वर्दी पर दाग: बरेली का वह भयावह रात

अध्याय 1: कर्तव्य और अकेलापन

उत्तर प्रदेश का बरेली जिला अपनी रूहानियत और शोर-शराबे के लिए जाना जाता है, लेकिन पीलीभीत शहर की ‘चित्रा कॉलोनी’ में सन्नाटा कुछ ज्यादा ही गहरा था। इसी कॉलोनी के एक छोटे से घर में काजल देवी रहती थी। काजल कोई साधारण महिला नहीं थी; वह पास के थाने में तैनात एक निडर महिला दरोगा थी।

36 साल की उम्र में भी काजल के चेहरे पर एक गजब का तेज था, लेकिन उसकी आँखों के पीछे एक गहरा दुख छिपा था। तीन साल पहले एक सड़क दुर्घटना ने उसके पति को उससे छीन लिया था। तब से काजल की दुनिया उसके 12 साल के बेटे टिंकू के इर्द-गिर्द सिमट गई थी।

काजल की दिनचर्या मशीन की तरह चलती थी—सुबह टिंकू का नाश्ता बनाना, उसे स्कूल की तैयारी में मदद करना और फिर अपनी नीली स्कूटी पर सवार होकर वर्दी के रौब के साथ थाने निकल जाना। शाम को 7 या 8 बजे जब वह घर लौटती, तो थकान और अकेलापन उसे घेर लेता। इसी अकेलेपन ने उसे धीरे-धीरे शराब की तरफ धकेल दिया था। वह रात को दो घूंट पीकर सो जाती ताकि यादों का शोर कम हो सके। उसे नहीं पता था कि उसकी यही आदत उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनने वाली है।

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अध्याय 2: शिकारी की नजर और पहला टकराव

उसी कॉलोनी के मकान नंबर 56/185 के पास एक कमरा किराए पर लेकर रहता था अनूप सिंह। अनूप एक ऑटो ड्राइवर था, लेकिन उसका असली काम और शौक औरतों का पीछा करना और अय्याशी करना था। वह तीन महीने पहले ही इस कॉलोनी में आया था और उसकी नजर हमेशा काजल देवी पर रहती थी।

12 दिसंबर 2025 की उस शाम अनूप अपनी ऑटो के साथ चौराहे पर खड़ा था, जब उसकी मुलाकात विमला से हुई। विमला एक ऐसी महिला थी जो पैसों के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी। अनूप उसे अपने कमरे पर ले गया। लेकिन तभी काजल देवी, जो अपनी पड़ोसन करुणा के साथ गश्त पर थी, वहां पहुँच गई।

काजल ने अनूप को रंगे हाथों पकड़ा। “अगर दोबारा इस कॉलोनी में गंदगी फैलाई, तो जेल की चक्की पीसते-पीसते बुढ़ापा आ जाएगा,” काजल ने गरजते हुए कहा था। उस दिन अनूप काजल के पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाया, लेकिन उसके मन में प्रतिशोध की ज्वाला जल उठी। उसने काजल का मोबाइल नंबर एक ‘जरूरत’ के बहाने ले लिया, ताकि वह सही समय पर वार कर सके।

अध्याय 3: नियति का खेल: खराब स्कूटी और ऑटो का सफर

तारीख थी 22 दिसंबर 2025। सुबह के समय काजल जल्दी में थी। टिंकू का स्कूल था और उसे थाने में एक बड़ी मीटिंग में जाना था। उसने स्कूटी स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। बैटरी शायद जवाब दे गई थी।

परेशानी में काजल ने अपने पुराने ऑटो वाले को फोन किया, पर उसने नहीं उठाया। तभी उसे अनूप की याद आई। “हेलो अनूप! मेरी स्कूटी खराब है, जल्दी ऑटो लेकर मेरे घर आओ,” काजल ने फोन पर आदेश दिया।

20 मिनट में अनूप वहां हाजिर था। जब उसने काजल को पूरी पुलिस यूनिफॉर्म में देखा, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। वह काजल को और उसके बेटे को स्कूल छोड़ने निकला। रास्ते भर अनूप ने काजल से बहुत मीठी और सम्मानजनक बातें कीं। काजल को लगा कि शायद उस दिन की डांट ने अनूप को सुधार दिया है।

“मैडम जी, शाम को भी मैं ही आपको थाने से लेने आ जाऊंगा,” अनूप ने बड़ी विनम्रता से कहा। काजल ने हामी भर दी।

अध्याय 4: षड्यंत्र की शुरुआत: नशे का मायाजाल

शाम के 7:30 बज चुके थे। बरेली की सर्द रात अपना पैर पसार रही थी। अनूप ने अपने दोस्त अंकित के साथ मिलकर पहले ही नशा किया था ताकि वह अपने खौफनाक मंसूबों को अंजाम दे सके।

काजल जब थाने से बाहर आई, तो वह काफी थकी हुई और मानसिक रूप से परेशान थी। ऑटो में बैठते ही उसने अनूप से कहा, “अनूप, रास्ते में किसी ठेके पर ऑटो रोकना। आज बहुत सिरदर्द है, थोड़ी दवा (शराब) लेनी होगी।”

अनूप के लिए यह जैकपॉट था। उसने काजल के लिए शराब खरीदी और फिर उसे एक सुनसान इलाके की तरफ ले गया। काजल ने वहीं ऑटो में बैठकर पीना शुरू किया। अनूप ने अपनी बातों के जाल में फंसाकर काजल को जरूरत से ज्यादा शराब पिला दी। काजल का होश धीरे-धीरे जवाब देने लगा। उसकी वर्दी का रौब, उसकी ताकत, सब कुछ नशे के सैलाब में डूब गया।

अध्याय 5: झाड़ियों के पीछे का काला सच

जब काजल पूरी तरह बेसुध हो गई, तो अनूप ने अपना असली रंग दिखाया। उसने ऑटो एक सुनसान झाड़ी के पास रोकी। उसके पास कोई हथियार नहीं था, इसलिए उसने शराब की खाली बोतल को पत्थर पर मारकर तोड़ा और उसका नुकीला कांच काजल के गले पर रख दिया।

“अब बोल दरोगा साहिबा! कहाँ गया तेरा रौब?” अनूप ने घृणा के साथ कहा। उसने काजल को झाड़ियों के पीछे घसीटा और उसके साथ वह घिनौना कृत्य किया जिसे सुनकर रूह कांप जाए। उसने न केवल एक महिला का सम्मान रौंदा, बल्कि उस वर्दी का भी अपमान किया जो सुरक्षा का प्रतीक थी।

इतना ही नहीं, अनूप ने अपने दोस्त अंकित को भी फोन करके बुला लिया। “अंकित, आज एक चिड़िया फंसी है, तू भी आ जा।” अंकित आया और उसने भी काजल की बेसुध हालत का फायदा उठाया। उन दोनों ने मिलकर इंसानियत को शर्मसार कर दिया।

अध्याय 6: कमरे का नर्क और तीसरे दोस्त का प्रवेश

रात गहराती जा रही थी। अनूप और अंकित काजल को बेसुध हालत में अनूप के कमरे पर ले आए। वहां फिर से शराब का दौर चला और फिर से काजल के साथ दरिंदगी हुई।

नशे में धुत अंकित ने अपने एक और जिगरी दोस्त विक्रम को फोन किया। विक्रम एक सामान्य लड़का था जो इन दोनों की असलियत से अनजान था। जब विक्रम कमरे में पहुँचा और उसने वहां का नजारा देखा, तो उसके होश उड़ गए।

“तुम पागल हो गए हो? यह तो वही पुलिस वाली है जो कॉलोनी में रहती है! तुम लोगों ने यह क्या किया है?” विक्रम चिल्लाया। अनूप और अंकित ने उसे भी लालच दिया, “तू भी हाथ धो ले बहती गंगा में, किसी को पता नहीं चलेगा।”

विक्रम ने वहां समझदारी से काम लिया। उसने बहाना बनाया कि उसे जरूरी काम है और वह वहां से निकल गया।

अध्याय 7: मानवता की जीत और न्याय की दस्तक

कमरे से बाहर निकलते ही विक्रम का दिल तेजी से धड़क रहा था। उसने सोचा कि अगर उसने आज आवाज नहीं उठाई, तो वह भी इस पाप का भागीदार होगा। उसने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल रोकी और पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया।

“चित्रा कॉलोनी के पास वाले कमरे में एक महिला ऑफिसर की जान खतरे में है, जल्दी पहुँचिए!”

कुछ ही देर में पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई वहां पहुँचीं। जब दरवाजा तोड़ा गया, तो पुलिस वाले सन्न रह गए। उनकी अपनी सहकर्मी, एक जांबाज अफसर, वहां सबसे अपमानजनक स्थिति में पड़ी थी। अनूप और अंकित को मौके पर ही धर-दबोचा गया।

अध्याय 8: अंजाम और एक नई सुबह

अगले दिन बरेली के अखबारों में यह खबर छाई हुई थी। अनूप और अंकित की पुलिस ने जमकर खातिरदारी की और उन्होंने अपना जुर्म कबूल कर लिया। काजल देवी को अस्पताल में भर्ती कराया गया। शारीरिक जख्म तो भर जाएंगे, लेकिन मानसिक घाव भरने में वक्त लगेगा।

विक्रम को उसकी बहादुरी और सही समय पर सही निर्णय लेने के लिए पुलिस प्रशासन ने सम्मानित किया। काजल के बेटे टिंकू को भी समझ आ गया कि उसकी माँ ने किन कठिन परिस्थितियों का सामना किया है।


लेखक का संदेश (कुलदीप राणा के अंदाज में)

दोस्तों, यह कहानी हमें दो बड़ी सीख देती है। पहली यह कि नशा चाहे गम का हो या खुशी का, वह हमेशा इंसान को कमजोर बनाता है और भेड़ियों को मौका देता है। दूसरी यह कि समाज में आज भी विक्रम जैसे लोग मौजूद हैं, जिनकी वजह से इंसानियत बची हुई है।

हमें सजग रहना होगा, सावधान रहना होगा। अनूप जैसे दरिंदे हमारे आस-पास ही छिपे हो सकते हैं। कभी भी किसी अनजान या अपराधी छवि वाले व्यक्ति पर जरूरत से ज्यादा भरोसा न करें।

मिलते हैं अगले किसी और घटनाक्रम के साथ। तब तक के लिए—जय हिंद, सुरक्षित रहें!