गरीब मैकेनिक ने फ्री में गाड़ी ठीक की , तो करोड़पति ने दिया ऐसा इनाम कि देखकर आँखें फटी रह जाएँगी

राजू मैकेनिक: एक छोटी मदद, बड़ी तक़दीर
भाग 1: धूल भरी सड़क और राजू की दुनिया
शहर की पुरानी धूल भरी सड़क के किनारे, एक छोटा सा बोर्ड टंगा था—”राजू ऑटो वर्क्स”। दुकान के नाम पर टीन की छत, चारों ओर बिखरे पड़े पुराने औजार, गाड़ियों के कल-पुर्जे और तेल-ग्रीस के जिद्दी दाग। इसी दुकान का मालिक था राजू—कोई तीस साल का नौजवान, मेहनतकश मगर हमेशा पैसों की तंगी से जूझता हुआ।
राजू के चेहरे पर मेहनत की थकान और आंखों में भविष्य की चिंता साफ झलकती थी। उसके परिवार में बूढ़ी और बीमार मां थी, और एक छोटी बहन जिसकी शादी की उम्र हो चली थी। इन सब जिम्मेदारियों का बोझ राजू के कंधों पर था। दिनभर गाड़ियों के इंजन से जूझना, छोटे-मोटे काम पकड़ना और किसी तरह दो जून की रोटी का जुगाड़ करना—यही उसकी जिंदगी थी।
मुश्किलें चाहे जितनी भी हों, राजू ने कभी अपनी ईमानदारी और इंसानियत का सौदा नहीं किया। उसके वालिद हमेशा कहते थे, “बेटा, नियत साफ रखना, ऊपर वाला सब देखता है।”
भाग 2: तपती दोपहर और एक अजनबी की मदद
एक तपती दोपहरी थी। आसमान से जैसे आग बरस रही थी। सड़कें खाली थीं और राजू अपनी दुकान के बाहर एक पुरानी कुर्सी पर बैठा पसीना पोंछ रहा था। मां की दवाएं खत्म होने वाली थीं, जेब में गिनकर ₹100 भी नहीं थे। वह इन्हीं सोचों में गुम था कि अचानक एक महंगी चमचमाती विदेशी गाड़ी उसके दुकान के सामने आकर रुकी।
गाड़ी से तेज आवाज आ रही थी और इंजन से हल्का धुआं भी निकल रहा था। राजू ऐसी गाड़ियों को अक्सर दूर से ही देखा करता था। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बाहर निकला। साधारण कपड़े पहने, चेहरे पर परेशानी और झुंझलाहट। उसने गाड़ी के बोनट को खोलने की कोशिश की, पर गर्मी और परेशानी में उससे वह भी ठीक से नहीं हो पा रहा था।
राजू अपनी कुर्सी से उठा और उस व्यक्ति के पास गया।
“साहब, क्या मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूं?” उसने नरमी से पूछा।
उस व्यक्ति ने राजू को ऊपर से नीचे तक देखा। शायद उसकी छोटी सी दुकान और साधारण हुलिए को देखकर उसे राजू की काबिलियत पर शक हो रहा था।
“तुम ठीक कर लोगे इसे? ये इंपोर्टेड गाड़ी है।” उसके लहजे में अविश्वास था।
राजू हल्का सा मुस्कुराया।
“साहब, मशीन तो मशीन होती है। चाहे देसी हो या विलायती। आप एक बार देखने तो दीजिए।”
उस व्यक्ति ने कुछ सोचते हुए हामी भर दी। राजू ने बोनट खोला और बड़ी तल्लीनता से इंजन को देखने लगा। कोई दस मिनट तक वह हर तार, हर पुर्जे को गौर से देखता रहा। उस व्यक्ति की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
“क्या हुआ? कुछ समझ में आया?”
राजू ने इंजन से सिर बाहर निकाला।
“साहब, गाड़ी की फैन बेल्ट टूट गई है और शायद रेडिएटर में भी कुछ दिक्कत है। गाड़ी काफी गर्म हो गई है।”
“फैन बेल्ट अब कहां मिलेगी इस वीरान में? और मुझे एक जरूरी मीटिंग के लिए पहुंचना है।” वह व्यक्ति और परेशान हो गया।
राजू ने कहा, “फैन बेल्ट तो शायद मेरे पास इसी मॉडल की एक पुरानी पड़ी होगी। अगर आप कहें तो मैं लगाकर देख लेता हूं। रही बात रेडिएटर की, तो उसे ठंडा होने में थोड़ा वक्त लगेगा।”
उस व्यक्ति के पास शायद कोई और चारा नहीं था। “ठीक है, देखो। पर जल्दी करना।”
राजू फौरन अपनी दुकान में गया और पुराने सामान के ढेर में से एक फैन बेल्ट ढूंढकर लाया। अगले एक घंटे तक राजू पसीने में नहाया हुआ उस गाड़ी से जूझता रहा। उसने बड़ी कुशलता से फैन बेल्ट लगाई, रेडिएटर में पानी डाला और कुछ देर इंजन को ठंडा होने दिया। इस दौरान वह व्यक्ति चुपचाप राजू को काम करते देखता रहा। उसके चेहरे के भाव धीरे-धीरे बदल रहे थे—अविश्वास की जगह अब कौतूहल और शायद थोड़ी प्रशंसा भी ले रही थी।
आखिरकार राजू ने गाड़ी स्टार्ट की। इंजन अब पहले की तरह घरघरा नहीं रहा था बल्कि एक सधी हुई आवाज में चल रहा था। धुआं भी बंद हो चुका था। राजू के चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी।
“लीजिए साहब, काम हो गया। ये आपको आराम से शहर तक पहुंचा देगी। पर इसे जल्द ही किसी अच्छे वर्कशॉप में दिखा लीजिएगा। रेडिएटर का पक्का इलाज करवाना जरूरी है।”
वह व्यक्ति गाड़ी की आवाज सुनकर हैरान था। उसे उम्मीद नहीं थी कि इस छोटी सी जगह पर उसकी लाखों की गाड़ी ठीक हो जाएगी। वह राजू की कारीगरी से बेहद प्रभावित हुआ।
भाग 3: इंसानियत की कीमत
उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक मोटी सी गड्डी निकालने लगा।
“बताओ, कितने पैसे हुए तुम्हारे?”
राजू ने अपने तेल लगे हाथों को एक पुराने कपड़े से पोंछा और मुस्कुराते हुए कहा,
“रहने दीजिए साहब, पैसे नहीं चाहिए।”
“पैसे नहीं चाहिए? क्यों? क्या मेरी गाड़ी ठीक से ठीक नहीं हुई?”
उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ।
“नहीं साहब, गाड़ी बिल्कुल ठीक है। पर कभी-कभी कुछ काम सिर्फ इंसानियत के नाते भी करने चाहिए। आप परेशान थे, मैंने बस थोड़ी मदद कर दी। इसे मेरी तरफ से चाय-पानी समझ लीजिए।”
राजू की आवाज में एक अजीब सी सादगी और सच्चाई थी। वह व्यक्ति कुछ पल राजू को देखता रहा। उसने अपनी जिंदगी में ऐसे लोग कम ही देखे थे, खासकर आज के जमाने में जहां हर कोई सिर्फ अपने फायदे की सोचता है।
उसने फिर भी जोर दिया, “नहीं, यह गलत बात है। तुमने मेहनत की है, तुम्हें इसका हक मिलना चाहिए।”
राजू ने हाथ जोड़ दिए, “साहब, अगर आप सच में कुछ देना चाहते हैं तो बस दुआ कीजिएगा कि मेरी दुकान चलती रहे और मां की तबीयत ठीक रहे। यही मेरी सबसे बड़ी कमाई होगी।”
उस व्यक्ति ने राजू की आंखों में झांका, वहां कोई लालच नहीं था—सिर्फ एक गहरी ईमानदारी थी। उसने पैसे वापस अपनी जेब में रख लिए।
“ठीक है। जैसी तुम्हारी मर्जी। पर अपना नाम तो बताओ। और ये लो मेरा कार्ड। कभी कोई जरूरत पड़े तो बेझिझक फोन करना।”
उस व्यक्ति ने अपना विजिटिंग कार्ड राजू की ओर बढ़ाया। राजू ने कार्ड लेकर अपनी जेब में रख लिया।
“मेरा नाम राजू है साहब। और आपकी मदद के लिए शुक्रिया।”
वह व्यक्ति मुस्कुराया, “मदद तो तुमने मेरी की है, राजू। अच्छा, अब चलता हूं।”
वह गाड़ी में बैठा और कुछ ही पलों में वह चमचमाती गाड़ी राजू की आंखों से ओझल हो गई।
राजू वापस अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया। उसे एक अजीब सा सुकून महसूस हो रहा था। पैसे तो नहीं मिले, पर किसी की मदद करके जो खुशी मिलती है, वह शायद पैसों से कहीं ज्यादा कीमती थी।
उसने जेब से कार्ड निकाल कर देखा। उस पर लिखा था—विक्रम ओबेरॉय, चेयरमैन, ओबेरॉय ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज। राजू को इन बड़े नामों से कोई खास मतलब नहीं था। उसने कार्ड वापस जेब में रख लिया और अपने अगले ग्राहक का इंतजार करने लगा।
भाग 4: मुश्किलें और उम्मीद का एक कार्ड
दिन बीतते गए। राजू की जिंदगी उसी पुराने ढर्रे पर चलती रही। मां की तबीयत कभी ठीक होती, कभी बिगड़ जाती। बहन की शादी की चिंता उसे खाए जा रही थी। दुकान पर भी काम कभी मिलता, कभी पूरा दिन खाली निकल जाता।
कई बार उसे विक्रम ओबेरॉय का ख्याल आता, पर वह फोन करने में झिझकता। उसे लगता, इतने बड़े आदमी को अपनी छोटी-मोटी परेशानियों के लिए क्या तंग करना?
एक शाम, जब राजू दुकान बंद करने की तैयारी कर रहा था, एक और मुसीबत उसके सामने आ खड़ी हुई। मकान मालिक, जो पिछले कई महीनों से किराया बढ़ाने की धमकी दे रहा था, आज सीधे दुकान खाली करने का नोटिस लेकर आ गया। राजू के पैरों तले जमीन खिसक गई। अगर यह दुकान भी चली गई तो वह अपने परिवार को कैसे पालेगा?
उसने मकान मालिक से बहुत मिन्नतें की, कुछ और मोहलत मांगी, पर वह टस से मस नहीं हुआ। राजू पूरी रात सो नहीं सका। उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मां की दवाएं, बहन की शादी और अब यह दुकान—सब कुछ जैसे उसके हाथ से फिसलता जा रहा था।
निराशा में उसने अपनी जेब टटोली। विक्रम ओबेरॉय का वह कार्ड अब भी उसकी जेब में था। एक आखिरी उम्मीद। उसने कांपते हाथों से फोन निकाला और कार्ड पर लिखा नंबर मिलाया।
दूसरी तरफ से एक भारी और रौबदार आवाज आई, “हेलो, ओबेरॉय स्पीकिंग।”
राजू की गिग्गी बंध गई, “साहब, मैं राजू बोल रहा हूं, मैकेनिक… आपकी गाड़ी ठीक की थी उस दिन…”
ओबेरॉय की आवाज में कोई हैरानी नहीं थी, जैसे वह इसी फोन का इंतजार कर रहे हों।
“हां राजू, कहो। कैसे हो? और तुम्हारी मां की तबीयत कैसी है?”
राजू को आश्चर्य हुआ कि उन्हें यह सब याद है। उसने हिम्मत करके अपनी दुकान वाली समस्या उन्हें बताई।
ओबेरॉय कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, “तुम एक काम करो राजू, कल सुबह ठीक 10 बजे मेरे ऑफिस आ जाओ। पते के लिए किसी से भी ओबेरॉय टावर्स पूछ लेना।”
राजू की समझ में कुछ नहीं आया, पर उसने हामी भर दी।
भाग 5: ओबेरॉय टावर्स में किस्मत का दरवाजा
अगली सुबह राजू अपनी सबसे साफ कमीज पहनकर, जो थोड़ी फटी हुई भी थी, ओबेरॉय टावर्स पहुंचा। शहर की सबसे ऊंची और आलीशान इमारतों में से एक थी वह। गेट पर खड़े गार्ड ने उसे ऐसे देखा जैसे वह कोई अजूबा हो। बड़ी मुश्किल से जब उसने विक्रम ओबेरॉय का नाम लिया, तब उसे अंदर जाने दिया गया।
ऑफिस किसी महल से कम नहीं था। इतना बड़ा और शानदार कि राजू का सिर चकरा गया। एक सेक्रेटरी उसे सीधे विक्रम ओबेरॉय के केबिन में ले गई। ओबेरॉय अपनी बड़ी सी कुर्सी पर बैठे थे। आज वह किसी राजा की तरह लग रहे थे।
“आओ राजू, बैठो।” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।
राजू झिझकता हुआ एक कुर्सी पर बैठ गया।
ओबेरॉय ने कहा, “तुम्हारी दुकान की समस्या के बारे में मैंने सुना। तुम चिंता मत करो, उसका हल निकल आएगा। लेकिन मैं तुमसे कुछ और बात करना चाहता हूं।”
राजू ने हैरानी से उनकी ओर देखा।
“उस दिन जब तुमने मेरी गाड़ी ठीक की थी और पैसे लेने से इंकार कर दिया था, मैं तुम्हारी ईमानदारी और हुनर से बहुत प्रभावित हुआ था। राजू, मैंने तुम्हारे बारे में कुछ पता करवाया। तुम एक बहुत मेहनती और सच्चे इंसान हो।”
ओबेरॉय अपनी कुर्सी से उठे और केबिन की खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए, जहां से पूरा शहर नजर आ रहा था।
“मैं एक नई ट्रांसपोर्ट कंपनी शुरू कर रहा हूं। राजू, मेरे पास सैकड़ों गाड़ियां होंगी और मैं चाहता हूं कि उन सभी गाड़ियों के रखरखाव और मरम्मत की जिम्मेदारी तुम संभालो। मैं तुम्हें इस कंपनी का हेड मैकेनिक, बल्कि वर्कशॉप मैनेजर बनाना चाहता हूं।”
राजू को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। वह और इतनी बड़ी कंपनी का मैनेजर!
“साहब, मैं तो बस एक छोटा सा मैकेनिक हूं। मुझसे ये सब कैसे होगा?”
ओबेरॉय मुस्कुराए, “राजू, हुनर किसी डिग्री या बड़े नाम का मोहताज नहीं होता और ईमानदारी सबसे बड़ी काबिलियत होती है। तुममें ये दोनों हैं। मैं तुम्हें एक महीने की तनख्वाह एडवांस में दे रहा हूं। और हां, तुम्हारे परिवार के रहने के लिए कंपनी की तरफ से एक अच्छा सा घर भी मिलेगा। तुम्हारी मां का इलाज भी कंपनी के सबसे अच्छे अस्पताल में होगा।”
विक्रम ओबेरॉय ने एक चेक और कुछ कागजात राजू की ओर बढ़ाए। राजू ने कांपते हाथों से वह चेक देखा। उस पर इतनी बड़ी रकम लिखी थी कि उसने अपनी पूरी जिंदगी में उतने पैसे एक साथ नहीं देखे थे। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। आंसू उसकी आंखों से बह निकले। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था।
ओबेरॉय ने उसके कंधे पर हाथ रखा, “राजू, ये कोई भीख या एहसान नहीं है। ये तुम्हारी मेहनत, तुम्हारी ईमानदारी और तुम्हारी इंसानियत का इनाम है। तुमने उस दिन मेरी गाड़ी ठीक करके मुझसे पैसे नहीं लिए थे, पर तुमने मेरा दिल जीत लिया था। और याद रखना, जो इंसान दिल जीत सकता है, वह दुनिया में कुछ भी जीत सकता है।”
राजू के पास शब्द नहीं थे। वह बस इतना ही कह पाया, “साहब, आपने मेरी दुनिया ही बदल दी। मैं आपका ये उपकार कभी नहीं भूलूंगा।”
विक्रम ओबेरॉय हंसे, “उपकार नहीं राजू, इसे अवसर कहो और मुझे यकीन है कि तुम इस अवसर का सही इस्तेमाल करोगे।”
भाग 6: नई जिंदगी, नई पहचान
उस दिन के बाद राजू की जिंदगी सचमुच बदल गई। उसने अपनी मेहनत और लगन से ओबेरॉय की ट्रांसपोर्ट कंपनी के वर्कशॉप को शहर का सबसे बेहतरीन वर्कशॉप बना दिया। उसकी मां का अच्छा इलाज हुआ और वह बिल्कुल स्वस्थ हो गई। बहन की शादी भी बड़ी धूमधाम से हुई।
राजू अब सिर्फ एक मैकेनिक नहीं था, बल्कि एक कामयाब और इज्जतदार इंसान था जिसकी कहानी हर कोई सुनाता था। वह अक्सर उस दिन को याद करता था जब उसने एक टूटी हुई गाड़ी को ठीक किया था और बदले में उस गाड़ी के मालिक ने उसकी टूटी हुई किस्मत को।
भाग 7: प्रेरणा और संदेश
तो दोस्तों, यह थी राजू की कहानी। एक कहानी जो हमें सिखाती है कि इंसानियत और ईमानदारी का फल भले ही देर से मिले, पर मिलता जरूर है। और जब मिलता है तो ऐसा मिलता है कि दुनिया देखती रह जाती है।
अगर आपने भी कभी किसी की निस्वार्थ मदद की है, या आपकी मदद किसी ने की है, तो अपने अनुभव हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताइए।
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आपके प्यार और साथ के लिए धन्यवाद।
समाप्त
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