठते हुए जानती थी कि उसने एक सीमा पार कर दी है। अब यह लड़ाई सिर्फ एक केस की नहीं रही। अब यह लड़ाई कानून बनाम ताकत की थी और इस लड़ाई में हार या जीत से ज्यादा दांव पर इंसानियत थी।

सच का उजाला

अगले दिन अदालत में विक्रम मल्होत्रा पेश हुआ। भारी शरीर, महंगा सूट, चेहरे पर बनावटी मुस्कान और आंखों में घमंड। उसके साथ वकीलों की पूरी फौज थी। कोर्ट में एक अजीब सी खामोशी फैल गई। जैसे सबको पता था कि आज कुछ बड़ा होने वाला है।

राधिका सिंह ने अपनी कुर्सी संभाली। उसने खुद को याद दिलाया कि सामने बैठा आदमी कितना भी ताकतवर क्यों ना हो, अदालत में सब बराबर होते हैं। विक्रम ने नजर उठाकर राधिका को देखा। उस नजर में चुनौती थी। जैसे कहना चाहता हो, “तुम मुझे नहीं जानती।” लेकिन राधिका उसे जानती थी, बहुत अच्छे से। उसने वही आदमी देखा था जिसने सालों पहले अजय की जिंदगी बर्बाद की थी और आज भी वही खेल खेल रहा था।

राधिका ने सवाल पूछने शुरू किए। सीधे, साफ और बिना किसी डर के। विक्रम की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी। उसके जवाबों में उलझन आने लगी। पहली बार उसे एहसास हुआ कि सामने बैठी जज सिर्फ कुर्सी नहीं है, वह दीवार है।

इसी बीच अजय को गवाही के लिए बुलाया गया। पूरे कोर्ट रूम की नजरें उस पर टिक गई। वही आदमी जो कल तक जूते पॉलिश करता था, आज सच का बोझ उठाए खड़ा था। उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन आवाज में अजीब सा ठहराव था। उसने बोलना शुरू किया। धीरे लेकिन साफ। उसने बताया कि कैसे दस्तावेजों में हेराफेरी हुई, कैसे उस पर दबाव डाला गया, कैसे उसे चुप कराने की कोशिश की गई।

हर शब्द के साथ क्वार्टर में सन्नाटा गहराता गया। राधिका चुपचाप सुनती रही। हर वाक्य उसके भीतर कुछ तोड़ रहा था। यह वही बातें थीं जिन्हें उसने सालों पहले सुनना नहीं चाहा था। तब उसने कानून चुना था, आज कानून उसी सच को उसके सामने रख रहा था।

फैसले का दिन

गवाही के बाद जैसे ही अजय बाहर निकला, उसे धमकी मिली। साफ शब्दों में, “अगर जिंदा रहना है तो अगली सुनवाई से पहले गायब हो जाओ।” अजय ने पहली बार डर को महसूस किया। लेकिन उसी डर के साथ एक अजीब सी शांति भी थी। उसे लगा कि अगर अब पीछे हटा तो वह खुद से हार जाएगा और उसने खुद से हारना बहुत पहले छोड़ दिया था।

राधिका को जब धमकियों का पता चला तो उसकी आंखों में गुस्सा उतर आया। अब यह लड़ाई व्यक्तिगत हो चुकी थी। उसने पुलिस सुरक्षा बढ़ाने का आदेश दिया। केस को फास्ट ट्रैक पर डाल दिया और साफ कर दिया कि किसी भी दबाव में फैसला नहीं बदलेगा। इस फैसले ने पूरे सिस्टम में हलचल मचा दी।

उस रात राधिका अकेली बैठी थी। सामने वही पुरानी तस्वीर थी, वो और अजय मुस्कुराते हुए। उसने तस्वीर को देर तक देखा और पहली बार उसके होठों से शब्द निकले, “शायद उस दिन मैं गलत थी।” लेकिन गलती मान लेना कहानी का अंत नहीं होता। कभी-कभी यही शुरुआत होती है।

अंतिम सुनवाई

अदालत की उस सुबह में एक अजीब सी खामोशी थी। ऐसी खामोशी जिसमें फैसले से पहले का डर, उम्मीद और अनकहा सच सब कुछ घुला हुआ था। बाहर मीडिया की भीड़ थी। कैमरे चालू थे, लोग फुसफुसा रहे थे। लेकिन अंदर कोर्ट में बैठी जज राधिका सिन्हा के चेहरे पर आज कोई भाव नहीं था। वही सख्ती, वही ठहराव। फर्क बस इतना था कि आज उसके भीतर की औरत पूरी तरह जाग चुकी थी।

कड़घरे में खड़ा अजय सिंह आज अलग लग रहा था। वही सादा कपड़े, वही थका हुआ शरीर। लेकिन आंखों में एक अजीब सी रोशनी थी। जैसे उसने तय कर लिया हो कि जो भी हो, सच बोलेगा। उसने अब डर से समझौता करना छोड़ दिया था। शायद इसलिए कि उसने खोने के लिए अब कुछ बचा ही नहीं था।

विक्रम मल्होत्रा अपनी जगह पर बैठा था। चेहरे पर पहले जैसा आत्मविश्वास नहीं था। पिछले कुछ दिनों में बहुत कुछ बदल चुका था। दस्तावेज सामने आ चुके थे, कुछ गवाह पलट चुके थे और सिस्टम की दरारें अब साफ दिखने लगी थी। फिर भी वह आखिरी उम्मीद के सहारे बैठा था। ताकत की उम्मीद, पैसों की उम्मीद, उस सोच की उम्मीद की आखिर में जीत उसी की होगी।

राधिका ने हथौड़ा उठाया। आवाज गूंजी। कोर्ट रूम पूरी तरह शांत हो गया। उसने फैसला पढ़ना शुरू किया। हर शब्द भारी था। हर वाक्य सच से भरा हुआ। उसने साफ कहा कि अजय सिंह पर लगाए गए आरोप साबित नहीं हो सके। दस्तावेजों में हेराफेरी की पुष्टि हुई और इस साजिश के पीछे जिन नामों का जिक्र आया उनमें विक्रम मल्होत्रा प्रमुख था।

कोर्ट रूम में हलचल मच गई। किसी ने ऐसा फैसला उम्मीद नहीं की थी। फैसला सुनते ही अजय की आंखों से आंसू बह निकले। वो आंसू खुशी के नहीं थे, वह आंसू उस दर्द के थे जो सालों से उसके भीतर जमा था। उसने ऊपर देखा जैसे किसी अदृश्य ताकत को धन्यवाद दे रहा हो। उस आदमी ने आज अदालत से इंसाफ पाया था। लेकिन जिंदगी से जो छीना गया था, वो आज भी अधूरा था।

विक्रम मल्होत्रा के चेहरे का रंग उड़ चुका था। उसके वकील कुछ कहने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन राधिका की आवाज में कोई गुंजाइश नहीं थी। हथकड़ी लगी और पहली बार वह आदमी झुका जिसने कभी किसी के सामने सिर नहीं झुकाया था।

उस पल क्वार्टर में कोई ताली नहीं बजी। कोई खुशी का शोर नहीं हुआ। सिर्फ एक भारी सन्नाटा था। जैसे सब समझ रहे हो कि आज किसी एक आदमी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की हार हुई है।

इंसानियत का सम्मान

फैसला सुनाने के बाद राधिका कुछ पल तक चुप रही। फिर उसने अजय की तरफ देखा। जज की कुर्सी पर बैठी औरत नहीं, बल्कि एक इंसान की नजर से। उसकी आवाज पहली बार थोड़ी नरम हुई। उसने कहा कि अदालत सिर्फ कानून नहीं देखती, बल्कि इंसान भी देखती है। और अगर कभी कानून इंसानियत से दूर चला जाए तो उसे वापस लाना भी अदालत की ही जिम्मेदारी है।

अजय अदालत से बाहर निकला तो धूप तेज थी। वही सीढ़ियां, वही जगह जहां वह सालों तक जूते पॉलिश करता रहा था। आज भी लोग वहां थे। लेकिन उसकी जिंदगी बदल चुकी थी। कुछ पत्रकार उसके पास आए, सवाल पूछे लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह बस चुपचाप चलता रहा। शायद उसे अब शब्दों की जरूरत नहीं थी।

राधिका अपने चेंबर में अकेली बैठी थी। सामने वही पुरानी तस्वीर रखी थी। वो और अजय। उसने तस्वीर को हाथ में लिया। आंखें भर आई। आज उसने अपने करियर का सबसे कठिन फैसला लिया था। उसने कानून के साथ-साथ अपने अतीत का भी सामना किया था। उसे एहसास हुआ कि उस दिन उसने रिश्ता छोड़कर कानून चुना था। लेकिन आज उसने कानून के जरिए रिश्ते की सच्चाई को स्वीकार किया था।

शाम को जब राधिका अदालत से बाहर निकली तो अजय वहीं खड़ा था। इस बार जमीन पर नहीं, सीढ़ियों पर खड़ा। दोनों आमने-सामने थे। कोई जज नहीं, कोई आरोपी नहीं। बस दो इंसान। कुछ पल तक दोनों चुप रहे। फिर अजय ने धीरे से कहा, “तुमने आज वही किया जो उस दिन नहीं कर पाई थी।”

राधिका की आंखों से आंसू बह निकले। उसने कुछ नहीं कहा। शब्द कम पड़ गए थे। उस शाम दोनों साथ नहीं गए। कोई मिलन नहीं हुआ। कोई फिल्मी अंत नहीं हुआ। लेकिन दोनों के बीच जो दीवार थी, वह गिर चुकी थी। अजय की जिंदगी में सम्मान लौट आया था और राधिका की आत्मा को शांति मिल गई थी।

कुछ महीनों बाद अदालत के बाहर जूते पॉलिश की जगह खाली थी। वहां एक छोटा सा बोर्ड लगा था — “यहां इंसाफ ने इंसानियत को पहचान लिया।” लोग रोज आते जाते थे, बोर्ड पढ़ते थे और कुछ पल के लिए रुक जाते थे। क्योंकि इस कहानी का अंत किसी एक की जीत नहीं था। यह कहानी थी उस पल की जब कानून ने झुककर इंसानियत को सलाम किया।

उपसंहार

यह कहानी सिर्फ एक जज और उसके तलाकशुदा पति की नहीं थी। यह कहानी उस कुर्सी की थी जिस पर बैठकर इंसान अक्सर भूल जाता है कि उसके सामने भी एक इंसान खड़ा है। यह कहानी उस आदमी की थी, जो अदालत के बाहर बैठकर जूते पॉलिश करता रहा, लेकिन उसके भीतर सच कभी मैला नहीं हुआ। और यह कहानी उस औरत की थी जिसने कानून को जीवन बना लिया था, लेकिन एक दिन उसी कानून के सामने अपनी आत्मा को खड़ा कर दिया।

अजय सिंह ने हमें सिखाया कि हालात चाहे जितने नीचे क्यों ना ले जाएं, अगर इंसान अपनी ईमानदारी को नहीं छोड़ता, तो एक दिन वही ईमानदारी उसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है। वही राधिका सिंह ने यह दिखाया कि सच्चा न्याय वही नहीं होता जो फाइलों में लिखा होता है, बल्कि वही होता है जो इंसान के दिल को हल्का कर दे।

इस कहानी में कोई खलनायक सिर्फ एक आदमी नहीं था, बल्कि वह व्यवस्था थी जो अक्सर ताकतवर के आगे झुक जाती है और कमजोर को कुचल देती है। लेकिन जब कोई एक इंसान भी सच के साथ खड़ा हो जाए तो वही व्यवस्था हिलने लगती है।

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि कानून का मकसद सजा देना नहीं, बल्कि इंसाफ देना है। और इंसाफ तभी पूरा होता है जब उसमें इंसानियत शामिल हो।

अगर इस कहानी ने आपको कहीं भीतर छुआ हो तो समझिए कि आपने सिर्फ एक कहानी नहीं सुनी, बल्कि अपने भीतर के सच से मुलाकात की है। क्योंकि असली जीत कुर्सी की नहीं होती, असली जीत इंसानियत की होती है।

समाप्त