काशी का ‘कलंक’ और मानवता का ‘मसीहा’: एक अभागी माँ और कचरा उठाने वाले ‘बेटे’ की महागाथा

लेखक: विशेष खोजी ब्यूरो स्थान: वाराणसी (काशी), उत्तर प्रदेश

बनारस की सुबह जहाँ शंखनाद और गंगा की लहरों से शुरू होती है, वहीं कभी-कभी यहाँ की रातें ऐसे कड़वे सच उगलती हैं जो पूरे समाज की अंतरात्मा को झकझोर कर रख देते हैं। हाल ही में काशी के एक सरकारी अस्पताल के गलियारे में जो कुछ घटा, वह आधुनिक भारत के ‘सफल’ युवाओं के चेहरे पर एक करारा तमाचा है। यह कहानी है सावित्री देवी की, जिन्हें उनके अपने खून ने ‘लावारिस’ छोड़ दिया, और गोविंद की, जिसने ‘अछूत’ कहलाकर भी एक माँ को मोक्ष दिलाया।

खंड 1: ममता का अंधा विश्वास और विश्वासघात की पटकथा

सावित्री देवी के लिए उनका बेटा रोहन ही उनकी दुनिया था। पति की मृत्यु के बाद, उन्होंने अपनी पुश्तैनी बालियाँ और घर का एक-एक तिनका बेचकर रोहन को मुंबई भेजा ताकि वह बड़ा आदमी बन सके। रोहन बड़ा आदमी बना भी—एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊँचे पद पर आसीन। लेकिन जैसे-जैसे उसकी बैंक बैलेंस बढ़ी, उसकी संवेदनाएं मरती गईं।

मुंबई की चकाचौंध और अपनी पत्नी प्रिया के दबाव में, रोहन को अपनी बीमार माँ एक ‘पुराना फर्नीचर’ लगने लगी। वह उन्हें काशी विश्वनाथ के दर्शन के बहाने बनारस लाया। अस्पताल के उस सीलन भरे गलियारे में, एक ठंडी लोहे की बेंच पर बैठाकर उसने कहा, “माँ, मैं दवा लेकर आता हूँ, तुम यहीं बैठना।” सावित्री देवी घंटों बैठी रहीं। उन्हें नहीं पता था कि जिस बेटे को उन्होंने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज वही बेटा उन्हें मौत के मुहाने पर छोड़कर जा चुका है।

.

.

.

खंड 2: अस्पताल की बेरुखी और एक ‘अछूत’ का आगमन

रात गहराने लगी। अस्पताल का स्टाफ सावित्री देवी को एक ‘लावारिस बुढ़िया’ समझकर अनदेखा कर रहा था। बिना पर्ची और बिना पैसों के, उस सरकारी अस्पताल में एक माँ की जान की कीमत शून्य थी। भूख, प्यास और अपने ही बेटे के तिरस्कार ने सावित्री देवी को भीतर से तोड़ दिया। उनकी साँसें उखड़ने लगीं और वे फर्श पर गिर पड़ीं।

तभी वहां ‘गोविंद’ आया। अस्पताल का एक मामूली सफाई कर्मचारी, जिसे समाज ‘नीची जाति’ का मानकर दूर रहता है। गोविंद ने जब उस वृद्ध महिला को तड़पते देखा, तो उसे अपनी स्वर्गवासी माँ की याद आ गई। उसने अपनी पानी की बोतल उनके होठों से लगाई। यह वह क्षण था जहाँ ‘खून के रिश्ते’ हार गए थे और ‘इंसानियत’ जीत रही थी।

खंड 3: गोविंद का ‘अतुलनीय’ त्याग—शॉल और दवा

गोविंद के पास बहुत कम साधन थे। अपनी झोपड़ी की छत ठीक कराने के लिए उसने महीनों से जो पैसे बचाए थे, वे सब उसने सावित्री देवी की दवाइयों पर खर्च कर दिए। बनारस की सर्द रात में जब सावित्री ठंड से कांप रही थीं, तो गोविंद ने अपनी पुरानी और फटी हुई ऊनी शॉल उन्हें ओढ़ा दी। वह शॉल भले ही फटी थी, लेकिन उसमें एक बेटे की सच्ची गर्माहट थी।

जब डॉक्टरों ने इलाज से मना कर दिया, तो गोविंद उनके पैरों में गिर पड़ा। उसने अपनी इज्जत की परवाह नहीं की, बस एक माँ की जान की भीख माँगी। अंततः, एक इंजेक्शन लगा, जिससे सावित्री देवी का दर्द थोड़ा कम हुआ। लेकिन नियति का फैसला कुछ और ही था। सावित्री देवी ने गोविंद के गले में अपनी आखिरी निशानी—एक तुलसी की माला—पहना दी और उसकी गोद में अपनी अंतिम साँसें लीं।

खंड 4: मणिकर्णिका का न्याय और रोहन का पतन

अस्पताल प्रशासन ने शव को ‘लावारिस’ घोषित कर दिया, लेकिन गोविंद अड़ गया। उसने अपनी पत्नी की आखिरी निशानी, एक चाँदी की चेन, बेचकर सावित्री देवी के अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियाँ खरीदीं। मणिकर्णिका घाट पर, जहाँ बड़े-बड़े राजाओं की चिताएं जलती हैं, वहां एक सफाई कर्मचारी ने एक सवर्ण माँ को मुखाग्नि दी।

उसी समय दिल्ली के एक फोटो जर्नलिस्ट, आर्यन ने इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर लिया। अगले दिन यह खबर पूरे देश में ‘वायरल’ हो गई। इंटरनेट की दुनिया ने रोहन को ढूँढ निकाला। रोहन और उसकी पत्नी प्रिया का सामाजिक बहिष्कार शुरू हो गया। कंपनी ने उसे नौकरी से निकाल दिया, उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई और वह आलीशान घर, जिसके लिए उसने अपनी माँ की बलि दी थी, वह उसके लिए एक ‘नर्क’ बन गया।

खंड 5: पश्चाताप की अग्नि और अधूरा न्याय

रोहन बदहवास होकर बनारस भागा। वह अस्पताल पहुँचा, लेकिन वहां केवल सन्नाटा था। एक नर्स ने नफरत से कहा, “तुम्हारी माँ तो मर गई, उनकी राख भी अब गंगा में मिल चुकी है।” रोहन मणिकर्णिका घाट पर पहुँचा और उस ठंडी राख को मुट्ठी में भरकर दहाड़ मारकर रोया। लेकिन वे आँसू अब बेकार थे। माँ चली गई थी, और पीछे छोड़ गई थी एक कभी न खत्म होने वाला पछतावा।

निष्कर्ष: मानवता ही धर्म है

सावित्री देवी और गोविंद की यह कहानी हमें सिखाती है कि:

    रिश्ते खून से नहीं, कर्मों से बनते हैं: रोहन जैसे बेटे समाज के लिए कलंक हैं, जबकि गोविंद जैसे लोग इंसानियत के सच्चे मसीहा।

    कर्मों का फल अटल है: रोहन ने जो बोया, वही काटा। आधुनिकता का मतलब अपनी जड़ों को भूलना नहीं है।

    इंसानियत की कोई जाति नहीं होती: एक ‘अछूत’ के हाथों से माँ को मिला मोक्ष, हर सामाजिक रूढ़ि पर एक तमाचा है।

आज भी काशी के उस अस्पताल में गोविंद अपना काम करता है। उसे कोई मलाल नहीं है कि उसने अपनी सारी जमापूंजी एक अजनबी औरत पर लुटा दी। उसे तो बस उस तुलसी की माला में अपनी माँ का आशीर्वाद महसूस होता है। काशी की हवा में आज भी यह कहानी गूँजती है, जो हमें याद दिलाती है कि “इंसानियत का दिया कभी नहीं बुझता।”


लेखक की कलम से: यह लेख उन सभी माताओं को समर्पित है जो आज भी किसी अस्पताल की बेंच पर अपने ‘रोहन’ की राह देख रही हैं। याद रखिये, माँ भगवान का रूप है, और उसे त्यागना ईश्वर को त्यागने के समान है।